सितम्बर 2020
अंक - 63 | कुल अंक - 63
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कविता-कानन

आँख

मुझे पता नहीं था कि
तुम मुझे
बिन देखें भी
देख सकतीं हो।

जैसे देखते हैं
बत्तख रात्रि के घने कोहरे को

कई बार तो मैं तुम्हें देखकर
बस आँखों से ही बिछड़ जाता हूँ
मगर शरीर से नहीं।

हमारी-तुम्हारी बातों के मध्य
कोई एक आदमी बहुत ही दुखी होकर
भारी-भरकम आवाज़ लगाता है
जैसे नसीहतों के बारें में
औरतें आपस में सिर फुटौवल करती हैं।

मैं लौटता हूँ
अपने भीतर लगभग एक शताब्दी के बाद
जब शहर, गाँव, हैंड पम्प, खेत-खलिहान सब
मेरे भीतर उपस्थित होते हैं।

सच कहूँ तो
अवश्य मैं तुम्हें चाहने लगा हूँ
जैसे कोई चाहता हैं अपने बच्चों को।

लेकिन

हाँ! तुम दार्शनिक नहीं हो
नहीं भांपती हो मेरे आंखों के बारें में
कभी
सोच भी लिया करों
इन बेरहम, मासूम, इच्छाओं वाले आँखों को

जिसमें तुम्हें
अपनाने का हुनर है।  


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आदिवासी

मासी ने खेतों में रोप दिए हैं धान के बीज
बुच्चिया ने मुँह में
दूध चूसने वाले प्लास्टिक के निप्पल को ही
माँ का स्तन समझ लिया है
बाबा भी हुक्के के दम में खोज रहें है
अपने लिए एक जीवन्त फसल,
जिससे एक घर की लौ कायम रहे।

हर रोज हमारे घर में मदिरा के बाद
चिल्ल-पों, चिल्ल-पों की आवाज सुनाई पड़ती है
मुहल्ले के लोग कहते हैं;
"लो, शुरू हुआ एक डोम कचकच..."

ईंट का जवाब पत्थर से देना
अब मुमकिन है जब डोम कचकच हमारे घर में शुरू हो जाएं
तब हम काले-काले लोग मुस्कुराते हैं काले समय में
जब भी हम आदि से अंत की तरफ बढ़ते हैं
एक प्रश्न हमेशा मौजूद रहता है?
पत्थर में मौजूद ईश्वर की तरह
झुग्गी में ले जाउंगा आदिवासी होने का सबूत
आज खरीद कर ले गया मैं
अपने और अपने पुत्र के लिए चिमटा
जब बदमाशी हद से ज्यादा हो जाती है तो
यही चिमटा उसके पीठ पर उसके आदिवासी होने का प्रतीक बन जाता है।

नग्न शरीर पर उकेर दिया जाता है आज भी कई जख्म
हम उज्ज्वल भविष्य की चिंता नहीं करते हैं
हम एक वक्त की रोटी की चिंता करते हैं।
हम चिंता करते हैं सिद्धु-कानू के इतिहास की
घर, बेटी,माता-पिता और अपने सभ्य समाज की
जिसमें हम आज भी घूंट कर जी रहे हैं।
जी रहे हैं बिन पक्के मकान के
जी रहे हैं बिन खेत-खलिहानों के
जी रहे हैं बिन वस्त्र के
जी रहे हैं बिन चप्पल के
जी रहे हैं बिन स्मार्ट इंडिया के
जी, हाँ! हम आदि हो चुके हैं
क्योंकि कोई भी हमें अपनाने के नाम पर आश्वासन देते फिरते हैं।
हम ठीक है;
अपनी एक अलग दुनिया में
जिसमें हमें कोई नीचा दिखाने के लिए
नहीं बेंच देता है अपने आप को
कोई हमारे इज्जत से खिलवाड़ तो नहीं करता है
अरे! हम भी इंसान और मानवता को समझते हैं
हम भी समझते हैं कि
मानव जीवन के मूल्य
जिसमें उल्लिखित है एक असभ्य समाज
जो यथार्थ से बिलकुल अलग है।

आदिवासी होने का प्रमाण पत्र प्रदान किया जाता है
आदिवासी होने के लिए जरूरी नहीं किसी क्षेत्रीय भाषा, पहनावे-ओढावे, खाद्य व्यंजन आदि सीखने की

बस जरूरी है कि
एक इंसान को इंसान के नजरिए से देखने की।
तब तुम स्वयं हर जाति, धर्म को त्याग बन जाओगे
एक स्मार्ट इंडियन
जिसमें दर्ज होगा हर मनुष्य के भीतर आदिवासी होने का प्रमाण।


- रोहित प्रसाद पथिक

रचनाकार परिचय
रोहित प्रसाद पथिक

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