सितम्बर 2020
अंक - 63 | कुल अंक - 63
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

मूल्याँकन

नारी उत्पीड़न से सशक्तिकरण की यात्रा: पारो- उत्तरकथा
- डॉ. मधु संधु




सुदर्शन प्रियदर्शिनी का उपन्यास ‘पारो- एक उत्तरकथा’ प्रणय, प्राण और प्रारब्ध एक दस्तावेजी अवलोकन है। इससे पहले उनके पाँच उपन्यास आ चुके हैं- ‘सूरज नहीं उगेगा’, ‘रेत का घर’, ‘जलाक’, ‘न भेजयों विदेस’, ‘अब के बिछुड़े’। उनकी कविताएँ ‘शिखंडी युग’, ‘यह युग रावण है’, ‘मुझे बुद्ध नहीं बनना’ में संकलित हैं। ‘उत्तरायण’ और ‘काँच के टुकड़े’ उनके कहानी संग्रह हैं।

‘पारो- उत्तरकथा’ का मूलाधार बंगला साहित्यकार शरतचंद्र का 1917 में प्रकाशित उपन्यास ‘देवदास’ है, जिसका हिन्दी और दूसरी भाषाओं में अनुवाद भी हुआ। ‘देवदास’ उपन्यास की कहानी पर कम से कम सोलह बार फिल्में बनीं- 1. मूक चित्रपट, 5 बंगाली में (दो बांग्लादेश ने बनाई), 4 हिन्दी में, 1 आसामी, 2 उर्दू में (एक पाकिस्तान में बनी), 2 तमिल में, 2 तेलगु में, 1 मलयालम में। बॉलीवुड में ‘देवदास’ पर चार बार फिल्म निर्माण हुआ, जिसमें क्रमश: 1- कुन्दन लाल सहगल, जमुना बरुआ, राजकुमारी 2- दिलीपकुमार, सुचित्रा सेन और वैजयंती माला, 3- शाहरूख खान, ऐश्वर्य राय और माधुरी दीक्षित 4- अभय देओल, माही गिल्ल, कल्कि कोइचलिन । (देव- डी--आज के जमाने की) जैसे मंजे हुये अभिनेताओं ने काम किया। कॉमेडी किंग कपिल शर्मा का देवदास- पारो का एपिसोड भी पर्याप्त चर्चित रहा।

शरत चंद्र के ‘देवदास’ के 102 वर्ष बाद प्रकाशित ‘पारो- उत्तरकथा’ शरत चंद्र के ‘देवदास’ उपन्यास का पुनर्पाठ न होकर पुनर्सर्जना है। बदलते समय और समाज ने पहला बदलाव तो शीर्षक में ही कर दिया है, जहां देवदास का नायकत्व पारो ने हथिया लिया है। यहाँ देवदास लौकिक न होकर एक भावना है। वह तो पारो की स्मृतियों का हिस्सा है, अवचेतन का भ्रम है। दिवास्वप्न सा आता है और आत्मा की आवाज बन मूल्यवत्ता का नीर-क्षीर विवेक समझा चला जाता है। अतीतजीवी भावुक प्रणय पगी नायिका का अन्तर्मन देवदास के साथ धूप में खिलता, बरसात में भीगता और लहलहाती बगिया सा मुस्काता है। मनोविश्लेषक इस व्यामोह को मानसिक रोग भी मान सकते हैं। ऐसे लगता है कि देव की आत्मा भटक रही है, उसका तर्पण नही हो पाया क्योंकि पारो का प्रेम देव की आत्मा को मुक्त नहीं होने देता।

यह नायिका प्रधान रचना है। उपन्यास में एक दर्जन से अधिक स्त्री पात्र हैं- लीलावती, राधा, पारो, शोभना, रोहिणी, कंचन, सुलक्षणा, रानी साहिबा, चन्द्रमुखी, कोठेवालियां, बुधिया, कल्याणी, दिव्या आदि। सुदर्शन प्रियदर्शिनी के स्त्री पात्र पुरुष पात्रों से कहीं अधिक सशक्त, विवेकशील और दृढ़ हैं। उनके पाँव यथार्थ की व्यावहारिक और ठोस ज़मीन पर टिके हैं। लीलावती- कुंवरनारायण, पारो- देवदास, चन्द्रमुखी- देवदास, राधा- वीरेन, पारो- वीरेन, रानी साहिबा- भुवनशोम, कंचन- प्रमोद, कंचन- विनोद आदि सभी युगलों में स्त्री चरित्र भारी और सशक्त पड रहे हैं।

पुरुषों के सौ गुनाह माफ वाली सामंतीय अवधारणा कुंवरनारायण, वीरेन, प्रमोद, विनोद, भुवनशोम का पाठकीय दृष्टि से अवमूल्यन कर रही है। वीरेन राधा को कभी भुला नहीं पाता, लेकिन उसके स्वार्थी, शंकालु, सामंती मन को यह स्वीकार नहीं कि पारो की स्मृतियों में मृत देवदास बसा रहे। इसी की सज़ा कहिए कि वह पारो को कभी पत्नी का दर्जा नहीं दे पाता। राधा के लिए वह इतना पोजेसिव रहा कि बेटी कंचन की उपस्थिति भी बर्दाश्त नहीं कर पाता और उसे ननिहाल भेज दिया जाता है ।

उपन्यास की स्त्री उत्पीड़ित है। उसका यह उत्पीड़न चौतरफा है। व्यक्ति, परिवार, समाज, परम्परायेँ – सभी उसके विरोध में मोर्चा खोले बैठे हैं। सारे गरल इस स्त्री के हिस्से आए हैं। यहाँ बेमेल विवाहों का तांता लगा है। अपनी जिद्द, अभिमान और अहं को लेकर राय साहब अपने से दस वर्ष बड़ी राधा से विवाह करके ही छोड़ते हैं और उसके आत्महत्या कर लेने पर हवेली के लिए एक ऐसी ठकुराइन, बच्चों के लिए एक ऐसी माँ खरीद लाते हैं, जो उनसे पंद्रह वर्ष छोटी है। लीलावती, कंचन के जीवन को भी शराबी, वेश्यागामी पुरुषों ने नरक बना रखा है।

देवदास की माँ, यानि रानी माँ लीलावती चौदह वर्ष की उम्र हवेली में आई थी। पति लीलावती की उपस्थिति में हवेली में ही नाच- गाने की महफिलें- मजमें लगाता है और ठकुरानी होकर भी उनकी उपेक्षित, अतृप्त, अपमानित, लहूलुहान आत्मा हवेलीनुमा पिंजरे में फड़फड़ाती, तड़पती, भटकती, अपमानित होती रहती है।

उत्पीड़न का जहर वीरेन/ रायसाहब की पहली पत्नी राधा को भी रोज़ घूंट- घूट पिलाया जाता है। भूगोल की प्रोफेसर राधा से वीरेन जबर्दस्ती शादी करता है। कहता है कि अगर यह शादी न हुई तो वह आत्महत्या कर लेगा या राधा के साथ कुएं में छलांग लगा देगा और शादी हो जाने पर लगातार उसका लगातार उत्पीड़न करता है। राधा के घर से निकलने पर, कालेज जाने पर, माली या नौकरों से बात करने पर शक करता है। उसके सौंदर्य को नष्ट करने के लिए शेविंग किट से कैंची निकाल उसके बाल काट देता है। दुधमुंही बेटी को ननिहाल में ही रखने का नादिरशाही हुकुम सुनाता है। राधा हर समय डरी, सहमी, भीगी बिल्ली बनी रहती है और इस उत्पीड़न से तंग आ आत्महत्या कर लेती है।  

देवदास भी अपनी बालसखी/ प्रेमिका, पार्वती/ पारो का उतना ही उत्पीड़क है जितना वीरेन। पारो के दरवाजे पर आकर देव का प्राण त्यागना नवविवाहित पारो को कलंकित कर देता है, सारी मान- मर्यादा पाँव तले रौंद देता है, उसे पत्थर की अहल्या बना देता है, राय साहब के लिए अपदस्थ कर देता है। अब उनके लिए वह मात्र  एक खरीदी हुई गुड़िया है, किराये की आया है। उन्होने उसे बड़ी हवेली की ठकुराइन और बड़े- बड़े बच्चों की माँ बनाया है, लेकिन पत्नी का दर्जा नहीं दिया है। उसके जीवन के दोनों ओर अनबुझी पहेलियाँ हैं। असह्य दोतरफा वेदना है। पारो की पीड़ा यह है कि उसकी मुहब्बत भी बेमेल थी और शादी भी बेमेल है। वह जलते आँगन में जलते तलवों के साथ खड़ी है। उसका मुख्य उत्पीड़क समाज और इसकी परम्पराएँ हैं, जो वर्गभेद की बात करती हैं, जो कहती हैं कि सामाजिक बंधन से प्रेम वैध हो जाता है और बंधन के बिना अवैध, जो लिंग भेद की बात करती हैं, मानती हैं कि पुरुष होने के  नाते वीरेन तो राधा को अपने मन में बसा सकता है, लेकिन स्त्री होने के नाते पारो मृत देव को भी याद नहीं रख सकती। वह तो पतंग  बनकर देवदास के साथ उड़ना चाहती थी, लेकिन उसकी डोर रायसाहब के खूँटे से बांध दी गई है । देव की माँ रानी साहिबा और पिता भुवनशोम के दंभ और अपनी माँ मंगला की अहमन्यता– सभी ने मिलकर पारो की बलि ली है। देव के पिता ने उसे परकीया करार दिया और अपनी माँ ने उसकी सौदेबाजी की।

यह पितृसत्ताक समाज है। बेटी कंचन को माँ राधा से, उसके वात्सल्याधिकार, अभिभावकत्व, संरक्षण से वंचित करना एक क्रूर पिता द्वारा किया जाने वाला भयंकर उत्पीड़न ही है। बाज की तरह पिता ने उसकी सारी खुशियाँ दबोच रखी हैं। उसके मन में पिता की छवि एक आततायी सी आक्रामक और नृशंस है। पिता द्वारा माँ का स्थान दूसरी औरत को देना भी कंचन को वितृष्णा से भर देता है। अबोध उम्र में बेमेल शादी भी उत्पीड़न का ही रूप है और उदण्ड, पीड़क और सुरा- सुंदरी प्रेमी पति से निभाना कंचन का ही जीवट है। शादी में उसके हिस्से दासत्व, रसोई, मर्यादा और रूढ़ियाँ ही आती हैं। ससुराल उसके लिए अग्निकुंड सा है। पति की मृत्यु का दोष पत्नी पर मढ़ा जाना भी उत्पीड़न का एक हिस्सा है। कंचन की सास कहती है-
"प्रमोद को खा गई अब किसे निगलेगी।"
शोभना यानी वीरेन की बहन के बारे में सुदर्शन प्रियदर्शिनी ने अधिक नहीं लिखा, लेकिन पिता की बेरुखी और माँ के आत्मकेंद्रण ने उसे तिरस्कृत बच्चे का जीवन ही दिया।    

महेन की प्रेमिका दिव्या का पिता अपने राजपूती गौरव के कारण बेटी की शादी महेन से नहीं करता और वह पिता की इच्छा से हुई शादी को नकार दूसरे दिन ही पति का घर छोडकर चली जाती है, किसी को नहीं मालूम कि वह कहाँ है। पिता के जातीय भेद- भाव एक किशोरी को त्रिशंकु बना देते हैं। महेन से उसकी शादी की नहीं जाती और पिता द्वारा आरोपित पति उसे स्वीकार नहीं।      

इतनी अधिक दबाई जाने वाली यह उत्पीड़ित स्त्री जब सिर उठाती है, तो नारी सशक्तिकरण का जीवंत उदाहरण बन जाती है। यह उपन्यास अबला से सबला की यात्रा है।    

लीलावती उपन्यास की सबसे सशक्त स्त्री है। पति प्रताडित लीलावती पति की मृत्यु के बाद रिश्तेदारों को, हवेली की मान- मर्यादा को, व्यापार की जटिलताओं और जायदाद को, अपने बच्चों को पूरे साहस, आत्मबल और बौद्धिक विवेक से संभालती है। किसी भी षड्यंत्र को पनपने नहीं देती। देवर द्वारा कारोबार और कोर्ट कचहरी के संदर्भ में हस्तक्षेप पर कहती है- यह नही होगा। बड़ा होकर वीरेन ही सब संभालेगा। पारो के सरल और कर्तव्यनिष्ठ व्यक्तित्व को पहचान उसका साथ देती, वीरेन की हर उच्छृंखलता पर लगाम लगाती कहती है-

"मैंने उन जमीदारों के तेवर उम्र भर देखे और निभाए हैं इसलिए मैं पार्वती के साथ अन्याय न होने दूँगी।-----मैं अभी ज़िंदा हूँ चाहूँ तो आज भी तुम्हें बेदखल कर सकती हूँ वीरेन।"
अल्हड़ प्रेमिका पारो का प्रश्न था-
"मैं क्या करूँ देवदास ? जिया नहीं जाता!"
और उपन्यास के अंत तक आते- आते वह सब को जीने का रास्ता दिखा रही है। उपेक्षित, उत्पीड़ित पार्वती अपने आत्मबल से दोयम दर्जे से छुटकारा पा लेती है। जानती है-
“यह लड़ाई भी मेरी अपनी ही है। यह न मैं देव के लिए लड़ रही हूँ, न रायसाहब के लिए, न अपनी माँ के लिए और न रानी माँ के लिए - - - - मैं स्वयं कितनी सशक्त और अडिग रह सकती हूँ या अपने आप को रखना चाहती हूँ- यह मुझे कोई समझा नहीं सकता।"

अपनी सारी ऊहापोह, रायसाहब से मिलने वाली अवहेलना और अपमानजनक व्यवहार के बावजूद यह कर्तव्य सजग स्त्री जल्दी ही आदर्श, परिपक्व गृहस्थन बन जाती है, ताकि घर में सौहार्द बना रहे, प्रेम बना रहे, सबसे ऊपर घर बना रहे। अपने दुख से उभरती है। वीरेन के जमाई की मृत्यु पर स्वेच्छा से सारे दायित्व निभाती है। रानी माँ का मन जीत लेती है। कंचन को माँ सा स्नेह और सखी सा साथ देती है, महेन का दुख सांझा करती है, शोभना को पूरा सम्मान देती है। वह अपने व्यक्तित्व को इतना ऊपर उठा लेती है कि रायसाहब हर निर्णय में, हर मुसीबत में, प्रत्येक घरेलू हलचल में उसकी विवेकशील सलाह लेना अनिवार्य मानते हैं। पारो रायसाहब का कवच बन जाती है।

कंचन जानती है कि समाज में विधवा सिर्फ दया, उपेक्षा और प्रताड़ना की पात्र है और विवाह के बाद स्त्री को पति- परिवार के साथ असंख्य समझौते करने पड़ते हैं। पति प्रमोद की मृत्यु के बाद वह पिता के घर में रहने की बजाय देवर विनोद से शादी की चादर स्वीकारने   का सशक्त निर्णय लेती है। क्योंकि वह जानती है कि पिता के घर विधवा बनकर रहना उसे सब की दया का पात्र बना देगा और कहीं और पुनर्विवाह में उसे नये सिरे से सारे समझौते करने होंगे।

इस पुरुष सत्ताक समाज में स्त्री की स्थिति और मन: स्थिति राधा के चरित्र से भी आँकी जा सकती है। वह कॉलेज में प्रोफेसर है। वीरेन से दस साल बड़ी है। वीरेन के प्रति उसके प्रेम में कांता भाव नही है, लेकिन वीरेन के आत्मघाती उद्वेग के कारण वह उससे विवाह के लिए हामी भरती है। लेकिन वीरेन की सामन्तीय पत्नी पीड़क वृति से मुक्त होने के लिए वह आत्महत्या का वरण कर उसे गहन अपराध बोध में छटपटाने के लिए छोड़ देती है। यहीं हम उस पीड़क को आत्मग्लानि से घिरा हुआ पाते है।  

पारो की माँ मंगला भले ही समाज के दोयम दर्जे से सम्बद्ध है, लेकिन उसका आत्मसम्मान उसे सशक्त स्त्री की तरह प्रस्तुत करता है। भुवनशोम द्वारा पारो और देव की शादी से इंकार करने पर वह संकल्प करती है कि बेटी की विदाई सोने की पालकी में होगी और वह भुवनशोम की हवेली से बड़ी हवेली में जाएगी और इस संकल्प को वह पूरा भी करती है।   

लीलावती हो, पारो हो या कंचन– उपन्यास के स्त्री पात्र हवा का रुख पहचानते हैं, स्थितियों को समझते हैं, निर्णय की क्षमता रखते हैं। विवेकशील और लचीले हैं। समझौते करने में उन्हें कोई कष्ट नहीं, निर्णय लेने में किसी पक्षपात का आरोपण नहीं, अपना मत देने में संकोच नहीं। वे मस्तक ऊंचा करके व्यक्ति, समाज और परम्पराओं पर आघात भी कर रहे है और दूसरों का पथ प्रशस्त भी कर रहे हैं।

देवदास और पारो की कहानी भावुक मन की प्रेम कथा रही है। भावुकता में चिंतन सूत्रों का विलयन इसे हमारे आज से जोड़ता है। यह सूत्र उपन्यास में भरे पड़े हैं-          
1. गरीब होने से क्या मर्यादा कम हो जाती है स्त्री की।   
2. औरत की चार आँखें होती हैं। सूक्ष्म दृष्टि से स्त्री सब देख लेती है, जो आम लोगों को सामने से भी दिखाई नहीं देता।
3. नारी को बचपन से नारीत्व की घुट्टी पिलाकर उसे एक विशेष स्थिति में गढ़ दिया जाता है कि वह दासी है, पति का घर उसका अंतिम पड़ाव है और अंतिम छोर है, उसको लांघना नरक में जाने के बराबर है, क्योंकि हमारा दर्जा दोयम ही है।
4. बड़े लोग अपनी पत्नियों को प्यार नहीं करते- उन्हें भोगते हैं- और सामाजिक दायित्व निभाते हैं।
5. महलनुमा कोठियों में रानियाँ नहीं, बांदियाँ रहती हैं।
6. प्यार स्त्री और पुरुष में अंतर नहीं करता। प्यार स्त्री और पुरुष के अधिकारों के तोल में नहीं तुलता। प्यार समाज की बनी- बनाई इमारतों पर नहीं लिखा जाता, प्यार का अपना एक फ़लक होता है जो सबका अलग- अलग निर्मित होता है।
7. कुछ क्षण होते हैं जब हम भावावेग में ऐसे निर्णय ले लेते हैं- जिन्हें लेकर हम उम्र भर हाथ मलते रह जाते हैं।
8. प्यार का वास्तविक अर्थ विरह है, मिलन नहीं है। समाज की उपेक्षा और प्रताड़ना है। वह गुलाब की तरह कोमल, सुंदर, सुष्मित और रंगीन है पर उतना ही काँटों से बिधा हुआ।
9. पुरुष का अहं ताड़ के वृक्ष से भी ऊँचा, बड से भी गहरा फैला हुआ- अपनी जड़ों से गुंथा हुआ होता है।
10. वास्तविक हार तब होती है जब मनुष्य स्वयं से हारता है।
11. हम बाहर वालों को जाने देते हैं, उनकी की हुई शत्रुता भूल जाते हैं, पर अपनों को क्षमादान नहीं दे पाते।
12. कहाँ रह जाती हैं ऊँची दीवारें, ऊँची बुर्जियां, ऊँचे ओहदे, सब एक दिन धराशाही हो जाता है और हम हाथ मलते रह जाते हैं।
13. बड़ा आदमी हो तो दीवारें स्वयं ही पिंघल जाती हैं और एक साधारण आदमी के लिए वही लौह कारा बन जाती हैं।
14. बनी बनाई परम्पराओं की इमारतों तले हम दब सकते हैं, दफन नहीं किए जा सकते।
15. प्यार न दिल का फ़तूर है, न दिमाग की अपरिपक्वता और न ही हृदय की दुर्बलता है। इसके तार तो पिछले जन्म के किसी अधूरे रिश्ते से जुड़े होते हैं।
16. हम जीवाणु या मनुष्य जीवन के प्रारम्भ से ही जीवन की टेढी पगडंडियों पर चलना सीख लेते हैं। यह लड़ाई सब की अपनी अपनी होती है।    

‘पारो- उत्तरकथा’ उस स्त्री की कथा है, जो एक भावुक विरहिन प्रेयसी से लाड़ली बहू, सहगामिनी- सहयोगिनी पत्नी, सौतेली होकर भी सगी माँ के स्नेहिल रूप में हमारे सामने आती है। उपन्यास अगर सामन्तीय परंपरा की अभिशप्त स्त्रियॉं को लिए है तो उनमें लौह स्त्री का स्वाभिमान और संघर्ष क्षमता भी है। रानी माँ, पारो, मंगला, कंचन, शोभना- सभी स्त्री पात्र मिलकर एक सशक्त संसार की रचना में जुटे हैं। उत्पीड़न की आग ने अग्निकुंड से निकली इन स्त्रियॉं को खरा सोना बना दिया है।






 
समीक्ष्य पुस्तक- पारो- उत्तरकथा
रचनाकार- सुदर्शन प्रियदर्शिनी
प्रकाशक- सभ्या प्रकाशन, दिल्ली
संस्करण-    प्रथम, 2019
पृष्ठ- 330
मूल्य- 450 रुपये


- डाॅ. मधु संधु

रचनाकार परिचय
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