दिसम्बर 2020
अंक - 65 | कुल अंक - 66
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

डायरी

उलझे मन की बेतरतीब डायरी
- सतीश छिम्पा


(तारीखों पर चलता तो तरतीब भी देता, समय कहाँ चलता है कभी पटड़ी पर!)

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जहाँ मुहब्बतों की शुरुआत और दीवानगी अपनी हदें पार करके बेहद होती हैं और फिर इज़हार-ए-मुहब्बत के बाद इश्क के बगीचे से चुने गए फूलों को प्रेमी या प्रेमिका की बाहों पर सजाया जाता है। सफर जो कभी भी खत्म नहीं होता है, उसके अस्तित्व का गौरव गान गाती हुई सड़क अक्सर किसी सुहाने मोड़ पर ठहर ही जाती है। ठहरना या नहीं ठहरना किसी के बस में नही, परबस है। सड़कछाप को मालूम नहीं शायद कि ख़ूबसूरती का एक झरना यहाँ भी मौजूद है।

सड़क छाप जानता है कि दुनिया के सभी महाकाव्यों की सर्जक है सड़कें, सड़कें काल की गति का ग्रीस है। सड़कें कालिदास से लेकर मुक्तिबोध तक का सफर हैं। सड़कें सामंती क्रूर व्यवस्था से निकल क्रांति की सोच में ढलती हैं। सड़कें प्रेमियों का आश्रय स्थल है, शराबियों का बिस्तर है, मजदूरों का रेस्टॉरेंट है और है घर से भागी लड़कियों का प्ले ग्राउंड। सड़कें इतिहास हैं, वर्तमान हैं और हैं भविष्य भी, सड़कें भावों के समानांतर एक और भाव है। शेरशाह सूरी हो या अकबर या औरंगजेब या फिरंगी या इसी देश के काले अंग्रेज़ या धनपति हो भले, राजशाही से लेकर नकली देवताओं के असली ठिकानों, लोकतंत्रों और लोकतंत्र से तानाशाहों तक और फिर आगे क्रांतियों और पराजयों से लेकर फिर से हुई किसी नई शुरुआत तक के सफर से परिचित हैं सड़कें।

इस बेहद प्यारी सड़क पर खड़ा, सड़कछाप व्यग्र है,  आश्चर्यचकित, उदास और किंकर्तव्यविमूढ़ और स्तब्ध। देखकर कि सड़क आदमी को बदलते देख रही है आदमी से केवल बुद्धिजीवीवादी में, कलाकार को देख रही है कुर्सी और ओहदेदार के आगे झुका हुआ और न सिर्फ देख रही है बल्कि व्यंग्य में हँस रही है। तंज कस रही है।

सूरतगढ़ का सड़क छाप आश्चर्यचकित है कि सड़क ज़िंदा है और आदमी जो पहले कलाकार फिर बुद्धिजीवितावादी फिर मशीन में बदला था अब दो पाया कृत्रिम संवेदनशीलता वाला रोबोट बन गया है। सड़क छाप इसलिए भी आश्चर्यचकित है कि सड़क नाम से ज्यादा काम को महत्व देती है। उसकी इस चेतना पर इसलिए मुग्ध है कि वो चैतन्य है। पचास हजार का सवाल हल न कर सकने वाला जब बुद्धि से हारता है तब सड़कें विलाप करती हैं और बेरोज़गारी हँसती है।


सड़क छाप जानता है कि दुनिया के सभी महाकाव्यों की सर्जक है सड़कें, सड़कें काल की गति का ग्रीस है। सड़कें कालिदास से लेकर मुक्तिबोध तक का सफर हैं। सड़कें प्रेमियों का आश्रय स्थल है, शराबियों का बिस्तर है, मजदूरों का रेस्टॉरेंट है और है घर से भागी लड़कियों का प्ले ग्राउंड। सड़कें इतिहास हैं, वर्तमान हैं और हैं भविष्य भी, सड़कें भावों के समानांतर एक और भाव है। जिसको सहेजने और संवारने का काम बहुत जरूरी है। बहुत जरूरी है जैसे चुंबनों के किसी अनसुलझे सवालों का हल कर लेना।

उदास मौसम में फिर उसका लौट आना और फिर विदर्भ डायरी, तारीखों की बस्ती में और वहाँ सड़क पर चलते हुए, ठप ठप, टप-टप की आवाज़ें, आगे जाकर बरसात के जमा हुए पानी की शांत, चुप, एकदम सन्नाटा जैसे सदियों पहले ही मर चुके हों शब्द, भाषा अलोप हो गयी हो जैसे दरख्तों, पौधों और पशु-पक्षियों की भाषा, तितलियों, भँवरों और कबूतरों की भी भाषा जैसे अचानक लोप हो गयी हो। जैसे मर गया हो सबकुछ यहाँ, कुदरत का शब्दकोष जल गया लगता था। ज़बान बस बोझ थी। और शायद यही कुछ चलता ही रहने वाला था अगर अचानक नज़रों ने आँखों को धोखा न दे दिया होता तो, निःशब्द बात हुई, इकरार और इनकार के बीच का स्पेस भरने का काम नए बने शब्द करेंगे, जब कभी वे बन गए तब। वे दो बड़ी-बड़ी काजल लगी आँखें, जो घनघोर उदासियों में भी उदास होना नहीं जानती थीं। एक शरारत, निमन्त्रण भरी मुस्कुराहट का तिलिस्म, नीचे के होंठ की शेप, जो बाद में पता चलता है कि ये सब उसकी कुदरतन खूबसूरती है।


बरसात के जमा हुए पानी की शांत, चुप, एकदम सन्नाटा टूट गया। कल...कल...कलकल बह निकला, शब्द जो लगता था कि मर गए, जीवन के गीत गा रहा है, अलोप हो गई भाषा मुखरित होकर आखर रच रही है । दरख्तों, पौधों और पशु-पक्षियों की भाषा, तितलियों, भँवरों और कबूतरों की भी भाषा जैसे अचानक  हवाओं के शीतल वेग के साथ लौट रही हो।

शब्दकोष सीने से लगाकर, जीभ को बाइज्जत बरी कर दिया गया है। वो गहरे समन्दरों से मुट्ठी भर मोती ले आती थी। वो एक लड़की जो हाड़ मांस से नहीं बल्कि प्रीत के महीन धागों से बुनी गई थी। जिसके सपनो में असंख्य रंगों से भरी रंग-बिरंगी आकाशगंगा हर रोज आती थी। वो जो असंख्य गौरैया के संगीत से इस समाज, वर्ग और देश को सजा देना चाहती थी। कहाँ है अब वो लड़की, जो जिसकी आँखों में मचलते थे नये समाज और मनुष्य के सपने।


सुबह आँख खुली तो ठंडी हवाएं चल रही थीं। बुलबुल, फ़ाख्ता, सोन चिड़ी, हरि, लाल, संतरी और भी अनेक भांत की चिड़ियाएँ गीत गा रही थीं। मैंने ऊपर देखा, आसमान काला और सफेद था, आम दिनों की तरह ही। अपने चेहरे पर हाथ फिराने के लिए उठाए और नज़र पड़ी, हथेलियाँ जो गौरी होने के साथ लाल हुआ करती थी, काली हो गयी है, महाजन वाली मटकी सफेद हो चुकी है। छत के बनेरे पर बैठा मोर काला स्याह, देखकर घिन-सी आ गयी। मेरे सिरहाने पड़ी रंगीन जिल्द की किताब सफ़ेद हो चुकी है। हर समय, जो रंगीन लहरें मेरे भीतर उठती मचलती रहती हैं, वे ठस्स हो चुकी हैं। मेरी सम्वेदनाएँ बुझने लगी हैं और सामने दीवार पर टँगा एक प्रेमिल चित्र काला और सफेद होकर उदास हो गया है।


मैं बाहर आ जाता हूँ। कीकर के पत्ते सफ़ेद हैं, खेरड़ा पूरा काला है। काला कुत्ता अब गहरा काला हो चुका है और पड़ोसन का घाघरा कुर्ता सफेद झक्क उदास-सा, उसके चेहरे से चूने वाला पसीना काला है, बिलकुल काला। ट्यूशन जाती अल्हड़ उम्र लड़कियाँ बुढ़ा गयी हैं। उनकी जीन काली है, उनके गुलाबी, हरे, पीले, नीले टॉप्स सफेद और काले हैं। उनके मुलायम गाल, पत्थरों से कठोर हो गये हैं। बाणिये की छत तक जाती अमर बेल काली है। सब कुछ काला है, सब कुछ सफ़ेद है, मैं काला, वो सफेद, वो काला, उधर वाला सफेद। पड़ोसन, जो खिलखिलाती, मोतियाँ लुटाती थी, आज उदास थी, सफेद कपड़ो में, मैं वितृष्णा से भर गया। घबराया हुआ लौट आया।

घबराकर किताब खोली, सफेद पन्नो पर छपे काले अक्खर, एक, एक, एक फिर एक फिर से एक और अनेक कविताएँ मेरे भीतर उतर गयीं। मैंने देखा मेरी हथेलियाँ लाल-लाल थीं। सामने सूखते कपड़े रंगीन थे। किताब की जिल्द बादामी थी। मैं बाहर गली में आ गया। गाय रात्ती थी। मोर अपने रंगों में था। अमर बेल हरी थी। पड़ोसन ने लाल सूट पहना था। ट्यूशन से लौटती लड़कियाँ नीली जींस पर गुलाबी, लाल,पीले , हरे, भूरे, स्लेटी, बैंगनी टॉप्स पहने हुए धीरे-धीरे चल रही थीं। उनकी चाल में जीवन उलझ-उलझ जाता था और मुस्करा रहा था। उनके गालों पर असंख्य गीत मचल रहे थे। एक लड़की मुड़ी और मेरी ओर बढ़ी, उसकी बगलों में इत्तरों का समुद्र बसा था। उसकी आँखों में जीवन हरियल हो रहा था, उसके होंठ हिले, उसने कुछ कहा, क्या कहा? मुझे नहीं पता, मैंने नहीं सुना, "कुछ बोलो" मैंने कहा, उसने भी नहीं सुना, मैं आगे बढ़ता हूँ, उसे छू लेना चाहता हूँ, मेरी उंगलियाँ बस छूने ही वाली हैं और अचानक मेरी नींद टूट गयी, जाग आ गयी, सपना बीच में ही रह गया। सपनों का भी जाने कहाँ-कहाँ किस-किस के यहाँ खाता खुला हुआ है।

हल्की बरसात में जब सड़क पर लाइट कलर के कपड़ों में कुछ लड़के-लड़कियाँ आपस में चुहल करते हुए जा रहे थे तब आवारा कवि के मन में आया कि ज़ोर से कूकली मारे और उछल कर पास की दीवार पर बैठ जाए, या कोई गाना गाये, दौड़कर पीले सूट वाली लड़की के बराबर पहुँच जाए और 'कान्या मान्या कुर्र' कर दे मगर वो कुछ नहीं कर पाया और गर्दन नीची किये किसी शरीफ़ आदमी की तरह चलता रहा। उसने देखा पीले सूट वाली लड़की ने साथ चलते लड़के के धीरे से थापी लगाई, कितने खुश हैं ये लोग, उसने सोचा और सिगरेट सुलगा ली, धुआँ उड़ाता वो एक गली में मुड़ गया।

पार्टी ज़ोरों पर थी और उसका मन नहीं था भीड़ में बैठकर चुस्कियाँ लेने का, एक कोना देखा और जम गया। एक के बाद एक, पता नहीं कितने 'एक' गटकने के बाद जब उसने ऊपर देखा, दीवार के पास गुलाबी रंग के टॉप में वो खड़ी थी। बहुत ख़ूबसूरत, मन हुआ छू ले, वो हाथ बढ़ाता है। छूना चाहता है मगर वो अदीठ हो जाती है। पता नहीं क्या जंची कि आवारा कवि ने मोबाइल निकाला और जाने किसके नम्बर मिलाए, कुछ देर बात की और ख़्वाबों के पक्षियों के साथ हवा में उड़ने लगा।

"और लोगे क्या?" यह विनय था
"ना पेट भर गया।" कहकर वो बाहर आ गया। अंधेरा गहरा हो गया था और वो सीधा चला जा रहा था। कीकरों के पास कुछ आवाजें सुनकर रुक गया, देखा, गौर से देखा, और मुळक दिया।
"अगली सदी तुम्हारी होगी प्रेमियो! तब तुम्हें कीकरों और अँधेरे की ओट नहीं लेनी पड़ेगी।" वो ज़ोर से बोला और घर की तरफ बढ़ गया।


एक तरफ उगा वो विशाल दरख़्त, जाने क्या नाम था उसका। उसकी छाया जब दीवार पर पड़ती थी तो कामनाओं के रंगीन आकाश से बरसने लगती थी मन के सरोवर पर यादें। सफेद हैयर बैंड सर पर कसकर निकल पड़ती थी वो प्यार के रसभरे मोसमों में नज़्म की तरह उतरने को मेरे दिल के पन्नों पर।

यह किसी बिसरा दिए गए साल की जनवरी का कोई दिन था, जब भीतर से पिघलते भावो की स्याही से लिखने लगा था मैं कविता। वो औसत से थोड़े ऊंचे  कद और भरी पूरी देह की थी। चेहरा, थोड़ा ललाई लिए हुए गौरे रंग का, किसी किसानी परिवार या कहें कि महिला एथलीट की सी फिटनेस थी। गठन किसानी-सा, किसी मध्य एशियाई हूर की तरह दिखती, कामुक कामनाओं को भड़काने वाले रसायनों से बनी या बुनी गई लगती थी और ठोड़ी पर हल्का गड्ढा और गोल-मटोल चेहरे पर हल्की मगर गंभीर मुस्कुराहट के प्राकृतिक मगर स्थाई से निशान से सजी तिलिस्मी दुनिया की जादुई खुशबुओं पर सवार होकर आई लगती थी। उसकी मजबूत मगर मुलायम देह यष्टि किसी जवान तो जवान बूढ़ों की भी कामुक कामनाएँ जगा सकने की योग्यता रखती थीं। बहुत ही प्यारी। खिला चेहरा, जादुई आँखें, लम्बे काले घने बाल, जब खुले छोड़ती जो घटाओं की तरह के असर करती और जो कमर से नीचे तक झूलते हुए किसी अनजाने सर्पिल तिलिस्म का स्रोत हो। बहुत समझदार मगर मासूम और जज़्बाती।


बीते मौसमों के फ़ालसाई दिनो! अब मैं तुम्हें याद नहीं करूँगा। गुलमोहर के फूलों की तरह दमकते पलो! अब मैं तुम्हे बिसरा दूँगा। इत्र घुली शरबतों से महकती शामो! अब तुम्हें दफ्न होना है, भावनाओं और नातों के  इस अकाल में अतीत की कब्र में।

.....उफ्फ.....''नींद क्यों टूट गयी....?"



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एक और पन्ना


सड़क पर चलते हुए, ठप ठप, टप-टप की आवाज़ें, आगे जाकर बरसात के जमा हुए पानी की शांत, चुप, एकदम सन्नाटा जैसे सदियों पहले ही मर चुके हों शब्द, भाषा अलोप हो गई हो। जैसे दरख्तों, पौधों और पशु-पक्षियों की भाषा, तितलियों, भँवरों और कबूतरों की भी भाषा जैसे अचानक लोप हो गयी हो। जैसे मर गया हो सबकुछ यहाँ, कुदरत का शब्दकोश जल गया लगता था। ज़बान बस बोझ थी। भाव सब अभाव में लौट लगाकर ठस गये थे।

यही कुछ चलता ही रहने वाला था मगर अचानक नज़रों ने आँखों को धोखा दे दिया। निःशब्द बात हुई, इकरार और इनकार के बीच का स्पेस भरने का काम अब नए बने शब्द करेंगे, जब कभी वे बन गए तब।  वे दो बड़ी-बड़ी काजल लगी आँखें, जो घनघोर उदासियों में भी उदास होना नहीं जानती थीं। एक शरारत, प्यार करने को ललचाई और नश्याई आँखों में निमन्त्रण भरी मुस्कुराहट का तिलिस्म, नीचे के होंठ की शेप जो बाद में पता चलता है कि ये सब उसकी कुदरतन खूबसूरती है।


बरसात के जमा हुए पानी की शांत, चुप, एकदम सन्नाटा टूट गया। कल...कल...कलकल बह निकला शब्द जो लगता था कि मर गये, जीवन के गीत गा रहा है, अलोप हो गई भाषा मुखरित होकर आखर रच रही है। दरख्तों, पौधों और पशु-पक्षियों की भाषा, तितलियों, भँवरों और कबूतरों की भी भाषा जैसे अचानक  हवाओं के शीतल वेग के साथ लौट रही हो। भाषा जो हर कहीं खत्म होने और लोप होने के खतरों से जूझ रही थी। उसकी हँसती आँखों के शब्दों को उधार लेकर बचा लिया है भाषा ने अपना अस्तित्व।

शब्दकोश सीने से लगाकर, जीभ को बाइज्जत बरी कर दिया गया है। वो गहरे समन्दरों से मुट्ठी भर मोती ले आती थी। वो एक जो इस धरती की मिट्टी की पैदाइश नहीं लगती थी, प्रीत के महीन धागों से बुनी गई थी। जिसके सपनो में असंख्य रंगों से भरी रंग-बिरंगी आकाशगंगा हर रोज आती थी। जिसकी एक छब देखने को इच्छाओं की भी इच्छाएँ तरस जाती है। कामनाएँ, धारणाएँ, इच्छाएँ सब की सब भटक कर निरर्थक हो जाती हैं।
 
वो अब कहाँ है? कहाँ हैं अब वो लड़की??


- सतीश छिम्पा

रचनाकार परिचय
सतीश छिम्पा

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