जनवरी 2016
अंक - 10 | कुल अंक - 63
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कविताएँ
दुःख सुख के गीत: सात कविताएँ
 
 
 
एक
 
आए, दुःख भी आए
रहे घर में साथ नहाए खाए
पड़ा रहे किसी कोने अंतरे में
 
दुःख भी आए
राह चलते किसी मोड़ पर टकराए
तो रुके पल दो पल बोले बतियाए
 
चुभे पाँव तले, काँटे सा कभी
धँस जाए, पर जिसे सह लिया जाए
जैसे सह लिया जाता है शत्रुओं को
इसी समाज में मित्रो के बीच।
 
 
दो
 
ऐसे मत गिरना ओ दुःख!
जैसे फसलों पर गिरता है पाला
 
मत आना इस तरह कि जैसे
प्रेम में डूबी लड़की की आँखों में पानी
 
आटे में नमक जितना ही रहना जीवन में
दाल में हल्दी जितना ही घुलना जीवन में
 
ऐसे गिरना जैसे गिरती है ओस
भोर में चुपचाप किसी पत्ती पर
ऐसे छूना जीवन को जैसे लोहे को छूता है पारस
 
ऐसे घिसना
जीवन की धार
कोई शिला घिसती है
जैसे कुंद पड़ चुका हथियार।
 
 
तीन
 
'सुख का संसार
कहाँ है जहाँ जाया जाए',
 
ऐसा ही कहा था, एक पिता ने
बेटी को लिखे एक पोस्टकार्ड में
 
माँ के बक्से में पड़ा है
वह सूक्ति-वाक्य लिखा पोस्टकार्ड
 
बड़े दुःख देखे माँ ने जीवन में लेकिन
नहीं पूछा उसने किसी से सुख का पता
 
ऐसा नहीं था कि चाह न थी सुख की
दरअसल वह दुःखों के उस पार ही था
 
दुःखों से लड़ने में था जीवन का सुख
यह हमने किसी धर्मग्रंथ से नहीं सीखा
सीखा उसी पोस्टकार्ड से
जो माँ के बक्से में पड़ा है।
 
 
चार
 
पहले एक गिरा
फिर गिरा दूसरा
बाद उसके तीसरा
इस तरह एक एक कर
गिरते रहे पुराने घर सारे
 
शहर में खड़ी होती रहीं
चमचमाती इमारतें, ऊँची, बहुत ऊँची,
 
मॉल मल्टीप्लेक्स की चकाचौंध के बीच
हाँफ़ता रहा बूढ़ा होता अथर्व एक शहर
 
सरकारें व्यस्त रहीं
फ्लाईओवरों के फीते काटने में,
 
पाँव पर चढ़ाए पाँव
तृप्ति की डकारें मारता
ऊँघता रहा शहर का नवधनिक
नव युग का मुनाफाखोर वणिक
 
बताया गया दुःखी नागरिकों को
यही है, यही है, यही तो है विकास।
 
 
पाँच
 
कोई नहीं जानता था
दुःख और सुख दो सहेलियाँ थीं
या आपस में लड़ने वाले दो पट्टीदार
 
कोई नहीं जानता था
दुःख और सुख कैसे आते हैं, कब जाते हैं
 
सिर्फ कहानियों के अंत में
कहा जाता था, "वे सुखपूर्वक
दिन व्यतीत करते हुए जीते रहे"
 
कहानियों के अंत में जो तय था
उसका होना जीवन में इतना कठिन
क्यों है, कोई नहीं जानता था।
 
 
छह
 
तुम पास थीं
तो पास था सुख
 
तुमसे दूर होना
दुःख के साथ होना था
 
जीवन बीतता जाता था
तुमसे दूरी बढ़ती जाती थी।
 
 
सात
 
सबसे बड़ा दुःख यह
कि जीवन बीत जाए और
किसी मन की देहरी न खुले
तुम्हारे लिए,
 
सुख सबसे बड़ा यही
कि प्रेम से भरा एक हृदय है
जिसमें तुमको पनाह मिल गई।

- नील कमल

रचनाकार परिचय
नील कमल

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