सितम्बर 2020
अंक - 63 | कुल अंक - 63
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

फ़िल्म समीक्षा
मनुष्य और राक्षसों के संसार की कहानी 'कार्गो'

 
हिंदी में तय फार्मूलों और हकीकत से हटकर बहुत ही कम फिल्में बनी हैं। अगर कभी बनती भी हैं तो उनमें ऐसे प्रयोग किए जाते हैं कि फिल्म आम दर्शक के सर से गुजर जाती है। कार्गो लीक से अलग होने के बावजूद एक सहज फिल्म है, जो हमें एक कल्पनालोक में ले जाती है। जहां जीवन और मृत्यु के गंभीर प्रसंगों पर कभी-कभी आप मुस्करा भी देते हैं। 
पृथ्वी पर अपना वर्चस्व बनाए रखने के लिए इंसानों और राक्षसों की लड़ाई पौराणिक है। लेखक-निर्देशक आरती कदव अपनी डेब्यू फिल्म कार्गो में इस पौराणिक मिथक को कई ट्विस्ट एंड टर्न के साथ तोड़ती और पेश करती हुई प्रतीत होती है। वे एक नई-रोचक कहानी बुनकर इस बार हमारे सामने प्रस्तुत हुई  हैं। इसमें विज्ञान, अंतरिक्ष के साथ साथ आत्मा-परमात्मा , जीवन-मृत्यु का दर्शन भी है लेकिन इसे एक फैंटेसी के रूप  में ही सहजता से बुना गया लगता  है। वह भी एक ऐसे दौर में जबकि हिंदी सिनेमा में रियलिस्टिक पर जोर है, आरती काल्पनिक कहानी को जमीनी सच्चाई की तरह पेश करती हैं वह भी हल्के-फुल्के कॉमिक अंदाज में। 
 
इसमें साल 2027 का समय दिखाया गया है, जब इंसान चांद-मंगल से आगे बृहस्पति तक पहुंच गया है। लेकिन धरती पर हालात 2020 जैसे हैं। क्योंकि 2027 तो कपोल कल्पना के आधार पर दिखाया जा सकता है। साल 2020 की बात करें तो इस दौर में वही लोकल ट्रेनें, वही घरों की पलस्तर से उखड़ती दीवारें और उनमें काले पड़ते इलेक्ट्रिक सॉकेट मौजूद हैं। वहीं प्यार के झूठे वादे और रिश्तों में धोखा देने वाले इंसान पैदा हो रहे हैं। लेकिन कार्गो में इस जीवन-मरण के बीच में बड़ा बदलाव दिखता है। मरे हुए इंसान को लेने के लिए भैंसे पर सवार यमराज या उनके नुमाइंदे नहीं आते। यह काम मनुष्यों जैसे दिखने वाले राक्षस करते हैं। साथ ही यहां न स्वर्ग है, न नर्क। पृथ्वी पर मनुष्यों और राक्षसों के समझौते के बाद आकाशगंगा में मृत्यु के पश्चात अंतरिक्ष स्टेशन बनाए गए हैं, जहां आदमी  सिर्फ मर कर ही पहुंच सकता है। यहां उसे कार्गो यानी डिब्बाबंद माल कहा जाता है। स्टेशन में उसकी ‘मेमोरी इरेज’ की जाती है और फिर धरती पर नए शरीर में उसका जन्म होता है। 
 
फ़िल्म की कहानी की बात करूं तो यहां काल्पनिक काल और स्थान के बैकग्राउंड वाली यह कहानी एक अंतरिक्ष स्टेशन पुष्पक 634-ए पर 75 साल से रह रहे होमो-राक्षस प्रहस्थ (विक्रांत मैसी) की है। जिसकी उम्र कितने सौ बरस होगी, कह नहीं सकते। लेकिन चूंकि अब उसके स्टेशन में जन्म-मृत्यु के कई चक्रों से गुजर कर आते लोग कहने लगे हैं कि उसे कहीं देखा है, तो इसका मतलब है कि धरती पर कई युग बीत चुके हैं। उसके रिटायरमेंट का समय आ गया है। उसकी जगह लेने के लिए राक्षसों-मनुष्यों के इंटरप्लेनेटरी स्पेस ऑर्गनाइजेशन ने युविष्का शेखर (श्वेता त्रिपाठी) को भेजा है।  दूसरी ओर प्रहस्थ को धरती पर लौटना मुश्किल लगता है क्योंकि उसकी भावनाएं अपने काम से जुड़ी हैं। मगर यहां उसकी एक छोटी-सी प्रेम कहानी भी आरती ने दिखाई है। 
 
ओटीटी प्लेटफॉर्म नेटफ्लिक्स पर आई कार्गो का फिल्माई ढांचा रोचक है। हॉलीवुड या पश्चिमी देशों में बनने वाली महंगी अंतरिक्ष फिल्मों की तुलना में सीमित संसाधनों में बनी कार्गो अंतरिक्ष फैंटेसी का सुंदर नमूना पेश करती है। कहानी और स्क्रिप्ट में दम दिखाई देता है। इसी कारण यह आपको बांधे रखने में कामयाब होती  है। मृत्यु का सफर और वहां से पुनर्जन्म की राह पर लौटना क्या इतना ही सहज किंतु रोचक होता होगा। फिल्म में मर कर अंतरिक्ष स्टेशन में आने वाले किरदारों में एक बात लगभग समान दिखती है कि वे अचानक मर गए हैं और एक बार अपने किसी प्रियजन या परिवारवाले से बात करना चाहते हैं। मृत्यु यहां मशीनी रूप में है। जिसमें ना कोई दर्द, ना तकलीफ और ना ही इमोशन है। स्मृति को ‘खत्म’ कर देने वाली या मिटा देने वाली कुर्सी पर बैठने के बाद इंसान जैसे कोरी स्लेट हो जाता है और धरती पर ट्रांसपोर्ट होने के लिए रबर के गुड्डे की भांति तैयार रहता है। ऐसे तमाम दृश्य और प्रसंग यहां आकर्षक लगते हैं।  कार्गो जीवन से मोह और मृत्यु के भय को एक समान दूरी और एक नजर से देखने की कहानी मालूम पड़ती है। कई बार जैसे हमें यह पता नहीं होता कि हम जी रहे हैं, वैसे ही हमें यह भी पता नहीं चलता कि हम मर चुके है। कुछ ऐसी ही बात कहते हुए कार्गो कहीं-कहीं हल्की मुस्कान पैदा करती है। इसमें हल्का व्यंग्य भी है।
 
लगभग एक घंटे 50 मिनट की यह फिल्म दर्शकों को बांधे रखने में कामयाब  है। अगर आप रूटीन फिल्मों से अलग कुछ देखना पसंद करते हैं और साइंस फिक्शन में रुचि है तो कार्गो आपके लिए है। हिंदी में ऐसी फिल्में दुर्लभ है। अतः एक अलग अनुभव के लिए इस फिल्म को देखा जा सकता है। विक्रांत मैसी और श्वेता त्रिपाठी ने अपनी भूमिकाएं सहजता से निभाई हैं। फिल्म के सैट अच्छे से डिजाइन किए गए लगते हैं।  इसका आर्ट डायरेक्शन और वीएफएक्स कहानी के अनुकूल हैं। फ़िल्म के सेट, लोकेशन को छोड़ गाने ज्यादा प्रभावित नहीं कर पाते। 
 
अपनी रेटिंग - 3 स्टार

- तेजस पूनिया

रचनाकार परिचय
तेजस पूनिया

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