दिसम्बर 2020
अंक - 65 | कुल अंक - 66
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

फ़िल्म समीक्षा
लक्ष्मी: अपने भीतर की लक्ष्मी को महसूस करिए

 
स्टार कास्ट - अक्षय कुमार,कियारा आडवाणी,अश्विनी कलसेकर,राजेश शर्मा,आयशा रजा,मनु ऋषि,शरद केलकर
 
आखिरकार काफी इंतजार के बाद अक्षय कुमार की फिल्म 'लक्ष्मी' रिलीज हो ही गई है। इस फिल्म को लेकर काफी विवाद भी रहा लेकिन अब इसे ओटीटी पर रिलीज कर दिया गया है। यह फिल्म तमिल मूवी 'कंचना' की हिंदी रीमेक बताया जा रहा है। हालांकि मैं साउथ की फिल्में नहीं देखता हूँ इसलिए कंचना पर कुछ नहीं कह सकता। यदि यह कंचना का रीमेक है तो कंचना वाकई अच्छी फिल्म रही होगी। 
 
फ़िल्म की कहानी कुछ यूँ है कि आसिफ यानी अक्षय कुमार और रश्मि यानी कियारा की शादी हुई है लेकिन यह शादी दो अलग - अलग धर्मों के लोगों का मिलन है। दोनों ने भाग कर शादी की थी। इस वजह से रश्मि के परिवार वाले उन दोनों से नाराज है। अब जब रश्मि के माता पिता की सिल्वर जुबली सालगिरह है तब आसिफ चाहता है कि उसकी पत्नी एक बार अपने परिवार से मिले। क्योंकि उसकी मां ने न्यौता जो दिया है। वे दोनों अपने भतीजे के साथ कुछ दिन के लिए वहाँ जाते भी हैं। बस यहीं से हो जाती इस फिल्म की कहानी शुरू। आसिफ फैसला लेता है कि इस बार वो रश्मि के परिवार वालों को मनाकर रहेगा। लेकिन घर आते वक्त आसिफ उस जमीन पर पहुंच जाता है जहां उसे नहीं जाना चाहिए था। कारण यह फ़िल्म देखने पर पता चलेगा आपको। आसिफ कई बार एक ही डायलॉग दोहराता है, 'मां कसम चूड़ियां पहन लूंगा'। और फिर उसे चूड़ियां पहनने की नोबत आ ही जाती है। क्योंकि उसके भीतर एक आत्मा प्रवेश कर गई है जो कि किन्नर की आत्मा है। लेकिन आसिफ ने चूड़ियां क्यों पहनी हैं, उसका एक उद्देश्य है जो बेहद इमोशनल है।
 
फ़िल्म में अक्षय कुमार की एंट्री धमाकेदार है। अक्षय कुमार की परफॉर्मेंस में कोई कमी नहीं दिखाई देती है। उन्होंने आसिफ और लक्ष्मी दोनों के किरदार को भरपूर जिया है और अपने अभिनय से किरदार में और फ़िल्म में जान फूंकी है।  फिल्म में लक्ष्मी की एंट्री भी धमाकेदार है और अक्षय कुमार ने जो अपने किरदार को जिया है, वह तारीफ के काबिल है। एक लंबे समय बाद अक्षय ने कॉमिडी के रहते हुए भी सीरियस किरदार को उसके अंजाम तक पहुंचाया है। लक्ष्मी के किरदार में शरद केलकर का किरदार बहुत छोटा है मगर छाप छोड़कर जाता है। अगर आपको हॉरर फिल्मों से डर लगता है तो इस फिल्म को देख लें क्योंकि यह हल्की फुल्की हॉरर फिल्म है जिसमें अच्छा मनोरंजन भी शामिल है और सन्देश भी। 
 
अक्षय और कियारा की जोड़ी नहीं जम पाई। कारण अक्षय पर उम्र हावी होती दिखाई देती है जबकि कियारा के लुक्स के बारे में कहना ही क्या। कियारा हर फिल्म के साथ बेहतर होती जा रही हैं। हालांकि कियारा के पास करने के लिए कुछ खास नहीं था। राघव लॉरेंस ने डायरेक्शन किया है तो साउथ इंडियन फिल्मों के प्रभाव से आप नहीं बच सकते। अगर साउथ की फिल्में पसंद हैं तो ठीक वरना पहले ही गाने से फिल्म से आपका ध्यान भटक जाएगा और शायद देखने का मन नहीं करेगा। बावजूद इसके 'बुर्ज ख़लीफ़ा' और 'बम भोले' गाना प्रभावित करता है। इस फिल्म का हर गाना कहानी को खत्म करने का सा काम करता दिखाई देता है। फिल्म में सपोर्टिंग कास्ट के तौर पर अश्विनी कलसेकर, राजेश शर्मा, आयशा रजा और मनु ऋषि ने भी अपना काम बखूबी किया है।
लेकिन एक बात मुझे समझ नहीं आ रही है कि लक्ष्मी फ़िल्म अच्छी है बावजूद इसके लोग नेगेटिव रिव्यू क्यों दे रहे हैं। फ़िल्म किन्नरों को लेकर भी बात करती दिखाई देती है। लंबे समय बाद किन्नरों की कहानी पर्दे पर बुनी गई है। इस नाते भी थोड़ा तारीफ कर लेते भाईयों। 
 
अपनी रेटिंग - 3 स्टार

- तेजस पूनिया

रचनाकार परिचय
तेजस पूनिया

पत्रिका में आपका योगदान . . .
विमर्श (4)मूल्यांकन (6)धरोहर (1)उभरते स्वर (1)आधी आबादी: पूरा इतिहास (1)फ़िल्म समीक्षा (31)फ़िल्म जगत (4)