मार्च 2016
अंक - 12 | कुल अंक - 58
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कहानी
रिंग-अ-रिंग ओ' रोजेज़
 
भित्ति के पात्र का नाम भित्ति ही क्यूँ रखा? यह शायद मैं न बता पाऊं.... हाँ, शायद कहानी के अंत तक यह नाम स्वयं को जस्टीफ़ाय कर पाए | कुछ लोगों को भित्ति दया की पात्र लग सकती है तो कुछ को एक मौकापरस्त स्त्री जो इस समाज को बड़ी साफगोई से अपने हिसाब से जीती है | भित्ति को लेकर यहाँ मेरी निजी धारणा कुछ भी नहीं | मुझे तो यह कहानी  लिखने से पहले अंदाजा नहीं था कि मैं स्वयं ही शायद समाज की इस हिपोक्रेसी को दर्शाने में हिचकिचाहट महसूस करने लगूंगी | नहीं... नहीं... कोई डर नहीं था, बस एक स्त्री होते हुए किसी दूसरी स्त्री के जीवन की बेबाक सच्चाई का सामना करते हुए ऐसा लग रहा था कि जैसे दर्पण में कोई अपने ही प्रतिबिंब के माथे पर पसीने की बूँदें देख ले | तो कहानी कुछ यूँ कहूँगी .......
 
भित्ति कुछ दूर तक तो उसके पीछे दौड़ी फिर ठिठक कर हांफने लगी, उसने पास ही दीवार के साथ सटी एल्मुयूनियम की रेलिंग को पकड़ लिया | साँस संयत होते-होते सब कुछ उसे धुंधला-सा दिखाई देने लगा था या शायद उसकी पलकों में बीते, जीवन की स्मृतियां पिघलने लगी थीं | उसकी आँखों में एक साथ कई सारे कांटे उग आए हो | सीने में धड़कनें इतनी तेज़ हो गई थी कि यूँ लगने लगा जैसे धड़कनों की रफ़्तार दिल को अपने अंदर ही कचोट कर ले जाएगी |
 
उसने आँखों को रगड़कर मसला जैसे भीतर पड़े कचरे को साफ़ करने पर शायद फिर से सब कुछ सामान्य दिखने लगेगा | आँखों पर से हाथ हटाया ही था कि एक जानी-पहचानी गंध उसके नथुनों में समा गई | नीचे देखा तो पैरों के नीचे किसी लिजलिज़ी वस्तु के आ जाने की सी अनुभूति हुई | उसने अचकचा कर अपनी साड़ी टखनों तक ऊँची उठा ली | चप्पलों के नीचे से होते हुए एक लंबी पंक्ति दूर तक खिंची जा रही थी | पीछे मुड़कर देखा तो वही गू-मूत की मिलीजुली हरी और काली कतार ज़मीन पर घिसटती दिखाई दी, जिससे वह बीते कई महीनों से जूझ रही थी | कई बार तो उसे लगता था कि पम्मू के कपड़े धोते-धोते उसके हाथों की रेखाओं के स्थान पर इन हरी-काली लकीरों ने अपना कब्ज़ा जमा लिया हो और अब उसका व उसके बच्चों का भविष्य भी इन हरी-काली लकीरों के द्वारा ही तय होगा |
 
उसके मन में घिन जैसा तो कुछ नहीं था, हाँ किन्तु अपने इन्हीं हाथों से उसे कुछ खाना भी अब सुहाता न था | दिन में अनेक बार पम्मू के गंदे कपड़े धोते-सुखाते और फिर धोते हुए उसे पम्मू की इस हालत पर रोना आता रहता था | यूँ तो आँसूओं का निकलना एक शारीरिक प्रक्रिया होती है, शरीर के रिएक्शन जताने का यह अनोखा तरीका भित्ति बचा कर रखना चाहती थी, बहुत बाद के लिए ....शायद आशंका के इरादों को भांपती भित्ति की आँखें इन आंसूओं को सहेजने में लगी थी ..बाद के लिए ...शायद? नहीं यक़ीनन...बहुत बाद के लिए | 
 
वह पम्मू के प्रति सहानुभूति से भर उठती थी और अपने प्रति दया से, कि इस भरी जवानी में जहाँ उसे पम्मू के जोश की निशानियों के परिणाम स्वरुप प्रेम-पगी चादरें धोनी चाहिए थी वहीं उसे पम्मू के हंगे-मूते कच्छे धोने पड़ रहे थे | अब तो भित्ति ने गिनती करना भी छोड़ दिया था कि पम्मू ने दिन में कुल कितने कच्छे बिगाड़े और आंकड़े इकठ्ठा करके कुछ फ़र्क भी किसे पड़ना था? अब तो उसने अपनी सारी पुरानी साड़ियाँ, पुराने कपड़े, घर-भर की सारी पुरानी चादरें तक फाड़-फाड़कर पम्मू के लंगोट बना दिए थे | इन लंगोटों को बदलते समय गलती से भी उसका हाथ यदि पम्मू के अंगों को छू जाए तो उसका मन ग्लानी से भर उठता था |
 
खुमारी भरे वक़्त में भित्ति के इन्हीं हाथों से जबरन अपने अंग पकड़वाने वाला पम्मू कैसे उन्मादित होकर बेस्ट परफोर्मेंस देने को उतावला हुआ रहता था | वहीं अब जरा सा छू भर जाए तो दर्द से कराह उठता है | भित्ति सिहर उठती है... छी-छी वह भी क्या सोचने लग जाती है ? भला यह समय है इस तरह की बातें ज़ेहन में लाने का? लेकिन हर व्यक्ति सुख-दुःख के बीच वर्तमान से अतीत के बीच पेंडुलम की तरह डोलता ही रहता है | कभी न कभी हर व्यक्ति निजी हो ही जाता है...बेहद अन्तरंग बातें किसी ऐसे संवेदनशील समय में याद आ जाना किसी गुनाह का सबब भी तो नहीं होती .... आख़िरकार हर व्यक्ति पहले अपने ही बारे में तो सोचता है फिर अंत में किसी दूसरे के | भित्ति भी क्या अलहदा सोच रही थी? वह भी तो एक साधारण मनुष्य ही थी | जीवन को भरपूर जीने की ऊष्मा कभी-न-कभी हर देह के भीतर उठती ही है | प्रेम देने व पाने की कोई सीमा नहीं होती....प्रेम किसी कानून और किसी नियम का मोहताज नहीं होता, प्रेम देना आज भित्ति का फ़र्ज़ है तो इसी प्रेम के ठहर जाने या चुक जाने के ख़याल को दिमाग में ले आने भर से वह अपने आप को स्वार्थी नहीं मानती | चाहे वह इस वक़्त कितने भी कठिन समय से क्यों न गुज़र रही हो | हर व्यक्ति किसी एक क्षण के लिए ही सही किन्तु स्वार्थी तो हर मनुष्य बनता ही है |
 
पम्मू का अपने शरीर पर कोई अधिकार ही नहीं रहा था | सब कुछ जैसे उसके बस के बाहर हुआ जा रहा था | दिन-रात उसके चेहरे पर एक निरीह भाव पसरा रहता था | अपने-आप को दूसरे पर बोझ बनता देखने की लाचारी, अपनी पत्नी को टूटते देखने की लाचारी, बच्चों के उजड़ते भविष्य की चिंता उसे और भी कमज़ोर कर रही थी | सबसे ज्यादा दुःख तो उसे इस बात पर होता था कि उसकी गंदगी कोई और उठाए हालांकि भित्ति ने कभी कोई शिकवा या शिकायत नहीं की थी | शिकायत करती भी तो किससे....उस भगवान से जिसने पम्मू को यह भयंकर बीमारी दी थी? या अपने माँ-बाप से जिन्होंने उसकी शादी पम्मू से की थी? भित्ति की इस परिस्थिति में दोष तो किसी का भी नहीं ठहरता, न भगवान का... न उसके माता-पिता का। आख़िर प्रकृति के नियम के आगे सभी को सिर झुकाना पड़ता है .....हाँ आजकल सब ऐसे ही जुमले ढूंढ लाते हैं भित्ति को बहलाने के लिए |
  
भित्ति इस मुसीबत की घड़ी में अबला बनकर मौन नहीं रहना चाहती थी वह तो एक बेहतर कल के इंतज़ार में कुछ सोचना चाहती थी, अपने परिवार पर आई इस विपदा का मुकाबला करना चाहती थी | वह कोई असाधारण हिम्मत वाली स्त्री थी ऐसा भी नहीं था किन्तु पम्मू को इतनी आसानी से मौत का ग्रास बनने देना उसके और उसके परिवार के हित में भी नहीं था | अपने परिवार के एकमात्र पालनहार को इतनी आसानी से गंवाया भी नहीं जा सकता |
 
भित्ति नए ज़माने की स्त्री थी, वह स्थिति को अपने हाथ में लेना जानती थी, वह रोने से पहले कम से कम एक बार हँसने की कोशिश करना चाहती थी | अब वह इसमें कितनी सक्षम थी या कितनी विफल हुई यह निर्णय तो पाठकों पर छोड़ा ही जा सकता है | फिलहाल वह पम्मू का इलाज़ करवाने मुंबई के इस अस्पताल में ले आई थी | 
 
अपने विचारों को झटककर वह फिर से फर्श पर खिचीं गू-मूत की कतार को 'फॉलो' करती हुई सामने वाले लोहे के गेट की तरफ दौड़ी | उसने पम्मू को घिसट-घिसट कर यहीं से ओझल होते देखा था लेकिन चौकीदार से पूछने पर ज्ञात हुआ कि इनडोर पेशेंट को तो बिना परमिशन वहाँ से बाहर निकलने ही नहीं दिया जाता, उस पर भी पम्मू जैसे पेशेंट का इस तरह मैन-गेट से बाहर अकेले निकल जाना तो असंभव ही लग रहा था |
 
भित्ति दाएं-बाएं वाले अहाते में से होती हुई खुले मैदानों में आगे-पीछे तक देख आई थी, बीच रास्ते में उसने न जाने कितने ही मरीजों से पम्मू के बारे में पूछताछ की थी, उनके परिजनों के सामने पम्मू का हुलिया बयान किया था | यहाँ तक की मरीजों के परिचितों से उनके इर्द-गिर्द खड़े लोगों से भी पम्मू को ढूँढने की गुहारें लगाई थी किन्तु सब व्यर्थ हो गया था | संध्या होने  तक सारे विभागों में खोजबीन होती रही किन्तु पम्मू का कुछ अता-पता न चला था |
  
 पम्मू जिस संस्था  में नौकरी करता था उसके  नियमों के तहत उसे संस्था  की और से चिकित्सा सुविधा  मुहैया थी, एक छोटी डिस्पेंसरी तो उसके अपने शहर में भी थी किन्तु बड़ी बीमारियों के इलाज़ हेतु मरीजों को मुंबई के इस बड़े अस्पताल मे भेज दिया जाता था | प्रारंभ में तो पम्मू को इस बात का अंदेशा ही नहीं हुआ था कि उसे कैंसर जैसे रोग ने आ जकड़ा है, वह तो इन लक्षणों को सामान्य बुखार व थकान समझ रहा था | धीरे-धीरे स्थिति  ज्यादा बिगड़ने लगी तब जाकर सारे टेस्ट करवाए गए जिसमें पता चला कि पम्मू कैंसर से पीड़ित है और उसका कैंसर अंतिम पड़ाव पर निकला |
 
परिवार के अकेले कमाऊ पूत पर इस बीमारी का आतंक कुछ इस कदर टूटा कि गृहस्थी की गाड़ी ही डगमगाने लगी | बूढ़े माँ-बाप, दो बेटों और पत्नी के भविष्य की कल्पना मात्र से पम्मू बिखर कर रह गया था | उसे दूर तक सब कुछ उजाड़ दिखाई दे रहा था | उसके जीवन में एक अंतहीन पतझड़ का आग़ाज़ हो चुका था | वह बार-बार नींद से जाग उठता था, उसके कानों में जीवन के सख्त पड़े दिन किसी सूखे पत्ते की तरह गिरते व सरसराते सुनाई देते जो कभी तेज़ तो कभी धीमी रफ़्तार से गोल-गोल उड़ते फिर ज़मीन पर आ ठहरते... बिखर जाते...टूट जाते... या रेत के कणों में जा मिलते और अंतत: ब्रह्मांड में विलीन हो जाते | उसे अपना जीवन भी धीमे-धीमे इसी गति से मिटता दिखाई दे रहा था | 
 
शुरूआती दिनों  में तो उसने साधारण दवाइयों से काम चलाने की कोशिश की थी किन्तु धीरे-धीरे शरीर ने साथ देना बंद कर दिया फिर कीमोथेरेपी ने तो उसे बिस्तर से ही लगा दिया | पहले-पहल तो छुट्टियों की अधिकता से घर का बजट बिगड़ा फिर बच्चों की पढ़ाई पर भी इसका असर दिखने लगा | भित्ति ने घर की जिम्मेदारियाँ अपने कन्धों पर उठाने का भरसक प्रयत्न किया | पम्मू की सेवा करना उसका कर्तव्य था किन्तु यहाँ वह इसे अपनी जरूरत अधिक मान रही थी | वह जी-जान से पम्मू को बचाने में जुट गई |
 
कई महीनों से भित्ति, पम्मू के साथ मुंबई के इस अस्पताल में डेरा जमाए हुए थी | अस्पताल में दवाइयों की गंध के कारणवश भित्ति का जी मिचलाया रहता था | उसकी भूख-प्यास खत्म होती जा रही थी, धीरे-धीरे भित्ति की सेहत बिगड़ने लगी थी | इधर पम्मू की बीमारी में रंचमात्र का भी सुधार दिखाई नहीं दे रहा था | वह दिनोंदिन चिड़चिड़ा होता जा रहा था | डॉक्टरों ने भित्ति को कोई झूठी उम्मीद नहीं दिलाई थी, पम्मू की हालत और रिपोर्टों से इतना जायजा तो भित्ति ने भी लगा ही लिया था कि पम्मू की बीमारी लाईलाज है | पम्मू की बीमारी पूरे घर भर का केंद्रबिंदु बन गई थी और सभी परिवारजन एक-दूसरे का हाथ पकडे उसके गोल-गोल "रिंग-अ-रिंग ओ' रोजेज" करते हुए से चक्कर लगा रहे थे | भित्ति को लगता था जैसे एक दिन सभी "हुश..हा..हुश हा... वी आल फ़ाल डाउन" करते हुए धड़ाम से गिर पड़ेंगे फिर सब कुछ नष्ट हो जाएगा | 
         
विवाह के पंद्रह बरसों के भीतर ही अपने ऊपर आ पड़ी इस भयंकर विपदा ने भित्ति को बुरी तरह झकझोर दिया था | बच्चों का भविष्य अब भित्ति के हाथों में था | तन्हाई में सवालों का एक अंतहीन सिलसिला उसे झिंझोड़ डालता था जबकि मन में उठने वाले तमाम सवालों के जवाब उसके पास उपलब्ध थे भी नहीं | उसे अपना परिवार तिल-तिल करके ख़त्म होता दिख रहा था | पम्मू परिवार की रेलगाड़ी का वह इंजिन था जिसके पटरी से उतरते ही परिवार का हर सदस्य एक-एक करके किसी डिब्बे की मानिंद पटरी से उतरता चला जा रहा था |
 
भित्ति इन दिनों  अपने आप को एक ऐसे पुल पर खड़ा हुआ पाती थी जिसका एक सिरा भीषण आँधी में टूटकर हवा में झूल रहा था और जिसके दूसरे सिरे पर वह अपने बच्चों के साथ खड़ी थी | पुल पार किए बिना अपने पीछे आती हुई मौत से बचना उसके लिए नामुमकिन था तो ऐसे अंधड़ में पुल के इस पार ठहरना भी | पुल से गुज़रना ही उसे अब एक मात्र सही विकल्प नज़र आ रहा था शायद यही नियति का इशारा भी था और ऐसे में एक दिन भित्ति मन को कड़ा करके अपने बच्चों समेत इस पुल को पार कर गई |
 
घर लौटकर नाते-रिश्तेदारों के बीच कई दिनों तक वह पम्मू की यही व्यथा-कथा सुना-सुना कर विलाप करती रही.... बीच-बीच में उस पर बेहोशी के दौरे भी पड़ते रहते थे, हर बार एक लंबी बेहोशी के बाद वह तरोताज़ा हो उठती थी जैसे किसी लंबी नींद के बाद जागी हो | इन दिनों सास-ससुर उसकी सेवा-टहल में लगे रहते हैं | उन्हीं से पता चला कि भित्ति को पम्मू के स्थान पर कुछ समय बाद नौकरी मिल जाएगी | बच्चे अपनी माँ को और दुखी नहीं देखना चाहते, इसलिए स्कूल से आकर अब वे पहले अपना होमवर्क करते हैं फिर चुपचाप खेलने चले जाते हैं | परिवार की ज़िन्दगी फिर से अपने पुराने ढर्रे पर लौटने लगी है |
 
इधर सब यही जानना चाहतें हैं कि फिर पम्मू का क्या हुआ? क्या वह सचमुच उस दिन बिना किसी को कुछ भी बताए अस्पताल से गायब हो गया था? या भित्ति ही उसे छोड़कर लौट आई थी? अब यह तो किसी को भी नहीं पता | सरकारी अस्पताल में कैंसर के मरीजों की बढ़ती तादाद में एक पम्मू की जिम्मेदारी भला किसने ली होगी? यदि पम्मू अपनी मन मर्जी से मुंबई की भीड़ में गुम हो गया था तो उसके जीवन की अंतिम साँसे महानगर की तेज़ रफ़्तार सड़कों से कितने दिनों तक तारतम्य स्थापित कर पाई होंगीं?    
 
बहरहाल पम्मू की इस कहानी को भित्ति ने इतनी-इतनी बार दोहराया कि सभी को यही विश्वास हो चला है कि पम्मू अपनी बीमारी से तंग आकर जीवन से छुटकारा पाने के लिए एक रोज़ बिना भित्ति को बताए अस्पताल के गेट से बाहर रेंगता हुआ बाहर निकल गया था | हाँ, इस सबके बीच एक खास बात यह हुई कि भित्ति के एक विधुर रिश्तेदार जो हाल ही में ट्रान्सफर होकर इसी शहर में आए हैं, वे इन दिनों भित्ति के इनकम टेक्स, इंश्योरेंस व फाइनेंसियल कामकाज की प्रक्रिया देख लेते हैं | आने वाले समय में भित्ति के इस जीवनचित्र में कितने रंग भर पाएंगे? यह अभी कहना मुश्किल है | फिलहाल तो "हुश..हा..हुश हा... वी आल फाल डाउन" कहकर गिरने से पहले ही भित्ति ने परिवार के सभी सदस्यों को "रिंग-अ-रिंग ओ रोजेज़" करना सिखा दिया |
 

- रजनी मोरवाल

रचनाकार परिचय
रजनी मोरवाल

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कथा-कुसुम (2)