सितम्बर 2020
अंक - 63 | कुल अंक - 63
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

ज़रा सोचिए

दोषी सामाजिक परिवेश भी
- प्रगति गुप्ता


तारीख और दिन आज सोचूं तो मुझे याद नहीं पर जब भी सुनीता नाम के उस मरीज़ा के बारे में सोचती हूँ तो उसके साथ-साथ न जाने कितनी ही बातों का ज़खीरा स्वतः ही मेरे रोंगटे खड़े कर देता है। क़रीब छब्बीस-सताईस साल की एक लड़की अपनी रसीद रिसेप्शन पर बनवा; अपनी जाँचों का बेसब्री से इंतज़ार कर रही थी। चूँकि मुझे रिसेप्शन पर रखा हुआ पेशेंट रजिस्टर से देखना था तो मैं स्वयं ही उठकर स्टाफ के पास आ गई थी। वजह सिर्फ यही नहीं थी क्योंकि यह मेरी आदतों में शुमार था। बीच-बीच में रिसेप्शन के चक्कर लगाना ताकि वहाँ की गतिविधियों पर भी मेरी नज़र रहे। चूँकि उस समय कैमरों का इतना प्रचलन नहीं था तो सभी गतिविधियों पर नज़र रखने के लिए ख़ुद ही जतन करने होते थे।

सुनीता नाम की यह मरीज़ा अन्दर ही अन्दर बहुत बैचेन थी शायद तभी उसके हाव-भाव उसको शांत नहीं होने दे रहे थे। कभी अपना पर्स खोलती, कभी आँखे बंद करके शांत होने की चेष्टा करती तो कभी उँगलियों पर कुछ दोहराती हुई प्रतीत होती। उसको देखकर लग रहा था शायद किसी मन्त्र का जाप कर रही है। साथ ही कभी आसपास बैठे मरीजों की बातों को सुनने की कोशिश करते हुए तो वो दिख रही थी, पर मुझे नहीं लगा कि उसका ध्यान वास्तव में मरीज़ों की तरफ है। उसकी इतनी बैचेनी मुझे भी बार-बार सोचने पर मजबूर कर रही थी शायद यही वजह थी कि मुझे भी अपने काम के बीच उसका ख़याल बार-बार उसके लिए सोचने पर मजबूर कर रहा था और तभी मैंने फ़ोन करके स्टाफ से उस मरीज़ा को पहले मेरे पास भेजने को कहा।

जैसे ही मैंने उसको अन्दर बुलाया, उसको लगा मैं ही वो डॉक्टर हूँ, जिसको उसकी सोनोग्राफी जाँच करनी है। अन्दर आते ही वो मेरे पैरों पर गिर गई और उसने रोना शुरू कर दिया। मैंने उसको उठाकर सबसे पहले कुर्सी पर बैठाया और उसको शांत होने को कहा। पर शायद वो जितना अपने रोने को रोकने की कोशिश करती, उतनी ही उसकी रुलाई फूटती जाती। शब्द तो निकल नहीं रहे थे बस यही "प्लीज मैम आप मेरी मदद करो...प्लीज मैम आप मेरी मदद करो।" वो मुझसे बहुत छोटी थी तो अनायास ही मेरे मुँह से निकल पड़ा, "पहले चुप हो जाओ बेटा। फिर मुझे बताओ क्या हुआ है तुम्हें।" शायद बहुत देर से वो अपनी रुलाई रोक कर बैठी थी तो बहुत देर के रुके हुए भाव जब फटते हैं तो शायद इतनी जल्दी शांत नहीं होते। भावों की बिखरन इंसान को सँभलने और स्वयं को समेटने में बहुत वक़्त माँगती है। जितना भावों को सहेजने में इंसान को वक़्त लगता है, उससे ज़्यादा वक़्त उन्हीं भावों के बिखरने पर स्वयं को समेटने में लगता है।

"आप मेरी सोनोग्राफी करेंगी?"
"नहीं, मैं नहीं करुँगी। सोनोग्राफी के डॉक्टर दूसरे है बेटा। कुछ बताओगी मुझे क्या परेशानी है तुमको, मैं तुम्हारी मदद कर पाऊं शायद।"
"आंटी! आप तो प्लीज डॉक्टर को कहकर मुझे सिर्फ़ यह बता दो कि मेरे लड़का है।" मेरे बेटा बोलने से ही सुनीता भी अब आंटी जैसे संबोधन पर आ गई थी।
"मुझे आंटी और कुछ नहीं चाहिए सिर्फ लड़का होना चाहिए। प्लीज आंटी आप करो न मेरी मदद।" बोलकर उसने फिर से रोना शुरू कर दिया। मुझे उसका रोना देखकर लग रहा था कि वो ह्य्स्टेरिक (उन्मादी) हो रही है तो मैंने ज़ोर से उसको डांट लगाई।
"चुप हो जाओ तुम, बिल्कुल रोना बंद करो और खामोश बैठो थोड़ी देर।" मेरे ज़ोर से बोलने से सुनीता एकदम चुप होकर मेरी तरफ़ देखने लगी। तभी स्टाफ को बुलाकर मैंने उसके लिए पानी मंगवाया और चुपचाप पानी पीकर बैठने को कहा।

"पहले मन को शांत करने की कोशिश करो बेटा और मुझे सबकुछ सच-सच बताओ क्या हुआ है तुम्हारे साथ। क्यों इतना परेशान हो? मुझसे तुम्हारी जो मदद होगी करुँगी पर पहले तुमको और तुम्हारी परेशानियों को जानना चाहूंगी।" उसको शांत होकर संयंत होने में क़रीब आधा घंटा लग गया। फिर नार्मल होते ही उसने कहना शुरू किया, "आंटी जबसे मैंने कंसीव किया है, मैं बहुत परेशां हूँ। मुझे लगता है कहीं मैं पागल न हो जाऊं।" आज से पाँच साल पहले मेरे शादी किशोर नाम के आदमी के साथ हुई थी। अच्छा बिज़नस है इनका यहाँ। रुपयों की कोई कमी नहीं है। परिवार में किशोर के एक छोटे भाई के अलावा उनके माँ-पिता भी साथ रहते हैं। मेरे मम्मी-पापा ने बहुत सारा क़र्ज़ लेकर मेरी शादी की थी। छोटा भाई है, जो कि बहुत छोटी नौकरी करता है और पापा का दो साल पहले देहांत हो गया है। अब गुज़ारा बहुत मुश्किल से होता है।
"यहाँ सुसराल में रुपयों की कोई कमी नहीं पर पिछले सालों में, मैं तीन बार माँ बनी आंटी पर हर बार जब में चेकअप को जाती तो मुझे नहीं पता कब यह लोग  डॉक्टर से बात करके पता करते थे कि लड़का है या लड़की और आंटी मुझे नहीं पता किस चीज़ में मुझे इन लोगों ने क्या खिलाया कि सब अच्छा चलते-चलते अचानक ही तीनो बार भारी रक्तस्त्राव के साथ मुझे गर्भपात हुआ।"
"मैं बहुत पढ़ी-लिखी नहीं हूँ सो कभी इतना सबकुछ सोच ही नहीं पाई कि मेरे साथ सबकुछ ठीक होते हुए भी ऐसा क्यों हो रहा है। उल्टा यह लोग बहुत तरीके से यह सब करते रहे। यह तो मुझे जब इस बार कंसीव किया तब पता लगा, जब मैंने किशोर को पापा-मम्मी से अकेले बात करते सुना कि इस बार तो भगवान् करे लड़का हो, नहीं तो इस बार दवाइयाँ खिलाने से इसकी जान को ख़तरा हो जायेगा, यह बात डॉक्टर बहुत अच्छे-से बोल चुकी है।" कुछ ऐसा ही किशोर अपने माँ-पापा से बोल रहे थे। चूँकि बच्चे की बात हो रही थी इसलिए मेरे भी कान खड़े हो गये और मैंने ध्यान से सुनने की कोशिश की।"

"आंटी तब मुझे अहसास हुआ कि मेरे पहले वाले गर्भपात प्राकृतिक नहीं थे। सब इन लोगों की चाल थी। बेटा होने ही हवस ने इन लोगों को इतना गिरा दिया था कि होने वाले बच्चे की जान लेते हुए इनको कोई तरस नहीं आया। इन लोगों की बातें सुनते ही मुझे इतनी ज़ोर का रोना आया आंटी कि मैं ख़ुद को रोने से रोक न सकी। तब इन लोगों को शायद यह आभास हो गया कि मैंने इनकी बातें सुन ली हैं। जैसे ही किशोर कमरे से बाहर आए तो मुझसे पूछने लगे कितनी देर से खड़ी हो यहाँ और रो क्यों रही हो।"
"आंटी मैं बहुत डर गई थी, साथ ही मुझे अपने लिए भी खौफ़ हो गया कि यह लोग तो नन्ही-सी बच्ची को मार सकते हैं। अगर इनको पता लग गया मैंने इनकी बातें सुन ली है तो यह मुझे या तो मार डालेंगे या तलाक़ दे देंगे। मैं तो पीहर भी नहीं जा सकती थी आंटी, वहाँ तो सभी कुछ बहुत मुश्किल से चलता है। बस चुपचाप ही मैंने किशोर को झूठ बोल दिया कि मैं डर गई थी कि इस बार भी मैं कहीं बच्चे को खो न दूँ।"
"आंटी जबसे मैंने इन लोगों की बातें सुनी है, मैं रात-रात भर सो नहीं पाती। बस एक खौफ़ मन में समा गया है कि पता नहीं कब ये किसी डॉक्टर को अपनी तरफ मिला लें और मुझे न जाने कब कुछ बगैर बताये खिला दें और मैं अपने बच्चे को खो दूंगी। आंटी अब मुझे अहसास हुआ है कि यह हमेशा ही क्यों ऐसे डॉक्टरों के पास जाते थे, जिनको कोई जानता तक नहीं। अब तो आंटी मुझे लगता है पता नहीं वो डॉक्टर थे भी कि नहीं।" इतना सबकुछ बोलते में फिर सुनीता ने रोना शुरू कर दिया और रोते-रोते बोली, "आंटी! आजकल तो सपने में मेरे पिछले तीनों बच्चे मेरे पास आते हैं और मुझे कहते हैं मैं अच्छी माँ नहीं हूँ क्योंकि मैं उनको बचा नहीं सकी। आंटी मुझे तो कुछ भी पता ही नहीं था कैसे बचाती उनको। बहुत रोते है आंटी मेरे बच्चे, सारी-सारी रात रोते है और मुझे भी सोने नहीं देते।"

"आंटी आप ही बताओ कैसे वापस लाऊं उनको, मुझे तो लगता है मेरा यह भी बच्चा कहीं उनकी बातें सुन-सुन कर मुझसे रूठ न जाए और हमेशा के लिए मेरे से दूर चला जाये।"
सुनीता की बातें सुनकर अब मुझे लगने लगा था कि किसी गहरे अवसाद में जा चुकी है वो। चूँकि अपने इस दर्द को डर की वजह से किसी से साझा नहीं कर पायी और अन्दर ही अन्दर घुटने से उसने अपने लिए भी एक बीमारी खड़ी कर ली थी। कितना अजीब लग रहा था अब मुझे कि एक मासूम-सी बच्ची, जिसकी कोई ग़लती नहीं थी और वो इन बेकार की लड़का होने जैसी सोच की वजह से आहत की जा रही थी।
लोगों की दकियानूसी सोच किसी को कितना आहत करेगी, कई बार लोग अपने स्वार्थों के बीच सोच ही नहीं पाते और इस परिवार ने तो तीन अजन्मे बच्चों के साथ तो अन्याय किया, साथ ही इस लड़की को गहरे अवसाद में डुबो दिया। कितना जानवरों जैसा व्यवहार है यह कि इंसान अपने स्वार्थों के पीछे किसी को आहत करते में ज़रा भी संकोच नहीं करता। इस समय मुझे इस बच्ची पर इतना प्यार आ रहा था कि इसके सभी दर्दों को कहीं स्वयं में समेट लूँ।
खैर सभी कुछ सँभालने के लिए मुझे बहुत तरीके से और समझदारी से काम करना था। नहीं तो हो सकता था कि किसी भी दिन यह लड़की कोई ग़लत निर्णय ले ले। सबसे पहले सुनीता के पति को अपने विश्वास में लेना था ताकि सुनीता मेरे पास बराबर आती रहे और मेरे यहाँ से ही उसकी सब जाँचें हो ताकि उसके घर वाले कोई ग़लत निर्णय न ले सके।

यह काम मेरे लिए भी बहुत मुश्किल था क्योंकि किसी को भी सिर्फ हमारे यहाँ से ही वो सभी जाँचें करवाए ऐसा विश्वास दिला पाना बहुत टेडी खीर थी। जबकि मेरी मंशा सिर्फ सुनीता के भावों को सँभालने की ही नहीं थी बल्कि मैं हर क़ीमत पर चाहती थी कि यह बच्चा हो जाये ताकि सुनीता इस अवसाद से निकल सके।
"सुनीता, क्या तुम बताओगी तुमको यहाँ आने के लिए किसने सलाह दी?" मेरे प्रश्न पूछने के पीछे मक़सद यह था कि कोई तो होगा इसको बोलने वाला कि इस डॉक्टर के पास जाओ, वो आपको सही जाँचें करके देंगे या सलाह देंगे।
"आंटी! मेरी सहेली के दोनों बच्चों के समय की सभी जाँचें पूरी प्रेगनेंसी के समय आपके यहाँ ही हुई हैं। उसी ने मुझे बोला कि तेरी सभी परेशानियों का हल वहाँ हो जायेगा।" सुनीता ने मुझे जवाब दिया।
थोड़ी ही देर में सुनीता का पति उसको लेने आ गया, चूँकि अभी तक उसकी सोनोग्राफी नहीं हुई थी सो उसके पति को भी इंतज़ार करना था। अब तक सुनीता सामान्य हो चुकी थी और उसके पति को ऐसा कुछ भी नहीं बताना था, जिसकी वजह से सुनीता को यहाँ आने से उसका परिवार रोकता। मैंने और डॉक्टर गुप्ता ने यह निर्णय लिया कि किसी तरह इसको यहीं वापस आने के लिए बोला जाये।
सुनीता का जैसे ही नंबर आया, हमने उसके पति को भी अन्दर बुला भेजा। उसको बच्चे के अच्छे होने की सूचना दी और चूँकि मरीज़ की हिस्ट्री ली जाती है, उस हिस्ट्री को ही माध्यम बना किशोर को समझाया कि चूँकि पहले तीन बार बच्चा गिर गया है अबकि बार सुनीता का विशेष ध्यान रखना होगा। अगर अबकि बार कुछ ऐसा हुआ तो सुनीता की जान को बहुत ख़तरा है। उसको खाने-पीने के सभी सुझाव देकर वापस चार-पाँच दिन बाद आने के लिए यह कहकर बुलाया कि सुनीता को अन्दर डर बैठा हुआ है कि बच्चे को कुछ हो न जाये। इसको अन्दर से मजबूत करने की ज़रूरत है ताकि माँ और बच्चा दोनों ही स्वस्थ रहे इसलिए इसको समझाइश की ज़रूरत पड़ेगी और किशोर जी आपको ही सुनीता को बराबर हमारे पास लेकर आना होगा। जितना सुनीता मन से मजबूत होगी, बच्चा उतना ही स्वस्थ होगा। शायद मेरी बात किशोर को समझ आ गई थी और उसने अपनी सहमति दी।

अब किशोर शायद सुनीता के मरने की बात सुनकर चुपचाप हाँ में हाँ मिलाता रहा। शायद अभी वो कुछ भी पूछने या कहने की स्थिति में नहीं था। बच्चे का जैसे-जैसे विकास हुआ, सुनीता अपने आप में चिकित्सकीय समझाइश के साथ मजबूत होती गई।
कुछ महीने गुज़रने पर जब एक दिन किशोर उसके साथ आया और मुझे लगा शायद वो मुझे कुछ पूछना चाहता है। मैंने उसको अकेले ही अन्दर बुलाया। तब उसने मुझसे पूछा, "मैम यह तो आपने बताया कि बच्चा बहुत अच्छे-से बढ़ रहा है, क्या आप बताएँगी कि हमारे बेटा है या बेटी।" तब मैंने उसको भी बहुत अपनेपन के साथ समझाया।
"किशोर बेटा! एक बात पूछूँ तुमसे, सच-सच बताना तुमको अगर ज़रा-सा भी प्यार है सुनीता से तो बेटा उसको इस बच्चे के साथ जीने दो। बहुत मुश्किल से उबरी है वो, उसको वो खुशियाँ दो जो उसको चाहिए। अगर उसको कुछ हो गया तो उसके जाने के बाद क्या गारन्टी है कि तुमको बाद में भी किसी और स्त्री से  बेटा ही होगा। सब ईश्वर पर छोड़ो बेटा। तुम्हारी माँ भी स्त्री है, जिसको तुम बेहद प्यार करते हो। अब जो भी हो, सुनीता की जान की ख़ातिर उसको जी लेने दो।" शायद मेरा उसको बेटा कहकर समझाना निरुत्तर कर गया और शायद कहीं वो सुनीता की मौत को लेकर परेशान भी हो गया था। क्योंकि सुनीता उसके माँ-बाप का बहुत दिल से ख़याल रखती थी।

"जी मैम! बोलकर वो चला गया। और नौ महीने बाद सुनीता ने एक स्वस्थ बेटी को जन्म दिया। जिसने सुनीता के सारे बुरे स्वप्नों के आने-जाने पर रोक लगा दी और बच्चे का आगमन उसकी उपस्थिति सबकी मानसिकताओं में तब्दीली लेकर आयी।

इस मरीज़ा के जाने के बाद मैं सोचने पर मजबूर हो गयी कि बेटा-बेटी जैसी मानसिकता का सामाजिक स्तर पर सुधार होना सबसे पहले ज़रूरी है। जब तक लोगों की मानसिकता नहीं बदलेगी, समाज में परिवर्तन मुश्किल है। इसलिए किसी को भी दोष देने से पहले इसकी शुरुआत अपने परिवार से होनी चाहिए।


- प्रगति गुप्ता