मार्च 2016
अंक - 12 | कुल अंक - 63
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

भाषांतर
व्लादिमीर इलीइच लेनिन (1870-1924) रूस में बोल्शेविक क्रांति का नेता एवं रूस में साम्यवादी शासन का संस्थापक!  श्रमिकों में क्रांति की चिंगारी डालने के लिए बंदी गृह में डाल दिया गया। तीन वर्ष की इस निर्वासन अवधि के दौरान आपने तीस पुस्तकें लिखीं। 'वास्तविक' लोकतंत्र तथा समाजवाद के स्थापनार्थ विश्व के अन्य सभी देशों में रहने वाले श्रमिकों के साथ अंतरराष्ट्रीय बंधुत्व की भावना विकसित करने के लिए प्रतिबद्ध क्रांतिकारी की दो कविताओं का नीता पोरवाल जी द्वारा हिंदी रूपांतरण-
 
लेनिन से संवाद 
 
घूमता घटनाचक्र   
एक नहीं, कई कामों के लिए प्रतिबद्ध!
 
रात की परछाईं पसरते ही
धीरे-धीरे डूब ही जाता है दिन
अब दो लोग हैं कमरे में
सफ़ेद दीवार पर टंगी
लेनिन की तस्वीर और मैं
कि खिसकने लगती है ऊपर की ओर खूंटी
ऊपर उठे उसके होंठ की तरह
कुछ बोलने के लिए मानो
अभी झटके से खुल पड़ेगा उसका मुंह
 
तनाव से सिकुड़ती
गहन सोच-विचार में जकड़ी,
अपनी विशाल सोच की तरह ही
घनेरी उसकी भंवें
 
पताकाओं का जंगल
और उनके साये में
कूच करती हजारों की भीड़
घनी झाडियों से उठे उनके अनगिनत हाथ
 
हर्षोल्लास से दमकते
उन्हें देखने की उत्कंठा से
उठ पड़ता हूँ मैं अपनी जगह से
उनका अभिवादन करने के लिए
उनके बारे में जानकारी हासिल करने के लिए
 
कामरेड लेनिन!
(दफ़्तर से मिले निर्देश की
महज खानापूर्ति की तरह नहीं
अपितु पूरी निष्ठा व लगन से)
मैं उनके बारे में बताना चाहूँगा तुम्हें
 
बेहद मुश्किल काम
जिसे पूरा करने के लिए दर-दर भटक रहे हैं हम
जरुर पूरा होगा
और जो लगभग पूरा हो भी गया है
 
जरुरतमंदों को दे रहे हैं हम
खाना और कपड़े साथ बिजली भी
भर दिये गए हैं
कोयले और लोहे के भंडार
पर चारों ओर बिखरा
रक्त रंजित मलबा उठाने के लिए
हमारे पास अब थोड़ी रकम बची है
 
तुम्हारे बगैर
कितने ही हैं जो बेरोजगार हो गए
और यही है एकमात्र सारे फसाद और
सारे झगड़े की वज़ह
 
कितनी ही काई
हमारी मातर भूमि की सीमाओं पर
और भीतर जमी पड़ी है
  
उन्हें चिन्हित करो
और समझा दो
बज चुकी है रणभेरी
 
कई प्रजाति हैं उनकी
वे उतने ही खतरनाक हैं:
जैसे बिच्छू और जमींदार
उनमें से कुछ
जो बरबादी की राह पर चल पड़े:
वे पियक्कड,कट्टरपंथी और चाटुकार हैं
 
वे मोर की तरह
घमंड में चूर
घूमते हैं चारों ओर
अपने सीने पर कलम
और बिल्ला चिपकाए
 
हमें उन्हें प्रशिक्षित करना ही होगा
लेकिन उन्हें प्रशिक्षित करना इतना आसान भी नहीं
 
बर्फ से ढंकी जमीन हो,
या हरे-भरे मैदान,
या हो कारखाने
हमेशा हर जगह
हमारे दिल में होते हो तुम
 
कामरेड लेनिन!
हम बनाएंगे,
हम सोचेंगे,
हम सांस लेंगे,
हम जीवित रहेंगे,
और इस तरह
डटकर मुकाबला करेंगे हम
 
घटनाओं का एक चक्र
एक नहीं, कई कामों के लिए संकल्पबद्ध    
धीरे-धीरे डूब ही गया दिन
पसरने लगी है रात की परछाईं
और अब दो व्यक्ति हैं कमरे में
सफ़ेद दीवार पर
लेनिन की तस्वीर और मैं!
 
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सुनो!
 
सुनो!
टिमटिमाते हैं सितारे अगर
यानि- किसी को जरूरत है इनकी
यानि- कोई तो है जो बन जाना चाहता है इन जैसा
किसी को तो भरोसा है
रौशनी की भव्य बौछार पर
 
भरी दुपहरिया
धूल भरे बबंडर में
अकुलाता घूमता वह
फूट-फूट कर रो पड़ता है ईश्वर के समक्ष
इस डर से, कि पहले ही हो चुकी है बहुत देर
चूमकर ईश्वर का बलिष्ठ हाथ
करना चाहता है एक वादा उससे
जमीन पर एक सितारा होगा जरुर ऐसा
वह लेता है कसम
क्योंकि बगैर सितारे के
इस अग्नि परीक्षा में सफल हो पाना मुमकिन नहीं
 
बाद में
ऊपर से शांत लेकिन
मन ही मन दुखी हो भटकता है चारों ओर
 
भरोसा देता सबको
कि अब
सही है सब कुछ
डरने की कोई जरूरत नही तुम्हें
सुना तुमने?
 
सुनो,
टिमटिमाते हैं सितारे अगर
यानि- सचमुच किसी को जरूरत है इनकी
यानि- बहुत जरुरी है
कि हर शाम
उन तमाम ऊंची इमारतों के शिखर तक
कम से कम एक सितारा तो पहुंचे!
 
अंग्रेजी से अनुवाद- नीता पोरवाल

- नीता पोरवाल

रचनाकार परिचय
नीता पोरवाल

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