अक्टूबर-नवम्बर 2020 (संयुक्तांक)
अंक - 64 | कुल अंक - 64
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कविता-कानन

तुम्हें लिखने में

मैं प्रेम को कभी
शब्दों में नहीं लिख पाया
रेले की तरह
सब कुछ बह जाता था उसी क्षण
पूरे आवेग के साथ
कुछ ठहरता नहीं था
जो पकड़ पाता मैं शब्दों में।

लगा कि मैं प्रेम में डूबा पड़ा हूँ
किसी राग की तरह
जो ठुमरी में उलझा है
बिना आलाप के और
उसे वहाँ से निकलना ही नहीं है।

तुममें रहकर मैं
तुम्हें लिख नहीं पाता
और तुममें रहे बिना
कुछ लिखना बेमानी है
कुछ पन्ने हैं जो लिखे-फाड़े
पुनः जोड़े, फिर से लिखे और
फिर-फिर फाड़ दिए
तुम्हें लिखने में।

हर बार बदल गए शब्द, राग
बदल गई ताल
प्रेम की हमराह होने में।
कोई शब्द ऐसे नहीं बचे
जिन्हें काट-काट कर
फिर से नहीं लिखा।
अब सारे शब्द कटे पड़े हैं।

यह जानते हुए कि
आदि से लिखा है और
अनंत तक लिखा जाएगा प्रेम को
यह जानते हुए कि
किसी भी भाषा में
कोई भी शब्द नहीं लिख पाया
प्रेम को सही-सही।
ऐ दोस्त आओ मिल कर लिखते हैं
कोई शब्द
जो प्रेम को लिख जाए
उसके आवेग के साथ।


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भला मालिक

आप खूँटे से बंधी हैं
डंडा खा कर सीधे खड़ी होती हैं
चारा खाती हैं
नाले का पानी पीती हैं
बस गोबर देती हैं!
वे प्यार से थन धोते हैं
थपथपाते हैं
आप दूध नहीं उतारतीं
लात मारती हैं
आँसू बहाती हैं
क्या तलाश रही हैं!

वे बछड़ा लाते हैं आपके पास
इतना पास कि वह
आपके थनों को दुलारने लगता है
आपको लगता है
आ गये अच्छे दिन
आपका सारा दूध
स्तन में उतर आता है
थनों में दौड़ने लगता है।

वे खुश होते हैं
बछड़े को हाँक लगा
दूर बाँध देते हैं और
दोह लेते हैं सारा दूध
आप बछड़े को देखकर ही खुश हैं।

वाह मालिक कितना भला है
आपको माँ मानता है।


- धर्मपाल महेन्द्र जैन

रचनाकार परिचय
धर्मपाल महेन्द्र जैन

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