अक्टूबर-नवम्बर 2020 (संयुक्तांक)
अंक - 64 | कुल अंक - 64
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

धरोहर

अभिव्यक्ति के सारे खतरे उठाने ही होंगे –  मुक्तिबोध

 (जन्म 13नवंबर 1917 मृत्यु 11 सितम्बर 1964)

 

गजानन माधव मुक्तिबोध का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं है। वे उन अग्रणी लेखकों में से एक हैं जिन्होंने साहित्य के जरिये व्यवस्था के शोषणकारी व अन्यायी चरित्र के विरुद्ध आवाज बुलंद की। उन्होंने न सिफ अपनी कविताओं के जरिये बल्कि कहानियों, लेखों व समीक्षा के जरिये मजदूर-मेहनतकश जनता के दुखों-तकलीफों को स्वर प्रदान किया। शासकों के मुंह पर पड़े नकाब को मुक्तिबोध ने अपनी रचनाओं के जरिये उतार फेंका और यह बताया कि आजादी मिलने के बाद भी देशी शासकों का चरित्र अंग्रेज साम्राज्यवादियों से ज्यादा भिन्‍न नहीं है। पूंजीवादी व्यवस्था के अंतर्विरोधों, जनविरोधी चरित्र व निरकुंशता का वर्णन ही मुक्तिबोध का रचना संसार है।

 

गजानन माधव मुक्तिबोध का जन्म 13 नवंबर सन्‌ 1917 को श्योपुर (शिवपुरी) ग्वालियर (मध्य प्रदेश) में हुआ। शुरुआती शिक्षा इन्होंने उज्जैन में ली। मुक्तिबोध की मां पार्वती बाई बुंदेलखंड के एक किसान परिवार से थीं। इनके पिता श्री माधव मुक्तिबोध पुलिस में इंस्पैक्टर थे। समय-समय पर पिता का ट्रांसफर होने के कारण इनको भी उनके साथ जाना पड़ता था, जिस कारण इनकी पढ़ाई-लिखाई भी बाधित होती रही। इंदौर के होल्‍कर से 1938 में बी.ए. की डिग्री हासिल करने के बाद मुक्तिबोध उज्जैन में प्राध्यापक बन गये।

 

मुक्तिबोध का विवाह परिवार की इच्छाओं के विरुद्ध हुआ लेकिन पत्नी के साथ उनका मतैक्य न हो सका। एक कवि के खूप में जो बस किसी तरह जीवन चलाता है, के बजाय उनकी पत्नी की आकांक्षाएं ज्यादा सम्पन्न और सुविधा से पूर्ण जीवन जीने की थी। स्नेह-प्रेम और अपेक्षाकृत सुविधाओं में जिये मुक्तिबोध का शेष जीवन अभाव, संघर्ष व विपन्नता में कटा । अध्ययन करने की भूख मुक्तिबोध में ऐसी थी कि अभावों में जीने के बाद भी अध्ययन नहीं छोड़ा। राजनांद गांव में रहते हुए ही मुक्तिबोध ने अंग्रेजी, फ्रेंच व रूसी उपन्यासों का अध्ययन किया। इसके साथ ही जासूसी उपन्यासों, वैज्ञानिक उपन्यासों व विभिन्‍न देशों के इतिहास का भी गहन अध्ययन किया।

 

1940 में शुजालपुर में शारदा शिक्षा सदन में अध्यापक बने। लेकिन यहां लंबे समय तक नहीं टिके। इसके बाद उज्जैन, कलकत्ता, इंदौर, बनारस, जबलपुर, बंबई आदि जगहों पर भी नौकरियां की। 1948 में नागपुर आये। सूचना और प्रसारण विभाग, आकाशवाणी एवं “नया खून (साप्ताहिक) में भी काम किया। मुक्तिबोध ने पाठ्य-पुस्तकों का भी लेखन किया। 1958 में दिग्विजय महाविद्यालय, राजनांद गांव में प्राध्यापक हुए। अपनी भांति-भांति की नौकरियों तथा एक स्थान से दूसरे स्थान पर भ्रमण करने को मुक्तिबोध ने स्वयं निम्न प्रकार व्यक्त किया है- “नौकरियां पकड़ता और छोड़ता रहा।

शिक्षक, पत्रकार, पुनः शिक्षक, सरकारी और गैर सरकारी नौकरियां। निम्न-मध्यवर्गीय जीवन, बाल-बच्चे, दवादारू, जन्म-मौत में उलझा रहा।

 

1943 में 'तारसप्तक' का प्रकाशन हुआ, जिनकी शुरुआत मुक्तिबोध की कविताओं से होती थी। पहली बार मुक्तिबोध की कविताएं ‘तारसप्तक' में ही छपी। नयी कविता के लिए सात कवियों का एक मण्डल बनाकर तारसप्तक का एक संकलन किया गया। तारसप्तक नयी कविता का प्रस्थान बिन्दू व प्रयोगवाद का आरंभ भी माना जाता है।

मुक्तिबोध ने मध्यभारत प्रगतिशील लेखक संघ की बुनियाद डालकर लेखकों को संगठित करने का प्रयास किया। लेखक संघ की विशिष्ट बैठकों में वे साहित्यिक विचारकों को बुलाते थे। 1944 में इंदौर में उन्होंने फासिस्ट विरोधी लेखक सम्मेलन का भी आयोजन किया। वे निरंतर लेखकों-साहित्यकारों को उनकी जिम्मेदारियों से अवगत कराते रहे। साहित्यकारों को जन से जोड़ने, जन के दुखों-कष्टों को स्वर देने और संघर्ष को अपनी रचनाओं में स्थान देने पर वे जोर देते रहे। वे स्वयं भी मजदूरों-मेहनतकशों से घुलमिल कर रहते थे, उनके जैसा ही जीवन स्वयं जीते थे। उनकी कविताएं मेहनतकशों से सरोकार रखने का सबसे बड़ा प्रमाण है।

 

हिन्दी साहित्य में उनका योगदान बेहद महत्वपूर्ण है। हिन्दी साहित्य में उनके योगदान को भुला देना नामुकिन है। नई कविता के स्तंभकारों में उनका नाम शामिल है, लेकिन वे एक सीमा के भीतर ही लेखन करने के बजाय उन सीमाओं को विस्तारित करते गये। नई कविता में उस समय जो मध्ययुगीनता की मानसिकता हावी थी, उसको उन्होंने आधुनिकता के सांचे में ढाला। मुक्तिबोध न सिर्फ आधुनिक और नये जीवन-मूल्यों के प्रति जागरुक थे बल्कि अपनी कविताओं में प्रतीक व बिंबों के जरिये इनको स्वर दिया। अपनी समीक्षा व आलोचना के जरिये हिन्दी साहित्य को एक नई दृष्टि दी।

मुक्तिबोध उस कोटि के थे जो यह मानते थे कि कला को सिर्फ कला तक सीमित नहीं किया जाय बल्कि कला की एक सामाजिक पक्षधरता होनी चाहिये। सामाजिक, भीतिक व आत्मिक समस्याओं पर उन्होंने इसी दृष्टि से लिखा है। उनका लेखन वर्गीय समाज की विषमता को खोलकर सामने ला देता है। इसी वर्गीय समाज में उनका लेखन मेहनतकशों को समर्पित है। उनका भाव एक मजदूर का सा भाव है।

 

आज जब व्यक्तिवाद व खुदगर्जी चरम पर है। कई साहित्यकार व मुख्य धारा के लोग स्वयं को स्थापित करने और बेहद निजी चीजों पर ही लेखन व विचार करते हैं। इसके विपरीत मुक्तिबोध लेखन को वगीय पक्षधरता से जोड़ते हैं। मुक्तिबोध कहते हैं कि “पार्टनर तुम्हारी पालिटिक्स क्या है?” उनका आशय साफ है कि आप जन को समर्पित हो या जनविरोधी शासक वर्ग को। साहित्य भी उनके लिए वर्गीय निष्ठा का सवाल है।

 

सामाजिक कुरीतियों, असमानता, शोषण-उत्पीड़न पर मुक्तिबाध की कविताएं कड़ी चोट करती हैं। दलित मुक्ति, नारी मुक्ति, जनवादी मूल्यों में बाधक व्यवस्था और व्यवस्था के चालक शासकों के विरूद्ध आम जनता का आह्वान करते हुए मुक्तिबोध कहते हैं-

“अब अभिव्यक्ति के सारे खतरे उठाने ही होंगे

 तोड़नें ही होंगे गढ़ और मठ सब।

पहुंचना होगा दुर्गग पहाड़ों के उस पार

 तब कहीं देखने मिलेंगी बाहें

 जिसमें कि प्रतिफल कांपता रहता

अरुण कमल एक”

 

मुक्तिबोध की प्रतिबद्धता मजदूर मेहनतकश जनता के साथ थी। उनकी प्रतिबद्धता एक नई शोषणमुक्त दुनिया बनाने को समर्पित थी। ठीक यही कारण है कि उनकी कविता आकर्षित करती है। उनकी यही प्रतिबद्धता शोषण और शासक-सत्ता के घमण्ड को चूर करने वाली है। मानव मुक्ति को वर्गीय मुक्ति के रूप में देखते थे। मुक्तिबोध मजदूरों, किसानों, शोषितों की मुक्ति उनके जीवन में पसरे अंधकार, भूख, असमानता व उत्पीड़न से मुक्ति के अलावा किसी अन्य रूप में नहीं देखते थे।

 

 मुक्तिबोध के लेखन में सत्ता से संघर्ष के साथ-साथ अपने आप से भी संघर्ष का गवाह है। आत्ममुग्धता से वे कोसो दूर थे। वे लिखते हैं-

“नहीं चाहिए मुझे हवेली

नहीं चाहिए मुझे इमारत

नहीं चाहिए मुझको मेरी

अपनी सेवाओं की कीमत

नहीं चाहिए मुझे दुश्मनी

करने कहने की बातों की

नहीं चाहिए वह आईना

बिगाड़ दे जो सूरत मेरी

बड़ो-बड़ों के इस समाज में

शिरा-शिरा कंपित होती है

अहंकार है मुझको भी तो

मेरे भी गौरव की मेरी

यदि न बजे इन राजपथ्थों पर

तो क्‍या होगा !! मैं न मरूंगा

कन्धे पर पानी की काबड़

का यह मार अपार सहूंगा।।”

 

धर्म के स्वयंभू ठेकेदारों, धर्म के नाम पर साम्प्रदायिकता का जहर फैलाने वालों पर करारी चोट करते हुए मुक्तिबोध कहते हैं-

भारतीय संस्कृति के खंडेरों में

जीवन्त कीर्ति की विदीर्ण युक्तियों 

के लतियाये भालों पर

स्तम्भों के शीर्ष पर

मंदिरों के श्रृंगों पर

बैठे ये जनदेषी घुप्पू ये घनघोर

चीखते हैं रात दिन

घूमते हैं खंडेरों की गलियों में चारों

ओर

कुकुर पुराने और दंभ के नये जोर

जनता के विद्देषी

अनुभवी

कामचोर ...........”

 

मुक्तिबोध की चर्चा करते समय उनकी सृजनशीलता का सबसे बेहतरीन उदाहरण “अंधेरे में' कविता का जिक्र बेहद जरूरी है। यह उनकी अंतिम कविता भी है। उनकी अन्य रचनाओं की तरह ही यह लंबी कविता भी संवाद करती हुयी आगे बढ़ती है। आजादी के बाद भारतीय शासक वर्ग द्वारा जो शासन कायम किया गया यह उसकी एक आलोचना है। पूंजीवादी पथ पर अग्रसर भारतीय शासक वर्ग तमाम अंतर्विरोधों को पैदा करता है। जन की आंकाक्षाओं का दमन और ऊपरी वर्ग की दौलत व संपन्नता में इजाफा इसका परिणाम था। यह कविता जन की आकांक्षाओं, कवि की आकांक्षाओं, स्वपष्नों और जन की दुर्दशा और संघर्ष को अभिव्यक्त करती है।

ओ मेरे आदर्शवादी मन

ओ मेरे सिद्धान्तवादी मन

अब तक क्या किया?

जीवन क्‍या जिया?

………………….

 

बताओ तो

किस-किस के लिए तुम दौड़ गये

करूणा के दृश्यों से

हाय! मुहं मोड़ गये

बन गये पत्थर

बहुत-बहुत ज्यादा लिया

दिया बहुत-बहुत कम

मर गया देश

अरे जीवित रह गये तुम!!

लो-हित-पिता को घर से निकाल दिया

जन-मन-करूणा सी मां को हंकाल दिया

स्वार्थों के टेरियार कुत्तों को पाल लिया

भावना के कर्तव्य त्याग दिये

हृदय के मंतत्व मार डाले!

बुद्धि का माल ही फोड़ दिया

तर्कों के हाथ उखाड़ दिये

जम गये

जाम हुये

फंस गये

अपने ही कीचड़ मे धंस गये।

 

1962 में उनकी रचना 'भारतः इतिहास और संस्कृति” प्रकाशित हुयी। इसके प्रकाशित होते ही तत्कालीन म0प्र0 सरकार उनसे चौकन्नी हो गयी। उसके बाद 17 फरवरी 1964 को पक्षाधात से पीड़ित हो गये। भोपाल में इनका इलाज चला लेकिन दशा न सुधरी और अंत में इनको दिल्ली के एम्स में लाया गया। लगभग 8 माह मौत से जूझते हुये कलम और मेहनतकशों का यह सिपाही, बेहाशी की हालत में ही 11 सितम्बर 1964 की रात को जग को अलविदा कह गया।

 

मुक्तिबोध की एक कविता 'पूंजीवादी समाज के प्रति” में पूंजीवादी समाज की वस्तुस्थिति को स्पष्ट करते हुए मुक्तिबोध सामंतवाद की तुलना में एक श्रेष्ठ समाज बताते है लेकिन व्यापक मजदूर-मेहनतकशों के लिए यह समाज एक पीड़ा व बोझ से कम नहीं है। पूंजीवाद के विनाश, रिक्तता के बारे मे वे कहते है-

 तेरे रक्त से भी घृणा आती तीव्र

तुझको देख मितली उमड़ आती शीघ्र

तेरे झस मे भी रोग कामि है उग्र

तेरा नाश तुझ पर क्रुछतुझ पर व्यग्र।

मेरी ज्वालाजन की ज्वाला होकर एक

अपनी उष्णता में धो चलें अविवेक

तू है मरणतू रिक्ततू है व्यर्थ

तेरा ध्वंस केवल एक तेरा अर्थ

 

लेखन-काविता, कहानी, निबंध, आलोचना, इ्तिहात्र विधाओं में/

कविता संग्रह- चांद का मुंह टेडा है, भूरी भूरी खाक धूल तथा तारसप्तक में रचनाएं प्रकाशित कहानी संग्रह- काठ का सपना, विपात्र, सतह से उठता आदमी।

उपन्यास- विपात्र।

आलोचना- कामायनीः एक पुनर्विचार, नई कविता का आत्मसंघर्ष, नए साहित्य का सौन्दर्यशास्त्र, समीक्षा की समस्याएं।

आत्माख्यान- एक साहित्यिक की डायरी।

इतिहास- भारतः इतिहास और संस्कृति।

रचनावली- मुक्तिबोध रचनावली(सात खंडों में)।

 


- नीरज कृष्ण

रचनाकार परिचय
नीरज कृष्ण

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