फरवरी 2016
अंक - 11 | कुल अंक - 63
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

आलेख
'शरणदाता' भाइयों के आताताई बनने की कथा: मृत्युंजय पाण्डेय
 
“दुनिया में खतरा बुरे की ताकत के कारण नहीं, अच्छे की दुर्बलता के कारण है। भलाई की साहसहीनता ही बड़ी बुराई है। घने बादल से रात नहीं होती, सूरज के निस्तेज हो जाने से होती है।”- अज्ञेय
 
भारतीय इतिहास में देश विभाजन एक दुखद प्रसंग है। देश के बंटवारे की घोषणा होते ही हिन्दू-मुसलमान, जो कल तक एक दूसरे के भाई एवं पड़ोसी थे, वे अचानक एक-दूसरे के दुश्मन बन गए। विदेशी सरकार से आज़ादी के लिए संगठित होकर लड़ने वाले अपने ही भाई एक-दूसरे के लिए ‘आताताई’ बन बैठे। 
अज्ञेय की ‘शरणदाता’ कहानी अपने ही भाइयों के आताताई बनने की कथा है। सांप्रदायिकता के दानवी चपेट में इंसान अपनी इंसानियत भूल कर हैवान बन गया था। पर उन हैवानों के बीच कुछ इंसान भी थे, जो विपरीत परिस्थितियों में भी लगातार अपने इंसान होने का प्रमाण प्रस्तुत कर रहे थे। अज्ञेय इस कहानी में हैवानियत के बीच छिपी इंसानियत की खोज करते हैं।
 
लूट, बलात्कार, आगजनी और हत्या आज़ादी की सबसे बड़ी सच्चाई है। आज़ादी के समय पूरे देश में डर की फिज़ा तैर रही थी। हिन्दू-मुसलमान एक-दूसरे को संदेहभरी दृष्टि से देख रहे थे। इसी डर और संदेह की वजह से लाहौर का देविन्दरलाल अपना बसा-बसाया घर छोड़कर हिंदुस्तान (जालंधर) जाना चाहता है, पर उसके मित्र रफीकुद्दीन जाने नहीं देते। वे कहते हैं- “मैं तो इसे मेजारिटी का फर्ज़ मानता हूँ कि वह माइनारिटी की हिफाज़त करे और उन्हें घर-छोड़कर भागने न दे। हम पड़ोसी की हिफाज़त न कर सके तो मुल्क की हिफाज़त क्या ख़ाक करेंगे।” निश्चय ही वकील रफीकुद्दीन में इंसानियत बची थी, उन्हें यह अच्छा नहीं लगता कि हिन्दू अपना "घर-बार छोड़कर अपने ही शहर में पनाहगजीं हो जाएँ?" पर उनके न चाहते हुए भी लोग ‘पनाहगजीं’ हो रहे थे। कुछ हिन्दू लाहौर से हिंदुस्तान जा रहे थे और कुछ लाहौर में ही हिंदुओं के मुहल्लों में। रफीकुद्दीन जब भी किसी हिन्दू को लाहौर छोड़कर जाते हुए देखते तो उनके चेहरे पर चिंता और व्यथा का भाव उमड़ पड़ता।
 
रफीकुद्दीन के आग्रह पर देविन्दरलाल जालंधर नहीं जाते। रफीकुद्दीन देविन्दरलाल से कहते हैं कि यदि कोई ख़तरे की बात हुई तो वह पहले ही खबर कर देंगे या उनकी सुरक्षा का इंतजाम कर देंगे। सांप्रदायिकता एक ऐसी आग है, एक ऐसा जुनून है, जो आसानी से ख़त्म नहीं होती। अभी कुछ ही दिन बीते थे कि सारे शहर में लूट-पाट, आगजनी और हत्या शुरू हो गई। मुस्लिम सांप्रदायिक लोग चुन-चुन कर हिन्दू-सिखों को काटने लगे। दंगाइयों के आतंक से आतंकित होकर देविन्दरलाल अपने मित्र रफीकुद्दीन के घर में पनाह लेते हैं। नये देश की स्थापना के नाम पर, आज़ादी के नाम पर उसकी आँखों के सामने ही उसका घर लूट लिया जाता है। चारों तरफ आग की लपटें दिखाई देती हैं। “शहर वीरान हो गया था। जहां-तहां लाशें सड़ने लगी; घर लूट चुके थे और अब जल रहे थे।” इन सब दृश्यों को देख रफीकुद्दीन पराजय का अनुभव करता है। देश के भविष्य के विषय में सोचते हुए उसका मन “थकान? उदासी? विरक्ति? पराजय?” और न जाने किन-किन पीड़ा से भर जाता है।
 
सांप्रदायिकता की आग में सांप्रदायिक लोग जिंदगी देने वाले डॉक्टर को भी झोंक देते हैं। कहानी में एक प्रतिष्ठित हिन्दू डॉक्टर दो मुसलमान नेताओं के साथ, मुसलमानों की बस्ती में मरीज देखने जाता है “एक मरीज को देखने के लिए स्टेथोस्कोप निकालकर मरीज पर झुके थे कि मरीज के ही एक रिश्तेदार ने पीठ में छुरा भोंक दिया...।”
विभाजन के समय सांप्रदायिक मनोवृति वाले लोग पुलिस विभाग में भी थे। वे पीड़ित लोगों की मदद करने के बजाय उन पर अत्याचार ही कर रहे थे। लाहौर के एक रेलवे कर्मचारी ने बहुत से निरक्षित हिन्दुओं को अपने घर में पनाह दी थी। उसने पुलिस को ख़बर दी कि इन लूटे-पिटे लोगों को सही-सलामत हिंदुस्तान पहुंचा दिया जाए। पुलिस शरणाथियों सहित उस रेलवे कर्मचारी को भी गिरफ्तार कर थाने ले जाती है और उसके पीछे उसके घर को लूट कर आग लगा दी जाती है। तीन दिन बाद पुलिस के हथियारबंद सिपाही उसे तथा उसके परिवार को गोली मार देते हैं।
 
विभाजन के समय देश का वातावरण ‘विषाक्त’ हो गया था। “द्वेष और घृणा की चाबुक से तड़फड़ाते हुए हिंसा के घोड़े” को कुछ सांप्रदायिक संगठन या संप्रदाय वाले लोग दौड़ा रहे थे। इस हिंसा के घोड़े को भड़काने में सहायक बन रहे थे ‘पुलिस और नौकरसाही’ जो अपना कर्तव्य भूलकर हैवानियत के रास्ते पर चल पड़े थे। उस ‘विषाक्त वातावरण’ में सब-कुछ भड़क रहा था, उफन रहा था, झुलस और जल रहा था।” उस समय हैवानियत भड़क रही थी, उफन रही थी और इंसानियत झुलस और जल रही थी। इंसानियत को झुलसते और जलते हुए देख रफीकुद्दीन की बातों में ‘एक लज्जित-सी रुखाई का स्वर’ सुनाई देता है।
यह सच है कि “ख़ुदा जिसे घर से निकालता है, उसे फिर गली में भी पनाह नहीं देता।” दंगाई रफीकुद्दीन को लाचार कर देते हैं। वे उसे धमकी देते हैं कि वे उसे (देविन्दरलाल) घर से निकाल दें नहीं तो वे उसके घर को जला देंगे। “उन्हें शिकार चाहिए- हल्ला करके न मिलेगा तो आग लगाकर लेंगे।” रफीकुद्दीन देविन्दरलाल से कहता है- “आखिर तो लाचारी होती है, अकेले इंसान को झुकना ही पड़ता है।” काफिर का शिकार करने के लिए दंगाई लोग अपने ही मुस्लिम भाई का घर-बार तबाह कर डालने पर तुल जाते हैं। वास्तव में सांप्रदायिक लोगों को किसी भी संप्रदाय से कुछ भी लेना-देना नहीं है, वे सिर्फ गुंडे हैं। गुंडे। जिन्हें न तो हिन्दुओं की चिंता है और न ही मुसलमानों की फिक्र।
 
सांप्रदायिक सोच वाले लोग मुसलमानों के साथ-साथ हिन्दुओं में भी थे। अज्ञेय ‘शरणदाता’ कहानी में हिन्दू-सांप्रदायिक लोगों की सोच को भी रेखांकित करते हैं। बंटवारे के समय दोनों देशों के लिए अनुमानित सीमा जो तय कि गई थी, वहाँ सौ मुसलमानों को सिक्खों ने ‘शरण’ दी थी। पर अंत में उन ‘शरणदाता’ सिक्खों को भी हार मननी पड़ी। कारण, आस-पास के गाँव तथा अमृतसर शहर के लोगों ने उनके लिए अन्न का संकट पैदा कर दिया। उन हिन्दू-सांप्रदायिक लोगों को भी शिकार चाहिए था। पर आखिर में, सिक्खों ने ‘शरणदाता’ का फर्ज़ निभाया। सौ-ढाई सौ सिक्ख “किरपाने निकालकर उन्हें घेरे में लेकर स्टेशन पहुंचा आए, किसी को कोई क्षति नहीं पहुंची।” परिस्थितियाँ इतनी खराब थी कि पूरे गाँव के साथ होने के बावजूद भी उन्हें हार माननी पड़ी। ‘लेकिन आखिर तक उन्होंने निभाया, इसकी दाद देनी चाहिए।’
 
‘शरणदाता’ का फर्ज़ रफीकुद्दीन भी निभाता है। दंगाइयों के लगातार धमकाने के बाद वह देविन्दरलाल को सुरक्षा की दृष्टि से अपने मित्र शेख़ अतीउल्लाह के अहाते के अंदर पेड़ों के झुरमुट की आड़ में बनी हुई गैरेज में रखवा देता है। यहाँ पहुँचकर देविन्दरलाल सोचता है- “यह है आज़ादी! पहले विदेशी सरकार लोगों को कैद करती थी, वे आज़ादी के लिए लड़ना चाहते थे; अब अपने ही भाई अपनों को तनहाई कैद दे रहे हैं, क्योंकि वे आज़ादी के लिए लड़ाई रोकना चाहते हैं।” विदेशी सरकार की कैद में लोग गा-चिल्ला सकते थे, पर यहाँ गाने-चिलाने पर भी प्रतिबंध था। वे आज़ादी के नाम पर, आज़ादी के लिए, मनुष्य की आज़ादी को ख़तरे में डाल देते हैं। आजाद देश के खुले आकाश के नीचे प्रार्थना और याचना करते लोग, जलते हुए घर एवं सपनों का धुआँ, अनगिनत घाव तथा चारों तरफ रक्त ही दिखाई दे रहा था।
 
रफीकुद्दीन के मुस्लिम दोस्त शेख़ साहब पुलिस के दफ्तर में हेड कलर्क थे। इस दृष्टि से रफीकुद्दीन को वह जगह सुरक्षित लगी थी। उनका ऐसा सोचना सही भी था, पर जो जगह जितनी सुरक्षित होती है, शायद वह उतनी ही “उपद्रवों की जड़ भी होती” है। शेख़ साहब के परिवार में कुल चार सदस्य थे। एक शेख़ साहब, दूसरे उनकी पत्नी, तीसरी उनकी बेटी जैबुन्निसा और चौथा उनका बेटा आबिद। जैबुन्निसा को छोड़ बाकी तीन सदस्य सांप्रदायिक ज़हर फैलने वाले लोग ही थे। एक दिन देविन्दरलाल के खाने में “बड़ी-बड़ी मुसलमानी रोटी के बजाय छोटे-छोटे हिन्दू फुलके” आते हैं। हठात उन्हें “तीन-एक फुलकों की तह के बीच में एक कागज की पुड़िया-सी दिख पड़ी” जिस पर लिखा था- “खाना कुत्ते को खिलाकर खाइएगा।” पुड़िया पढ़ते ही देविन्दरलाल का दिमाग ‘सन्न’ रह गया। ‘शरणदाता’ के लिए मित्र के घर से ज़हर वाला खाना आता है। देविन्दरलाल खाना बिलार को खिलते हैं और वह मर जाता है। जो काम शेख़ साहब अपने मेहमान के साथ करना चाहते थे, वही काम देविन्दरलाल अपने मेहमान (बिलार) के साथ करता है। रफीकुद्दीन इस्लाम के नाम पर अपने मित्र को अपने घर से निकाल देता है (यधपि वह ऐसा नहीं चाहता था) और शेख़ साहब इस्लाम के नाम पर, नये देश की स्थापना के लिए मित्र के मित्र को ज़हर दे देते हैं। शेख़ साहब ज़हर देकर यह प्रमाणित करते हैं कि वे रफीकुद्दीन की तरह बेवकूफ या गद्दार (?) नहीं हैं। वे मुस्लिम राष्ट्र के लिए कुछ भी कर सकते हैं। वे अपने संप्रदाय के लिए भाई-चारे को भी खत्म कर सकते हैं।
 
कहानी की विडम्बना देखिये, एक मित्र आग्रह करके ज़ोर देकर उसे लाहौर से जाने नहीं देता, क्योंकि देविन्दरलाल के लाहौर छोड़ने से उनकी नाक कट रही थी। बाद में वही इस्लाम के दबाव में आकर, उसे अपने घर से निकाल देता है। दूसरा मित्र उसे शरण के साथ-साथ विष भी देता है और साथ में उसकी लड़की यह संदेश भी देती है कि विष दिया जा रहा है।
विष की चेतावनी देकर जैबुन्निसा यहाँ एक मुस्लिम पात्र के रूप में नहीं, बल्कि इंसान के रूप में अपनी उपस्थिति दर्ज कराती है। वह हैवानियत के बीच इंसानियत का प्रमाण प्रस्तुत करती है। उसकी इंसानियत के चलते ही देविन्दरलाल की जान बचती है। कुछ समय पश्चात् वे हिंदुस्तान लौटकर अपने परिवार का पता लेने के लिए रेडियो पर अपील करवाते हैं। उनके बताए हुये पते पर लाहौर से जैबुन्निसा ख़त भेजती है। ख़त में उसने लिखा था- “आप बचकर चले गए, इसके लिए ख़ुदा का लाख-लाख शुक्र है। मैं मानती हूँ कि रेडियो पर जिनके नाम आपने अपील की है, वे सब सलामती से आपके पास पहुँच जाएँ। अब्बा ने जो किया या करना चाहा, उसके लिए मैं माफी मांगती हूँ और यह भी याद दिलाती हूँ कि उसकी काट मैंने ही कर दी थी। अहसान नहीं जताती, मेरा कोई अहसान आप पर नहीं है, सिर्फ यह इल्तजा करती हूँ कि आपके मुल्क में अक़लियत का कोई मजलूम हो तो याद कर लीजिएगा। इसलिए नहीं कि वह मुसलमान है, इसलिए कि आप इंसान हैं। ख़ुदा हाफिज़!” जैबू की इंसानियत भले ही इतिहास में दर्ज न हो पर वह देविन्दरलाल के स्मृति में हमेशा ही मौजूद रहेगी।
 
विभाजन के सांप्रदायिक दंगों की विभीषिका में यदि सांप्रदायिक सोच वाले शेख़ साहब और पुलिस कर्मचारी सहित अन्य लोग थे तो जैबुन्निसा और सीमा पर रहने वाले सिक्ख तथा मुस्लिम राष्ट्र में हिन्दू रेलवे कर्मचारी जैसे व्यक्ति भी थे, जिनके अंदर की इंसानियत बची हुई थी। वे विकट परिस्थिति में भी अपनी मानवीयता को नहीं खोते। अज्ञेय ‘शरणदाता’ कहानी में ऐसे ही विकट संकट में इंसानियत की पहचान करते हैं। यह एक बहुत बड़ी बात है।

- मृत्युंजय पाण्डेय

रचनाकार परिचय
मृत्युंजय पाण्डेय

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