दिसम्बर 2020
अंक - 65 | कुल अंक - 66
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

व्यंग्य

आओ, वादे करें!

इस संसार का हर आदमी जो एक-दूसरे के पास हो या दूर एक काम ज़रूर करते हैं और वो है वादा। वादा करना भी किसी काम को करने से कम नहीं है, क्योंकि आपने वादा कर दिया मतलब काम कर दिया और इसका सबसे अच्छा उदाहरण आप हमारे यहाँ के नेताओं से ले सकते हैं, जो चुनाव के समय वादे कर जाते हैं और सीधे पाँच साल बाद ही जनता के बीच जाते हैं और कहते हैं हमें अपने काम पर वोट दीजिए और वोट मिल भी जाते हैं नयें वादों पर।

वादा तभी किया जाता है जब एक आदमी को दूसरे आदमी पर विश्वास न हो। ऐतिहासिक काल में या उससे भी पहले इसे वरदान देना या वचन देना कहा जाता था। पहले समय में अगर आपने किसी को वचन दे दिया तो आपको निभाना ही पड़ता था, चाहे आपके प्राण ही क्यों न निकल जाएँ और इसके सबूत आपको हमारे पवित्र ग्रंथ रामायण से प्राप्त हो जाएँगे। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि पहले का समय वादा निभाने का स्वर्ण युग था क्योंकि पहले का राजा हो या आम आदमी अपने वचन का पक्का होता था लेकिन इस नवीन युग में वादे का कोई मूल्य नहीं रह गया है और अब लोग वादा नहीं दावा करते हैं। लोग तरह-तरह के वादे करते हैं, जैसे- दोस्त मिलने का, दुश्मन से बदला लेने का, पत्नी पति से प्रणय का, भ्रष्टाचार मिटाने का, अपनी प्रेमिका से उसके लिए कुछ भी कर जाने का। लेकिन वादा निभाना आसान नहीं है हालाँकि वादा करना भी जरूरी है नहीं तो सामने वाला व्यक्ति आप पर विश्वास ही नहीं करेगा। इस प्रकार वादा और विश्वास परस्पर एक-दूसरे के पूरक हैं क्योंकि जब तक आप वादा नहीं करेंगे तब तक दूसरा व्यक्ति आप पर विश्वास भी नहीं करेगा चाहे फिर आप वादा निभाएँ या तोड़ें इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता और वादा करने की ख़ासियत हमारे यहाँ के नेताओं में कूट-कूट कर भरी है आलम तो यह है कि चुनाव में करोड़ों रुपए खर्च होते हैं और हजारों वादें नेता लोग जनता से कर डालते हैं और इन वादों की फेहरिस्त बहुत लंबी है और अगर हम इन वादों को कागज पर उतारना भीचाहें तो हजारों पेड़ काटने पड़ेंगे इन वादों को लिखने के लिए, ज़मीन पर उतारना दूर की बात है।

आम चुनाव के वक्त भिन्न-भिन्न प्रकार के वादे होते हैं, जैसे- चौबीसों घंटे बिजली, पानी, सड़क, गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा, रोजगार और ये मूल वादे हैं, जो सत्तर सालों से हमारे देश में हो रहे हैं और यही वादे हर चुनाव में बार-बार किए जाते रहे हैं चाहे वो नगर निगम का चुनाव हो या लोकसभा का इन वादों में आपको कोई अंतर नहीं मिलेगा। आपको एक जैसे वादे देखने को मिलेंगे और इन वादों में भी एक महत्त्वपूर्ण वादा भ्रष्टाचार मिटाने का, जो कि आजकल बहुत किया जा रहा है क्योंकि कुछ सालों में ऐसा कुछ हुआ है कि नेताओं को एक नया मुद्दा मिल गया है वादा करने का लेकिन ऐसा भी नहीं है कि भ्रष्टाचार पर पहले वादे नहीं होते थे लेकिन क्या हुआ भ्रष्टाचार मिट गया, नहीं बल्कि समय के साथ नेताओं ने भ्रष्टाचार के आरोपों से बचने के लिए लोकायुक्त और लोकपाल जैसे नये कवच भी विकसित कर लिए हैं और इस प्रकार भ्रष्टाचार को न ही कभी मिटाया जा सकता है ये तो वो वादा है, जिसे अनंत काल तक कभी निभाया नहीं जा सकता क्योंकि अगर सरकार की नींव ही भ्रष्टाचार रूपी चंदे के आधार पर बनी हो तो वो भला किस प्रकार कह सकते हैं कि हम पूर्णतया भ्रष्टाचार मिटा देंगे पर वादा करना जरूरी है, लेकिन इन वादों का कोई अर्थ नहीं हमारे देश में 70 सालों से सिर्फ वादे ही हो रहें हैं और आज भी हो ही रहें हैं और यह कोई एक पार्टी या पार्टी के नेता नहीं बल्कि सभी नेता और उनकी पार्टियाँ कर रही हैं लेकिन कोई भी इनको निभाता नहीं है या निभाना ही नहीं चाहता है वो वादा चाहे गरीबी हटाने का वादा हो या रोजगार देने का किसी भी वादे को निभाया नहीं बल्कि उस समस्या को और बढ़ाया गया ताकि उस समस्या को आड़ बनाकर और वादे किए जा सकें और कुर्सी के उस परम आनंद को प्राप्त कर सकें क्योंकि वादा करने वाला नेता जानता है कि अगर अभी वादा पूरा कर दिया तो अगली बार चुनाव में कौन सा वादा करेंगे क्योंकि बिना वादे किए न तो किसी की सरकार बन सकती है और न ही कोई नेता बन सकता हैं।

वादा तो आशिक़ भी करता है अपनी महबूबा से कि मैं तुम्हारे लिए चाँद-तारे तोड़ लाऊँगा, तुम्हारे लिए सात समंदर पार चला जाऊँगा वगैरह-वगैरह लेकिन क्या वो ऐसा कर सकता है? नहीं परन्तु वो सब इस प्रकार के वादे इसलिए करता है ताकि उसकी प्रेमिका को उस पर विश्वास हो जाये, झूठा विश्वास।ऐसे ही जनता उस महबूबा कीतरह है, जिसे पता सब है लेकिन फिर भी बेवकूफ बन जाती है क्योंकि उसे सब मुफ्त में चाहिए इसलिए जनता उसी पर विश्वास करेगी, जो ज़्यादा से ज़्यादा वादे करे फिर चाहे वह झूठे ही क्यों न हो यह उसी प्रकार है, जिस प्रकार एक आशिक़ की महबूबा उसे छोड़ देगी अगर उसका कोई दूसरा आशिक़ उसे और अच्छे वादे करे। सब वादे का खेल है और जो जितने ज़्यादा वादे करेगा उतना ही ज़्यादा सुख को प्राप्त करेगा और यही परम सत्य है कि वादा तोड़ने वाले को कोई पाप नहीं लगता।


- अमित कुमार चौबे

रचनाकार परिचय
अमित कुमार चौबे

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