अक्टूबर-नवम्बर 2020 (संयुक्तांक)
अंक - 64 | कुल अंक - 64
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

गीत-गंगा

तुम्हीं बताओ

कैसे मन को मैं समझाऊँ, तुम्हीं बताओ!
तुम कहती हो जल्दी मेरे, घर आ जाओ।

माना तुमको प्यार बहुत है
मेरी इन बूढ़ी साँसों से,
पर कैसे ओझल कर दूँ मैं
इस घर को अपनी आँखों से।
पुरवा बड़े प्यार से कहती, गुनगुन गाओ!
तुम कहती हो जल्दी मेरे, घर आ जाओ।

तुम्हें चाह है रहूँ वहाँ मैं
जहाँ सभी सुविधाएँ होतीं,
सुख का सावन रोज़ बरसता
खुशियाँ आकर बिरवा बोतीं।
पर जूही-चम्पा कहती तुम, कहीं न जाओ,
तुम कहती हो जल्दी मेरे घर आ जाओ।

छत पर जब गमले के पौधे
हाथ पकड़कर बतियाते हैं,
उन्हें छोड़कर यों जाने से
आँखों में आँसू आते हैं।
मेरे बिना कहेंगे किससे, प्यास बुझाओ,
तुम कहती हो जल्दी मेरे घर आ जाओ।

नहीं मानती हैं दीवारें
नहीं छोड़ते हैं दरवाजे,
मेरा घर गीतों का मंदिर
हर कोने में बाजे-गाजे।
शाम-सवेरे सब कहते हैं, मुझे बजाओ,
तुम कहती हो जल्दी मेरे घर आ जाओ।


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कैसे गीत लिखें

दहशत के पीले पत्ते पर कैसे प्रीत लिखें?
सन्नाटे में डूबे मन से कैसे गीत लिखें?

घर-आँगन, गलियाँ-चौबारे
सब कुछ भूल गये,
हँसी-ख़ुशी के सभी नज़ारे
छत से झूल गये,
अपने जब हो गये पराये, कैसे मीत लिखें?
सन्नाटे में डूबे मन से, कैसे गीत लिखें?

कदम-कदम पर बढ़ती जाती
पल-पल मजबूरी,
रोज़ सुबह लेकर आती है
एक नयी दूरी।
तुम्हीं बताओ विषम घड़ी में क्या विपरीत लिखें?
सन्नाटे में डूबे मन से कैसे गीत लिखें?

कहीं नहीं दिखती गौरैया
घर के छज्जे पर,
भीड़ नहीं लगती लोगों की
अब दरवज्जे पर।
संयम के सब सेनानी हैं, कैसे भीत लिखें?
सन्नाटे में डूबे मन से कैसे गीत लिखें?

बाबूजी की जैसी हालत
माँ भी वैसी है,
पूरे घर में सबकी किस्मत
जैसी-तैसी है।
समझ न आता 'कोरोना' पर, कैसे जीत लिखें?
सन्नाटे में डूबे मन से, कैसे गीत लिखें?


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गीत मचलते हैं

जब भी किसी अँधेरे घर में दीपक जलते हैं,
मेरे मन में दीप-शिखा बन गीत मचलते हैं।

रात-रात भर मधुरिम सुर में
हर दम गाते हैं,
अँजुरी भरकर चंदनवन से
ख़ुशबू लाते हैं।
स्वाति बूँद बनकर सीपी में हर पल ढलते हैं,
जब भी किसी अँधेरे घर में दीपक जलते हैं।

जब-जब आती है गौरैया
मेरे आँगन में,
महक मोगरे की भर जाती
मन के कानन में।
छन्दों के मृदु पाँव अधर पर स्वयं फिसलते हैं,
जब भी किसी अँधेरे घर में दीपक जलते हैं।

आखर-आखर आकर घर में
रुनझुन करता है,
उर की बगिया में भौंरों-सा
गुनगुन करता है।
छत के ऊपर खुली हवा में शब्द टहलते हैं,
जब भी किसी अँधेरे घर में दीपक जलते हैं।

दूर कहीं यमुना के तट पर
कोई गाता है,
बाँसुरिया के मोहक स्वर में
गीत सुनाता है।
साँसों की राधा के उर में भाव उछलते हैं,
किसी अँधेरे घर में जब भी दीपक जलते हैं।।


- डॉ. मधुसूदन साहा

रचनाकार परिचय
डॉ. मधुसूदन साहा

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गीत-गंगा (1)