दिसम्बर 2020
अंक - 65 | कुल अंक - 66
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

उभरते स्वर

कामयाबी

जीवन में वो मंज़िल ही क्या,
जिसे पाना बहुत आसान हो।
छाले न पड़े पैरों में,
न ज़ख्म के निशान हों।

कामयाबी के वो सपने ही क्या,
आँखें सूजी, न हुई लाल हों।
जुनून हो बस कामयाबी का,
चाहे दिन हो या रात हो।

वो जीत का मंज़र ही क्या,
जिसका किया न इंतज़ार हो।
आँसू न निकले आँखों से,
करे खुशी का इजहार जो।

न लिखे सपने सैकत पर,
जो मिट जाए गर तूफान हो।
लिखा है मंज़िल पाहन पर,
मिटता न कभी निशान जो।

मिली वो पहचान ही क्या,
जिसे बतानी बार-बार हो।
चले पीछे-पीछे कारवां,
करे तुम्हारी जय-जयकार जो।


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पपीहे का संकल्प

बड़ा बावला है तू पपीहे!
ये कैसी है ज़िद कर ठानी?
वर्ष भर रह जाता प्यासा,
स्वाति बूँद से प्यास बुझानी।

नीर सभी तो प्यास बुझाते,
चहुं ओर पानी ही पानी।
इंतज़ार में बैठा प्यासा,
कर बैठा ना तू नादानी!

विकल्प नहीं जहाँ संकल्प है,
संशय नहीं जहाँ प्रेम निश्चल है।
स्वाति बूँद से प्यास बुझाना,
हठ नहीं यह मेरा निश्चय है।

न बुझेगी उम्मीद की लौ,
चाहे विकल्प मिले कई और।
नीर स्रोत मिले चहुं ओर,
स्वाति ही प्यास बुझाए मोर।

न हठ है न मनमानी,
समझ चाहे मेरी नादानी।
मर जाऊँगा मैं तो प्यासा,
अगर यही मेरी ज़िंदगानी।

न नैनो में भरी निराशा,
प्यास बुझेगी मन में आशा।
अटूट विश्वास की परिभाषा,
अंबर निहारे पपिहा प्यासा।

एक टक निहारे गगन,
अपनी ही धुन में था मगन।
उम्मीद भरे उसके नयन,
हाय! कैसी लगी ये लगन।

छा गई घटा घनघोर,
स्वाति बूँद ज़मीं की ओर।
गिरी पपिहे के कण्ठ में जाकर,
तृप्त हुआ वो प्यास बुझाकर।

घुमड़-घुमड़ कर बरसा पानी,
देखी अद्भुत यह प्रेम कहानी।
अनुपम था ये मिलन,
भर आए मेरे भी नयन।।


- स्वाति सौरभ

रचनाकार परिचय
स्वाति सौरभ

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