दिसम्बर 2020
अंक - 65 | कुल अंक - 66
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

उभरते स्वर

सब कुछ आसान ही क्यों?

वो प्यास ही क्या जो बुझ गई
वो बात ही क्या जो बन गई
वो मुसीबत ही क्या जो टल गई
वो उमर ही क्या जो सिर्फ कट गई

वो रात ही क्या जो सुहानी है
वो पल ही क्या जिसमें आसानी है
वो मस्ती ही क्या जो छुपानी है
वो ज़िन्दगी ही क्या जो सिर्फ बितानी है

वो रास्ते ही क्या जिसमें गढ्ढे नहीं
वो इंसान ही क्या जिसमें कमी नहीं
वो खेल ही क्या जिसमें मुश्किलें नहीं
वो दिन ही क्या जिसमें कोई परेशानी ही नहीं

 

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उस इंसान के नाम, जिसने उम्मीद नहीं छोड़ी थी

तू वो सूरज की किरण है जो काले बादलों को भी पीछे छोड़ देती है
तू वो कमल की कली है जो दलदल में भी खिलना नहीं भूलती है

तेरा हर एक क़दम एक नए जोश से भरा है
हारना तूने सीखा नहीं यही एक उसूल तेरा है

बुरा वक़्त तो सबका आता है लेकिन उसे भी जीना तूने सिखाया है
कुछ भी परेशानी हो तूने उसे मुस्करा के भगाया है

ज़िन्दगी में समय सबके पास उतना ही है
उतने ही समय में तूने सब जीत के दिखाया है

तू वो चींटी है जो छोटी होकर भी बहुत बोझ उठा लेती है
तू वो पहाड़ की चोटी है जो दूर से भी अपनी कामयाबियों की झलक दिखाती है।

 

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वक़्त

वक़्त क्या है
वो जो कभी रुकता नहीं
या वो जो हमें कभी रोकता नहीं

वो जो बिन बताए बीत जाता है
या वो जो सबके रोकने पर भी रीत जाता है

वो जो लम्हों को अपने साथ क़ैद कर लेता है
या वो जो उन्हें हमारे साथ जीना सिखाता है

वो जो होता सबके पास है
या वो जो होकर भी न होने का अहसास है

वक़्त भी क्या चीज़ है न
यह हो, तो भी हम लोगों को चैन नहीं
और न हो तो भी चैन नहीं


- इरा जैन

रचनाकार परिचय
इरा जैन

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