दिसम्बर 2020
अंक - 65 | कुल अंक - 66
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

बातें कुछ ज़रूरी-सी

बाज़ार की चकाचौंध

साल 2020 के फागुन में होली का रंग घुलने से पहले ही वैश्विक महामारी कोरोना का रंग अप्रत्याशित मात्रा में ऐसा घुला कि अब तक बस एक अनिश्चितता का काला छापा सबके दरवाजों पर, देशों, नगरों-महानगरों, गाँवों-कस्बों, मोहल्लों पर चस्पा है। त्यौहार अपने नियत महीनों-दिनों पर आये भी और मनाये भी गये मगर त्यौहारी रौनकों में उम्मीद की रोशनी और जोश के ढोल न तो दिखाई ही दिये न ही सुनाई ही दिये। अब देवठान के बाद सहलग भी अपनी मंडप गढ़ाई कर चुका है, पीली चिट्ठियों का आवागमन ज़ोरों पर है। तीन-चार सौ आगन्तुकों की लिस्टें भी पचास पर आकर सिमट गयी हैं, उस पर डर ये कि किसको रखें व किसे छोड़ें और किस-किस फूफा-मौसा का मुँह ताउम्र को फूलेगा।

इस सब के बीच जो तनिक भी नहीं बदली, वो थी बाज़ार की कूटनीति। महामारी के चलते लॉकडाउन की अवधि में बाज़ार पर तगड़ी चोट हुई, लाज़मी था भी। बहुतायत में खरीदा गया गोदामों में एकत्रित माल झींगुरों, चींटियों, सीलन, चूहों आदि ने बिना दया दिखाये बर्बाद कर डाला। कुछ ट्रेंडी वस्तुओं पर आउटडेटेड का ठप्पा भी उभर आया।
बाज़ार तो पर बाज़ार ही ठहरा, जिसे हर हाल में सिर्फ़ उठना आता है, बैठना तो कतई नहीं! निजी अर्थव्यवस्थाओं का समानुपात भी तो बाज़ार के तनकर खड़े रहने का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है।


बहरहाल हम सदा से ही बारहों महीने त्यौहारों-उत्सवों की बलैया लेने वाले लोग हैं। होली के 'बाद' लॉकडाउन के चलते सब बंद रहा लेकिन बाज़ार रक्षाबंधन से 'पहले' सब स्कीमों, पॉलिसियों, सेलों के नाम पर मूँछ पे ताव देकर मुस्कुरा रहा था। कर्ण कवचधारी भीड़ त्योहार दर त्योहार वैश्विक महामारी को जीभ चिढ़ाकर एडवाइजरी का उल्लंघन करने पर आमादा रही।
मॉल बंद रहे मगर एसेंशियल प्रोडक्ट्स के नाम पर ग्रोसरी स्टोर्स, जिनमें जूते, कपड़ों, होम डेकोर, फर्नीचर मतलब कि हर छोटी से बड़ी चीजें थीं, वो सब बत्तीसी निपोरे खुले रहे और भई 'सदर' तो सदर ही ठहरा, पिचासी प्रतिशत शहरों में खूब गदर मचाया इसने भी!
मासूम पढ़ी-लिखी भीड़ मुँह पर मास्क 'कभी हाँ, कभी ना' के लहजे में टाँगे कंधे से कंधा रगड़कर चलती रही। बस स्टैंडों, रेलवे स्टेशनों पर हमने मान लिया कि यहाँ वायरस के लिये 'निषेध' लिखा हुआ है। हमारी सोच ने ये भी मान लिया कि गाँव-कस्बों तक जाने को वाइरस को कोई टैम्पो या जुगाड़ नहीं मिलती तो वहाँ पर हाट लगाएँ या हाट में लहालोट ही क्यों न हो जाएँ! ये चुन्नू-सा वाइरस भला जनता का क्या बिगाड़ लेगा!


भई आपके सारे लॉजिक मान लिये, एक एप के होने के कारण अनुपात की पुष्टि भी मान ली मगर ये भी कहिये कि क्या गाँव-कस्बों में हर कहीं नेटवर्क के खंभे पहुँचे हैं? या फिर हर एक का मोबाइल डाटा या ब्लूटुथ हर समय चालू रहता होगा? गौर से सोचिये तनिक, उत्तर आप खुद बूझ लेंगे।
गाँव के हाट हों या शहर के सदर, यहाँ की कतारें श्मशान घाटों की वेटिंग कतारों को सच में बढ़ा रही है। विश्वास न हो तो जाकर देख आइये वहाँ। कहावत वही, जो हमारे पुरखे कह गये हैं कि- अपने मरे ही स्वर्ग दिखता है।


सब कुछ सही है आपका यूँ बलवा करना, बरगलाना, आपका यूँ पिंजरा तोड़कर उड़ना, इन रोकों से आपका ऊब जाना, इस मनहूसियत भरे माहौल से छटपटाकर सभी बेड़ियाँ तोड़ देना। सबकुछ मगर उतना ही जायज़ है जितना कि एक लिट्रेट और एक एजूकेटेड में बहुत ही महीन अपितु मजबूत लाइन भर का अंतर होता है।
बाज़ार का काम ही अपनी सतरंगी चमक-दमक, रसीले प्रलोभनों में उलझाकर, आँखों को चौंधिया कर अपने झाँसे में लपेट लेना है। वो उसका काम हमेशा ही पूरी ईमानदारी और मुस्तैदी से करता चला आ रहा है।
मगर आप क्या कर रहे हैं?
अपनी, अपने परिवार, समाज और भविष्य की नस्लों को अपनी अनदेखी, अपनी 'भाड़ में जायें, हमें क्या?' वाली मानसिकता और नियमों की अनदेखी के चलते गर्त में नहीं डाल रहे हैं।


इतिहास गवाही देता है कि हम सदा से जुझारू और विजेता देश के निवासी हैं लेकिन शत्रु को कभी भी कमतर नहीं आँकना चाहिये। अभी इस वैश्विक शत्रु के विनाश के हथियार और निराकरण कुछ भी पुख्ता तौर पर हाथ नहीं लगे हैं, तब तक खुद को ही क्यूँ न एक लक्ष्मण रेखा के भीतर रोका जाये!
किसी भी बात का मखौल उड़ाने से इतर हम ये भी सोच कर देखें कि मास्क की आदत क्या बुरी है? यदि हम बीमारी को छोड़ भी दें तो विकट प्रदूषण के चलते भी हमें ही भविष्य में फायदा पहुँचेगा। मिट्टी-धूल और हवा में व्याप्त विषाक्त कणों, गैसों आदि से काफी हद तक बचाव होगा ही होगा। पर्सनल हाइजीन हमें ही एक सुरक्षाचक्र प्रदान करती है और डिस्टेंसिंग भी एक एटीकेट एक मैनर्स का कदम भर ही तो है। सार्वजनिक जगहों पर भीड़-भाड़ वाले वाहनों, स्थानों आदि पर यदि एक-आध हाथ की दूरी रहेगी तो आये दिन महिलाओं, लड़कियों के संग होती अभद्रता भी शायद कम हो सके (ये उम्मीद अक्सर दम तोड़ देती है )!


बाज़ार को चलने दीजिए, वो वही कर रहा है, जो उसके हित में है पर आप अपने हित को भी नज़रंदाज़ मत करिये।
कुछ नियमों के पालन से हमारी ज़िन्दगी थमेगी नहीं बल्कि उनकी अनदेखी से अवश्य ही हम एक फ्रेम और चंदन के हार में बंद होकर रह जाएँगे। खरीदारी करिये परंतु आवश्यक वाली। यदि जीवन बचा रहा तो तफरी को बहुत मौके और समय मिलेगा।


तो ठण्डे दिमाग से सोचिये, सोचने के पैसे नहीं लगते बल्कि हम पनौतियों से बचते हैं।
हमारा और हमारी आने वाली पीढ़ियों का भविष्य सुरक्षित रहे, उसके लिये क्या हम बहुत छोटे-छोटे योगदान देने से भी पीछे हट जायेंगे?
मास्क पहनने या एक-आधे हाथ की दूरी रखने से क्या-क्या नुकसान उठाने पड़ रहे हैं? यदि नहीं तो करिये न वही, जिसमें सबका भला हो, हम आते सालों में भी त्योहारों व उत्सवों का आनन्द ले सकें।
स्वस्थ रहिए, सावधान रहिए, सानन्द रहिए।


- प्रीति राघव प्रीत

रचनाकार परिचय
प्रीति राघव प्रीत

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