अक्टूबर-नवम्बर 2020 (संयुक्तांक)
अंक - 64 | कुल अंक - 64
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कथा-कुसुम

कहानी- बिंध गया सो मोती है

जबसे वह लौट कर आयी थी, अजीब-सी कशमकश से गुज़र रही थी। आज वह परिवार के साथ, लड़की वालों से मुलाकात करने गयी थी। सचमुच समय कितना बदल गया! कहाँ एक वो ज़माना था और कहाँ आज, लड़के वाले और लड़की वालों में कोई अंतर ही न रहा।
उसे याद है उसके समय में, लड़के वालों के कहने पर साड़ी पहनवा कर उसकी फोटो खिंचवायी गयी थी। कितना रोई-धोई थी वह। माँ-पिताजी के चेहरे पर चिंता की गहन लकीरें देख कर, वह भी चिंतित हो उठी थी। कहीं ऐसा न हो कि लड़के वाले उसे देखते ही ना कर दें। देखने में तो वह हमेशा से ही आकर्षक थी, गोरा रंग, तीखे नाक-नक्श बस एक ही कमी थी, जो उसके आड़े आती थी। वो थी उसकी चार फुट ग्यारह इंच की हाइट।


एकाएक विचारों ने करवट बदली, उसने उठकर पर्स में से अपना मोबाइल निकाला। फेसबुक खोलकर फिर वही एक नाम टाइप करने लगी, जो बरसों से उसके ज़ेहन में छुपा अक्सर उसे सताया करता है, मोहित प्रकाश।
पहली बार जब वह फेसबुक पर आयी थी। सबसे पहले उसने उसी का नाम सर्च किया था और उसकी तस्वीर देखते ही उसकी बरसों पुरानी कुंठा उसकी आँखों से आँसू बनकर बहने लगी थी।


उसे तो संदेह है कि वजह सिर्फ उसकी हाइट थी या कुछ और!! उन दो दिनों में ही उसने, उसके साथ अपने सुंदर सपनों का संसार भी सजा लिया था।
उसे याद है अच्छी तरह से, उस दिन हल्की चंदनिया रंग की साड़ी में उसका रूप कितना खिला जा रहा था। जिस दिन मोहित अपने पूरे परिवार के साथ उसे देखने आया था। और 'हाँ' होते ही उसके चेहरे पर भी हँसी खिल आयी थी। माँ-पिताजी, भाई-बहन सभी कितने ख़ुश हुए थे। मानो उसने ज़िंदगी की सबसे बड़ी जंग जीत ली थी और फिर चल पड़ा था, एक-दूसरे को मिठाई खिलाने का दौर।


उस दिन उसे अपने आस-पास सबकुछ बेहद ख़ूबसूरत नज़र आ रहा था। ऐसा लग रहा था जैसे उससे बढ़ कर दुनिया में कोई और ख़ुशनसीब नहीं। और फिर उसे मोहित के साथ अकेले कमरे में बातचीत करने के लिए छोड़ दिया गया था। दिल तेजी धड़कने लगा था। कुछ मिनट तक दोनों चुपचाप बैठे रहे थे। उसे इंतज़ार था कि मोहित अब कुछ बोले। काफी देर के बाद, अचानक मोहित बोल उठा था, "सुनिए, एक बात कहनी है।" वह घबरा गयी थी, "कौन-सी बात!"

उसने सिर उठाया ही था कि मोहित की छोटी बहन खिलखिलाते हुए अंदर आ गयी थी और बोली थी "टाइम ओवर!" अब बाकी की गुफ्तगू आप दोनों फोन पर कर लीजिएगा। चलिए बाहर, सब आपका इंतज़ार कर रहे हैं।" और फिर बात वहीं अधूरी ही रह गयी थी।


उस दिन के बाद दो दिन तक, वह मोहित के फोन का इंतज़ार करती रही थी। मगर जब उधर से कोई फोन नहीं आया, तो माँ चिंतित हो उठी थी। मन में तरह-तरह के ख़याल उपजने लगे थे।
काफी सलाह मशविरा के बाद पिताजी ने मोहित के यहाँ फोन मिलाया था। उसकी माँ ने फोन उठाते ही कहा, "भाईसाहब, हमें माफ कर दीजिएगा। हम बहुत शर्मिंदा हैं, मोहित शादी के लिए तैयार नहीं है।" सुनते ही माँ के ऊपर तो जैसे वज्रपात हो गया था। वह बेहोश होकर गिर पड़ी। फौरन डॉक्टर को बुलाया गया। आते ही उसने माँ का पूरा चेकअप किया। उसे गहरा सदमा पहुँचा था। इंजेक्शन देकर उसे सुला दिया गया था।


घर का माहौल अभी सामान्य हो भी नहीं पाया था कि तभी सुनने में आया कि मोहित की शादी बड़ी धूमधाम से हो गयी है और ये भी कि उसकी पत्नी की हाइट पाँच फुट ढाई इंच की है। कितना रोई थी वह अकेले में, बस साढ़े तीन इंच के लिए इतना बड़ा नाटक! वाह मोहित वाह! ख़ूब क़द बढ़ाया तुमने अपना! उस दिन जो बात अधूरी रह गयी थी, वो अब पूरी हो गयी थी।

जब भी वह फेसबुक पर मोहित के साथ उसकी पत्नी की फोटो देखती, बुदबुदा उठती, हाइट-वाइट से क्या होता है? है तो मोटी-भद्दी-सी! क्या पता, मोहित की बाहों में समाती भी न हो! और क्या पता मोहित अब पछताता भी हो! ऊँह! वह भी कितनी बावली है! एक निर्मोही ग़ैर मर्द से इतना भी क्या लगाव? उसने एक गहरी साँस ली और मोबाइल बंद कर के पति की ओर करवट बदल कर लेट गयी।
वह उसकी ओर पीठ करे सो रहा था। इस शख्स ने कभी भी उसकी ओर उस निगाह से देखा तक नहीं, जिसके लिए वह तरसती रही थी। शायद उसे ख़ूबसूरती और बदसूरती के बीच कुछ अंतर ही नहीं महसूस होता था।


एकाएक कमरे का दरवाजा खटका। "माँ!"
वह चौंककर बोली, "अंदर आ जाओ बेटा!"
"तो क्या डिसाइड किया आप लोगों ने?"
"डिसाइड? देख बेटा, शादी तुझे करनी है। डिसीजन भी तेरा ही होगा।"


"फिर भी, आपका क्या कहना है?"
"देख, एक बात तू अच्छी तरह से समझ ले, शादी-ब्याह कोई गुड्डे-गुड़िया का खेल नहीं, जो भी फैसला लेना सोच-समझ कर लेना। 'हाँ' का मतलब यानी कि 'हाँ' और 'ना' का मतलब 'ना'। मगर 'हाँ' के बाद 'ना' बिल्कुल भी नहीं होनी चाहिए।”
"हाँ माँ! ये तो आप बिल्कुल सही कह रही हैं। मगर उसकी हाइट मुझसे एक इंच ज़्यादा है।"


वह हँस पड़ी, "तेरे पापा की हाइट तो मुझसे पूरे एक फुट ज़्यादा है? हाइट को लेकर हमारे बीच कभी कोई बात हुई क्या?"
"सच माँ, तो फिर मैं 'हाँ' कहे देता हूँ।"
"अरे सुन-सुन, उससे भी तो पूछ ले। उसे तो कोई प्रॉब्लम नहीं है, तेरी हाइट को लेकर?"
"उसकी तरफ से तो हाँ है, उसे तो बस मेरे जवाब का इंतज़ार है।" हँसते हुए वह कमरे से बाहर चला गया।


एकाएक पति ने करवट बदली और उसका हाथ अपने हाथों में लेते हुए बोला, "बिंध गया सो मोती है।"
उसके हाथ की पकड़ भी कसती चली गयी। पति के मर्मस्पर्शी शब्दों ने आज, उसके भीतर पड़ी तमाम बरसों पुरानी छोटी-बड़ी खरोचों को पल भर में मिटा दिया।

नम आँखों से वह भी बुदबुदा उठी, "बिंध गया सो मोती है।"


- प्रेरणा गुप्ता