अप्रैल 2015
अंक - 2 | कुल अंक - 61
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

प्रेम निभा कर तो दिखाओ...!
तो यह बाज़ारीकरण का दौर है. यहाँ ‘मार्केटिंग’ जितनी अच्छी होगी, आपकी साख उतनी ही गहरी होगी. आप सभ्य समाज के हर पहलू को खंगाल लें, हर कोई अपनी ‘मार्केटिंग’ की ‘टीमें’ लगा कर बैठा है. हाथ धोने के साबुन से लेकर क़िस्मत बदल देने वाले बाबाओं तक का बाज़ार गर्म है और सभी अपनी साख बनाने और उसे भुनाने में लिप्त है. पर कुछ मामलों में यह समीकरण 'फिट' नहीं बैठता.
 
प्रेम करने या हो जाने की सारी हदें इन नियमों से परे हैं. इसकी न तो ‘मार्केटिंग’ सम्भव है और न ही इसे बाज़ारू सन्दर्भों के परिप्रेक्ष्य में आँका ही जा सकता है. हाँ, प्रेम जैसे गूढ़ विषयों का प्रचार- प्रसार ज़रूर ज़ोरों पर है, और इसको कई मूल्यों में भुनाया जाता भी रहा है.
इरादतन- ग़ैरइरादतन, हमारे समाज में 'प्रेम' करने को सिर्फ विपरीतलिंगियों तक ही सीमित कर दिया गया है; और इसी परिधि में संकुचित प्रेम अपनी जिजीविषा को कलपता रहा है. इस सन्दर्भ में, कवि ग्रेशन गोल्ड को पढ़ना भी सालता है, जिसका सार रहा है, '’उस शख़्स का प्यार, उस स्त्री की ज़िन्दगी, दोनों मिलकर एक मनुज और पत्नी ही बनते हैं.'' दुर्भाग्यवश, हम, आप और समाज के प्रायः बुद्धिजीवी इसी सोच को तवज़्ज़ो देते आ रहे हैं, और आज का समाज उसी सोच की परिणिति  है.
 
सपाट शब्दों में यूँ समझा जाए कि 'प्रेम' की मार्केटिंग नहीं होती, और न ही इसे सोच-समझकर जना जा सकता है. 'प्रेम' बस प्रेम होता है और पूर्णतः ख़ालिस  होता है. इस उद्वेलित भाव का प्रस्फुटन किसी भी सन्दर्भ में जायज है, बशर्ते कि इसे अपनी सीमाओं का उल्लंघन होने से रोके रखा जाए. प्रेम करने या उसका दम्भ भरनेवाले ज़्यादातर यहीं आकर चूकते हैं और उसका भुगतान प्रेम पवित्र रहते हुए भी भोगता रहा है.
इस शब्द मात्र का दायरा अप्रतिम और संभावनाओं से भरा है, पर इसका विस्तार बहुधा ही तरीके से होता हो. हम में से भी ज़्यादातर लोग प्रेम को महसूसने का भरम जीते हैं, पर अपनी आकांक्षाओं की जागृत ज्वालामुखी कितनों ने जी है! भरसक एक फ़ीसदी से भी कम, जिसकी जड़ों में हमारा भीरूपन है जिसे हम ज़िम्मेदारियों के बहानों से ढँकते हैं, और यही हमारे एहसासों का गला घोंटता रहा है, जिसे हम पीढ़ी- दर- पीढ़ी हस्तांतरित करते आ रहे हैं. कल हमने जो अक्षर प्रेम के विषयों में गढ़े थे, आज उसी की अपेक्षा हम बच्चों से लगाए तिल-तिल अतीत को महसूसते हैं.
 
प्यार करना साहस नहीं रहा है, या कि प्यार को महसूसना, जिसे हमारे सभ्य समाज ने स्थापित किया है, पर जो उल्लेखनीय है उसे प्रेम का निर्वाह माना जाना चाहिए. फिर चाहे वो प्यार समाज के किसी वर्ग का प्रतिनिधित्व करे, बच्चों का, बुज़ुर्ग का, युवाओं का, अधेड़ों का.प्रेम सिर्फ एहसासों का ताना- बाना है, जिसे अपने शेष हिस्सों में प्रक्षेपित हुआ महसूस किया जा सकता है, और जिसकी कोई शर्त नहीं होती.
वायदों का संसार हमेशा से वृहद रहा है, पर उनका निर्वाह एक छोटी बस्ती-सा ही होता है. रिश्तों के कुचले जाने में भी सबसे आगे हमारे अपने रहते हैं, वे अपने जिनकी शिकायत भी कहीं दुष्कर होती है, पर फिर भी रिश्तों की पकड़ से हम न जुड़के भी जुड़े रहने में सुरक्षा पाते हैं. मानवीय प्रेम इसी 'सुरक्षा' की भूख में यदा- कदा भटकता रहा है, और सटीक संसर्ग की चाह में गलत रास्तों पर भी चलना क़बूल कर लेता है, जिसका परिणाम वितृष्णा और खीज पैदा करता है.
 
सारे उपक्रमों का शेष भी यही है. प्रेम को उसकी पराकाष्ठा से मिलाओ न! जब प्रेम करने में हम इतने फुदकते हैं तो उसके निर्वाह में पसीने की नदियां कहाँ से उफनती हैं, या कि सारे पौरुष को यकायक ही काठ मार जाता है!
 
प्रेम करने या पाने का अपना आनंद हो सकता है, पर चिरकाल तक उसके निर्वाह का सुख भोगा है कभी?

- अमिय प्रसून मल्लिक