अक्टूबर-नवम्बर 2020 (संयुक्तांक)
अंक - 64 | कुल अंक - 64
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

ज़रा सोचिए

अगर जीवन का अंत आना ही है तो समस्याओं से लड़ते हुए आने दो
(महिला आत्महत्या के सन्दर्भ में)

- वीरेन्द्र बहादुर सिंह

आँखों में सतरंगी सपने सजाकर जीवन रूपी बाग़ में क़दम बढ़ा रहा व्यक्ति जीवनपथ पर आगे बढ़ने की बजाय मृत्यु रूपी खाई में समा जाए तो आश्चर्य की अपेक्षा आघात अधिक लगता है। आख़िर अचानक कोई व्यक्ति मृत्यु को अपना कर जीवन का करुण अंत क्यों पसंद करता है?

भारतीय समाज में जहाँ 64 प्रतिशत पुरुष आत्महत्या करते हैं, वहीं 36 प्रतिशत महिलाएँ आत्महत्या करती हैं। परंतु लेंसेट पब्लिक हेल्थ के 2017 के सर्वे के अनुसार दुनिया की जनसंख्या की गणना के अनुसार युवा और मध्यमवर्गीय युवतियों की आत्महत्या के मामले में भारत तीसरे स्थन पर है। सोचने वाली बात यह है कि अगर भारतीय स्त्री सहनशीलता, सहिष्णुता और संघर्ष की मूर्ति कहलाती है, तब पराजय स्वीकार करके ज़िंदगी से स्वयं पलायन करने का क़दम क्यों उठाती है?


शिक्षा और आधुनिकता के विकास के साथ महिलाओं को सपना देखने वाली आँखें मिलीं तो खुले आकाश में उड़ने के लिए पंख मिले, साथ ही आकाश भी मिला। पर उसके आजादी के साथ उड़ने वाले पंखों को काट कर बीच में तड़पने के लिए छोड़ने की सत्ता समाज ने पुरुषों के हाथों मे सौंप दी। यह भी कह सकते हैं कि पुरुषों ने अपने पास रखी। हमारा पुरुष प्रधान समाज, अनेक खामियों वाली विवाह व्यवस्था, ग़लत सामाजिक मूल्य, अधिक संवेदनशीलता और स्त्रियों की परतंत्रता के कारण पैदा होने वाली लाचारी एक हद तक असह्य बन जाती है। ऐसे में भयानक हताशा ही स्त्रियों को आत्महत्या की ओर क़दम बढ़ाने को मजबूर करती है।

थॉम्सन फाउंडेशन और नेशनल क्राइम ब्यूरो के पिछले साल के आंकड़ों के अनुसार 15 से 49 साल की भारतीय महिलाओं में से 33.5 प्रतिशत घरेलू हिंसा, 8.5 प्रतिशत यौन शोषण, 2 प्रतिशत दहेज को लेकर महिलाओं ने आत्महत्या की है। भारत में संपत्ति के अधिकार से लेकर दुष्कर्म तक के कानून महिलाओें के हक़ में है, फिर भी देखा जाए तो महिलाओं को न्याय नहीं मिल रहा है। अध्ययन कहते हैं कि अगर अन्याय बोध हमेशा चलता रहा तो मन में घुटन-सी होती रहती है। अगर यह घुटन बढ़ती रही और अपनी हद पार कर गयी तो महिला आत्महत्या का मार्ग अपनाती है।

अन्यायबोध की शुरुआत डोमेस्टिक वोइलेंस से देखने को मिलती है। ज्यादातर पुरुष आज भी महिलाओं को अपनी मिलकियत समझते हैं। व्यवसाय में असफल होने वाला पति अपनी असफलता का दोष पत्नी को देता है। शराबी पति शराब पीकर पत्नी को मारने का जैसे अपना अबाधित अधिकार समझता है। मैरिटल रेप के बारे में सर्वे की जो रिपोर्ट आयी है, वह चौंकाने वाली है। अपनी पसंद के लड़के से शादी करने का सौभाग्य हर लड़की को नहीं प्राप्त होता। महिला की इज्जत को उसके शरीर के साथ जोड़ कर उसकी भूल और नादानी की सजा उसे आजीवन मिलती रहती है। आज भी अनेक पैरेंट्स दुखी और परेशान बेटी के लिए मायके का दरवाजा नहीं खोलते। ऐसी बेटियाँ मौत की ओर क़दम बढ़ा देती हैं।

सालों से चली आ रही इन समस्याओं के हल के लिए पहले तो पुरुषों के हृदय में महिलाओं के लिए सम्मान और आदर का बीज रोपना ज़रूरी है। पुरुषों को इस बात का अह्सास कराना ज़रूरी है कि महिला का भी एक स्वतंत्र व्यक्तित्व होता है। वह एक पत्नी के रूप में पति और परिवार के लिए ही फर्ज अदा कर रही है, जो अति प्रशंसनीय काम है। महिलाएँ यह काम स्वेच्छा से कर रही हैं, जिसके लिए पति और परिवार को महिला का आभारी होना चाहिए। महिलाओं को भी पुरुषों के बराबर ही हक और अधिकार है, इसके लिए पुरुष और महिला, दोनों को जाग्रत करने की ज़रूरत है। पुरुष को भी समझना चाहिए कि महिला मात्र एक शरीर नहीं, जीती-जागती संवेदनशील व्यक्ति है। उसकी भी अपनी इच्छाएँ, अरमान, पसंद और अपना मत व्यक्त करने की आजादी है। वह भी व्यक्ति है, कठपुतली नहीं। ऐसा होने पर सचमुच समाज में स्वर्णयुग की शुरुआत होगी। यह बात समाज, परिवार और पुरुष वर्ग को स्वीकार करनी पड़ेगी।

आज जो स्थिति है, उसमें महिलाओं को हिंसा और अत्याचार सहने को मजबूर होना पड़ रहा है। आर्थिक मजबूरी और इज्जत का डर, दोनों ही इस बात को बढ़ावा देते हैं। अन्याय-शोषण का विरोध करने से, उनके आवाज उठाने से यह संभव न हो तो बोझिल संबंध तोड़ने से खुद की या माँ-बाप की इज्जत ख़राब नहीं होती।
अपने यहाँ महिलाएं अब कैरियर के पंख से उड़ रही है, परंतु बाहर की दुनिया के दांव-पेंच बहुत ही ख़तरनाक हैं। उन्हें वास्तविकता और सकारात्मक शिक्षा भी मिलनी चाहिए। यहाँ मनुष्य को कुचल कर, पीठ पीछे घाव करके ऊपर से नीचे गिराने वालों की कमी नहीं है। महत्वाकांक्षा के घोड़े पर सवार होकर आने वाली महिलाएँ यहाँ फिट नहीं होतीं। महिलाओं के स्वाभिमान, चाहत, मूल्य और आकांक्षाएँ हमेशा प्रतिद्वंद्विता की आग में जलती रहती हैं। यहाँ ये हारते हैं, पीछे जाते हैं, टूटते है, घायल होते हैं और बिखरते हैं। उनका हाथ थाम कर सही रास्ता बताने वाला कोई नहीं होता। परिणामस्वरूप कमजोर पलों में वे जीवन को ख़त्म कर देती हैं।


यह समय कभी न कभी बीत ही जाएगा और बदलाव होकर रहेगा ,यह उम्मीद आत्महत्या से बचा सकती है। आगे बढ़ने, टिके रहने और हर हाल में सफलता प्राप्त करने, घर और काम में बैलेंस बनाने, बच्चोे को श्रेठ बनाने और दुनिया की सभी सुख-सुविधाएँ प्राप्त करने की चाह तनाव पैदा करती है। चाह पूरी नहीं होती तो हताशा आती है और फिर मरने का विचार होता है।

ज़िंदगी में हर आदमी को सभी सुख नहीं मिलते। जो नहीं मिला उसके लिए रोने के बजाय जो मिला है, उसका आनंद उठाना ज्यादा बेहतर है और जीवन में मात्र जीतना ही महत्वपूर्ण नहीं है। हारना, बार-बार हारना, हार का उससे बोध पाठ प्राप्त कर, जीना और टिके रहना भी महत्वपूर्ण है। ग्लैमर वर्ल्ड या कार्पोरेट फील्ड में काम करने वाली लड़कियों की आत्महत्या अनलिमिटेड एम्बिशन का परिणाम है। बिना क्षमता की आकांक्षा ग़लत रास्ते पर ले जाती है।

इसके अलावा रिलेशनशिप में चिटिंग, बॉडी शेमिंग, असफलता, एक्स्ट्रा मैरीटल अफेयर, मनपसंद लड़के के साथ शादी के लिए परिवार का विरोध और सहनशक्ति का अभाव भी महिलाओं को आत्महत्या के लिए प्रेरित करता है। यहाँ महिला को समझना चाहिए कि ये सभी समस्याएँ काम चलाऊ हैं। थोड़ा सहनशील बनो। एक न एक दिन सभी समस्याओं का अंत हो जाएगा। समस्याओं का अंत आने दो। तब तक इंतजार करो। उसके पहले जीवन समाप्त करने का क्या मतलब? अगर जीवन का अंत आना ही है तो समस्याओं से लड़ते हुए आने दो, जिससे कुछ तो सुधाार होगा। इस सुधार के लिए आने वाली पीढ़ी आपको याद करेगी।


- वीरेन्द्र बहादुर सिंह

रचनाकार परिचय
वीरेन्द्र बहादुर सिंह

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