जनवरी 2021
अंक - 66 | कुल अंक - 67
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

बातें कुछ ज़रूरी-सी

न्यू नॉर्मल

हर इंसान के लिए हर वर्ष का समय, परिस्थितियाँ, ज़रूरतें, खुशियाँ, भय, चिंता इत्यादि के अनुभव पृथक-पृथक ही रहते हैं मगर बीते साल 2020 में 'डर' का स्पन्दन हम सबका साँझा ही रहा है, 'कोरोना' की शक्ल इख्तियार कर के।
आखिरकार दो हजार बीस खुद को कोसवाते हुए अपना सामान पैक कर के समय के रथ पर सवार होकर चला ही गया, बीती इकत्तीस दिसम्बर को। हम में से बहुत से लोग उसे कोसते हुये, नव आगन्तुक को कुछ यूँ प्रमाणपत्र दे रहे थे कि मानो वो 'कोरोना' नाम का डर भी उसके होलडोल में बंधकर चला ही जायेगा। नव के संग गेटपास नहीं मिलने वाला उस वैश्विक बीमारी को।


निश्चिंत रहिये, ऐसा कहते हुए मैं कतई नकारात्मक नहीं हूँ! हाँ...बस बिल्ली के बच्चे-सी आँखें नहीं मूँद रही हूँ। साधारण-सी बात है कि भिन्न-भिन्न कालखण्डों में किसी भी महामारी, वैश्विक बीमारी आदि ने जाने में वर्षों का समय लिया है, तो 'कोरोना' के तो नित नये स्ट्रेन मिल रहे हैं, फिर लाज़मी है कि इसे पूर्णतया धकेल कर विदा करने में वक़्त तो लगना ही है।
इन हालात में बेहतर होगा कि हम बीते को कोसने की बजाय अपने आज में 'न्यू नॉर्मल' की बातें ही क्यूँ न कर लें!


मैं भलीभाँति जानती हूँ कि किसी भी बात को, चीजों को देखने समझने का सभी का दृष्टिकोण अलग होता है। ये भी चित और पट की तरह ही है, जिसमें जनसमूह बन जाते हैं, 'चित आया तो मेरी और पट आया तो तेरी' वालों के समूह। मैं यहाँ बस मेरे नज़रिए को ज़ाहिर कर रही हूँ कि मैं कोरोना को बतौर एक कड़क शिक्षक के रूप में देख रही हूँ, जिसने जीवन के विभिन्न आयामों की प्रवृत्ति को, बातों को, महत्ता को व प्रकृति को बा-खूबी समझाया है। हम धरती के उग्र-ऊताताई बालक बने चले जा रहे थे, उसने हमारे कान उमेंठ कर छड़ी लगा दी और करा दिया दण्डबैठक! बीते साल ने बहुतों-से बहुत कुछ छीना और बहुतों को काफ़ी कुछ दिया भी है, मतलब उसने अपना अनुपात बराबर का रखा।
'न्यू नॉर्मल' मेरा एक दृष्टिकोण मात्र है, जिस पर तनिक ठहरकर सोचा तो अवश्य ही जा सकता है। आपकी स्वीकृति और अस्वीकृति दोनों का सम्मान सिरमाथे पर रहेगा।


लॉकडाउन और क्वारेंटीन पीरियड के दौरान अधिकांशत: वर्क फ्रॉम होम, ऑनलाईन क्लासेज, ऑनलाईन मीटिंग्स, वेबिनार आदि टेक्नोलॉजी से प्रभावित आदतों पर ज़ोर दिया गया या कहूँ कि उसके सिवा कोई चारा ही नहीं बचा था और वो सब हमारी दिनचर्या का हिस्सा अब तक बने हुए हैं। सबकुछ वैक्सीन आने के बाद भी अप्रत्याशित-सा है और रहने भी वाला है। टेक्नालॉजी/डिजिटाइजेशन जैसी आदतों को इस तरह जो विस्तार रोज़मर्रा की ज़िन्दगी में मिला है, उसका अनुभव बोझ समान सबके लिए शायद नहीं होगा! ऐसी आदतों को यदि आने वाले समय की मंशा में ढालकर अपना लिया जाये तो आसानी होगी।

ठीक इसी तरह 'अनुकूलन' आने वाले समय में एक बड़ा सहायक घटक होगा! किसी भी अनिश्चितता के लिए हम मानसिक व भावनात्मक तौर पर तैयार रहेंगे। प्रकृति ने अब तक वन्य जीवन को एडेप्टेबिलिटी की आदतों में ढ़ाल रखा था और हम मनुष्य सामाजिक प्राणी होने के घमण्ड में परिस्थितियों के अनुसार खुद को ढालने का हुनर भुलाये बैठे थे। कोरोना काल ने आक्समिक धमक देकर ये भूला गुण भी याद करा दिया। आज को देखकर लगने लगा है कि क्यूँ न इस अनुकूलन को सदा के लिये मानसिक व भावनात्मक रूप से व्यवहार में अपना ही लिया जाये, तो कोई नुकसान भी नहीं, है न!

बीता साल अपने नाम पर कलंक लगवाकर भी कितना कुछ दे गया, ये इत्मीनान से सोचियेगा इस नये साल की कुनकुनाहट में और कृतज्ञता जाहिर कीजियेगा तब।
आधारभूत सामाजिक अनुशासन जो हमारी पीढ़ी द्वारा बिसरा दिया गया था, वो सोशल बिहेवियर में बदलाव के तहत पुन: दिखाई दिया। हमने हैंड शेक से ज्यादा मौखिक अभिनंदन को अपनाया, आई कॉंटेक्ट और ग्रीटिंग्स को सोशल डिस्टेंसिंग की वजह से जगह मिली। धक्का-मुक्की की जगह एक वाजिब दूरी ने ले ली। भागा-दौड़ी की जगह एक ठहराव ने ले ली, हमने थोड़ा ठहरना सीख लिया।
मेरी समझ से इसे आगे भी सुचारू रूप से ज़ारी रखने में कतई नुकसान नहीं होगा।
कितनों ने पैसे को जिस तेजी से कमाया, आदतों के वशीभूत उसे उसी तेजी से खर्च भी किया! नतीजतन लॉकडाउन के बाद कई कंपनियों के बंद होने से, मंदी घिर आने से अनेकों नौकरियाँ गयीं। लोकल बिजनेस भी ठप्प हुये या तासीर ही बदल दी गई, तथा वो सभी 'खुले हाथ जगन्नाथ' वाले लोग आर्थिक रूप से अपाहिज हो गये। कितनों ने स्टेटस मेंटेन न कर पाने की शर्म में आत्महत्या का वरण किया, जो निश्चित ही ग़लत निर्णय था उनका।


ये सारी परिस्थितियाँ आज सेविंग्स के बचत के मायने और आवश्यकता भली प्रकार समझा गयीं हैं। ये आदतें भी प्रतिदिन का हिस्सा बना ली जायें, फ़िजूलखर्ची से बचा जाये तो कितना सब आसान हो जायेगा आने वाले समय में।
ठीक इसी तरह हमारी स्वास्थ्य के प्रति टाल-मटोल वाली मानसिकता ने मुँह की खाई है। कितने ही हम में से ऐसे होंगे जो, नीम-हकीमी घर पर कर के मुक्त होते रहे होंगे। लेकिन अब यह टाल-मटोल नहीं चलने वाली 'रेग्युलर हैल्थ चेकअप' अब अपनी अनुशासित जगह बना चुके हैं। दुर्घटना से देर भली की जगह दुर्घटना से स्वास्थ्य भला होने लगा है अपनी प्राथमिकता की छड़ी थामे। यह आवश्यक आदत भी हमेशा को अपनाना बेहतर ही साबित होगा। याद रखना होगा कि पैसा ही सबकुछ नहीं बेहतर स्वास्थ्य भी किसी खजाने से कम नहीं। जीवन शेष होगा तो अर्जन भी होगा ही।


कितनों के जीवन में इक ख़ास बदलाव भी हुआ होगा। डिस्टेंसिंग की दरकार के चलते बहुत-से रिश्तों के बीच की दूरी कम हुई होगी और बहुत से असलियत प्रत्यक्ष आने के चलते दूर भी हुये होंगे। झप्पियों और गेट-टुगेदर की जगह नज़दीकियाँ ज़ूम मिटिंग्स ने बढ़ाई होंगी। कहीं इस भयावह समय ने रिश्तों, मित्रताओं के चेहरों से नका़ब भी उतार फेंके होंगे और कितनी ही पुरानी भूली-बिसरी दोस्तियाँ भी रिन्यू हुई होंगी तो इस नये मेल-मिलाप को अपनाकर आगे बढ़ते जाने में हर्ज़ भी कैसा? वैसे 'जीवन' की कीमत इस काल ने बेहतर बुझाई है, वरना हम मनुष्य तो अपनी हेकडी में इसे बरबाद करके बेमकसद बस जिये जा यहे थे।

प्रकृति का आलिंगन कितना सुकूनदायक है हम ये कब का भूल चुके थे और यही नहीं हम तो जिस डाल पर बैठे थे उसी को काट भी रहे थे। यह बात भी इस विपरीत समय ने ही समझाई। प्रकृति को पुन: महसूस करना, उसके संग समय व्यतीत करना और उसको बाहों में भरकर आत्मा तक उतार लेना भी तो इसी समय ने सिखाया। इसे भी तो आगे जीवनपर्यन्त अपनाना होगा हमें, जिससे हमारे भीतर भी भावनात्मक नमी बची रहे।

यही नहीं, प्रतिदिन की दिनचर्या में जो बुरे व्यसन लगे थे उनसे मुक्ति भी होती दिखी। जैसे हाऊस हेल्प नहीं मिल पा रही थी तब हमने ही मिलकर सब गृहकार्य किये और बहुत अच्छे से किये, ज्यादा गहराई से किये।
कितने सारे नये स्किल्स सीखे। कुकिंग में नित नया कुछ-कुछ ट्राय किया। अपने भीतर बसी हॉबीज की तरफ लौटे चले। नाचे-थिरके, योगाभ्यास किया, सुर, लय-तान लगाये, बागवानी की, पौधों से बतलाये, लिखा-पढ़ा-गुना, इंटीरियर भी किया और खुद को बहुत-सा समय दिया, जो सालों से न किया था।


भूल गये थे कि लाइफ में बेलेंसिंग बहुत इंपोर्टेंट है। बाहर जाना आवश्यक है तो घर पर रहना भी उतना ही ज़रूरी है। जो नहीं करना चाहा था वो बेमन से ही सही पर सब किया और जो चाहा था उस पर भी रोक लगाना भी सीखा। बेसिकली जीवन को साधना सीखा।
वर्क फ्रॉम होम और ऑनलाईन से त्रस्त होकर स्क्रीन का टाइम कम करने के चक्कर में जो टाइमपास को देखते बैठे रहते थे वो देखना बंद किया गया। बचत भरा ये समय परिवार में पूरे राशन पानी के संग बाँटा गया। हमारी नज़दीकियों में सेंध मारकर जो दूरियाँ पलती जा रही थीं, वो सारी नज़दीकियाँ दूरियों के कारण ही मन की झील के किनारे आकर बैठने लगीं।


जीवन-मृत्यु, हारी-बीमारी सब अप्रत्याशित शै हैं, जो गलबहियाँ डाले हर दिन पोशम्पा-सितौलिया खेलते हैं। अनभिज्ञता, अकेलेपन, अनदेखी से काल का ग्रास बनना बहुत आसान है पर यदि हर पहलू पर सोच-विचार कर कुछ अनुशासन स्वयं ही अपने-अपने जीवन में लागू कर लिये जाएँ तो नुकसान के कम वरन् फायदे के ज्यादा आसार दिखाई देते हैं। वैक्सीन होने पर भी सबको एक दिन, हफ़्ते, महीने में तो नहीं मिलने वाला, इसमें वन बाई वन करते-करते भी साल तो लगेगा ही लगेगा।
सोशल डिस्टेंसिंग, मास्क का नियमित इस्तेमाल, हस्त प्रक्षालन/सेनीटाइजेशन, स्वस्थ खान-पान, स्वच्छ वातावरण आदि से जीवन को एक सुंदर गति ही मिलेगी, न कि कोई रुकावट उत्पन्न होगी।


मानती हूँ कि सब उकता गये हैं इस जबरन के अंकुश से, बीमारी के भय और अनिश्चित ठहराव से। पर यदि इसे एक बेलैंस की तरह एक आवश्यक अनुशासित दिनचर्या के तौर पर लें तो मन पर धरा बोझ निश्चित ही हल्का, बहुत हल्का हो जायेगा।
थोड़ा थमकर, सोचकर देखिये। इसके पैसे थोड़े न लगेंगे। स्वस्थ जीवन से मूल्यवान कोई निधि नहीं है।
'न्यू नॉर्मल' को अपनाना हम सबके लिये एक आसान और सुरक्षित सफ़र के समान होगा तो चलिए न मेरे संग इस सफ़र पर, खुद से वादा करके कि 'न्यू नॉर्मल' में लाइफ में ये सारे बैलेंस हमें खुद बनाने हैं, भरपूर जीना है और जीतना भी है।


- प्रीति राघव प्रीत

रचनाकार परिचय
प्रीति राघव प्रीत

पत्रिका में आपका योगदान . . .
कविता-कानन (3)विमर्श (1)आधी आबादी: पूरा इतिहास (2)बातें कुछ ज़रूरी-सी (4)रचना समीक्षा (1)संस्मरण (1)यात्रा वृत्तांत (19)