दिसम्बर 2020
अंक - 65 | कुल अंक - 66
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

विमर्श

सिन्हा जी का ग़ज़लकार अपने दायित्वों से पूर्णत: अवगत है
- के. पी. अनमोल


दुष्यंत कुमार ने हिंदी ग़ज़ल के जो प्रतिमान स्थापित किये, उन्हें बरक़रार रखना उनकी अगली पीढ़ियों के ग़ज़लकारों के लिए किसी चुनौती से कम न था। यह वह समय था, जब हिंदी परिवेश की ग़ज़लों का लोहा मान लेने के बावजूद उससे एक तरह का अलगाव दर्शाया जाता था। हिंदी ग़ज़ल और हिंदी ग़ज़लकारों को दोयम दर्जे का समझा जाता था। उनकी ओर हीन भावना से देखा जाता था। यह वह समय था, जब उर्दू ग़ज़ल के पैरोकार हिंदी ग़ज़ल को यह कहकर ख़ारिज करते थे कि इन ग़ज़लों में न तग़ज्जुल है, न इनका शिल्प खरा है और हिंदी कविता के स्वयंभू उसे यह कहते हुए मुख्यधारा से बाहर रखने पर तुले थे कि इनमें अपने समय की चिंताएँ नहीं। ऐसे मुश्किल समय में हिंदी के पास कुछ बेह्तरीन ग़ज़लकार रहे, जो अपना काम पूरी तन्मयता से करते रहे। वे अपने काम में इस विश्वास के साथ संलग्न रहे कि एक दिन साहित्य की दुनिया के हर कोने में हिंदी ग़ज़ल को यथोचित मान मिलेगा। आज हिंदी ग़ज़ल उस मुक़ाम पर खड़ी है, जहाँ हिंदी साहित्य की दुनिया उसमें अपना सुनहरा कल देख रही है।

हिंदी ग़ज़ल के इन जुझारू रचनाकारों में एक नाम बिहार के प्रतिनिधि ग़ज़लकार अनिरुद्ध सिन्हा का है, जो दशकों से हिंदी ग़ज़ल को तराश रहे हैं। यह ग़ज़लकार अपनी ही तरह से सम्पूर्ण समर्पण के साथ हिंदी ग़ज़ल की बेह्तरी के लिए लगातार प्रयासरत है। अपने ग़ज़ल लेखन, आलोचना तथा संपादन के द्वारा अनिरुद्ध सिन्हा; हिंदी ग़ज़ल के संवर्धन के लिए निरंतर प्रयासरत हैं। ग़ज़ल पर उनकी आलोचना और संपादन के भी ख़ूब चर्चे हैं, उनका अपना महत्त्व है लेकिन हम यहाँ उनके ग़ज़लकार पक्ष का विवेचन करेंगे।

ग़ज़लकार अनिरुद्ध सिन्हा की मुख्य विशेषता यह है कि वे उर्दू ग़ज़ल जैसी ही गंभीरता के साथ ग़ज़लगोई करते हैं। अपनी ग़ज़लों में वे पूरी संजीदगी के साथ एक-एक शेर को सलीक़े से पिरोते हैं। धारणा है कि हिंदी ग़ज़ल सपाट होती है। इसमें इशारों में बात करने का हुनर नहीं मिलता लेकिन सिन्हा जी सरीखे रचनाकारों को पढ़कर यह भ्रम दूर होता है। वे अपनी ग़ज़लों में कविताई (तगज्जुल) के साथ इशारों में बात करते हुए समकालीन परिदृश्य पर शेर रचते हैं। यही कारण है कि उनके अनेक शेर अपने पीछे गूँज छोड़ने में सफल होते हैं।


कोई किसी की तरफ है कोई किसी की तरफ
वो एक हम हैं जो रहते हैं ज़िंदगी की तरफ


कब तलक आवाज़ देंगे क़ातिलों के गाँव में
एक ढीला-सा कोई क़ानून हाथों में लिए


उसने फटे लिबास पे नज़रें न डालकर
उसके खुले बदन की ग़रीबी उतार दी


इनकी ग़ज़लों का चिंतन फ़लक बहुत बड़ा है। वे जहाँ अपनी ग़ज़लों में निम्न-मध्यम वर्ग की परेशानियों/उलझनों को अपनी रचनाओं का कथ्य बनाते हैं, वहीं देशप्रेम की भावना पर भी अच्छे शेर कहते हैं। समाज की समस्याएँ, उसका विसंगत, उल्लास-उत्सव आदि हर ज़रूरी पहलू उनकी ग़ज़लों में अपनी उपस्थिति दर्शाता है। यानी सिन्हा जी का ग़ज़लकार अपने दायित्वों से पूर्णत: अवगत है।

सिन्हा जी की ग़ज़लों की भाषा भी हिंदी को समृद्ध करने वाली भाषा है। हिंदी-उर्दू सहित अनेक भाषाओँ की शब्दावली से संपन्न इनकी रचनाएँ हिन्दुस्तानी ग़ज़ल का एक अच्छा उदाहरण हैं। जैसा कि हिंदी ग़ज़ल को इन दिनों भाषा की चारदीवारी में क़ैद करने की भरपूर कोशिशें हो रही हैं। ऐसे में अनिरुद्ध सिन्हा की ग़ज़लें यह समझाने के लिए सटीक उदाहरण हैं कि हिंदी ग़ज़ल आम इंसान की बोलचाल की भाषा, उसके परिवेश व चिंताओं की ग़ज़ल है।

इनकी ग़ज़लें अपने समय के विसंगत को मजबूती के साथ प्रस्तुत करती हैं। इनकी ग़ज़लों में साहित्य समाज का दर्पण बन उतरता है चाहे वह ओछी राजनीति हो, गिरते मानवीय मूल्य हों या सत्ता द्वारा जनता की अनदेखी।


सच के थके-थके हुए चेहरे को देखकर
हैरत है आदमी ने बग़ावत कभी न की


उस बात को कहने की मनाही है सदन में
जिस बात में उनका कोई गुणगान नहीं है


हमारे शहर की तस्वीर आकर देखिएगा
सड़क के बीच में गड्डे नए अक्सर मिलेंगे


निम्न मध्यम वर्ग की व्यथा इनकी रचनाओं में हर जगह देखने को मिलती है। आज हिंदी ग़ज़ल का विशिष्ट रचनाकार वही माना जाता है, जो निचले तबके की बात करता है क्यूँकि हिंदी ग़ज़ल सामान्य जनमानस की कविता है। इसका यही गुण इसे आम से आम इंसान के क़रीब लाता है। यही विशिष्टता सिन्हा जी के रचनाकार के पास भी देखने को मिलती है।

धूप की आँच में निकला हूँ सफ़र में साहब
हाथ कुछ आए तो फिर लौट के घर जाऊं मैं


उत्सवों ने पाँव अपना क्या पसारा दोस्तो
फिर ग़रीबी ने दिखाया क़द हमारा दोस्तो


हमने लहू से गीत लिखे हैं तमाम उम्र
हालात अपने आप कहाँ ख़ुशनुमा हुए


अपने दौर का यथार्थ रूप में अंकन सिन्हा जी की ग़ज़लों को और मजबूत बनाता है। हिंदी ग़ज़ल ने कल्पना लोक में जीना कभी पसंद नहीं किया। उसने अपने पाँव ही धरातल पर रखे, धरातल पर ही वह चलना सीखी और अब दौड़ रही है। हिंदी ग़ज़ल को यह धरातल ही आसमानी ऊँचाई दे रहा है। सिन्हा जी की ग़ज़लें भी धरातल की गलियों से अपने लिए शेर चुनती हैं।

देखिए तो मेहरबानों की है भीड़
सोचिए तो कोई भी अपना नहीं


सारी बेकार की ख़बरें ही छपा करती हैं
काम की बात तो अख़बार से कट जाती है


रगों में रेत भरकर रोज़ घटता जा रहा है
वो दरिया तो किनारों से लिपटता जा रहा है


अपने परिवेश के विसंगत पर हैरानी जताना, प्रश्न करना हिंदी रचनाकारों की पहचान है। संत-कवि कबीर के काव्य में जगह-जगह प्रश्न मिलते हैं, हैरानी मिलती है। वे सारे क्रियाकलाप, जो समाज के लिए भले न होने के बावजूद समाज में प्रचलित हों, हैरान करते हैं। एक विवेकशील रचनाकार इन पर प्रश्न उठाता है और पाठक को इंगित करता है कि उन पर विमर्श करे और उनको अस्वीकृत करे ताकि उसका ही नहीं, समस्त समाज का हित हो सके। सिन्हा जी की रचनाओं में यह हैरानी, ये प्रश्न जगह-जगह नज़र आते हैं।

कैसी अजीब सोच है लोगों की आजकल
जो आगे बढ़ रहा हो उसे रास्ता न दो


ये कैसी बेबसी के दौर में अब जी रहे हैं हम
हमारी फ़िक्र में शामिल हमारा दिल नहीं होता


कि जिसका चेहरा मुकम्मल न हो सका अब तक
मेरी तलाश में निकला है आईना लेकर


अनिरुद्ध सिन्हा जी की ग़ज़लें अनुभव के ताप में तपकर सृजित होती हैं। वह रचनाकार, जिसने कई दशक किसी एक ही विधा पर ख़र्च किये हों, उसका अनुभव स्वयं उसकी रचनाओं में बोलता दिखता है। यहाँ भी इनके शेरों में अनुभव की तपिश साफ़ दिखाई देती है।

ये आँधियाँ कभी न हिलाएँगी आपको
पाँवों को ज़ोर से तो ज़मीं पर जमाइए


उलझनों से तो कभी प्यार से कट जाती है
ज़िंदगी वक़्त की रफ़्तार से कट जाती है


हवस की ज़िद में उठे पाँव का भरोसा क्या
हवस की चाह ने अंधा किया सिकंदर को


आजकल समाज में पनपते नफ़रत के माहौल से इनके रचनाकार का मन आहत होता है। वह इंसानों में, समाज में, देश-दुनिया में प्यार, भाईचारा देखने को तरसता है। आपसी अलगाव से चिंतित होते सिन्हा जी अपनी रचनाओं में स्नेह और समानता का आह्वान करते हैं।

रंजिशों के कैक्टस जब दिल से बाहर आएँगे
भाइयों के दरमियां फिर प्यार देखा जाएगा


कभी लड़ाई है ख़ुद से इसकी कभी ज़माने से इसका झगड़ा
अदावतों से लहू-लहू है हमारा दिल भी अजीब दिल है


मानव जीवन में प्रेम की उपस्थिति बहुत ज़रूरी है। प्रेम वह धन है, जो संपन्न तथा अभावग्रस्त हर एक तरह के व्यक्ति के लिए अहम है। प्रेम चाहे प्रेयसी से हो, परिजन से हो या देश से, वह इंसान को मजबूत बनाता है और उसमें भावनाओं को ज़िंदा रखता है। ऊपर वर्णित तमाम महत्वपूर्ण विषयों के साथ ही सिन्हा जी कविता के दो ज़रूरी विषय शृंगार तथा देश-प्रेम के शेर भी अमूमन कहते हैं।

किसी की आँख में इक घर तलाशते रहिए
बहुत हसीन-सा मंज़र तलाशते रहिए


जब भी उठा है दर्द तेरा मुस्कुरा लिये
कुछ इस तरह से आँख के मोती बचा लिये


अनमोल ये गुहर है इसे आज़माइए
माथे पे अपने देश की मिट्टी लगाइए


ये वतन हमको इतना प्यारा है
हम न छोड़ेंगे चाहे सर जाए


संजीदा ग़ज़लगोई, कलात्मकता के साथ समकालीन विषयों का प्रस्तुतीकरण, विस्तृत चिंतन फ़लक, अपने समय के विसंगत का चित्रण आदि कारक अनिरुद्ध सिन्हा जी की ग़ज़लों को विशिष्ट बनाते हैं। विषयों की विविधता के साथ इनकी ग़ज़लों का कला पक्ष भी मजबूत नज़र आता है। इनका ग़ज़लकार ग़ज़ल की प्रचलित ज़मीनों पर सहजता के साथ अपने समय के शेर कहता है।
इस प्रकार हम कह सकते हैं कि अनिरुद्ध सिन्हा हिंदी के एक ज़रूरी ग़ज़लकार हैं।


- के. पी. अनमोल

रचनाकार परिचय
के. पी. अनमोल

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