दिसम्बर 2020
अंक - 65 | कुल अंक - 66
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

भाषांतर

हाय हम वकील क्यों हुए
(उर्दू से शौकत थानवी के व्यंग्य लेख का हिंदी अनुवाद)


भारत में जितनी अच्छी पैदावार वकीलों की हो रही है अगर उतनी पैदावार अन्न की होती तो यहाँ ज़रा भी भूखमरी नहीं होती।  मगर समस्या यह है कि यहाँ अनाज कम और वकील ज़्यादा पैदा हो रहे हैं। होना तो यह चाहिए था कि यहाँ मुकदमों के अनुपात में वकील होते पर यहाँ वकील न मुकदमों के अनुपात में हैं न मुकदमों के अनुसार हैं। इन दिनों वकीलों की संख्या इतनी ज़्यादा हो गई है कि यदि एक-एक मुक़दमे में दस-दस वकील भी लगा दिये जाएँ तो भी हज़ारों वकील बेरोज़गार रह जाएँगे। बी.ए. के बाद जिसे भी नौकरी नहीं मिली उसने एल.एल.बी. कर लिया। अब हर साल वकीलों का रैला कॉलेज की बिल्डिंग से कचहरी की बिल्डिंग को तक रहा है। यहाँ कई वकीलों की बैठे-बिठाये वकालत चल गयी और कई वकील चलते रहे और उनकी वकालत बैठ गयी।

वकीलों को बहुत-सी किस्में पाई जाती हैं। एक तो वो वकील, जिनकी वकालत चलते चलते कहाँ से कहाँ पहुच गयी, दूसरे वो वकील जो ख़ुद कहाँ से कहाँ पहुच गये और उनकी वकालत वहीं की वहीं है। तीसरे वो वकील जो, हैं तो वकील पर किसी किराना दुकान में नौकरी कर रहे हैं। चौथे वो वकील जो सर्कस में जोकर हो गये हैं, पाँचवे वो वकील, जो शायर हो गये। छठवें वो वकील, जो अब पूरी तरह भूल चूके हैं कि वे वकील हैं और अब वो घर जमाई बनकर ससुराल में रह रहे हैं। चुनाव के समय वकीलों की समस्या सुनते हुए एक प्रत्याशी ने कहा था– बस एक बार हमारी पार्टी सत्ता में आ जाये फिर देखना हम अपराध की मात्रा इतनी बढ़ाएँगे कि हर वकील के हाथ में सौ-सौ  केस होंगे।

विचारने की बात है कि आखिर वकालत किस-किस की चले और कब तक चले? हर वर्ष जितनी देश की आबादी नहीं बढ़ती, उससे ज़्यादा तो वकीलों की संख्या बढ़ जाती है। अगर वकीलों के बढ़ने की यही रफ़्तार रही तो वह दिन दूर नहीं जब इस देश में वकीलों के अतिरिक्त और कोई दिखाई ही नहीं देगा। तब हर मुवक्किल ख़ुद वकील होगा, हर गवाह वकील होगा, मालिक वकील तो नौकर भी वकील, पति वकील तो पत्नी भी वकील, दुकानदार वकील तो ग्राहक भी वकील, रिक्शावाला वकील तो सवारी भी वकील। अगर वकीलों की बढ़ती तादाद रोकी न गयी तो एक दिन यह दृश्य देखने को मिलेगा कि जूता बनाने वाला भी वकील, जूता बेचने वाला भी वकील, जूता खरीदने वाला भी वकील, जूता पालिश करने वाला भी वकील और जूता चुराने वाला भी वकील ही होगा।

अब प्रश्न यह है कि वकीलों की संख्या जो दिन दूनी और रात चौगुनी की दर से बढ़ रही है तो ये वकील आखिर करेंगे क्या? आज का हाल यह है कि छोटे आकार के मुक़दमे में भी बड़े साईज़ के वकील भिड़े हुए हैं। आज यह हाल है तो आने वाला समय तो और भयानक होगा क्योंकि सुनने में आ रहा है कि आने वाले समय में हिन्दुस्तान में धर्म का ही बोलबाला रहेगा। अगर हर आदमी धार्मिक हो जायेगा तो फिर झूठ, छल, कपट और हिंसा तो स्वत: ही समाप्त हो जायेगी फिर तो वकीलों की ज़रूरत खत्म हो जायेगी।

पाठकों दुनिया की हवा ही वकीलों के खिलाफ़ चल रही है। नये वकीलों के पैदा होने की रफ़्तार जितनी तेज़ है, पुराने बूढ़े वकीलों के मरने की उतनी ही धीमी। अमूमन वकील लम्बी उम्र प्राप्त करते हैं यह भी कोई छोटी समस्या नहीं है। पहले का वक्त ऐसा था कि कोई किसी को देख; थूक भी देता था तो वह उस पर मुकदमा ठोक देता था और फिर वह मुकदमा कई सालों तक चलता था और दोनों तरफ़ के वकील खूब फीस झटकते थे। लेकिन आज वक्त ऐसा हो गया है कि कोई किसी का सिर भी फोड़कर 'सॉरी' बोल दे तो मामला खत्म हो जाता है। दो लोग आपस में मारपीट पर उतारू हो जाते हैं तो दूसरे लोग बीच-बचाव कर के मामला संभाल लेते हैं और बात कोर्ट तक तो क्या थाने तक भी नहीं जाती है। वकीलों को तो हड़ताल कर के बीच-बचाव को कानूनन जुर्म घोषित करवा देना चाहिये।

अब वकीलों के सामने एक ही रास्ता है कि वो समाज में अपनी ज़रूरत पैदा करें। उन्हें लोगो को समझाना होगा कि शादी ब्याह एक क़ानूनी रस्म है, जिसमें पंडित और काज़ी के साथ लड़के वाले और लड़की वाले दोनों की तरफ़ से एक-एक शादीशुदा वकील होना ज़रूरी है ताकि शादी क़ानूनी रूप से पुख्ता हो सके। इसी तरह बच्चे की पैदाईश के वक्त दाई के साथ-साथ वकील का भी मौजूद होना ज़रूरी माना जाये ताकि बच्चे के जनमते ही वसीयत तैयार हो जाये। ऐसे सैंकड़ों मामलों को यह रूप दिया जाये कि इसमें वकील के दखल के बिना कुछ हो ही नहीं सकता। ज़मीन वकील साहब बिकवायेंगे, ट्रेन की टिकट वकील साहब के सामने ख़रीदा जायेगी, स्कूल में बच्चे का प्रवेश वकील के माध्यम से कराया जायेगा, पार्सल एक वकील के सामने रवाना होगा और दूसरे वकील के सामने खोला जायेगा, पति-पत्नी वकील को सामने बैठाकर लड़ा करेंगे, बाप वकील के आये बिना बच्चों को डांट न सकेगा, डॉक्टर वकील की मौजूदगी में दवा लिखेगा, वकील की मौजूदगी में ही दवा खरीदी और खाई जा सकेगी। मरने वाला वकील साहब से सलाह मशविरा लेकर मरेगा, मरने वाले के रिश्तेदार वकील साहब से बात कर के ही कफ़न-दफ़न के काम को अंजाम दे सकेंगे। शायर वकील से पूछ-पूछ कर ही शेर लिख सकेगा। मुशायरे की अध्यक्षता वकील से सलाह मशविरा कर के ही की जा सकेगी।

अगर वकीलों ने अपनी ज़रूरतें पैदा करने में सफ़लता प्राप्त कर ली तो ठीक वरना एक दिन ऐसा आयेगा, जब दो वकील मिलेंगे तो गले लग कर रोयेंगे और कहेंगे– हाय हम वकील क्यों हुए?


- अख़तर अली

रचनाकार परिचय
अख़तर अली

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