दिसम्बर 2020
अंक - 65 | कुल अंक - 66
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

स्मृति

समकालीन कविता की एक महत्वपूर्ण उपस्थिति का अनुपस्थित हो जाना


पिछले दिनों हिंदी कविता के एक बड़े नाम मंगलेश डबराल जी का निधन हो गया। मंगलेश डबराल जी का लेखन समकालीन यथार्थ की सटीक अभिव्यक्ति है। अपने समय के विसंगत का जिस साहस के साथ वे विरोध करते हैं, वह विलक्षण है। ऐसे साहसी कवि का जाना वाकई एक बड़ी क्षति है। हस्ताक्षर परिवार मंगलेश जी को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करता है।

- के. पी. अनमोल


मंगलेश डबराल जी की कविताओं में दुर्लभ मनुष्यता साँस लेती थी। आज सच में दिन भारी और ग़मगीन है और कविता की दुनिया में अजीब-सी रिक्तता। सबसे ज्यादा यह देखा कि उनकी कविताओं में संघर्ष और प्रतिरोध के स्वर को वे आरोपित नहीं, एक नागरिक की नैतिकता का अनिवार्य हिस्सा मानते हैं।  सत्ता और मनुष्य के संघर्ष में मानवीय हितों की पक्षधरता के साथ ही उनकी कविता मानवीय संवेदनाओं, संबंधों और वस्तुओं से जुड़ी स्मृतियों को विस्मृति के विरुद्ध बचाने की इस क्रूर समय में अनथक कोशिश है। संवेदना और बौद्धिकता का अद्भुत सामंजस्य उनकी विशिष्टता है।

- मीना बुद्धिराजा



मंगलेश डबराल का निधन समकालीन कविता की एक महत्वपूर्ण उपस्थिति का अनुपस्थित हो जाना है। इस बेहद दुखद और असहाय समय में यह एक ऐसी शून्यता है, जिसका भर पाना मुश्किल है। मंगलेश जी को अनेक बार टीवी पर सुना है, चाहे काव्य पाठ करते हुए या किसी मुद्दे पर विचार रखते हुए। उनकी भाषा और शैली दोनों में एक साफ़गोई रहती थी। इसका कारण शायद उनका पहाड़ी होना हो, जहाँ सरलता और सहजता स्वाभाविक रूप से घुली-मिली रहती है। वे पत्रकारिता और कविता के बीच बराबर सक्रिय रहे।
उनकी कविताओं से गुज़रते हुए हम उनकी छटपटाहट को महसूस कर सकते हैं। उनकी कविताएँ धूसर उदासी और संत्रास की कविताएँ हैं। अपने समय को अपनी कविताओं में दर्ज़ करने वाले वे ऐसे कवि थे, जिन्होंने समकालीन यथार्थ को अपनी कविताओं में बिना अतिरेक के जगह दी।

- भोलाशंकर तिवारी


कवि के चले जाने के बाद /शेष रह जाते हैं उसके शब्द /मन के किसी कोने को कुरेदते हुए /चिंघाड़ती हैं भावनाएँ /कवि की बातें, मुलाक़ातें /और उससे जुड़े किस्से /शब्द बन भटकते हैं इधर-उधर  /जैसे पुष्प के मुरझाने पर /उदास हो झुक जाता है वृन्त / जैसे उमस भर-भर मौसम /घोंटता है बादलों का गला /जैसे प्रिय खिलौने के टूट जाने पर /रूठ जाता है बच्चा /या कि बेटे के शहर चले जाने पर /गाँव भर में झुँझलाती फिरती है माँ/ वैसे ही हाल में होते हैं / कुछ बचे हुए लोग / पर जैसे थकाहारा सूरज /साँझ ढले उतर जाता है नदी में /एक दिन अचानक वैसे ही /चला जाता है कवि भी /हाँ, उसके शब्द नहीं मरते कभी /वे जीवित हो उठते हैं प्रतिदिन /खिलती अरुणिमा की तरह 

- प्रीति 'अज्ञात'


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उनकी कुछ कविताएँ


वर्णमाला

एक भाषा में अ लिखना चाहता हूँ
अ से अनार अ से अमरूद
लेकिन लिखने लगता हूँ अ से अनर्थ अ से अत्याचार
कोशिश करता हूँ कि क से क़लम या करुणा लिखूँ
लेकिन मैं लिखने लगता हूँ क से क्रूरता क से कुटिलता
अभी तक ख से खरगोश लिखता आया हूँ
लेकिन ख से अब किसी ख़तरे की आहट आने लगी है
मैं सोचता था फ से फूल ही लिखा जाता होगा
बहुत सारे फूल
घरों के बाहर घरों के भीतर मनुष्यों के भीतर
लेकिन मैंने देखा तमाम फूल जा रहे थे
ज़ालिमों के गले में माला बन कर डाले जाने के लिए

कोई मेरा हाथ जकड़ता है और कहता है
भ से लिखो भय जो अब हर जगह मौजूद है
द दमन का और प पतन का संकेत है
आततायी छीन लेते हैं हमारी पूरी वर्णमाला
वे भाषा की हिंसा को बना देते हैं
समाज की हिंसा
ह को हत्या के लिए सुरक्षित कर दिया गया है
हम कितना ही हल और हिरन लिखते रहें
वे ह से हत्या लिखते रहते हैं हर समय।


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पहाड़ से लालटेन

मैं पहाड़ में पैदा हुआ और मैदान में चला आया
यह कुछ इस तरह हुआ जैसे मेरा दिमाग़ पहाड़ में छूट गया
और शरीर मैदान में चला आया
या इस तरह जैसे पहाड़ सिर्फ़ मेरे दिमाग़ में रह गया
और मैदान मेरे शरीर में बस गया।

पहाड़ पर बारिश होती है बर्फ़ पड़ती है
धूप में चोटियाँ अपनी वीरानगी को चमकाती रहती हैं
नदियाँ निकलती हैं और छतों से धुआँ उठता है
मैदान में तब धूल उड़ रही होती है
कोई चीज़ ढहाई जा रही होती है
कोई ठोक-पीट चलती है और हवा की जगह शोर दौड़ता है।

मेरा शरीर मैदान है सिर्फ एक समतल
जो अपने को घसीटता चलता है शहरों में सड़कों पर
हाथों को चलाता और पैरों को बढ़ाता रहता है
एक मछुआरे के जाल की तरह वह अपने को फेंकता
और खींचता है किसी अशान्त डावाँडोल समुद्र से।

मेरे शरीर में पहाड़ कहीं नहीं है
और पहाड़ और मैदान के बीच हमेशा की तरह एक खाई है
कभी-कभी मेरा शरीर अपने दोनों हाथ ऊपर उठाता है
और अपने दिमाग़ को टटोलने लगता है।


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माँ का नमस्कार

जब माँ की काफ़ी उम्र हो गयी
तो वह सभी मेहमानों को नमस्कार किया करती
जैसे वह एक बच्ची हो और बाक़ी लोग उससे बड़े।

वह हरेक से कहती- बैठो कुछ खाओ।
ज़्यादातर लोग उसका दिल रखने के लिए
खाने की कोई चीज़ लेकर उसके पास कुछ देर बैठ जाते
माँ खुश होकर उनकी तरफ़ देखती
और जाते हुए भी उन्हें नमस्कार करती
हालाँकि वह उम्र में सभी लोगों से बड़ी थी।

वह धरती को भी नमस्कार करती कभी अकेले में भी
आख़िर में जब मृत्यु आई तो
उसने उसे भी नमस्कार किया होगा
और अपना जीवन उसे देते हुए कहा होगा-
बैठो कुछ खाओ।


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हत्यारों का घोषणा पत्र

हम जानते हैं कि हम कितने कुटिल और धूर्त हैं
हम जानते हैं कि हम कितने झूठ बोलते आए हैं
हम जानते हैं कि हमने कितनी हत्याएँ की हैं
कितनों को बेवजह मारा-पीटा है, सताया है
औरतों और बच्चों को भी हमने नहीं बख़्शा
जब लोग रोते-बिलखते थे हम उनके घरों को लूटते थे
चलता रहा हमारा खेल परदे पर और परदे के पीछे भी।

हमसे ज़्यादा कोई नहीं जानता हमारे कारनामों का कच्चा-चिट्ठा
इसीलिए हमें उनकी परवाह नहीं
जो जानते हैं हमारी असलियत।
हम जानते हैं कि हमारा खेल इस पर टिका है
कि बहुत से लोग हैं जो हमारे बारे में बहुत कम जानते हैं
या बिलकुल नहीं जानते।
और बहुत से लोग हैं जो जानते हैं
कि हम जो भी करते हैं, अच्छा करते हैं
वे ख़ुद भी यही करना चाहते हैं।


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क्या काम

आप दिखते हैं बहुत उदास
आपको इस शहर में क्या काम
आपके भीतर भरा है गुस्सा
आपको इस शहर में क्या काम
आप सफलता नहीं चाहते
नहीं चाहते ताकत
जो मिल जाए उसे छोड़ कुछ नहीं माँगते
आपको इस शहर में क्या काम
आप तुरंत लपकते नहीं
और न खिलखिल करते
हाथ जेब में डाले चलते
रोज़ रात में पाते खुद को लहूलुहान
आपको शहर में क्या काम!


- मंगलेश डबराल

रचनाकार परिचय
मंगलेश डबराल

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