अक्टूबर-नवम्बर 2020 (संयुक्तांक)
अंक - 64 | कुल अंक - 64
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

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आलेख

राष्ट्रीय एकता के संदर्भ में रामलीला की प्रासंगिकता
- डाॅ. प्रेमपाल सिंह वाल्यान


विश्व वांड्मय में महर्षि वाल्मीकि प्रणीत श्रीमद् वाल्मीकि रामायण भगवान श्री रामचन्द्र के सम्पूर्ण जीवन का प्रतिपादक प्रथम महाग्रंथ है। इसी के आधार पर संस्कृत एवं अन्य भारतीय भाषाओं में राम विषयक कृतियों की रचना, व्यास, मांस, कालिदास, भवभूति मुरारी, जयदेव, राजेश्वर, क्षेमेन्द्र, तुलसीदास, कम्बन, केशवदास, मैथिलीशरण गुप्त तथा कृतिदास आदि विश्व प्रसिद्ध कवियों के द्वारा की गयी।

श्री रामचन्द्र के मनोरम् एवं मधुर चरित्रों का ज्ञान उनके अश्वमेघ यज्ञ से ही प्रारम्भ हो गया था। लव एवं कुश के द्वारा रामचरित के सस्वर गान का स्पष्ट उल्लेख अनेक जीवन चरित्र पर आधारित विविध लोकनृत्यों एवं नाटकों का अभिनय निश्चित रूप से भगवान राम के जीवनकाल में ही हो गया होगा। ऐसा मानने में किसी प्रकार का संदेह नहीं करना चाहिए क्योंकि महान यशस्वी एवं प्रजारंजक राजा के दीर्घशासन काल में ही उससे संबंधित नाटकों का अभिनय जनता द्वारा न किया गया हो, ऐसा सम्भव नहीं है।
इस प्रकार स्पष्ट है कि श्रीराम के जीवन पर आधृत रामलीला की परम्परा अत्यन्त प्राचीन है और इसके अनेक रूप भारत एवं भारत के बाहर अन्य देशों में प्रचलित हैं। भारत के हिंदी प्रदेशों में प्रचलित रामलीलाएँ कवि शिरोमणि गोस्वामी तुलसीदास के 'रामचरित मानस' से अधिक प्रभावित हैं या उसी पर मुख्य रूप से आश्रित हैं। यह भी ऐतिहासिक सत्य है।


भगवान राम वेद मूलक भारतीय संस्कृति में भगवान विष्णु या परम ब्रह्म परमेश्वर के अवतार के रूप में प्रतिष्ठित हैं। अन्य धर्मावलम्बियों या महानुयायियों की दृष्टि में भी वे एक महान चरित्रवान एवं सद्गुण सम्पन्न श्रेष्ठ प्रजापालक के रूप में सम्मानित हैं। भारत राष्ट्र में अब तक उन जैसा पितृभक्त, मातृभक्त, प्रजावत्सल, नारी सम्मान संरक्षक, सेवक प्रिय, शरणागत रक्षक, निःस्पृदृ त्यागी तथा प्रबल शत्रु संहारक कोई दूसरा मानव उत्पन्न नहीं हुआ है। भगवती सीता भारत राष्ट्र की परम आदरणीया पतिप्राणा नारी थीं, जिनका अपहरण करके लंकापति रावण ने भारत राष्ट्र की अस्मिता पर आघात किया था। देश के उस दुष्ट शत्रु का सकुल संहार करके श्रीराम ने भारत राष्ट्र के गौरव एवं सम्मान में अभिवृद्धि की थी। लंका पर विजय प्राप्त करके पुनः उसे लंकाधीय के लघु भ्राता विभीषण को राजा बना कर वसुधैव कुटुम्बकम् इस उदार घोषणा को चरितार्थ किया था। इसके पश्चात् अयोध्या का सम्राट होकर श्रीराम ने अपनी प्रजा का पालन जिस स्नेह और न्याय से किया था, वह विश्व के इतिहास में सदा स्वर्णाक्षरों से अंकित रहेगा। श्रीराम का शासनकाल भारतीय नरेशों का चिरकाल से ही महान आदर्श रहा है। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने भारत की स्वतंत्रता के पश्चात् देश में रामराज्य लाने का मधुर स्वप्न देखा था। गोस्वामी तुलसीदास ने भी रामराज्य का सुन्दर चित्रण निम्नांकित शब्दों में किया है-

रामराज्य बैठे त्रैलोका, हरषित भए गये सब सोका।।
बयरू न करू काहू सन कोई, राम प्रताप विषमता खोई।।
दैहिक दैविक भौतिक तापा, राम राज्य नहीं काहूहि व्यापा।।
सब नर करहिं पर स्वर प्रीति, चलहिं स्वधर्म निरत श्रृतिनीती।।
सब उदार सब पर उपकारी, बिप्रचरन सेवक नर नारी।।
एक नारी व्रत रत सब भारी, ते मन बचन क्रम पति हितकारी।।
दण्ड जतिन्हकर भेद जँह, नर्तक नृत्य समाज।
जीतहु मनहि सुनिअक्षस, रामचन्द्र के राज।।
महिपुर मयूर वन्हि, रवि तय जेतनेहिकाज।
लागे वारिद देहि जल, रामचन्द्र के राज।।


सब प्रकार के सुख से सम्पन्न सभी अयोध्यावासी परस्पर प्रेम करते थे तथा स्वधर्म का पालन करते थे। आज भारत की अनेक समस्याओं में राष्ट्रीय एकता की समस्या प्रमुख है। आतंकवाद, पृथकतावाद तथा उग्रवाद की समस्याएँ राष्ट्र की चिरकालीन एकता को छिन्न-विच्छिन कर रही हैं। धार्मिक संकीर्णता एवं साम्प्रदायिकता का विष भारत राष्ट्र के अमर जीवन को विषाक्त कर रहा है। ऐसी परिस्थिति में इस राष्ट्र के महान नायक एवं मानवता के उत्कृष्ट आदर्श श्री राम का त्यागमय जीवन स्मृति में आता है।

भगवान श्रीराम के पावन चरित्र पर आश्रित रामलीलाएँ केवल भारतीय जनमानस के मनोरंजन का साधन मात्र नहीं हैं, अपितु वे सम्पूर्ण राष्ट्र को एकता सूत्र में बांधने का परम साधन हैं। रामलीलाओं के माध्यम से परस्पर भ्रातृ भाव, प्रेमभाव, त्याग, सदाचार संयम, अनुशासन तथा राष्ट्र भक्ति की अमूल्य शिक्षा मिलती है। पिता की आज्ञा को मानने के लिए तथा माता कैकयी की अनर्थकारिणी इच्छा को पूरा करने के हेतु श्रीराम ने जिस त्याग का आदर्श मानव समाज के सम्मुख प्रस्तुत किया है, वह आश्चर्यजनक है। अयोध्या के विशाल साम्राज्य को पिताश्री की प्रतिज्ञा पूर्ण करने हेतु लोटठवतम् (मिट्टी के ढेले के समान) त्याग कर श्रीराम ने न केवल अयोध्या के साम्राज्य को बचा लिया अपितु भारत राष्ट्र के महान शत्रु लंकापति रावण का संहार करके विपुल यश को प्राप्त कर लिया। यदि कैकेयी के समान श्रीराम भी स्वार्थ बुद्धि से अयोध्या का राज्य पाने के लिए उत्सुक होते, तो सारी अयोध्या लंका के समान ही नष्ट हो जाती। ऐसे भगवान श्रीराम की लीलाएँ भारत के प्रत्येक नागरिक को राष्ट्र रक्षा के लिये व्यक्तिगत स्वार्थ के त्याग का महान उच्च संदेश देती हैं। आज राष्ट्रीय एकता की जितनी भी समस्याएँ हैं, उनका समाधान भगवान राम के आचरण की नीति के आधार पर सुगमता से किया जा सकता है। जो राम पिता की आज्ञा मानने के लिये अयोध्या का साम्राज्य छोड़ सकते हैं, क्या उनके अनुयायी या उस देश के नागरिक के द्वारा एक छोटे-से स्थान या सम्पत्ति के लिए सम्पूर्ण राष्ट्र को स्वाहा करना उचित है?

भारत में मंचित रामलीलाएँ एकता का आदर्श प्रतीक हैं। इसलिए भारत के प्रत्येक नागरिक को चाहिए कि वे अपनी भौतिक सुख सुविधाओं को त्यागकर तथा रामलीलाओं से प्रेरणा लेकर अपने महान राष्ट्र भारत के प्रति अपने कर्तव्यों का पालन करें तथा अपने राष्ट्र के प्राचीन गौरव को समृद्ध करें तभी राष्ट्रीय एकता के सन्दर्भ में रामलीला की प्रांसगिकता सिद्ध हो सकती है।


- डाॅ. प्रेमपाल सिंह वाल्यान

रचनाकार परिचय
डाॅ. प्रेमपाल सिंह वाल्यान

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