दिसम्बर 2020
अंक - 65 | कुल अंक - 66
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

मूल्यांकन

जुगनुओं की वसीयत : अँधेरे से मुठभेड़ करते हाइकू
- डॉ. लवलेश दत्त




कविता का जन्म संवेदना से होता है। कवि जो देखता है, सुनता है अथवा भोगता है, उसी को शब्दों का आवरण पहनाकर लिपिबद्ध करता है। किसी न किसी रूप में वह अपने अनुभवों को ही कविता के रूप में कायान्तरित करता है। आज के समय में सबसे बड़ी समस्या समय की कमी है। इसी समय की कमी की वजह से साहित्य में कई छोटी-छोटी विधाओं का न केवल जन्म हुआ, बल्कि उनका पर्याप्त विकास भी हुआ। काव्य की ऐसी ही एक अत्यन्त लघु विधा है- हाइकु। पाँच-सात-पाँच के क्रम में मात्र सत्रह वर्णों में सृजित हाइकु अपने आप में पूर्ण कविता है क्योंकि इसका आकार लघु है लेकिन इसमें निहित संवेदनाओं के इतने बारीक तन्तु होते हैं कि पाठक के मन मस्तिष्क पर इसके पीछे की पूरी व्यथा-कथा अंकित हो जाती है। विगत 20-25 वर्षों में काव्य की यह लघुविधा अत्यन्त लोकप्रिय हो रही है। देश की कई अग्रणी पत्रिकाएँ हाइकु प्रकाशित कर रही हैं, जो इस विधा के लिए सुखद है। इसके साथ-साथ वर्तमान समय में कई कवि निरन्तर हाइकु सृजन कर रहे हैं। समय-समय पर प्रकाशित हाइकु संग्रहों से इसका प्रमाण मिलता है। इन्हीं संग्रहों के बीच देश की प्रख्यात हाइकुकाकर सुश्री मीनू खरे का नया हाइकु संग्रह 'जुगनुओं की वसीयत' का प्रकाशन साहित्य की इस लघ्वाकार विधा के रसिकों के लिए सुखद सूचना है। यह मीनू जी का द्वितीय हाइकु संग्रह है। इससे पूर्व 'खोयी कविताओं के पते' नामक हाइकु संग्रह अपनी संवेदनात्मक अभिव्यक्ति के लिए आज भी हिन्दी काव्य जगत में चर्चित है। इसी क्रम में मीनू खरे का द्वितीय हाइकु संग्रह 'जुगनुओं की वसीयत' का प्रकाशन न केवल हाइकुकारों के लिए बल्कि पाठकों के लिए भी आशाओं का संचार करता है।

प्रस्तुत हाइकु संग्रह में जहाँ एक ओर जीवन से जुड़े विभिन्न विषयों पर केन्द्रित हाइकू हैं तो वहीं राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय घटनाओं को भी हाइकु में ढाला गया है। मीनू जी अत्यन्त संवेदनशील रचनाकार हैं। इसका प्रमाण उनके हाइकू पढ़कर सहज ही लगाया जा सकता है लेकिन उनकी लेखनी केवल संवेदनाओं की ही संवाहक नहीं अपितु संघर्ष की सशक्त अभिव्यक्ति भी करती है। वे अँधेरे से लड़ने की सीख ही नहीं देतीं बल्कि स्वयं लड़ती हैं। इस बात का सत्यापन प्रस्तुत संग्रह के आत्मकथ्य से होता है, जिसमें उन्होंने संग्रह का शीर्षक 'जुगनुओं की वसीयत' रखने का कारण स्पष्ट करते हुए कहा है, "अँधेरे के विरोध का जुगनुओं का उपक्रम शाश्वत है और यह किताब उसी उपक्रम की एक कड़ी मानी जा सकती है।"

मीनू जी जीवन को कई कोणों से देखती हैं। वे अनुभूतियों की सूक्ष्म से सूक्ष्मतर पड़ताल करती हैं, उसमें डूबती हैं, उसको गुनती हैं फिर कहीं जाकर हाइकु बनता है। उन्होंने अपने हाइकु-सृजन पर हाइकु मालिका में स्वयं लिखा है-

जग के रंग
जब खुद रंगी तो
हाइकु बने।

जग को पढ़ा
गुना और लिखा तो
हाइकु बने।


एक सजग रचनाकार अपने समकाल पर पैनी दृष्टि रखता है। वह अपने समय और समाज की रोशनाई में अपनी लेखनी डुबाने से पहले उसकी खूब गहराई से जाँच करता है। तब कहीं जाकर मन को भेदने वाले शब्दों का चयन हो पाता है। पुस्तक की भूमिका में प्रख्यात हाइकुकार एवं साहित्यकार डॉ. मिथिलेश दीक्षित लिखती हैं, "समाज के एक जागरुक नागरिक का निष्पक्ष चिन्तन और एक कवि हृदय की गहन संवेदना; दोनों का समन्वय मीनू जी की हाइकु रचनाधर्मिता में सर्वत्र मुखर है।" मीनू जी की लेखनी से निसृत एक-एक शब्द उनके अनुभवों में लिपटा हुआ तथा उनके मन के भावों का रूपान्तरण है। एक नारी के रूप में उनके मन की पीड़ा का स्पष्ट दर्शन कराते हुए कुछ हाइकू द्रष्टव्य हैं-

सस्ता एसिड
चेहरे ने चुकाई
ऊँची क़ीमत।

कामकाजी स्त्री
दो नावों में सवार
फिर भी पार।

मैं औरत हूँ
नेम-प्लेट के सिवा
पूरा घर हूँ।


मीनू जी को प्रकृति से अत्यन्त प्रेम है। उनके प्रकृतिपरक हाइकू इस बात का प्रमाण हैं कि उनके हृदय में प्राकृतिक उपादानों के लिए विशिष्ट स्थान है। जंगल की आग, पशु-पक्षियों की हत्या, मनुष्यों द्वारा बुरी तरह से पेड़ों का काटा जाना जैसे प्राकृतिक हनन से उनका मन क्षुब्ध होता है। अपने दुखी मन से वे लिखती हैं-

जाते देखी जो
पेड़ों की शव-यात्रा
पक्षी फफके!

वो जंगल था
पर जंगलीपन
हमारा दिखा।

हारा जंगल
और जीता हमारा
जंगलीपन।


प्रस्तुत हाइकु संग्रह में जहाँ एक ओर दैनिक जीवन के अनेक रंगों को हाइकु में ढाला गया है, वहीं विशिष्ट पर्वों, अवसरों, ऋतुओं, महापुरुषों आदि के साथ-साथ पौराणिक चरित्रों को भी हाइकु का विषय बनाया गया है। महात्मा गांधी पर केन्द्रित उनके हाइकु द्रष्टव्य हैं-

देख के बापू
देश का रामराज
बोले हे राम!

क्षीण-सी काया
सत्याग्रह का प्रयोग
बड़ा संयोग

दुर्बल पाँव
गहरे पदचिह्न
नाम है गांधी

मीनू जी ने कोरोना महामारी को बहुत मार्मिकता के साथ हाइकु में ढाला है। वे उस अदृश्य वायरस के माध्यम से यह भी सीख देती हैं कि कभी किसी को लघु नहीं समझना चाहिए। वे कहती हैं-

लघुतम को
महत्तम दर्शाया
वायरस ने


लॉकडाउन की पीड़ा को पूरे विश्व ने अलग-अलग तरह से भोगा है लेकिन हमारे देश के ग़रीब मजदूरों के ऊपर जो बीती है, वह अत्यन्त दुर्भाग्यपूर्ण है। एक संवेदनासिक्त हृदय उनकी इस पीड़ा से व्याकुल हुए बिना नहीं रह सका। मीनू जी का नारी मन भी उन मजदूरों की पीड़ा से विचलित होकर कहता है-

लॉकडाउन
क़ैद है मेहनत
रिहा है भूख

लॉकडाउन
पगार आधी और
भूख पूरी है


मीनू जी अपने हाइकु के माध्यम से परिस्थितियों का चित्र खींचने में कुशल हैं। लॉकडाउन में मजदूरों का पैदल चलना, भूख से व्याकुल होना, रेल की पटरी पर चलते हुए दुर्घटनाग्रस्त होना जैसी कारुणामयी घटनाओं को अपने हाइकु में इतनी मार्मिकता से ढालती हैं कि पाठक के नेत्र सजल हो उठते हैं। वे लिखती हैं-

दौड़ते दावे
रेंगती मजबूरी
रो पड़े रस्ते

रोटी ने लिखी
अपनी यात्रा कथा
लाल रंग से


मीनू जी आकाशवाणी में कार्यरत हैं। आकाशवाणी में शब्दों का ही सारा खेल होता है। इसीलिए वे अपने हाइकु में शब्दों का चयन बहुत सोच-विचार कर करती हैं। संग्रह की भूमिका में प्रख्यात कवि डॉ. जगदीश व्योम लिखते हैं, "सुश्री मीनू खरे एक ऐसी साहित्यकार हैं, जो आकाशवाणी से जुड़ी हैं, जहाँ कुछ बोलने से पहले शब्द-शब्द को बहुत बारीकी से जाँचा-परखा जाता है। यही कारण है कि मीनू खरे की हाइकु कविताओं के बीच से गुज़रना सघन अनुभूतियों की किसी सुरम्य वाटिका के बीच से गुज़रने जैसा सुखद एहसास कराता है।"

इसमें कोई संदेह नहीं कि मीनू जी एक सजग और सचेष्ट रचनाकार हैं। प्रत्येक रचनाकार शब्द शिल्पी होता है। वह अपने सृजन में अपने शब्द भी गढ़ता है। मीनू जी के हाइकु में प्रायः शब्दों के प्रयोग का चमत्कार ही देखने को नहीं मिलता बल्कि कुछ एक शब्दों के नये रूप भी देखने को मिलते हैं। अपने एक हाइकु में वे ‘हिमालय’ शब्द को ‘हिमाले’ लिखकर उसे आम बोलचाल की भाषा में परिवर्तित करती हैं, जो पाठक को बरबस ही आकर्षित करता है-

फ़तह की हैं
हिमाले की चोटियाँ
यही ख़ता है?


मीनू जी भाषा प्रयोग में स्वतंत्रता अपनाती हैं। वे हिन्दी के प्रायः सभी प्रकार के शब्द यथा तत्सम, तद्वभ, देशज, आँचलिक आदि प्रयोग करती हैं। इसके साथ-साथ अंग्रेजी, उर्दू, अरबी-फ़ारसी के शब्दों का भी प्रयोग अपने हाइकु में इस ढंग से करती हैं की पाठक वाह-वाह कर उठता है। उदाहरण के लिए उनके हाइकु में अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग देखें-

कोंपल देख
निर्जीव ठूँठ बोला
लव यू बच्चे!

लैब में मैंने
उसे काटा तो रो दी
सॉरी मेंढक


पुस्तक का आकर्षण उनके अवधी में लिखे हाइकु हैं। मीनू जी लखनऊ में जन्मी व पली-बढ़ी हैं। उनका अधिकांश समय लखनऊ, गोरखपुर, वाराणसी आदि पूर्वी उत्तर प्रदेश में ही बीता है। अतः अपने अँचल की भाषा से उनका लगाव स्वभाविक है। उनके इसी लगाव का सुपरिणाम उनके अवधी में लिखे हाइकु हैं-

हमार बोली
ई देख्यो एक दिन
दुनिया बोली।

अवधी प्यारी
नेह बरसावै ज्यों
हो महतारी।

अवधी बोली
ज्यों मिसरी की डली
कानन घोली।

अवधी बोली
माँ जइस सुन्दर
माँ अस भोली।


प्रस्तुत हाइकु संग्रह में हर पृष्ठ पर एक नवीनता देखने को मिलती है। पृष्ठ पलटते ही जीवन का नया रूप सामने आता है। मीनू जी अपनी लेखनी के माध्यम से व्यवस्था पर प्रहार भी करती हैं। वर्तमान समय में न्यायपालिका, विधायिका, कार्यपालिका यहाँ तक कि चतुर्थ स्तंभ की भूमिका संदिग्ध होती जा रही है। मीनू जी साहस के साथ उस पर अपनी लेखनी चलाती हैं। वे लिखती हैं-

न्याय-मंदिर
तारीखों के प्रसाद
बाँटते रहे।

चिता की लौ पे
सियासत चमकी
टीआरपी भी।

न्यायमूर्ति तो
मूर्ति से बैठे रहे
चढ़ावे चढ़े।


मीनू जी जैसी निर्भीकता कम ही रचनाकारों में देखने को मिलती है। वस्तुतः निर्भीकता व्यक्ति की धर्मनिष्ठा और सच्चाई पर निर्भर करती है। जो व्यक्ति सच्चा होगा वही निडर भी होगा। मीनू जी एक सच्ची साहित्यकार हैं। इसका प्रमाण व्यवस्था विरोध में उनके लिखे हाइकु हैं। वे किसी भी प्रकार की चाटुकारिता नहीं स्वीकारती हैं। तभी तो वे मुखर होकर लिखती हैं-

तुच्छ दलील
दरिन्दों को बचाते
बड़े वकील।

ढेरों दीखते
क़ानून में सूराख़
कैसा इंसाफ़?


मीनू जी के हाइकु पढ़कर इस बात का अनुमान लगाया जा सकता है कि उन्होंने जीवन के हर एक पल को गहनता से जिया है। वे जहाँ भी जाती हैं, उस परिवेश में खो जाती हैं मानों वे उन स्थानों को अपने में आत्मसात कर लेती हों। उनके प्रकृतिपरक हाइकु इस बात का प्रमाण हैं कि वे स्वयं को प्रकृति से जोड़कर देखती हैं। उनके अन्दर सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के लिए अपनापन है क्योंकि वे स्वयं को उसका एक अंश मानती हैं। इसका कारण उनकी सकारात्मक सोच है। प्रख्यात कवि कमलेश भट्ट 'कमल' पुस्तक की भूमिका में लिखते हैं, "मीनू खरे अपनी सकारात्मक सोच के साथ हाइकु कविता में उतरी हैं। यह सोच उनमें एक ऐसी जिजीविषा का संचार करती है, जो अन्ततः पाठक के मन तक विस्तार पाती है।"

हाइकु संग्रह अत्यन्त आकर्षक कलेवर में शुभदा बुक्स, साहिबाबाद से प्रकाशित हुआ है। इसका प्रकाशन भी मीनू जी के हाइकु की तरह सुन्दर और मनमोहक है। हालांकि पृष्ठ संख्या देखते हुए मूल्य अधिक प्रतीत होता है। मीनू जी के इस द्वितीय हाइकु संग्रह 'जुगनुओं की वसीयत' को हिन्दी काव्य जगत में प्रशंसा व ख्याति मिलना अवश्यंभावी है क्योंकि यह केवल पुस्तक नहीं है बल्कि भोगे हुए जीवन की अनुभूतियों का रूपान्तरण है। मीनू जी ने अपने आत्मकथ्य में आज के समय को 'अँधेरों का युग' और जुगनुओं के अँधरों से सतत संघर्ष में 'आम आदमी की छोटी-छोटी सकारात्मक कोशिशों' को देखा है, जो इस बात का प्रतीक है कि मीनू जी सकारात्मक विचारों वाली रचनाकार हैं। वे समस्याओं के आगे घुटने टेककर बैठने वाली रचनाकार नहीं हैं बल्कि समस्याओं के समाधान खोजने वाली रचनाकार हैं। वे अपने पाठकों को सतत संघर्ष करने की सीख भी अपने इस हाइकु संग्रह के माध्यम से देती हैं। यही एक सजग और संवेदनशील रचनाकार का उद्देश्य भी होता है और अपने इस उद्देश्य में मीनू जी सफल हुई हैं। उन्हें अपने दूसरे और नये हाइकु संग्रह के लिए अत्यन्त शुभकामनाएँ और बधाई।



समीक्ष्य पुस्तक- जुगनुओं की वसीयत
विधा- हाइकु
रचनाकार- मीनू खरे
प्रकाशक- शुभदा बुक्स, साहिबाबाद
पृष्ठ    -126
मूल्य- 250/- (अजिल्द)


- डॉ. लवलेश दत्त

रचनाकार परिचय
डॉ. लवलेश दत्त

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