अक्टूबर-नवम्बर 2020 (संयुक्तांक)
अंक - 64 | कुल अंक - 64
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

पुस्तक समीक्षा
रक्तशाटीधारिणी माता: जीवन के यथार्थ से संवाद करती कहानियाँ


 
 
साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित युवा साहित्यकार डॉ.ऋषिराज जानी अपनी रचनाधर्मिता के प्रति प्रतिबद्ध रचनाकार के रुप में जाने जाते हैं। आपने ऐसे विषयों पर कलम उठाई है, जिन पर रचनाकारों का बहुत कम ध्यान जाता है। 
सामाजिक यथार्थवाद की बुनियाद पर टिका लेखक का यह कथासंग्रह (रक्तशाटीधारिणी माता) जीवन के अनेक मोड़, अनेक उतार-चढ़ाव के ग्राफ को दर्शाता हुआ पाठक की संवेदना को प्रगाढ़ करता है। यथार्थ के समीप होते हुए भी यह कथासंग्रह भाषा और शिल्प की दृष्टि से कसा हुआ है। इसमें अंकित घटनाएँ बहुत हद तक मानव की मनोदशा निर्धारित करती हैं और भविष्य की दशा सुझाती हैं। 
इस कहानी संग्रह में दो स्तबक हैं। प्रत्येक स्तबक में 8 कथाएँ हैं। इसके पहले स्तबक का हिन्‍दी अनुवाद डॉ.सुदेश आहूजा तथा दूसरे स्तबक का हिन्‍दी अनुवाद डॉ.सरोज कौशल ने किया है।
 
यन्‍त्रम्‍’ कहानी आज की मरती हुई संवेदना को दर्शाती है।
अहं विविक्ते यन्‍त्राणि पश्यामि। यन्‍त्राणि संवेदनरहितानि सन्‍ति। पृष्ठ 19
मनुष्य हो या जानवर मातृत्व की भावना सब में होती है। ‘ मातरौ’ कहानी में दो माताओं के स्नेह को दिखाया गया है। एक मनुष्य है दूसरी जानवर (कुतिया) पर दोनों का दु:ख एक जैसा है।
तयोर्भाषा वात्स्यल्यस्य भाषास्तिऽस्ति.........यां न जानीते विश्वम्‍ ।पृष्ठ 22
‘बसंतपंचमी’ कहानी में एक निम्नवर्गीय परिवार की मनोदशा को दिखाया गया है कि किस प्रकार एक माँ अपनी पुत्री के विवाह के लिए सदैव चिन्‍तित रहती है। 
माता पुनरपि विचारेषु निमग्ना भवति यत्‍ कदा मम नेत्रे पिहिते भवेताम्‍ अपि च निमिषा कदा नववधूवेषं धारयेदिति। पृष्ठ 24
‘शत्रु:’ इस कहानी में एक माँ की ममता को दिखाया गया है कि किस प्रकार से कोई माँ अपने बच्चे की खुशी के लिए हर कार्य करने को तैयार रहती है। 
वत्से! एकाकित्वं दु:सह वर्तते । अस्मिन्‍ समाजे एकाकिन्‍या: कन्याया: कृते जीवनं कष्टसाध्यं वर्तते ।यदा त्वं इदं सर्वं ज्ञास्यसि तदा अतिविलम्बो भविष्यति ।पृष्ठ 29
‘कैकेयी’ एक पौराणिक आख्यान को डॉ.ऋषिराज जानी ने जो नवीन पृष्ठभूमि प्रदान की है वह काबिले-तारीफ है
 
महाविद्यालयस्य उद्याने द्विवर्षपूर्वं राजीवस्य नेत्रयो: वीक्ष्य भूमिजाया: मनसि स्थिता कैकेयी वरद्वयं अयाचत, प्रथमं वचनमासीद्‍ यद्‍ रघुवंशी अयोध्यायां न निवत्स्यतीति। द्वितीयो वर आसीत्‍ यद्‍ भूमिजा स्वमिथिलामहालयं त्यक्त्वा त्रिदिवसाधिकम्‍ अयोध्यायां निवासं न करिष्यतीति। कामासक्तो रघुवंशी पूर्ववत्‍ निषेधं कर्तुं न प्राभवत्‍। पृष्ठ 31
‘रुधिरकूप:’ इस कथा में जातीय संघर्ष को दिखाया गया है। किस तरह कथाकथित उच्च वर्ग आज भी निम्न वर्ग का शारीरिक, मानसिक और आर्थिक शोषण कर रहा है। इस कहानी की भाषा भी भावानुकूल है। नाटकीय शैली में लिखित इस कहानी में संस्कृत के साथ ही प्राकृत भाषा का भी सुन्‍दर प्रयोग हुआ है।   
‘पलाएहि! तुमं पलाएहि! न कोवि मग्गो। इमत्तो नरकत्तो पलायणं कुरु। अहं शवामि जं तुमं कयावि इमम्मि गामे न आगच्छहि। पृष्ठ 36
 
गर्भपात:’ कहानी में लेखक कहता है कि महिलाओं को प्रतिदिन अपनी इच्छाओं का गर्भपात करना पड़ता है। परिवार के सुख समृद्धि के लिए पग-पग पर उन्हें अपनी अभिलाषाओं को मारना पड़ता है। 
सा गर्भवती.....। पृष्ठ 41
‘गणित’ में जीवन के गणित को दिखाया गया है। डॉ.ऋषिराज जानी कहते हैं कि जीवन भी एक गणित है जिसमें सदैव सुख-दु:ख का जोड़-घटाव गुणा-भाग लगा रहता है।
अमेयो यदा प्रश्नाकुला.....।पृष्ठ 44
‘मातृहत्या’ कहानी अभिनव नामक एक युवक की कहानी है जो शहरी चकाचौंध में अपने संस्कार और संस्कृति को भूल चुका है। यहाँ तक की वह अपने पत्नी के कहने पर बीमार माँ को देखने नही जाता और बाद में समाज को दिखाने के श्राद्ध आदि का नाटक करता है तदन्‍‍तर उसे अपने किए पर अपराध बोध होता है।
‘आम्‍! मातृहत्याया: पातकस्य कृते कोऽपि विधि: अस्ति वा? अहं कारयितुमिच्छामि’ इति।पृष्ठ 86
 ‘राष्ट्रस्य शोकाञ्जलि:’ इस कहानी में बताया गया है कि किस प्रकार अपना समय बिताने के लिए लोग झूठी देशभक्ति दिखाते हैं।
मृतसैनिकानां स्वजनानां रोदनध्वनि: डीस्कोसङ्गीतनादे निमग्नो भवति।पृष्ठ 88
 
‘रक्‍तधारिणीशाटी माता’ कहानी बाल मनोविज्ञान पर आधारित है। यह जीतू नामक एक बालक की कहानी है जिसकी माता को उसके शराबी बाप ने जिन्‍दा जला दिया था। उसका पालन-पोषण उसके मौसा-मौसी ने कुछ दिन किया, बाद में उसे चर्च में छोड़ दिया।   
‘कोर्पोरेट जातक कथा’ देबोदत्त नामक एक ऐसे धनलोलुप अधिकारी की कथा है जो अपनी पदोन्‍नति के लिए अपने अधीन कर्मचारियों के साथ अमानवीय व्यवहार करता है। उन्हें वह बंधुआ मजदूर समझता है। पर जब उसके हार्ड अटैक के समय उसके कर्मचारी उसकी मदद करते हैं तो उसका हृदय परिवर्तन हो जाता है।
‘मातृदिवस:’ इस कहानी में पौराणिक आख्यानों की चर्चा की गयी है।
 
‘चतुरदूरभाषे आषाढ़:’ में लेखक ने आज के प्रेम को दिखाया है कि किस प्रकार से लोग अपने निजी स्वार्थ के लिए झूठा प्रेम प्रदर्शित करते हैं और बाद में अपना कार्य पूर्ण होने पर पहचानने से इंकार कर देते हैं। इस कथा में दिखाया गया है कि किस से लोग अभाषी दुनिया के प्रेम को वास्तविक प्रेम मान बैठने की भूल करते हैं।
‘धनलता’ कहानी में डॉ.ऋषिराज जानी यह दिखाने का प्रयास करते हैं कि लोग किस प्रकार धन के पीछे अन्‍धे हो गये हैं। लोग पैसों के लिए अपनों को भूलते जा रहे हैं और जीवन का आनन्‍द अपनों के बीच ही है। धन तो क्षणिक है आज किसी और के पास कल किसी और के पास।     
‘रक्‍तबीज:’ कहानी में मनुष्य की अनंत और असीम इच्छाओं को दिखाया गया है। 
 
डॉ.ऋषिराज जानी की कहानियों में आम आदमी के जीवन की विविध समस्याओं स्थितियों और वर्तमान पीढ़ी में आई नवीन चेतना के इस तरह बारीक ब्यौरे मिलते हैं कि चरित्रों में जीवतंता पूरी गंभीरता से लक्षित होती है। प्राय: सभी कहानियों में शहरी मध्यवर्गीय जीवन के अनुभव और विचारधारा यूं रुपायित हुए हैं कि ये हमारे जीवन का हिस्सा लगते हैं। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि ये कहानियाँ बड़े आग्रह और कोमलता से लिखी गयी हैं। संग्रह का मुख्यपृष्ठ बहुत आकर्षक है, छपायीऔर कागज  अच्छे हैं। मूल्य भी उचित रखा गया है। संग्रह अपने उद्देश्य में सफल रहेगा इसमें कोई संदेह नहीं है। अच्छे कहानी संग्रह के लिए डॉ.ऋषिराज जानी को साधुवाद।




 
पुस्तक- रक्तशाटीधारिणी माता (कथासंग्रह) 
लेखक- डॉ.ऋषिराज जानी 
प्रकाशन- ग्रन्‍थम्‍ प्रकाशन, अमदाबाद
मूल्य-150 रुपया
पृष्ठ संख्या -153
प्रथम संस्करण- 2014

- डॉ. अरुण कुमार निषाद