अक्टूबर-नवम्बर 2020 (संयुक्तांक)
अंक - 64 | कुल अंक - 64
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

संस्मरण
काळजीभा
 
कोरोना काल में एक सेवानिवृत चौहतर वर्षीय व्यक्ति के लिए भला फुर्सत की क्या कमी हो सकती है। एक दिन एक पुरानी फाईल टटोलते हुए मेरी नजर उसमें लगे दो पत्रों पर पड़ी। बस मेरा मन 1988 की एक दुर्दांत अपराधी संबंधी रोमांचकारी घटना की स्मृतियों पर दस्तक देने लगा। 
वैसे मेरा तबादला कुशलगढ़ जिला बांसवाड़ा से बीकानेर 1984 में ही हो चुका था। यहां अदालत परिसर से करीब दो फर्लांग की दूरी पर ही एक विशाल पुराने सरकारी बंगले के तल मंजिल का एक भाग मेरे सरकारी आवास के रुप में आवंटित हुआ था। दूसरा भाग भी तल मंजिल पर ही था। उन दोनों पर बनी प्रथम मंजिल टूटी-फूटी और भूतहा किस्म की होने से उजाड़ पड़ी थी। करीब दस बीघा की खुली जमीन से घिरी उसकी चार दिवारी थी। 
 
पी.डब्ल्यू.डी. वालों ने मुझे बतलाया कि यह एक ऐतिहासिक भवन है। उनके अनुसार इस पुराने बंगले में कभी तत्कालीन बीकानेर राज्य के प्रधान न्यायाधीश जस्टिस एहसानुल हक सपरिवार रहा करते थे। उनके पुत्र जियाउल हक] जो बाद में पाकिस्तान के राष्ट्रपति रहे] का जन्म इसी बंगले में हुआ था। उनका बचपन भी इसी परिसर में बीता। मेरे लिए यह रोमांचकारी सूचना थी। जस्टिस एहसानुल हक एक प्रतिष्ठित जज रहे हैं। तत्कालीन राज्य न्यायपालिका की इस सर्वेाच्च हस्ती की प्रभा के हवा में मौजूद अणु-परमाणु को मैं महसूसने लगा था। इसी बंगले के पते पर मुझे उस दुर्दांत अपराधी के दो पत्र डाक से मिले थे।         
मेरी अदालत नजदीक ही थी। करीब आधा किलोमीटर दूर होगी। साथ ही वहां के पब्लिक पार्क परिसर में ही स्थित थी। अतः उस सुरम्य पार्क से गुजर कर अदालत पैदल जाना मुझे अच्छा लगता था। फिर मेरे पास साईकिल के अलावा कोई वाहन भी नहीं था।
 
पूरे सेवा काल में बीकानेर ही एकमात्र स्थान था जहां मैं लगातार पांच साल तैनात रहा। 1985 में मेरी पदोन्नति अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के रूप में होकर पदस्थापन भी वहीं के वहीं हो गया।
यह शायद 1988 के दिसंबर माह की बात है। बीकानेर में एक कुख्यात हिस्ट्रीशीटर अपराधी था। नाम था बाबुड़ा। तीस बतीस साल का युवा। लंबी चौड़ी कद काठी। खुंखार चेहरा। कत्ल के चार मुकदमों सहित लूट डकैती] अपहरण] मारपीट आदि के कोई सौ से अधिक फौजदारी मुकदमें उसके विरुद्ध वहां की अदालतों में  विचाराधीन थे। उसके करीब तेरह मुकदमें मेरी अदालत में विचाराधीन थे। प्रायः वह न्यायिक अभिरक्षा में जेल में ही होता था। सुना था कि एक बार उसने अदालत में मंच पर चढ़ कर मजिस्ट्रेट के थप्पड़ मार दी थी। जेल अधिकारी व जेल डॉक्टर भी उससे डरते थे। वह खतरनाक इतना था कि स्वस्थ होते हुए भी जेल डॉक्टर से उसने एक बार बीकानेर के के.ई.एम अस्पताल में डाक्टर को दिखाने का रेफरेंस करवा लिया। एक हेड-कांस्टेबल व एक सिपाही की कथित कस्टडी में वह जेल से अस्पताल तक बिना हथकड़ी के तांगे में बैठ कर गया। कथित इसलिए fd अस्पताल के बाहर उसके एक साथी ने दारु लाकर दी जो उसने उन पुलिस वालों के सामने पी। फिर तांगे से लौटने के दौरान उसने रास्ते में एक शराब की दुकान के सेल्समेन के साथ मारपीट कर दो बोतल शराब लूट ली। इतना ही नहीं आगे उसने रानी बाजार में एक मिठाई की दुकान का गल्ला लूट लिया। दोनों पुलिसकर्मी देखते रहे। उन्होंने उसे रोका तक नहीं। 
अखबारों में इस घटना के छपने से पुलिस प्रशासन की बहुत छिछालेदारी हुई। पुलिस ने दोनों घटनाओं के लूट के मुकदमें दर्ज कर मुलजिम बाबुड़ा] उक्त हेडकांस्टेबल व सिपाही के विरुद्ध अदालत में चालान प्रस्तुत किये। वे दोनों मुकदमें भी मेरी अदालत में विचाराधीन थे।
 
अदालती फैसलों का सारा दारमदार सबूत पर होता है। किसी ने अपराध किया भी हो लेकिन यदि उसके विरुद्ध कोई सबूत नहीं है तो मजिस्ट्रेट कुछ भी नहीं कर सकता। उसे मुलजिम को बरी करना ही पड़ता है। आम लोगों की सोच परिणामोन्मुखी अर्थात रिजल्ट ओरियेंटेड होती है। वे सोचते हैं अरे] दिन दहाड़े] सरे बाजार उसने दुकान का गल्ला लूट लिया था फिर भी अदालत ने उसे बरी कर दिया? और वे अदालत के बारे में] पता नहीं] क्या क्या सोचने लगते हैं। वे यह नहीं देखते कि गवाह अदालत में पक्षद्रोही हो जाता है। कभी डर-वश] तो कभी लालच-वश या फिर रिश्ते नाते के कारण  गीता/कुरान पर हाथ रख शपथ ले कर भी झूठ बोल जाता है। ऐसे में अदालत क्या कर सकती है। पुलिस को चाहिये कि गवाहों को सुरक्षा दें और  उन पर नियंत्रण करें।
खैर] मिठाई की दुकान से गल्ले की लूट के मामले में गवाही देने आया दुकानदार अदालत में मुलजिम बाबूड़ा को देखते ही कांपने लगा। उसने सशपथ बयान दिया कि वह बाबुड़ा को जानता तक नहीं। इतना ही नहीं उसने यह तक कह दिया कि उसकी दुकान से गल्ला लुटा ही नहीं गया। परिणाम स्वरुप शून्य साक्ष्य के कारण मुझे उसे बरी करना ही पड़ा। 
 
मुलजिम बाबूड़ा इस बात पर इतरा रहा था कि उसे आज तक किसी केस में सजा नहीं हुई है। लेकिन सेल्समेन से मारपीट कर शराब की बोतलें लूटने के मामले में स्थिती भिन्न थी। उस दुकान का पीड़ित सेल्समैन एक निडर युवक था। उसने अदालत में मुलजिम बाबुड़ा को पहचानते हुए उसके विरुद्ध ठोक कर बयान दिये कि उसी ने उसके मुंह पर मुक्कें मार कर दुकान में से शराब की दो बोतलें लूटी थी।उस समय दोनों पुलिसवाले तांगे में ही बैठे देख रहे थे। इस पुख्ता सबूत के अलावा भी कुछ अन्य सबूत पत्रावली पर था। अतः मैंने इस केस में बाबुड़े को चार साल का कठोर कारावास व दस हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई। साथ ही उसके हथकड़ी व पैरों में बेडियां] लगाने के आदेश दिये। सह अभियुक्त हेड कांस्टेबल व कांस्टेबल को प्रत्येक को नौ-नौ माह कठोर कारावास व पांच-पांच हजार रुपये जुर्माना से दंडित किया।
 
 इस फैसले से जहां शहर में अदालत की वाहवाही होने लगी वहीं मुलजिम बाबुड़ा आपे से बाहर हो गया। उसे पहली बार जो सजा हुई थी। 
बाबुड़े को उसके अन्य मुकदमों की सुनवाई हेतु चालानी गार्ड पुलिस प्रायः हर दूसरे तीसरे दिन अदालत परिसर में लेकर आती ही थी। वहां मुलजिमों के लिए एक लॉक-अप कक्ष बना हुआ था। मुझे अदालत की ओर आते देख कर वह लॉक-अप कक्ष से ही जोर-जोर से मुझे गालियां देने लगता।
उसी दौरान एक दिन मुझे डाक से एक लिफाफा मिला। उसमें मुलजिम बाबुड़ा का पत्र था। उसमें उसने पूरी बद्तमीजी के साथ मेरे लिए यह धमकी लिखी थी कि वह जमानत पर छूटते ही पांचवीं कक्षा में पढ़ रही मेरी बेटी का अपहरण कर लेगा। मेरी पत्नी उस पत्र को देख कर घबरा गई। यह स्वभाविक भी था। बच्चों से हमने उस पत्र का जिक्र नहीं किया था। कुछ हद तक मेरा मन भी अशांत होना स्वभाविक था। यह आत्म प्रवंचना की बात नहीं है] मैं बचपन से ही स्वभावतः निडर और कुछ हद तक दुस्साहसी भी रहा हूं। तब करीब चालीस साल का मेरा कसरती-बलिष्ठ शरीर।  छः फुट की मेरी कद-काठी। वैसे मजिस्ट्रेट के रूप में मैं प्रायःशांत रहता था। किन्तु साथ ही दृढ़ एवं सख्त भी था। 
 
संयोगवश दूसरे ही दिन बाबुड़े की उसके एक अन्य केस में मेरी अदालत में पेशी थी। अदालत में बैठते ही मैंने चालानी गार्ड के प्रभारी को बुलाया। मेरी अदालत में मेरे रीडर] चपरासी] सरकारी-वकील के अलावा कुछ अन्य वकील भी मौजूद थे। मुलजिम बाबुड़ा का वकील भी वहीं था। उनके सामने ही मैंने चालानी गार्ड प्रभारी को कहा कि मुलजिम बाबुड़े की हथकड़ी और बेड़ियां खोल कर अदालत में लेकर आना किंतु तीन सिपाहियों के पहरे में लाना। सरकारी वकील ने मुझे ऐसा न करने के लिए चेताया। उनके अनुसार मुलजिम खतरनाक था और उस वक्त आक्रामक तेवर थे उसके। वह अदालत में कुछ भी अप्रिय कर सकता था। उन्होंने सुझाया कि उसकी हथकड़ी व बेडियां] न खोली जावे। मैं यह सब जानता था। लेकिन मैंने अपना निश्चय नहीं बदला। तीन पुलिसवाले मुलजिम बाबुड़े को अदालत में लेकर आए। हथकड़ी बेडियां खुलने पर बाबुड़ा खुद आश्चर्य चकित था। अदालत में वह मुझे गुस्से से घूरने लगा।
 
``देख बाबुड़ा] यह भूल जाना कि यहां तुझ से डर कर तेरे खिलाफ फैसला नहीं होगा। फैसला यहां सबूत के आधार पर ही होगा। कुछ दिन पहले तुझे एक केस में मैंने सजा सुनाई है तो दूसरे केस में सबूत न होने से बरी भी किया है। रही बात तेरे धमकी भरे पत्र की] तो हो सकता है कभी तू जमानत पर आजाद हो कर जेल से बाहर आ जाय। सब जानते हैं कि मैं अदालत के लिए हमेशा घर से पैदल अकेला ही आता जाता हूं। यह याद रखना कि मैं सिर्फ कलम चलाना ही नहीं जानता] हाथ चलाना भी जानता हूं। मैं अकेला ही तेरे जैसे तीन जनों की मिट्टी पलीद कर सकने के लिए काफी हूं। लेकिन जो खास बात तुझे कहना चाहता हूं वह यह है कि गुंडागर्दी तुने अब तक खूब जमकर कर ली। तुझे मालुम है कि जुर्म की इस दुनिया में सेर को सवा सेर मिलते ही रहते हैं। तू यह भी जानता है कि तेरे दुश्मनों की कमी नहीं है। किसी दिन तेरा कोई दुश्मन तुझे ठोक सकता है। तेरे भले की ही बात कहता हूं कि अब छोड़ दे यह सब। हमारा क्या है। आज यहां तैनात है। कल तबादला होने पर कहीं और चले जाएंगे।’’ मैंने उसे समझाने की कोशिश की।
 
सभी देख रहे थे कि यह सुनकर बाबुड़े के चेहरे के भाव बदलने लगे थे। शायद गुस्से के स्थान पर कुछ दुख व पछतावे के। उसने शायद किसी मजिस्ट्रेट से ऐसी बेबाक बातें पहली बार सुनी थी। वह हाथ जोड़े मेरे सामने खड़ा रहा। वह कुछ नहीं बोला। अदालत में स्तब्धता के साथ साथ आश्चर्यजनित शांति  छा गई थी। अदालत से बाहर ले जाते समय बाबुड़े का सिर झुका हुआ था।                     
करीब एक सप्ताह बाद बाबुड़े का फिर एक पत्र मेरे घर पर डाक से मिला। उसमें उसने मुझसे पूर्व पत्र के लिए माफी मांगते हुए मेरी तारीफ में काफी बड़े शब्दों का प्रयोग किया था। मैंने सुकून की सांस ली। उस दिन मुझे विश्वास हो गया कि हर बुरे आदमी में पछतावे व सुधरने की गुंजाईश तो होती ही है। उसके दोनों पत्र आज भी मेरे पास सुरक्षित है।  
उसके कुछ अर्से बाद मेरा तबादला उदयपुर हो गया। उक्त तबादले के करीब दो-ढ़ाई माह बाद बीकानेर में तैनात मेरे एक साथी अधिकारी ने फोन पर मुझे बतलाया कि बाबुड़ा मारा गया। बीकानेर में उसकी दुश्मन गेंग के आदमी ने उसे गोली मार दी थी।
मेरी पत्नी को पता चला तो बोली] ``मैंने कहा नहीं था कि आप काळजीभा हो।’’

- मुरलीधर वैष्णव

रचनाकार परिचय
मुरलीधर वैष्णव

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