दिसम्बर 2020
अंक - 65 | कुल अंक - 66
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कहानी

स्वीकृत और अस्वीकृत के दरम्यान

ऐसा करने का मेरा कोई इरादा नहीं था। ये प्लानिंग शाब जी की ही थी। मैं उन्हें शाब जी ही कहता हूँ। इसका भी एक क़िस्सा ही है बस। जिस पहले दिन मैं उनके दरवाज़े गया, एक वफ़ादार गेटकीपर से मेरा सामना हुआ। मुझे मालूम था कि वे बिल्कुल अकेले ही रहते हैं। हुआ ऐसा कि अपनी एक कहानी लेकर मैं  उनके पास एक दिन चला गया। न कोई परिचय, न जान, न पहचान; उन दिनों मुझे अपने पर थोड़ा भरोसा कम ही था मगर ये जो रचना पर राय लेने वाला काम था, इसके लिए भी तो ख़ुद पर भरोसा होना ज़रूरी था इसलिए मुझे अब ऐसा लगता है कि वो भरोसा रहा होगा मेरे अंदर कहीं दबा-ढका और मेरा भरम ही  होगा कि भरोसा नहीं है।

मेरा मित्र, जो मेरा प्रथम पाठक हुआ करता, उसकी नज़रों में मैं एक कमज़ोर-सा इंसान था, जो सिर्फ़ और सिर्फ़ कहानियों के पात्रों से लड़ सकता है। उसी मित्र  ने एक दिन रेलवे फाटक के पास ट्रेन के गुजरने का इंतज़ार करते हुए मुझे यह सुझाव दे मारा था। वह बाइक चला रहा था और मैं उसके पीछे बैठा था। रेल का फाटक बंद था और तपस्विनी एक्सप्रेस जाने वाली थी। मुझे उस वक़्त थोड़ा कष्ट-सा महसूस हुआ क्योंकि पिछले काफ़ी समय से मैं अपनी हर कहानी उसे ही पढ़वाया करता। ऐसा मैं इसलिए न करता कि मुझे उसके विचार की ज़रूरत थी या फिर कि मुझे अपने लिखे में कोई सुझाव की ज़रूरत थी। दरअसल वही एक ऐसी चीज़ थी, जिस पर मुझे सौ फीसदी भरोसा था मेरे लेखन पर। मैं उस पर किसी की बात जल्दी सुनने को तैयार न होता। मैं उससे अपनी हर रचना इसलिए पढ़ने को कहता क्योंकि वह एक अच्छा और सच्चा-सा दोस्त था और उससे मैं कुछ भी कह सकता था। पता नहीं उसे मेरी कहानियाँ कितनी समझ आया करतीं मगर वह पूरी रूचि के साथ उन्हें पढ़ता। वह कभी-कभी जब मेरे पात्रों को किसी सन्दर्भ में उद्धृत किया करता तो मुझे यह बात बहुत पसंद आती।

उसी मेरे मित्र के सुझाव पर मैं शाब जी के पास चला गया था। ऐसा नहीं था कि शाब जी मुझे जानते न थे या कि वे मेरी कहानियों से परिचित न थे। वे मेरी कहानियाँ पत्रिकाओं में पढ़ चुके थे। वे मुझसे भौतिक शरीर के रूप में तो नहीं मगर मेरी रचनाओं के माध्यम से अवश्य ही परिचित थे। लेकिन मैं आदतन संकोची था और अपनी किसी चीज़ को पढ़ने को कहना मेरे ज़मीर के खिलाफ था। मैं ऐसे किसी समारोह/ कार्यक्रम में भी नहीं जा पाता था, जहाँ मुझे शाब जी  से किसी प्रकार का परिचय प्राप्त करने का अवसर मिल जाता। कुल मिलाकर यह एक परिचय और अपरिचय के मध्य वाली अवस्था थी। बहरहाल जिस कहानी को लेकर एक दिन मैं उनके गेट पर खड़ा हो गया था, मेरी वह कहानी अस्वीकृत होकर आ गयी थी और मुझे वह बेइंतहा प्यारी थी। मुझे नहीं मालूम कि अपनी चीज़ों से किस हद तक मुहब्बत की जानी चाहिए। शायद ये कुछ ऐसा था कि एक दफे राजकपूर साहब से उनकी एक कम चली फिल्म के बारे में पूछने पर कहा कि  'ये ऐसा है जैसे आपकी कोई औलाद पीछे रह जाये और उस पर आपको ज़्यादा प्यार आये।' मुझे अपनी इस कहानी पर यह उदाहरण    मौजूं जान पड़ा। ख़ैर जो भी हो पर मैं उनके पास अपनी उस अस्वीकृत कहानी के साथ खड़ा था। वे थोड़ा खुश थे। उनका व्यक्तित्व उनकी रचनाओं की तरह ही असरदार था। हो सकता है उनके पास ऐसे कामों के लिए वक़्त न भी रहा हो मगर उन्होंने मुझे ऐसा महसूस न होने दिया बल्कि काफ़ी गर्मजोशी से मिले। मैंने कम बातें की और उनको सुना ज़्यादा मगर वे भी बहुत बोलने वाले लगे नहीं; मुझे लगा इंसान शायद एक ही काम बेहतर तरीके से कर सकता है और अगर वह लिखता अच्छा है तो उसे अपनी कारीगरी लिखने के लिए ही बचा कर रखनी चाहिये, उसे बोलने पर जाया न करना चाहिये और मल्टी टास्किंग जैसी एक छलावा ही है, जैसे किसी छोटे झोले में बड़ा सामान भर दिया गया हो।

मुझे  ऐसा कहते हुए काफ़ी शर्म-सी महसूस हुई कि मैं उनके पास अपनी कहानी लेकर आया हूँ और उनका वक़्त चाहता हूँ। उनके हावभाव में ऐसा कुछ भी नहीं था, जिससे मुझे ऐसा सोचने का कोई कारण हो लेकिन यह सब मेरे ही अंदर था। मुझे जानकर हैरत हुई कि उन्होंने मेरी एकाध कहानी पढ़ भी रखी थी।  
'वैसे मुझे कहानियाँ किसी को और वो भी आप जैसे को पढ़ने को देना और यह अपेक्षा करना कि आप अपने व्यस्त से दैनिक रूटीन से समय काटकर इसे पढ़ें, यह वाक़ई बहुत कुछ अजीबो-ग़रीब अपेक्षा, "सा आपको क्यों लगता है?"
‘मेरी कहानी कोई भला क्यों पढ़ेगा मैं तो बस एक साधारण जन हूँ, जिसके पास एक खुरदुरी-सी क़लम है।’
'खुरदुरी क़लम...वाह बहुत अच्छे! देखें हम ज़रा आपकी खुरदुरी कलम चलती कैसी है। वे मुस्कुराये।
एक पल मुझे लगा कि मैं कुछ ज़्यादा ही बोलना हो गया होऊं।
और फिर ऐसा हुआ कि मैं अस्वीकृत कहानी उनकी मेज़ पर छोड़ आया।
मैंने अपने मित्र को यह बात नहीं बताई। बहुत दिन बीतने पर जब उधर से कोई जवाब न आया तब जाकर मैंने उसी तरह रेल फाटक पर मित्र को बताया कि उसके सुझाव पर कैसे उसने शाब जी को अपनी कहानी दे दी थी और यह भी कि बहुत दिन हुए उधर से कोई जवाब न आया। इस बार बाइक मैं चला रहा था और मित्र पिलियन राइडर था।


वह कुछ देर मौन रहा। बाद मैं मुझे उस चुप्पी का राज़ समझ आया।
"तुम ही क्यों नहीं समय लेकर मिल लेते! वैसे तुम वहाँ गये कब?" उसके इस सवाल के बाद मुझे यह समझ आया कि जाने से पहले उसे न बताना शायद मित्र की अपेक्षा के ख़िलाफ़ था।
ऐसे ही चला गया था। मैंने कहा।
"मैं चलूँ तुम्हारे साथ।"
"नहीं रहने दो। जब पहली बार तुम्हें नहीं लिया तो इस बार क्यों!?
"मैं चल रहा हूँ।" मित्र ने मेरे काँधे को दबाकर कहा।
और फिर एक सुबह हम दोनों बिना समय लिए, बिना फोन किये ही शाब जी के दरवाज़े पर खड़े थे। उनकी उदारता से मैं वाक़िफ़ था और मित्र भी। घंटी  बजी तो इस बार वे मुस्कुराते से दरवाज़े पर खड़े थे।
"आओ मैं तुम्हारे इंतज़ार में हूँ।"
इस बार वे हम दोनों को अपने बैठक ख़ाने में लेकर गये। पिछली बार जब मैं आया तो वे अपने अध्ययन कक्ष में बैठे थे। इस बार वे उत्साहित थे। वे स्मोक करते थे और कुछ ज़्यादा ही। पिछली दफे भी जब मैं उनके सामने बैठा था तो उन्होंने मेरे सामने ही सिगरेट पी थी, जिसका धुआं बहुत देर तक मेरे दिलो-दिमाग़ से निकल न पाया था। उनके घर से आने के बाद आधा दिन, दिन जाने पर भी नहीं। मुझे लगा था कि ये किसी दिन सिगरेट से ख़त्म हो जायेंगे और इनकी कुछ कहानियाँ अधूरी रह जाएँगी। फिर वे फ्रांज़ काफ्का की तरह अपने किसी मित्र को वे अधूरी कहानियाँ जला डालने को कह देंगे।
बैठक ख़ाना बड़ा था और उनके कश से निकलने वाले धुँए के छल्ले ऊँची छत तक जा रहे  थे। मैं उन छल्लों को देखता और उनके टूटने का इंतज़ार करता।


"मैंने तुम्हारी कहानी पढ़ी।" वे फिर उठे और सिगरेट की राख़ डालने के लिए ऐश ट्रे उठा लाये।
"ये कहानी तो कमाल की है।" अब तक मेरी साँस अटकी हुई थी मानो कोई बहुत बड़ा फैसला आने वाला हो। जब ये बात बाद में मैंने अपने मित्र को बताई तो उसने कुछ ऐसे उड़ाया बात को- "मतलब क्या अगर वे कह देते कि कहानी ख़राब है तो कोई पहाड़ तो नहीं टूट पड़ता!"
वे एक-एक वाक्य को कहते और फिर सिगरेट का एक कश। मैं लगातार, चुपचाप उनके चेहरे की ओर देखता रहता।
"तुमने ये कहानी कहीं भेजी क्या।"
"हाँ, भेजी थी न! मगर लौट आयी खेद के साथ।"
वे मुस्कुराये।
"इसे मैंने तुम्हारी रज़ामंदी लिए बग़ैर भेज दिया था तुम्हारा नाम हटा कर और मालूम क्या हुआ?"
ऐसा कहकर वे अपनी स्टडी रूम में गये और वहाँ से एक लिफ़ाफ़ा उठा लाये और उसे मेरी तरफ़ बढ़ा दिया।
लिफ़ाफ़ा खुला हुआ था। मैंने लिफ़ाफ़े से काग़ज़ निकाला; एक चिठ्ठी थी जिसे हाथ में लेकर उसने शाबजी की ओर देखा तो उन्होंने इशारे से उसे पढ़ने को कहा।
चिट्ठी संपादक की थी और शाब जी को संबोधित थी। चिट्ठी में उस कहानी को कालजयी कहानी बताया गया था और उस कहानी के एक-एक पात्र का ज़िक्र भी था। चिठी लंबी और फुर्सत से लिखी गयी लगती थी।


"उन्होंने यह मान लिया कि ये कहानी मेरी ही लिखी हुई है। मेरी मंशा भी यही थी। तुमने कहा था न साथ लौट आयी थी कभी कभी कहानियाँ ही हैं। यही मैं तुम्हें बताना चाहता था। तुमने एक बेहतरीन कहानी लिखी है। वह अस्वीकृति तुम्हारी है तुम्हारे नाम की है, तुम्हारी कहानी तो अभी उनके दिमाग़ में दर्ज ही नहीं हुई। वहाँ सिर्फ तुम्हारा नाम। जिस दिन वे नाम से आगे बढ़ जायेंगे, उस दिन वे तुम्हारी कहानी को एक बार और पढ़ेंगे और फिर वे कहानी का मोल आँक पाएँगे।"
"सर वो दिन कब आएगा?" मित्र अब तक जो चुप था, अचानक से उत्साहित हो गया। मैंने इशारे से उसे चुप रहने को कहा।
"ये सही कह रहे हैं। क़लम चलती रहे, रुके नहीं इन बातों से इन घटनाओं से, ज़रूर आएगा वह दिन। अस्वीकार का एक प्रभाव  है, इससे मैं इंकार नहीं कर सकता मगर वहीं सजग रहने की ज़रूरत है। अस्वीकृति और स्वीकृति के दरम्यान जो ज़मीन है न वह ठोस ज़मीन है, उसे पकड़कर रखने की ज़रूरत होती है।"
उस दिन शाब जी दोनों को छोड़ने अपने गेट तक आये।


उस दिन अपने मित्र की बाइक के पीछे बैठकर आते हुए मुझे महसूस हुआ कि बाइक की रफ़्तार तेज़ है। किसी मंज़िल पर पहुँचने की कोई जल्दी नहीं है और धरती की गुरुत्वाकर्षण शक्ति कुछ कमज़ोर हो गयी है।


- ममता शर्मा

रचनाकार परिचय
ममता शर्मा

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कथा-कुसुम (1)