दिसम्बर 2020
अंक - 65 | कुल अंक - 66
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

मूल्यांकन

उदयभानु हंस के जीवन पर अनूठी एवं उपयोगी कृति है ‘उदयभानु हंस की साहित्यिक उड़ान’
- डॉ. काकोली गोराई




सुप्रसिद्ध साहित्यकार आनन्द प्रकाश 'आर्टिस्ट' ने उदयभानु 'हंस’ जी के व्यक्तित्व व कृतित्व पर गहन अध्ययन एवं विवेचन करके उनके जीवन व कार्यों पर ‘उदयभानु हंस की साहित्यिक उड़ान’ शीर्षक से यह अनूठा शोधपरक जीवनी-ग्रंथ लिखा है। यह पुस्तक शोधार्थी, लेखक व समीक्षक के लिए प्रेरणादायक संकलन के रूप में अपनी उपादेयता को प्रामाणित करता है।

साहित्य जीवन और जगत् की आलोचना है। साहित्य के इस निकष पर जो विधा सर्वाधिक खरी उतरी है वह है- शोधपरक जीवनी। अपने विवेच्य व्यक्ति विशेष के जीवन-वृत ही नहीं बल्कि उसके जीवन से जुड़ी घटनाओं की प्रस्तुति के मामले में भी तथ्यों की प्रामाणिकता का बहुत ध्यान शोधपरक जीवनी-ग्रंथ के ग्रंथकार को रखना पड़ता है। इस दृष्टि से यह कृति उदयभानु 'हंस' के जीवन पर अब तक हुए शोध कार्यों में से एकमात्र ऐसी कृति है, जिसमें उनकी रचनाओं के आधार पर उनके जीवन-चरित के संदर्भ में जीवन-वृत को पूरी तरह स्पष्ट करने का प्रयास लेखक ने किया है और वह अपने प्रयास में सफल रहे हैं। स्वयं ‘हंस’ जी के शब्दों में, "सृजनात्मक एवं शोधपरक लेखन आनन्द प्रकाश 'आर्टिस्ट' का व्यवसाय नहीं, बल्कि स्वभाव है।"

उदयभानु 'हंस' पर हुए शोध कार्यों में ही नहीं, बल्कि हरियाणा प्रदेश में रचित शोधपरक साहित्य में श्रीवृद्धि करने वाली इस कृति की समीक्षा प्रस्तुत करते हुए कहा जा सकता है कि उदयभानु 'हंस' (1926-2019) बहुमुखी प्रतिभा सम्पन्न साहित्यकार थे। उन्होंने अपनी इस बहुमुखी-बहुरंगी प्रतिभा से साहित्य की विभिन्न विधाओं को गरिमा प्रदान की है लेकिन इनमें सर्वाधिक चटक रंग कविता पर चढ़ाया है। उन्होंने अपनी प्रखर प्रतिभा से काव्य की अनेक विधाओं को समृद्ध किया है। उनका जन्म, 2 अगस्त 1926 को पाकिस्तान के दायरा दीनपनाह नामक गाँव में हुआ था। उनके पिता हिन्दी और संस्कृत के विद्वान थे और इसके साथ ही वे एक कथावाचक भी थे। उदयभानु 'हंस' ने 8वीं कक्षा तक उर्दू-फारसी पढ़ी और वे घर में अपने पिताजी से हिन्दी और संस्कृत पढ़ते थे। हंस जी में काव्य-रचना के बीज बचपन से ही विद्यमान थे। घर के सात्विक एवं सुरूचिपूर्ण वातावरण और संस्कृत काव्य के गहन अध्ययन ने उनकी काव्य-रूचि और प्रतिभा का परिमार्जन किया। जीवन में संयम, साधना, शील और मर्यादा के वे प्रतीक थे और इसी का प्रतिफलन उनके काव्य साहित्य में भी दृष्टिगोचर होता है। हंस जी की प्रमुख काव्य रचनाएँ है - हिन्दी रूबाइयाँ (1952), धड़कन (1957), सरगम (1961), सन्त सिपाही (महाकाव्य, 1967), शंख और शहनाई (1976), देसां में देस हरियाणा (1977), हरियाणा गौरव गाथा (1981), कुछ कलियाँ कुछ काँटे (1986), अमृत कलश (1992), वन्दे मातरम् (1992) एवं मयूर पंख (1992)। भाव-तन्मयता और अभिव्यक्ति उनके गीतों को सर्वदा एक नयी भावभूमि पर प्रतिष्ठित कर देते हैं। हंस जी केवल कविता-लेखन में सिद्ध नहीं हैं वरन् गद्य-लेखन पर भी उनका काव्य के समान ही अधिकार रहा है। काव्य की तरह ही उन्होंने गद्य में भी एक से बढ़ कर एक सुन्दर कृतियाँ दी हैं। 'हंस उड़ा पश्चिम की ओर' (विदेश यात्रा), ‘स्मृतियों के शिलालेख’ (आत्मकथा), ‘बिहारी की काव्यकला’, ‘संस्कृति और समाज’, ‘हिन्दी भाषा और साहित्य’, ‘साहित्य परिचय’, ‘हिन्दी  नाटक का संक्षिप्त इतिहास’, ‘निबन्ध रत्नाकर’ और ‘हिन्दी के प्रमुख साहित्यकार’ इत्यादि हंस जी गद्य कृतियाँ भी हिन्दी साहित्य की धरोहर के रूप में मानी जातीं हैं। वे हरियाणा के प्रथम राज्य-कवि, हिंदी-रुबाई के प्रवर्तक तथा राष्ट्रीय चेतना के सम्प्रसारक-गायक-रचनाकार हैं। हरियाणा और पंजाब की सांस्कृतिक विरासत उनकी रचनाओं में तप कर निखरी है।

हंस जी पारदर्शी और संघर्षधर्मी व्यक्तित्व के स्वामी थे। मधुरता, सहजता, उदारता, मिलनसारिता, कलाप्रियता आदि उस अनुपम व्यक्तित्व के कुछ चटक रंग हैं। समाज की उन्नति के ताने-बाने से कविता बुनने वाले कवि 'हंस' की कविता में समाज की अनुकूलताओं और प्रतिकूलताओं का हृदयस्पर्शी चित्रण है। उन्होंने समाज के बाधक तत्वों पर यत्र-तत्र तीखा व्यंग्य कर उन्हें सुधारने और समाज को शिक्षा देने का प्रयास किया है। इनकी कविताएँ मानवतावादी विचारों एवं देश प्रेम के उज्ज्वल भावों की संवाहक हैं। भाव और शिल्प की दृष्टि से अप्रतिम हैं। हंस जी साम्प्रदायिकता की भावना त्याग करके समाज में प्रेम और सौहार्द भावना को सुदृढ़ करके परिवार, समाज और देश का उत्थान करने में सहयोग देने की बात करते हैं। साहित्यिक कार्य के छोटे से बीज से बहुत फल देने वाला वृक्ष बन जाता है। जीवन की उन्नति, विकास और आनन्द के लिए हमें अपने साहित्य के अनुरूप कार्य करने चाहिए। उदयभानु 'हंस' के साहित्य में भारतीय संस्कृति की झांकी प्रस्तुत होती है। हंस जी ने समाज में चेतना संचरित करने का बीड़ा उठाया, अतः आज के हिंसा, घृणा एवं अव्यवस्था के युग में हंस जी की परमावश्यकता है। इसलिए ‘उदयभानु हंस की साहित्यिक उड़ान’ का अध्ययन महत्वपूर्ण स्थान रखता है।

इस पुस्तक को अध्ययन की दृष्टि से आनन्द जी ने सात अध्यायों में विभाजित किया है तथा अंत में परिशिष्ट दिया गया है, जिसमें संदर्भ ग्रंथ-सूची सम्मिलित है। प्रथम अध्याय का शीर्षक 'साहित्यिक उड़ान से अभिप्राय' है, जिसके अंतर्गत साहित्य में अंतर्निहित संबंधों की विशद पड़ताल की गयी है। द्वितीय अध्याय का शीर्षक 'उदयभानु हंस- व्यक्तित्व की पृष्ठभूमि' है, इसमें उदयभानु हंस की जीवन-यात्रा पर प्रकाश डाला गया है। उनके युग और परिस्थितियाँ, जीवन परिचय एवं उनका व्यक्तित्व का विवरण दिया गया है। इसी कड़ी में तृतीय अध्याय है, जिसमें साहित्यकार उदयभानु हंस की स्मृतियों के कुछ प्रमुख अंश की अनुठी विवेचना की गई है। चतुर्थ अध्याय 'साहित्यकार का दायित्व और उदयभानु हंस का साहित्यिक अवदान' में, हंस जी की साहित्य यात्रा और उस समय के युगीन पृष्ठाधार पर प्रकाश डाला गया है। पंचम अध्याय 'उदयभानु हंस की साहित्यिक अभिव्यक्ति' विषय पर आधारित है। इस अध्याय में साहित्य, प्रेम, जवानी, पाप, रूप माधुरी, मनुहार, विरह वेदना, आशा, ज़िन्दगी, कविता आदि विविध आयामों को स्पष्ट किया है। षष्ठ अध्याय 'साहित्यकार का लक्ष्य और उदयभानु हंस की उपलब्धियाँ' विषय पर आधारित है। इस अध्याय में साहित्यकार की उसके अनुभवों के प्रति सही समझ को विकसित करता है। वह हंस जी के अपने भोगे हुए जीवन व जीवनानुभावों को पूरी सहजता और ईमानदारी से साहित्य में प्रस्तुत करता है, वह जीवन की समस्याओं और कठिन परिस्थितियों से पलायन नहीं करता और न ही घबराता है, बल्कि डटकर सामना करता है। सप्तम तथा अंतिम अध्याय में, उपसंहार शीर्षक से लेखक आनन्द प्रकाश आर्टिस्ट जी ने अपने अध्ययन का निष्कर्ष प्रस्तुत किया है।

इस तरह हम देखते हैं कि आनन्द जी ने हंस जी के साहित्य का ही नहीं, बल्कि उनके व्यक्तित्व का विश्लेषण भी बहुत ही गंभीरतापूर्वक किया। अगर लेखक आनन्द जी के लेखकीय स्वभाव और उनके इस शोधपरक जीवनी-ग्रंथ को जोड़कर देखा जाए तो एक अच्छे साहित्यकार के साथ-साथ एक प्रखर आलोचक के रूप में भी आनन्द जी का नाम स्पष्ट रूप से अपनी एक अलग पहचान के साथ हमारे सामने प्रस्तुत होता है। विवेच्य शोधपरक जीवनी के आधार पर यह धारणा और भी प्रबल हो जाती है कि आनन्द जी, जो भी लिखते हैं, वह महत्वपूर्ण, ज्ञानवर्धक और प्रामाणिकता की दृष्टि से विश्वसनीय होता है।

यह पुस्तक हंस जी के साहित्य पर उनके जीते-जी हुए शोध कार्य में अमूल्य कृति के रूप में चर्चित है। एक तरह से हंस जी के जीवन संघर्ष और साहित्यिक प्रयासों को संपूर्ण रूप में सामने लाने का एक स्तुत्य प्रयास प्रस्तुत कृति के रूप में आनंद प्रकाश आर्टिस्ट जी ने किया है। भारतीय संस्कृति के सांस्कृतिक पक्ष को उभारने तथा साधारण जनता को मानवता का पाठ पढ़ाने के लिए हंस जी ने भरसक प्रयास किया है। उन्होंने भारतीयों को अपनी संस्कृति से जुड़ने की प्रेरणा देने का सफल प्रयास किया है। अतः उदयभानु हंस के साहित्य में निहित मानव मूल्य, समाजोपयोगी और जनोपयोगी है। जैसे फूल तमाम दिशाओं से हवा ग्रहण करता है किंतु खिलता अपनी शर्तों पर है, उसी तरह से उदयभानु हंस जी भी अपनी शर्तों पर जीने और साहित्य को अपनी दृष्टि देकर उसका विकास करने वाले कवि एवं साहित्यकार रहे हैं। यह सच है कि उदयभानु हंस जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर बहुत-से शोधार्थियों द्वारा शोधकार्य प्रस्तुत हुआ है, जिसमें उपाधिपरक शोधकार्य भी शामिल है और स्वतंत्र रूप से किया गया शोध भी, किन्तु इन सबमें आनन्द जी ने एतद् विषयक समस्त सामग्री के संकलन एवं विश्लेषण में जिस श्रम-साधना और स्वतंत्र अनुसंधान-वृत्ति का परिचय दिया है, वह निश्चित रूप से अन्य से हटकर एवं प्रशंसनीय है। मेरा मानना है कि आनन्द जी का यह प्रयास ‘हंस’ जी के प्रति उनका अगाध सम्मान व श्रद्धा का सजीव प्रमाण है। मुझे पूर्ण विश्वास है कि इस शोधपरक पुस्तक का साहित्य संसार में स्वागत होगा तथा यह ग्रंथ उदीयमान कवियों/लेखकों के लिए नहीं, बल्कि शोधार्थियों एवम् अध्येताओं के लिए भी मार्गदर्शक का काम करेगी। वस्तुतः इसके लिए लेखक हार्दिक अभिनंदन एवं शुभकामनाओं के पात्र हैं।
 



समीक्ष्य कृति- उदयभानु ‘हंस’ की साहित्यिक उड़ान
लेखक- आनन्द प्रकाश ‘आर्टिस्ट’
विधा- जीवनी
प्रकाशक- ज्योतिे प्रकाशन, मयूर विहार, गोहाना रोड़, सोनीपत (हरियाणा)-131001
मूल्य- 500 रुपये
पृष्ठ- 232


- डॉ. काकोली गोराई

रचनाकार परिचय
डॉ. काकोली गोराई

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