सितम्बर 2020
अंक - 63 | कुल अंक - 63
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कथा-कुसुम

बेटी का हक़

"पापा जी, इस घर का आधा हिस्सा दीदी को लिखने वाले हैं, है न! यही कह रहे थे न आपसे? आपने कहा क्यों नहीं, दीदी तो ख़ुद इतनी सपन्न हैं, उन्हें घर देने की क्या ज़रूरत है?" अलका पति को समझा रही थी।
"अरे भाई, उनका घर है उनकी मर्ज़ी, जिसे चाहे दें!" पति राहिल का जवाब था।
"लेकिन दीदी को घर की क्या ज़रूरत है, उन्हें तो बेटी भी नहीं है, जिसकी शादी की उनको चिंता हो। शादी के बाद बेटी को मायके से कुछ नहीं लेना चाहिये।"


उस कमरे में बैठा नौ साल का उनका बेटा मोहित सब सुन रहा था। वह अपने कमरे में गया, जहाँ उसकी छोटी बहन महिमा टेबल पर बैठी, ड्राइंग कर रही थी। मोहित उसे देख चिल्लाया- "मेरे टेबल पर से हटो, यह मेरा टेबल है।"
"मम्मी देखो, भईया मुझे टेबल पर ड्राइंग नहीं करने दे रहा है।"
"क्यों मोहित, क्यों हटा रहा हो? तुम्हारी छोटी बहन है न! इसका भी तो यह टेबल है।"
"नहीं, यह इसका नहीं, बस मेरा है। यह बेटी है, इसका यहाँ कुछ भी नहीं है।"
अलका यह सुन स्तब्ध खड़ी रह गयी।

 

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स्वाधीन

"माँ, मैं नकुल से सारे रिश्ते तोड़कर आ गयी हूँ। अपमान और प्रताड़ना के सिवा मुझे उस घर से आज तक कुछ नहीं मिला है। आज मैं तलाक के कागज मुँह पर फेंक कर आयी हूँ।" रक्षा ने मायके में आकर माँ के पाँव छुते हुए कहा।
"क्या कह रही है रक्षा, क्या हुआ?" माँ ने आश्चर्य से रक्षा से पूछा।
"माँ, हर समय बस पैसे की माँग! मैं अच्छा-खासा कमाती हूँ। मेरे पैसों पर भी नकुल का अधिकार रहता था, पर मैंने कभी बुरा नहीं माना लेकिन एक पैसा भी अपनी मर्ज़ी से खर्च नहीं कर सकती। यह तो गलत है न माँ! मैं अगर पैसे खरचूं तब मुझे भी, मेरे पैसे का हिसाब नकुल को देना पडेगा। यह कहाँ तक तर्कसंगत है! उस पर, दिन-रात पुछताछ करना, इतनी देर कैसे, कहाँ थी, मैंने तो कभी नकुल से नहीं पूछा! इतनी देर कहाँ हुई, कहाँ थे, माँ सबकुछ बरदाश्त हो जाता है पर चरित्र पर कोई ऊँगली उठाये तब तन-बदन में आग-सी लग जाती है, सहन नहीं होता है।"


"रक्षा, तू तो जानती है अपनी भाभी को, मैं कैसे?" माँ का कातर स्वर आगे बोलते ज़बान थरथराने लगी।
"माँ, मैं यहाँ रहने नहीं आई हूँ।" रक्षा दर्प से बोल उठी।
"मैंने अलग रहने का फैसला अपने दम पर किया है इसलिये मैंने एक घर किराये पर ले लिया है। मैं तुमको अपने साथ रहने का न्योता देने आई हूँ। मेरे साथ मेरे घर पर, रहोगी न माँ!" रक्षा माँ से लिपटते हुए बोली।


माँ  सोच रही थी, शिक्षा वास्तव में औरत को साहसी एवं स्वाधीन बना देता है।


- डॉ. विभा रंजन कनक

रचनाकार परिचय
डॉ. विभा रंजन कनक

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