जनवरी 2021
अंक - 66 | कुल अंक - 67
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

रचना समीक्षा

 

बिब्बी ~ तुमने मुझे पकाया किसी फसल की तरह

('रेखाएँ बोलती हैं भाग -2 ' से चित्रा देसाई जी का संस्मरण)
 
"मेरी कवितायें संस्मरण हैं। गद्य लिखूँगी तो अपनी 'बिब्बी' पर, अपनी 'माँ' पर ही लिखूँगी।" चित्रा देसाई जी का ये कथन मुझे उनके लिखे पहले गद्य की ओर खींच ले जाता है, जो उन्होंने अपनी 'बिब्बी' पर ही लिखा है। बिब्बी का अति सूक्ष्म अंश मात्र है इसमें क्योंकि जितना उन्हें जानने समझने लगी हूँ चित्रा जी को सुन- सुनकर,तो बिब्बी स्वयं आप ही एक संपूर्ण ब्रह्मांड हैं। ब्रह्मांड का हर अंश लिखा जाना अभी शेष है तो आइये तब तक उस छोटे से अंश से मिलवाती हूँ आप सबको।
 
संस्मरण यदि ऐसे होते हैं, तो मैं कहूँगी कि नहीं संस्मरण नहीं ये समाधि है। 'बिब्बी से बिब्बीपना' तक की समाधि। जिसके आगे मेरा हाल एक पाठक होकर भी ठीक वही होता जैसा कि अपने दाता की शरण में बैठकर उसकी महिमा को अपने भीतर आत्मसात करना। उस दर पर मौन बैठे रहना जहाँ दुख,दर्द,शिकायतें,सुख,प्रेम सब एकाकार होकर बहते जाते हैं बंद पलकों को चीरकर...ढुलकते हुये मौन आराधना बन।
ये कतई अतिशयोक्ति नहीं क्योंकि मैं इस अंश को पढ़ते हुये बढ़ती जाती हूँ तो शब्द धुँधलाने लगते हैं, पनीली आँखें आवसार बन झरती जाती हैं, और हृदय अपनी स्पंदन इतने वेग से करता है कि खुद की धड़कनों को नितांत दर्द में डूबा हुआ सुन पाती हूँ तब मैं।
चित्रा जी ने बिब्बी को जिया ही नहीं बल्कि उन्हें विदा करके खुद में संग्रहित कर लिया है।
 
सूरदास जी बिब्बी के लिए ही कह गये होंगे...
मेरो मन अनत कहाँ सुख पावै।
जैसे उड़ि जहाज कौ पंछी,फिरि जहाज पै आवै।।
ऐसे ही बिब्बी दिन भर अपनी पूरी दुनिया की परिक्रमा कर अपने नीड़ में लौटकर ही सुख पाती थीं।
अपनी सुगठित दिनचर्या में स्नान,ध्यान,गीतापाठ,चाय- अखबार ,बुहारी सब ठसक से निपटातीं और बेगार के काम भी उन्होंने अपने हाथों में साध रखे थे जैसे- चित्रा जी के कपड़े सिलना,बाण से चारपाई बुनना,पानी की मोटर की वायरिंग आदि उनके हाथों यूँ खेलते जैसे कठपुतलियों का खेल साधा हो।
सर्वगुण सम्पन्ना माँ थीं उनकी बिब्बी।
 
एक बेटी जो अपनी माँ के एक-एक पल की साक्षात् गवाह भी रही हो और एक-एक रक्तकणिका की साझेदार भी ...उस बेटी से डॉक्टर गोयल का सपाट तौर पर कह देना कि "आपकी माँ नहीं बचेंगी।"
सचमुच ऐसी बातों को सुनने पर मन के भीतर अमावस पसर जाती है,वही हुआ भी। पहले बीती एक और अमावस गहरा गई,,, दोहरी मार थी ये नियति की,काश कि इस दफ़ा भी कोई अफ़वाह अमावस से भारी हो जाती और उम्र फिर बढ़ जाती।
इस बार की अमावस भरी जनवरी में ही हीटर से निकल कर मृत्यु का ताण्डव करने पर आमादा थी। उस वक्त जब हमारे देश में पाँच प्रतिशत झुलसी देह बचाना नामुमकिन हुआ करता था, तब बिब्बी पंद्रह प्रतिशत बर्न थीं।
बेटी जनवरी के आखिर में पहुँची थी क्योंकि माँ बेटी को परेशान नहीं करना चाहती थीं, इसीलिए हादसे की ख़बर तक ना पठाई गई थी।
बेटी ने दर्द गटक लिया कड़वी दवा सा क्योंकि माँ को संभालने की बारी अब उसकी थी, जिस माँ के अंग लिपट कर नन्ही असहाय बच्ची,,, विशाल, दृढ़ निश्चयी लौह सम बनी थी ।
माँ के संग बच्ची ने आइसोलेशन में रहने का ठान लिया था। एक कमरें दो शरीर एक आत्मा और दो ज़िन्दगियाँ एकाकार होने की तैयारी पर थीं।
 
माँ -बेटी से इतर कमरे में दो परिपक्व महिलायें गहन वार्ता कर रही थीं। वार्ता में विघ्न उत्पन्न हुआ दवाईयों पर उगी नींद के कारण।
माँ अब बालिका सी सो गई थीं...बेटी निकल गयी अकेली उस गाँव,गलियों, खेतों,पगडंडियों, आँगन तक माँ के हौसले की टॉर्च थामे।
चित्रा जी की बिब्बी काई के शहर में भी अपने पाँव की ताक़त पर ज्यादा विश्वास करती थी। पाँचवी कक्षा उत्तीर्ण लड़की ग्रामीण प्रदेश में भी अन्याय के खिलाफ़ खड़ी भी हो जाती थी। अनेकों उतार-चढ़ाव के बाद आया की नौकरी से शुरूआत करते हुये उसी के ठीक सामने नर्सिंग होम बनाया और जीवन भर सेवा देकर अपनी यात्रा का भागी बनाया और ये सिलसिला तब तक चला जब तक बेटी ने वकील का काला गाउन नहीं पहन लिया। बेटी के पैर पर खड़े होते ही गाँव को उन्होंने अपना मकसद बना लिया।
 
अपने महाप्रयाण को जैसे उन्होंने स्वयं चुन लिया था,,मोक्ष के पथ पर वो अपनी अच्छाई और परोपकार के पुष्प बिछा चुकी थीं। सब जैसे पूर्व नियोजित था ! ये आइसोलेशन तो मानो एक प्रक्रिया हो ...खुद की आत्मा को बेटी की आत्मा में उड़ेल देने की आवश्यक आजीवन प्रक्रिया ...जिसमें इक्कीस जनवरी तो शायद निमित्त मात्र थी...यादों की बही में अनुभव के आँकड़े चढ़ाने के लिये।
७ फरवरी की दोपहर उन्होंने चित्रा जी से कहा, "चित्रा ,रास्ता मत रोको, मुझे जाने दो।"
बेटी अब उस प्रक्रिया में उन जैसी ही बन गई थी...बोली - "बिब्बी, मैं तुम्हें मुक्त करती हूँ। तुम्हें यदि महायात्रा पर जाना है ,तो मैं नहीं रोकूँगी।"
शाम होते- होते वो अपनी गठरी बाँधकर निकल गयी थी उस पुष्प सज्जित पथ पर।
 
बेटी अपनी बिब्बी का तेज सहेजे हुये ...उनके द्वारा प्रदत्त अंतिम व महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभाने को उठ खड़ी हुई,जैसे मानो पिंड सिराने चली हो साक्षात् दुर्गा का प्रतिरूप बन कर।
मैं बेटी के मुख पर फैले उस अलौकिक तेज को शब्दों में महसूस कर पा रही थी...जिसके पीछे छुपा था अथाह भावों और दर्द का उफनता समुन्दर
(जिसमें बहकर मुझे पहुँचना था अभी बेटी के पास तक)।
 
अहमदाबाद स्टेशन पर राजधानी का इंतजार करते हुये बिब्बी दे गयीं थीं एक विशेष जिम्मेदारी...वसीयत में लिखकर कि उनके महाप्रयाण के बाद उनकी देह 'एम्स' के मेडीकल छात्रों के लिये दान में दी जाये। 
दान कहाँ इसे तो स्वैच्छिक भेंट कहा जायेगा और ऐसी भेंट कोई संत अलौकिक आत्मा ही दे सकती है।
वो कह गयीं थीं बेटी से कि "शरीर को जलाकर,राख लेकर हरिद्वार जाओगी? ये सब कर्मकांड मत करना। मेरा शरीर दान कर देना।"
ढलते सूरज को साक्षी बनाकर प्रतिज्ञा लेकर बोलीं - "तुम्हें कोई कुछ भी कहे,कमज़ोर मत पड़ना।"
 
बेटी को अब वो प्रतिज्ञा पूरी करनी थी... मित्र लता की सलाह ने तीव्रता की छड़ी थमा दी।
एम्स ने जली देह को नकार दिया तो क्या! शाश्वत सत्य है ये कि...तपे को छाँव तो मिलती ही है इस प्रकृति की गोद में विचरते प्राणियों को।
आर्मी अस्पताल ने छाँव वाला दरख़्त बनना स्वीकार किया। भला होता भी कैसे नहीं कि बिब्बी ने तीन साल उसकी शाखाओं पर भी फुदकते,कूकते हुये समय दिया था उसे।
एम्स की मना के बाद बिब्बी ही वहाँ हाथ पकड़ कर ले गयीं होंगी...अपनी कर्मभूमि तक।
सुबह आठ बजे उनको वहाँ लेकर पहुँची बेटी उनकी पर अब हमेशा को विदा लेने में पैर जमने लगे थे। बिब्बी की बर्फ़ सी देह की छुअन ही बेटी को ऊष्मा दे गयी। बेटी ने डिसेक्शन वाले कमरे का मुआयना किया वो अब संभलने लगी थी। चूँकि वो जानती थी कि जीवन-मृत्यु तक के अनेकों चरण उसकी बिब्बी प्राण रहते ही पूर्ण कर चुकी थी।
बेटी वहाँ से बाहर आ गयी....वो डर से ऊपर उठ गई थी। बिब्बी जाते-जाते उसे अपना 'बिब्बीपना' जो दे गयीं थी।
 
अब बारी मेरी थी। अपनी लेखिका को जी रही थी मैं उनके लिखे को पढ़कर। मैंने फोन उठाया और बिना-सोचे समझे लगा दिया क्योंकि मेरी सोचने-समझने की शक्ति नम्ब सी हो चुकी थी। दिन के ग्यारह बजे थे और फोन उठाते ही प्रिय लेखिका की खुशियों से खनकती आवाज़ आई....हैल्लो प्रीति,कैसी हो?
मैंने कहा ...दीदीराज...'बिब्बी' को पढ़ा मैंने...और फिर ना मैं कुछ बोल सकी कि...गला रुँध गया था मेरा। दर्द ने जाम कर दिया था और उस तरफ़ से भी गहरी तलहटी वाली ख़ामोशी ...
समुन्दर उछालें भर रहा था। फोन के दोनों तरफ़ की खामोशियाँ तर होकर सुबुक रही थीं। देर तक बिना बोले भी दो दिल शोर मचा रहे थे। मानो बिब्बी की आत्मीय आरती गा रहे हों, हृदय के तीव्र घंटनाद के संग।
देर बाद भरभराती आवाज़ ने उस तरफ़ से कहा...इस बार आऊँगी दिल्ली, तो दोनों मिलकर साथ बैठकर 'बिब्बी' को खूब याद करेंगे।

 


- प्रीति राघव प्रीत

रचनाकार परिचय
प्रीति राघव प्रीत

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