अक्टूबर-नवम्बर 2020 (संयुक्तांक)
अंक - 64 | कुल अंक - 64
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

आधी आबादी: पूरा इतिहास

चन्द्र किरण सोनरेक्सा: एक अवलोकन
(जन्म शताब्दी विशेष)
- डॉ. शुभा श्रीवास्तव


हिंदी का इतिहास शुरू से ही पुरुष केंद्रित रहा है। किसी भी इतिहास में स्त्री साहित्य को खारिज करने की हमेशा कोशिश रही है। सिर्फ उन्हीं का उल्लेख हम पाते हैं, जिनसे इतिहास मुँह नहीं मोड़ पाया है। परंतु आज यह बात नही है। आज हर जगह स्त्री रचनाकार स्वीकृत है। कुछ रचनाकार अपने उत्कृष्ट योगदान के बावजूद उतनी चर्चित नहीं हुई, जितनी प्रसिद्धी उन्हें मिलनी चाहिए। ऐसी ही रचनाकार हैं- चंद्र किरण सोनरेक्सा।

सैक्सेरिया, सारस्वत, सुभद्रा कुमारी चौहान स्वर्ण पदक तथा दिल्ली हिंदी साहित्य अकादमी पुरस्कारों से पुरस्कृत चंद्र किरण जी ने लगभग 300 कहानियाँ, उपन्यास, नाटक, आत्मकथा और अनेक बाल साहित्य का सृजन किया है। इसके बावजूद किसी भी हिंदी साहित्य के इतिहास ग्रंथ में इनका उल्लेख नहीं मिलता।

चन्द्रकिरण सैनोरेक्सा का जन्म 19 अक्टूबर, 1920 ई. में पेशावर छावनी, नौशहरा में हुआ था। इनके पिता का नाम रामफल और माता का नाम जानकी था। चन्द्रकिरण जी ग्यारह वर्ष की आयु से ही सृजनरत हो गयीं, जो जीवन पर्यन्त तक चलता रहा। इनकी पहली कहानी 'घीसू चमार' बाल पत्र विजय में 1931 ई. में प्रकाशित हुई। लगभग 25 वर्ष तक आकाशवाणी लखनऊ में सेवा देने के पश्चात सत्रह मई 2009 को इनका देहान्त हुआ था।

चन्द्र किरण को सर्वाधिक प्रसिद्धि उनकी आत्मकथा 'पिंजरे की मैना' से मिली है। निम्न मध्यवर्गीय परिवार के उतार चढ़ाव, अंतर्द्वंदों के बीच सृजनशील नारी की आत्मकथा है पिंजरे की मैना। इस आत्मकथा में उनका क्रांतिकारी लेखन और सामाजिक दृष्टि उभरकर सामने आई है। दो जून की रोटी के लिए भारतीय स्त्रियों की पीड़ा, त्याग और समर्पण को बड़ी कुशलता से स्व के माध्यम से अभिव्यक्त किया है। वस्तुत: यह आत्मकथा नारी मन की पीड़ा का शब्दकोश बन पड़ी है। नारी के जीवन का बंधन, उसकी परतन्त्रता, उसकी अधिकार विहीनता आदि सबकुछ मूर्त रूप में पिजरे की मैना में साकार दिखाई देते हैं। पितृसत्ता और समाज का सामंतवादी रुख कैसे स्त्री जीवन को प्रताड़ित करता है, इसका यथार्थपरक रूप पिंजरे की मैना में चित्रित हुआ है। एक लेखिका का दर्द यह भी है कि वह पहले माँ, पत्नी, बहू और बाहर काम करने वाली कर्मचारी है फिर वह सबसे बाद में लेखिका है। एक स्त्री लेखक की इस पीड़ा को पिंजरे की मैना बखूबी बयान करती है। पिंजरे की मैना परम्परागत दाम्पत्य का, स्त्री विमर्श का पूरा आख्यान प्रस्तुत करती है।

शिल्प की दृष्टि से देखें तो इसमें उपन्यासात्मकता अधिक मिलेगी। इस आत्मकथा के संदर्भ में सुधा अरोड़ा जी कहती है कि- "इस आत्मकथा की तुलना अगर किसी से की जा सकती है तो वह है मन्नू भण्डारी की 'एक कहानी यह भी'। दोनों किताबों में ग़ज़ब की ईमानदारी, साफगोई और पारदर्शिता है। शब्द झूठ नहीं बोलते, दोनों आत्म कथाओं के ब्यौरे इस बात के गवाह हैं।" (स्त्री काल से साभार)

चन्द्रकिरण की कहानियों को हम शरतचंद और प्रेमचंद की परंपरा का वाहक कह सकते हैं। डॉ. उर्मिला गुप्ता का मानता है कि "सजीव पात्रों की सृष्टि करने में वे शरतचन्द्र के समकक्ष ठहरती हैं तो सरल एवं प्रभावपूर्ण भाषा शैली में मुंशी प्रेमचंद से टक्कर लेती प्रतीत होती हैं। इनकी कहानियाँ मानवोदात्त संवेदनाओं से परिपूर्ण हैं। चन्द्रकिरण की क़लम से मानवीय संवेदनाएँ पारिवारिक-सामाजिक मूल्य, व्यक्तिगतगत इच्छाएँ अपने सहज रूप में पाठकों के सामने आती हैं। इन कहानियों में मध्यवर्गीय जीवन अधिकाशत: उपस्थित हुआ है। चन्द्रकिरण ने उत्तर भारतीय समाज और वर्ग चेतना से सम्बन्धित कहानियों को व्यापक सन्दर्भों में अपनी कहानियों में उतारा है। खुदेजा अकाली, सितारा सुनीता आदि इनके द्वारा प्रयुक्त पात्र हमारे आसपास के जीवन में चलते-फिरते दिखाई देते हैं। चन्द्रकिरण के कथा साहित्य में तत्कालीन परिवेश के अनुकूल रिश्तों में घुटन, मूल्य ह्रास का चित्रण मिलता है। इसीलिए अज्ञेय का मानना है कि- "मध्यवर्गीय जीवन में पाखण्डो और स्वार्थ पर, आकांक्षाओं पर चन्द्र किरण इतनी गहरी चोट करती हैं कि पाठक तिलमिला उठे।" (भारतीय साहित्य संग्रह से साभार)

चंद्र किरण जी स्वयं यथार्थ पर बल देती हैं और साथ ही अपने लेखकीय दायित्व से पूर्णत: परिचित भी हैं। लेखन उनके लिए मनोरंजन या व्यवसाय नहीं है बल्कि एक सामाजिक उत्तरदायित्व है। अपने साहित्य लेखन के लिए चन्द्र किरण जी कहती है कि- "मैंने देश के बहुसंख्यक समाज को विपरीत परिस्थितियों से जूझते कुम्हलाते और समाप्त होते देखा है। वह पीड़ा और सामाजिक आर्तनाद ही मेरे लेखन का आधार रहा है। उन सामाजिक कुरीतियों, विषमताओं तथा बंधनों को मैंने अपने पाठकों तक पहुँचाने का प्रयास किया है, जिससे वह भी उनके प्रति सजग हो।"

चन्द्रकिरण ने अपने कथा साहित्य में नारी के विविध रूपों को चित्रित किया है। नारी और उसके जीवन से जुड़ी हर समस्या को महसूस करने के लिए इनके साहित्य से अच्छा उदाहरण अन्य कहीं नहीं मिलेगा। इनकी कहानियों में मध्यवर्ग की घुटन में छटपटाती और उच्च वर्ग के झूठे आडम्बर में उलझी स्त्री संवेदना का चित्रण प्रमुखता से है। गृहस्थी का सुख कहानी में पति के अत्याचार के कारण घुटन, अन्याय की संवेदना भीतर तक भेद देती है। 'सौदामिनी' कहानी में चन्द्र किरण पितृसत्तात्मक व्यवस्था में नारी शिक्षा की विवशता, उसकी दशा और अन्याय के प्रति उसके विचार को यथार्थवादी नज़रिये से प्रस्तुत करती हैं। 'कमीनों की जिंदगी' कहानी में एक कामकाजी नारी के समक्ष आने वाले विभिन्न संघर्षों को बड़ी खूबसूरती से दर्शाया गया है।

चन्द्रकिरण के द्वारा चित्रित नारी पुरुष के समकक्ष है। नारी की मनोदशा प्रेम और शरीर की अनुभुतियों की सहज अभिव्यक्ति इनके कथा साहित्य की महत्वपूर्ण विशेषता है। इन्होंने ऐसी नारी का चित्रण किया है जो खुले और आधुनिक विचारों वाली नारी है। चन्द्रकिरण जी ने नारी स्वतन्त्रता के नये मानदंड का निर्माण किया है। चन्द्रकिरण की नायिका स्त्री देह की बँधी-बँधाई परंपरा से अलग छवि रखती है पर वह व्याभिचार की सीमा तक नहीं जाती। इनके नारी पात्र संयमी और आत्मनिर्भर हैं। चन्द्रकिरण ने नारी की आत्म निर्भरता के लिए शिक्षा को सबसे ज्यादा महत्व दिया है।
चन्द्र किरण जी का साहित्य आज के स्त्री विमर्श को आईना दिखाता है। इन्होने स्त्री विमर्श के नाम पर देह गाथा का विरोध किया है परन्तु पुरुषवादी मानसिकता की इन्हें सूक्ष्म पकड़ थी तभी तो वह कहती है कि- "कवि, प्रोफेसर, डॉक्टर, कुली और मजदूर....नारी का मूल्य सबकी दृष्टि में एक है।" (ए क्लास का कैदी: कहानी संग्रह)


चन्द्र किरण की रचनाओं में स्त्री मन की वह दुनिया है, जहाँ पुरूषवादी अहं नहीं पहुँच पाता है। जीवन के हर छोटे से छोटे प्रसंग, जो संवेदनात्मक होते हैं, वे स्त्री तो महसूस करती है पर पुरुष नहीं। चन्द्र किरण के कथा साहित्य में यही छोटे से छोटे प्रसंग अपनी मनोवैज्ञानिक सूक्ष्मता के साथ उपस्थित हुए हैं। स्त्री की घर और बाहर की जिम्मेदारियाँ, उसका दोहरा जीवन, दोहरा संघर्ष चन्द्र किरण जी की लेखनी से रूपाकार हुआ है। 'गृहस्थी का सुख' जैसी कहानियाँ इन संवेदनात्मक बिन्दुओं पर यथार्थवादी दृष्टि डालती हैं। चन्द्र किरण जी के सन्दर्भ श्रीपत राय का मानना है कि- "निम्न मध्म वर्ग के घरों के अन्दर का विशेषकर स्त्रियो का इतना स्वाभाविक और पैना चित्रण अन्यत्र दुर्लभ है। नारी के स्वभावगत तुच्छता और क्षुद्रता का भी उनका अध्ययन बहुत व्यापक है। आज के कहानीकारों में मैं उनका स्थान ऊंचा मानता हूँ।" (दूसरा बच्चा: कहानी संग्रह)

कहानियों से इतर इनके उपन्यास में नारी पात्र ज्यादा शिक्षित और विद्रोही हैं। 'दिया जलता रहा' की दीप्ति नारी चेतना का प्रतीक बनकर पाठक के समक्ष आती है। समाज के आडम्बरों, रीति रिवाजों को तोड़ने का साहस इनकी नायिकाएँ करती हैं। 'चंदन चांदनी' उपन्यास में गरिमा दहेज़ जैसे रूढियों पर प्रहार करती है और साथ ही उच्च शिक्षा और नौकरी के कारण स्त्रियों की बदलती स्थिति का भी खाका खींचती है। इनके उपन्यासों में रूढिवादिता, संयुक्त परिवार को मानसिकता, शारीरिक शोषण, विवाह विच्छेद जैसे अनेक प्रश्न पात्रों के माध्यम से पाठकों से टकराते हैं।

‘वंचिता’ और ‘कहीं से कही नहीं’ जैसे उपन्यास अपने कथ्य और सरल सम्प्रेषण के लिए सदैव याद किये जा सकते है। डॉ. रामविलास शर्मा चन्द्र किरण के लिए सत्य ही लिखते हैं कि- "साधारण जिंदगी में भी निर्भिक कितनी हृदय द्रावक घटनाएँ होती हैं, कितने कठिन संघर्ष का सामना आज की स्वतंत्र चेता नारी कर रही है इन सब का चित्रण सिद्ध कलाकार की क़लम से हुआ है। जगह-जगह हास्य विनोद के छीटें, अचानक मर्म को छूने वाला व्यंग्य, वाक्यों के भीतर अनायास रची हुई कहावतें और वह जो बहुत कुछ देखने और ठोकरे खाने के बाद इन्सान में उसकी गिनती होगी, वह सब इनके लेखन में है।" (लेखन- जनधर्मी लेखन का आलोचनात्मक सिलसिला, पृ.- 237)

चन्द्र किरण के नाटक भी भाव और भाषा का वैविध्य अपने भीतर समाहित किए हुए हैं। पीढियों का पुल (नुक्कड नाटक) में वर्तमान युवा पीढी उसकी सतर्कता और कर्तव्य निर्वाह की संघर्षमय स्थिति का चित्रण है। वर्तमान सामाजिक परिवेश और उसका बदलाव तथा उस बदलाव में युवा वर्ग को मानसिकता का संवेदनशील चित्रण इनके नाटकों की विशेषता है। नाटक चाहे स्वर्ण मृग हो या वायदा, इंतजार हो या दहेज सभी नाटक किसी न किसी सामाजिक समस्या को पाठकों के सामने अपने पूरे यथार्थ रूप में प्रस्तुत करते हैं। नाटकों के माध्यम से भी चंद्र किरण जी ने नारी की विविध समस्याओं को साहित्य के केन्द्र में वैसे ही किया है, जैसे प्रेमचंद ने निर्वाह किया है। अवरोध नाटक में विधवा, घर परिवार नाटक में स्त्री स्वास्थ्य, दहेज नाटक में दहेज प्रथा तथा इंतजार नाटक में स्त्री पुरुष समस्याओं का अंकन हुआ है। चल रे मनवा देसवां की ओर नाटक में गांव और शहरी संस्कृति का चित्रण ठोस धरातल पर किया गया है।
रंगमंचीय दृष्टिकोण से इनके नाटक बड़े सहज हैं। इनका प्रकाश संयोजन और रंगमंचीयता इनके नाटकों की प्रसिद्धि का कारण है। कथानक और संवाद योजना दीर्घ न होने के कारण इनके नाटक मंचन में सरस व सरल हैं।


हिन्दी साहित्य में बाल साहित्य बहुत कम लिखा गया है, खासतौर पर चन्द्र किरण जी के समय में। चन्द्र किरण जी द्वारा लिखित पशु-पक्षी सम्मेलन ने प्रसिद्धि में इतिहास रचा है। करनी का फल, चतुर पंडित, टिड्डे की काम चोरी, मेघपरी और सोने की नदी जैसी रचनाएँ अपने हास्य और बाल सुलभ कोमलता के कारण पाठक को अपनी ओर बड़ी सहजता से आकर्षित कर लेती है। घमण्डी का सिर नीचा, मैं तुमसे बड़ा हूँ की कहानियाँ बच्चों के चरित्र निर्माण में सहायक ही नहीं हैं बल्कि कुछ रचनाएँ इतिहास से भी परिचय करवाती हैं। ऐसी रचनाओं में महारानी अहिल्याई, रानी पदमनी, लक्ष्मीबाई, वीर तात्या टोपे, नाना साहब पेशवा, हर्ष वर्धन और  विक्रमादित्य काफी चर्चित रचनाएँ रही हैं।

कहानियों के अतिरिक्त चन्द्र किरण जी ने 'शीशे का महत्व' नामक तिलस्मी और ऐय्यारी केंद्रित बाल उपन्यास का भी सृजन किया है। नल दम्पयन्ति बाल नाटक अपने पौराणिक आख्यान के साथ ही अपने देश की संस्कृति और ऐतिहासकता से भी हमारा परिचय कराता है। इनके द्वारा रचित बाल साहित्य मौलिकता के साथ प्रेरक तत्वों से परिपूर्ण हैं, जो मनोरंजन के साथ ज्ञानवर्धक तथा मार्गदर्शक भी है। बाल साहित्य की उपयोगिता इन्हीं अर्थो में आंकी जा सकती है, जिस पर चन्द्र किरण जी का साहित्य खरा उतरता है।

बहुमुखी प्रतिभा की धनी चन्द्र किरण सैनोरेक्सा ने टेली फिल्म 'गुमराह' का निर्माण भी किया है। इनके उपन्यास और दिया जलता रहा आकाशवाणी से प्रसारित हुआ था। इनकी कहानी 'हिरणी' पर फिल्म निर्माण की भी सूचना है।
चन्द्र किरण जी ने छाया और ज्योत्सना उपनाम से कविताएँ भी लिखी हैं। अपने गीतों को वह कवि सम्मेलनों में गाया भी करती थीं। देश प्रेम का स्वर इनके गीतों में प्रधान है। एक उदाहरण द्रष्टव्य है-


अवतार महात्मा गांधी है भारत का भाग्य बनाने को
जरा कृपा की बल्ली लगा देना
चरखे की तोप चलाकर तुम
पूनी का गोला लगाकर तुम
मैनचेस्टर लंका शायर की
सारी ही मिलों को उड़ा देना
अवतार महात्मा गांधी है भारत का भाग्य बनाने को
(तर्ज: बजरंग बली मेरी नाँव चली)


आज उनकी जन्म शताब्दी के अवसर पर हम उनके साहित्य के योगदान को याद करके उन्हे श्रद्धा सुमन अर्पित कर इतिहास में उनका नाम स्वर्णिम अक्षरों में लिख सकते है।


- डॉ. शुभा श्रीवास्तव