अक्टूबर-नवम्बर 2020 (संयुक्तांक)
अंक - 64 | कुल अंक - 64
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

उभरते स्वर

हमदम

कोई चलते-चलते रुक जाए, जब दिल की कोई आह सुने
कोई दुनिया की परवाह न हो, कोई शिकवा कोई गिला न हो

कोई सच्चे दिल से बात सुने और दो पल अपनी बात कहे
कोई बिन बोले भी सुना करे, कोई हर मरहम की दवा करे

कोई बात न हो तो आँखों से फिर अपने दिल का हाल कहे
कोई चाह के दामन छोड़ न सके, इस दामन को अपना घर करे

कोई हँसते-हँसते रो पड़े, कोई देख के यूँ ही हँसा करे
कोई पूछे तो इनकार करे पर रंगत उसकी छुप न सके

कोई साथ चले और साथ रुके कोई ख़ौफ भी सारे दूर करे
कोई बैठे-बैठे शाम करे, कोई जाने की न बात करे

कोई झूठ बोल कर रुका रहे, कोई साये जैसे जुड़ा रहे
कोई ऐसा हमदम मिले हमें, जो सदियों के वादे किया करे


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दादी माँ

कोई संग बैठे और बात करे, बस इतनी-सी फ़रियाद करे
वो किस्से ख़ुद से बोल के, बचपन अपना वो याद करे
वो चाय की चुस्की लेती है, फिर यादों में खो जाती है
कोई पूछे तो वो कैसी है, उसकी आँखें नम हो जाती है
वो खोई-खोई रहती है, जब मटर छीलती रहती है
सबको साथ देख मुस्काती है, जब भोर में पूजा करती है
वो बैठे-बैठे सोती है, जब मन से अकेली होती है
जब सूरज ढलने लगता है, बेचैन-सी वो हो जाती है
वो दरवाजे पर बैठी है, राह सभी की तकती है
वो न जाने ये रीत नई, सबकी अपनी प्रीत नई
वो दीवारों में क़ैद हो गई, नई पीढ़ी यूँ आगे बढ़ गई
अब सोच के तुम क्यों सहम गई, कुर्सी वो कब सूनी हो गई
जब तुमको कुछ फुर्सत मिली, जाने कहाँ वो चली गई


- डॉ. प्रज्ञा बाजपेई

रचनाकार परिचय
डॉ. प्रज्ञा बाजपेई

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