मार्च 2016
अंक - 12 | कुल अंक - 61
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

लघुकथाएँ
दंश
 
बाबूजी ने बहुत उमंग और आतुरता से घण्टी बजाई। बिटिया खुश हो जाएगी उन्हें अचानक सामने देखकर। कब से नहीं मिले हैं उससे। दो पल बाद द्वार खुला। लड़खड़ाते हुए जमाई बाबू ने दरवाजा खोला। मुँह से एक तेज बदबूदार भभका और हाथ में आभूषण। प्रणाम की मुद्रा में जुड़े हाथ यूं ही रह गए। 
"बाबूजी आप!"
बेटी पर निगाह पड़ी तो कलेजा मुँह को आ गया। तन पर मारपीट के निशान, शरीर पर आभूषण के नाम पर नाक की कील तक न थी। आँखों के नीचे पड़े स्याह घेरे अपनी कहानी खुद कह रहे थे।
उसकी दशा देखकर बहुत देर तक पछताते रहे।
"तू चल मेरे साथ, इस नर्क में अब मैं तुझे एक पल भी नही रहने दूँगा।"
"नही बाबूजी, अब यही तकदीर है मेरी, जिसे आपने चुना है मेरे लिए।"
"मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई बेटी!"
"माँ-बाप से कहाँ कभी कोई गलती होती है बाबूजी?" कहते हुए विकास की याद आ गई जो दिल की गहराईयों से चाहता था उसे। अश्रु उसके गालों से ढलक पड़े
"यह आपके अपने समाज के हीरे जैसे वर की चमक है, मुझे तो अब इसी चमक में रिसना है जिंदगी भर!"
 
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लिखी हुई इबारत
 
बड़ी बेसब्री से बेटे की पसन्द देखने का इंतज़ार करती डॉक्टर शिल्पा उस लड़की को देखकर चौंक गई।
"ये क्या शिशिर को यही मिली थी?"
सात वर्ष पहले किसी सम्बन्धी की ज़बरदस्ती का शिकार होकर गर्भवती हुई उस किशोरी को उसी ने छुटकारा दिलाया था उस मुसीबत से।
"ठीक है लड़की की कोई गलती नहीं थी, पर मेरा ही बेटा क्यों?" रसोई में आकर वह बड़बड़ाई। उसका मन कसैला हो उठा था।
"आप फ़िक्र मत करिये, मैं शिशिर को कोई बहाना बनाकर शादी से इंकार कर दूँगी।" पृष्ठ से उभरे स्वर को सुनकर शिल्पा चौंक गई। उसने पलटकर देखा तो रसोई में उस लड़की को पाया। अवसाद की काली छाया उसके चेहरे पर देख वह यकायक कुछ नहीं कह पाई। कुछ पल संशय में रही।
"रहने दो शुचि, कुछ मत कहना उससे, मैं ही भूल गई थी की तुम मानव हो, कोई कागज का टुकड़ा नहीं, जिस पर एक बार कोई इबारत लिख गई तो वो बेदाग न रहा। किसी की दुष्टता की सज़ा तुम क्यों भुगतो?"
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मिठाई
 
नास्तिक बाबूजी को देर रात, चुपके से पूजा घर से निकलते देख मानस की उत्सुकता जाग गई और पुलिसिया मन शंकित हो उठा। वो चुपके से उनके पीछे चल पड़ा। उन्होंने हाथ में पकड़ा लड्डू माँ की ओर बढ़ा दिया।
"लो, खा लो।"
"ये कहाँ से लाए आप?"
"पूजा घर से" उन्होंने निगाह चुराते हुए कहा।
उसकी आँखें भर आयीं अपनी लापरवाही पर। घर में सौगात में आये मिठाई के डिब्बों का ढेर मानो उसे मुँह चिढ़ा रहा था।
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विक्षिप्तता की झलक
 
हाथ से अधिक तेज उसकी जुबान चल रही थी। उधर अमित का गुस्सा बढ़ता जा रहा था उसकी बकझक से। जिया ने आग्नेय दृष्टि से उसे घूरा फिर पौधों को पानी देने लॉन में आ गई। बर्तन मलते हुए, कम दिमाग वाली वो पगली-सी किशोरी कभी मुस्कुरा रही थी, तो कभी गालियाँ बक रही थी।
"शिवानी आ गई है क्या मिसेज़ शर्मा?" बाहर नीरा ने पूछा तो उसकी त्योरियों पर बल पड़ गए।
" हाँ, आ गई पगलिया"
कॉलोनी में इन दिनों कामवालियों का अकाल-सा हो गया था। प्रत्येक गृहणी को एक अदद कामवाली की तलाश थी। उधर सभी के नखरे बहुत थे। ऐसे में उस पगली को काम पर रखना, गृहणियों की विवशता थी। काम सब कर देती थी, बस अनाप-शनाप कुछ भी बकती रहती थी।
जब अचानक ही वो वमन करने लगी, चेहरा पीला पड़ गया, तो सबकी वक्र दृष्टि उस पर जम गई। हर घर में यही चर्चा थी। कुछ निगाहों में सहानुभूति थी, तो कुछ में घृणा, कुछ में कौतुहल तो कुछ में व्यंग्य।
"न जाने किसका पाप लिए घूम रही है। वो तो चलो फिर भी पागल है।पर जिस नीच ने उसके पागलपन का फायदा उठाया थू है उस जानवर पर" उसने पच्च से थूक दिया।
 
काफी देर तक नीरा के साथ इधर-उधर की करके वह अंदर आई तो जड़ रह गई।
देखा तो पगलिया उसके पति की बाँहों में झूल रही है।

- ज्योत्स्ना 'कपिल'

रचनाकार परिचय
ज्योत्स्ना 'कपिल'

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कथा-कुसुम (4)