दिसम्बर 2020
अंक - 65 | कुल अंक - 66
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

जो दिल कहे
जाता साल-आता साल: कई सबक, कई मिसालें
 
साल 2020 गुजरने को है। गुजरता साल खौफ के मंजर से भरा रहा। जाता हुआ साल मानव सभ्यता के इतिहास में एक ऐसे साल के रूप में याद किया जाएगा, जिसमें गंभीर चुनौतियों के साथ-साथ बेमिसाल उपलब्धियां भी एक ही साथ अर्जित की हैं। स्वास्थ्य जगत का इतिहास बताता है कि मनुष्य ने कभी भी एक साथ किसी भी महामारी से लड़ने के लिए इतने अधिक शोध और वैज्ञानिक उपाय नहीं किए थे जितने कि आज किए जा रहे हैं। दुनिया भर में 200 से अधिक बैक्सीन पर काम हो रहा है और 30 बैक्सीन लगभग अंतिम दौर में पहुंच चुकी हैं। मनुष्य घर पर रहकर मुकाबला अपनों की देखभाल खुद की हिफाजत और स्थर्य॑ के प्रति अधिक जिम्मेदार बनना भी इसी साल सीखा है। संभवत मानव इतिहास में यह पहला मौका होगा जब पूरा विश्व एक साथ घरों में कैद होकर रह गया, मुक्ति अभी भी नहीं हुई है लेकिन हालात बदलने लगे हैं। विश्लेषण करते हैं गुजरा साल हमारे लिए क्या-क्या सबक देकर गया है
 
यह बात समझ में आ गई कि पूरे विश्व में बढ़ती हुई आबादी ने जिस तरह संसाधनों का उपयोग किया है वह उचित नहीं है। हमारे जीवन पर प्रकृति की जो कृपा है जो प्रभाव है वही प्रकृति अपने अतिशय दोहन और शोषण से खफा होने पर कहर बरपाने में विलम्ब नहीं करती। महामारी के प्रभाव में गरीबी अमीरी के भेद को मिटा दिया साधन संपन्न लोग भी बेहाल और बेबस हो गए हैं, गरीबों की तो कहे ही क्या लेकिन हर आपदा में अच्छी चीजें भी साथ हुई हैं, पूरी दुनिया में एक-दूसरे की सहायता के लिए बढ़े हुए हाथों ने हौसला दिया है। यह मानवता का नया चेहरा है जिसने गरीब देशों से लेकर अमीर देशों तक एक-दूसरे को थामे रखा है। हमारे देश में भी लाखों-करोड़ों लोगों ने दूसरों की सहायता की है। इसी दौरान चिकित्सकों का भी एक चेहरा सामने आया, जहां चिकित्सकों ने अपनी परवाह किए बिना लोगों को चिकित्सा उपलब्ध कराई वहीं अनेक लोग मुनाफे का धंधा करने से भी नहीं चूके। गुजरता हुआ साल यह भी सबक दे रहा है महामारी को गुजरा हुआ नहीं समझा जा सकता अभी इससे दो दो हाथ करने बाकी हैं।
 
लगभग 9 महीने तक देश में एक तरह का आर्थिक अपंगता व्याप्त था लेकिन देश की बड़ी आबादी ने समझदारी के साथ इस हालात से मुकाबला किया है।
इस साल की सबसे बड़ी और जोरदार छलांग रही है डिजिटल दुनिया में दुनियाभर के करोड़ों बच्चे ऑनलाइन क्लासेज में जुटे हैं। गृहणियाँ किचन के लिए रेसिपी ढूंढ रही हैं, बच्चे नए-नए खेलों में मशगूल हैं और बुजुर्ग लोग अपने लिए मनपसंद पुस्तकों के साथ घर बैठे आनंद ले रहे हैं। यह समझ में आ गया है कि आने वाला बर्ष तकनीक का वर्ष होगा और अनदेखे और अकल्पनीय आकिष्कार सुविधाएँ और प्लेटफार्म हमारे सामने होंगे। अभी तो यही कमाल है कि इस तकनीकी ने हमें जीवन की बेहतरीन अनुभूतियों से भी गुजरने का मौका दिया है। यद्यपि विकासशील देशों में तकनीक का प्रभाव धीमी गति से देखने को मिल रहा है लेकिन इसमें कोई शक नहीं क महज एक दशक में ही हमने जो कुछ अर्जित किया था, उसे पिछले 1 साल में 10 गुना बढ़ता हुआ देखा है और आने वाले साल में यह रफ्तार सौगुनी होने जा रही है।
 
अच्छी ख़बर है कि न केवल अपने देश में बल्कि विश्वभर से हवा के स्राफ होने की खबरें आ रही हैं। ग्रीनहाउस गैस के उत्सर्जन में गिरावट के भी संकेत मिले हैं। इसके अलावा मानवीय दृढ़ता, समानुभूति एवं इन सबसे बढ़कर स्वास्थ्य एवं आवश्यक सेवाओं के लिए काम करने वाले लाखों लोगों के निःस्वार्थ कार्य का प्रमाण प्राप्त हुआ है। इस वायरस के खिलाफ चल रहे युद्ध को किसी भी सूरत में जीतने एवं लोगों की जानें बचाने का जज्बा ही कोविड-19 की लड़ाई का हॉलमार्क बनता जा रहा है। सरकारें कानून बना कर आगे बढ़ रही हैं।
 
देश में कई शहर ऐसे हैं जो अब कचरा अलग कररने की प्रक्रिया बंद कर रहे हैं क्योंकि लगातार बढ़ते मेडिकल कचरे और प्लास्टिक के व्यक्तिगत सुरक्षा किट की संख्या के सामने सफाई कर्मचारी बेबस हैं। डरे हुए लोग सार्वजनिक परिवहन के साधनों का प्रयोग नहीं करना चाहते हैं, उन्हें डर है कि भीड़भाड़ वाले सार्वजनिक स्थानों पर संक्रमण का खतरा बढ़ जाएगा। इसलिए, जैसे-जैसे लॉकडाउन खुला शहरों की सड़कों पर निजी वाहनों की संख्या में बढ़ोतरी होती गई है इससे जलवायु परिवर्तन के लिए जिम्मेदार जीवाश्म ईंघनों से होने वाला उत्सर्जन भी बढ़ गया है, मतलब पिछला रिकॉर्ड फिर कुलबुलाने लगा है। हमें भविष्य की ओर अग्रसर होना चाहिए क्यूंकि कोरोना की इस शाम का सबेरा भी अवश्य होगा और अच्छी चीजों की खोज आगामी साल में हमारे और नजदीक होगी। आज जब हम इस स्वास्थ्य संकट के चरम पर पहुंच चुके हैं, हमें काम करने के नए तरीके ढूंढने होंगे। हम हालात के सामान्य होने का इंतजार नहीं कर सकते क्योंकि तब यह न तो नया होगा और न ही अलग। आने वाले साल में ऑनलाइन चीजों पर और जोर बढ़ने वाला है। शिक्षा, स्वास्थ्य, घर से काम करने लोग और सलाह सेवायें बढेंगी।
 
हमें अच्छी तरह समझ लेना चाहिए कि कोरोना महामारी वैक्सीन के बाद भी सरल नहीं रहने देगी। फिलहाल तो डिस्टेंस पर जोर रहेगा इसलिए सुरक्षा की दृष्टि से खानपान कपड़े और आवास जैसी चीजों पर भी लोग एंटीबायरस का दावा पेश कर देंगे। इलेक्ट्रिक वाहन समय से काफी पहले हाजिर होने को तैयार है ऐसे में पैट्रोल-डीजल बेचने वाले देशों के दिन खराब हो जायेंगे, बशर्ते उन्होंने नए विकल्प न चुन लिए। कोरोना और सामूहिक भीड़भाड़ के बीच मुठभेड़ चलेगी। चुनाव, त्यौहार उत्सव और विवाह जैसे आयोजनों में भीड़ उमड़ेगी/ उमड़ रही है। उबकाए-उकताए लोग घर की कैद तोड़ कर भागेंगे, भले ही इससे अर्थव्यवस्था  को गति मिले लेकिन कोरोना की लहर दर लहर भी पीछा करेगी। अभी हम अपने देश में दीपावली और शादी समारोहों की भीड़ का आलम देख रहे हैं, अब इसी महिने में यूरोप में क्रिसमिस में यही सब जहां भी दोहराया जाएगा। लोकडाउन के आर्थिक दुष्परिणामों से डरी सरकारें कोरोना की विकरालता के बाबजूद अब इसका नाम लेने से भी डरने लगी हैं। सरकारें पहले से अधिक सर्वसत्तावादी  हो जायेंगी। शादी, मुण्डन और बर्थडे जैसे मामलों में सरकारी मंजूरी इन्सपेक्टर राज के लौटने की आहट है जो अधिक तेज होगी। रोजगार के परम्परागत क्षेत्रों में नए उपकरण और तकनीक अकुशल और अशिक्षित लोगों के लिए मुहाली पैदा करेगी। आर्थिक असमानता समाज में गहरी भेदभाव की खाई और चौड़ी करेगी।
 
हस्ताक्षर समूह एवं उसके पाठकों के लिए आने वाला वर्ष मंगलमय हो।
शुभकामनाएं!

- नीरज कृष्ण

रचनाकार परिचय
नीरज कृष्ण

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