अक्टूबर-नवम्बर 2020 (संयुक्तांक)
अंक - 64 | कुल अंक - 64
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

मूल्यांकन

आशा की किरण: तिनका तिनका मध्यप्रदेश
- तेजस पूनिया




मरजानी, तिनका तिनका की श्रृंखला, तिनका तिनका तिहाड़, तिनका तिनका मध्यप्रदेश, तिनका तिनका डासना, रानियाँ सब जानती हैं आदि जैसी प्रसिद्ध एवं लोकप्रिय किताबें लिखने वाली लेखिका एवं लेडी श्री राम कॉलेज (दिल्ली विश्वविद्यालय) में एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. वर्तिका नन्दा आज अपनी एक अलग  पहचान बना चुकी हैं। देश के विभिन्न जेलों का अध्ययन करके वहाँ से कविताएँ और कहानियाँ निकालने का अनूठा काम इन्होंने किया है। यूँ तो मैंने लेखिका वर्तिका नन्दा को हमारे महाविद्यालय किरोड़ीमल में एक सेमिनार के दौरान सुना है। बेहद सुरीली, सुमधुर आवाज़ और बहुमुखी प्रतिभा की धनी इस लेखिका के द्वारा जेलों पर किए गये कार्य के लिए राष्ट्रपति से सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। तिनका तिनका फाउंडेशन की शुरुआत करके जेलों के भीतर इन्होंने एक बेहतर माहौल तैयार किया है। पुस्तक समीक्षा की कड़ी में वर्तिका नन्दा की लिखी पुस्तक तिनका तिनका मध्यप्रदेश पर बात करूँ, उससे पहले तिनका तिनका तिहाड़ पुस्तक में एक महिला कैदी की कविता है-

सुबह लिखती हूँ शाम लिखती हूँ
इस चारदीवारी में बैठी जबसे, तेरा नाम लिखती हूँ
इन फासलों में जो ग़म की जुदाई है
उसी को हर बार लिखती हूँ


यह मात्र कविता ही नहीं अपितु जेल के भीतर मौजूद उस महिला कैदी की अंतर्व्यथा भी प्रकट करती है। लेखिका वर्तिका नन्दा उस पार के संसार की बातें करती हैं, जो 10 बाई 10 के अँधेरे कमरे में अपनी ज़िंदगी काट रहे हैं। लेखिका जेल और उस संसार को चुनती है, जिसके बारे में हम कभी बात नहीं करना चाहते। इन जेलों में फूलों की क्यारी नहीं है, खुला आसमान नहीं है और तो और, पेड़ की छाँव भी उन्हें मयस्सर नहीं है। है तो बस एक खिड़की, जिसमें छोटे-छोटे से सुराख हैं, उनमें भी दरवाजा नहीं है। लोहे का गेट है और उस गेट पर है एक बड़ा ताला जड़ा। रात का ऐलान शाम 5 बजे ही हो जाता है। तब बचे-खुचे ख़्वाब भी उसी बड़े कमरे में बंद हो जाते हैं और करवट बदलने तक की इजाज़त लेते हैं। यहाँ सिर के नीचे कोई तकिया नहीं, एक छोटा-सा कपड़ा है।

खैर इसी श्रृंखला में समीक्षार्थ हेतु किताब है तिनका तिनका मध्यप्रदेश। 'जेल’ शब्द सुनते ही ऊंची दीवारों से घिरे परिसर, तंग कोठरियाँ, लोहे के गेट की सलाखों के पीछे पकड़े गये लोगों के अनजाने चेहरों का दृश्य आँखों के आगे आ जाता है। जेल का यह स्याह पक्ष है तो उसमें अपनी सजा काट रहे लोगों में कला और रचनात्मकता एवं सृजनात्मकता का एक उजला पक्ष भी मौजूद है और उसी पक्ष से दो चार करवाती है किताब ‘तिनका तिनका मध्यप्रदेश’। यह पुस्तक 19 लोगों के ज़रिए जेल की कहानी कहती है। मध्य प्रदेश की जेलों में बंद बारह पुरुषों, दो महिलाओं, चार बच्चों और एक प्रहरी के ज़रिए जेल के हर पक्ष को इसमें सुंदर तस्वीरों के साथ सँजोया गया है। बच्चों की उम्र छह साल से कम हैं और उनमें से तीन का तो जन्म ही जेल में हुआ है।

जेल में बाहर से न कोई रसोइया आता है, न हज्जाम। जेलें सब कुछ नए सिरे से शुरू करने और ज़िंदगी के अस्थायी होने के भाव को समझाने में माहिर होती हैं। जो आया है, वो लौटेगा।

कविता से तिनका तिनका मध्यप्रदेश की शुरुआत होती है। कुछ जेल के भीतर की तस्वीरें भी इस किताब में मौजूद हैं और ये तस्वीरें हमें जेल के भीतर के माहौल से रू-ब-रू करवाती हैं।


थोड़ी और जेलें
थोड़ी और सिकुड़ती जगह
थोड़ी कम हवा
सब कुछ थोड़ा
पर इंतज़ार बड़ा।


कविता अपने आप में एक अनूठा प्रयोग लगती है।
जेलों के बिना समाज नहीं पर जेलें अपराध के हर सवाल का जवाब भी नहीं। जेलों की मौजूदगी से अपराधों का खात्मा हुआ हो, ऐसा नहीं है और जो जेलों में हैं, वे सभी अपराधी ही हों, ऐसा भी कोई प्रमाण नहीं है। इसलिए दुनिया की हर जेल समाज से कटा एक टापू है, जहाँ से सवाल झाँकते हैं।

किताब की ये मात्र पंक्तियाँ ही नहीं है अपितु ये हमें सोचने पर मजबूर करती हैं। कि क्या जेल में सिर्फ कोई अपराध करके ही जाया जा सकता है। कभी-कभी तो बेकसूर होने के बाद भी लोग जेलों में ठूंस दिए जाते हैं और ऐसा अभी से नहीं मुगलों, अंग्रेजों के राज में भी होता था। भारत देश में चार लाख उन्नीस हजार से भी अधिक कैदी बन्द हैं, जिनमें से तकरीबन तीन लाख विचाराधीन केस के मामले में फँसे हुए हैं। तिनका तिनका मध्यप्रदेश बताती है कि अकेले मध्यप्रदेश में तकरीबन चालीस हज़ार कैदी मौजूद हैं।

जेल हमें यह बताती है कि यहाँ ऊंची आवाज़ में बोलना मना है। जेलें रंगों का बायोस्कोप हैं तो ये लिखती भी हैं। सुभद्रा कुमारी चौहान से लेकर माखन लाल चतुर्वेदी भवानी प्रसाद मिश्र, गांधी, भगतसिंह आदि जैसे हज़ारों लाखों नाम हैं, जिन्होंने जेल के भीतर सृजन का काम किया है। तिनका के इतिहास कि बात करें तो यह 2013 में सामने आया। यूँ तो लेखिका कहती हैं कि उन्होंने प्रयास 1993 से ही शुरू कर दिया था परंतु मुकम्मल हुआ 2013 में आकर। लता मंगेशकर सरीखी आवाज़ की धनी लेखिका जेल का नुमाइंदा नहीं करती बल्कि जेल के भीतर से कला और सृजन को भी बाहर लेकर आती है।

जेलों पर किया गया यह काम अपने आप में मौलिक और क़ाबिले-तारीफ है। तिनका तिनका तिहाड़ पुस्तक तो गिनीज बुक रिकॉर्ड तक में दर्ज हो चुकी है। तिनका तिनका की श्रृंखला में जेल के भीतर की प्रतिभाओं के साथ-साथ वहाँ का मुआयना करती तस्वीरें भी इसमें साझा की गयी हैं। ये तस्वीरें किसी भी संवेदनशील हृदय के व्यक्ति में दया भाव पैदा करने के लिए काफी है।


- तेजस पूनिया

रचनाकार परिचय
तेजस पूनिया

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