सितम्बर 2020
अंक - 63 | कुल अंक - 63
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

जयतु संस्कृतम्
विहगी
 
विहगेन समं डयते विहगी, 
तरुत: तरुमेति द्रुतं विहगी। 
मधुरं किल गायति सा विहगी, 
सहसैव विभेति जनाद् विहगी।।१ 
 
मृदु चिर्-चिर्-नाद-निनादकरी, 
मुरलीरवत: प्रियगानकरी। 
विपिने नगरे क्वचनापि खगी, 
मनुजांश्च चमत्कुरुसे विहगी।।२ 
 
गगने तव तड्डयनं  रमणम्, 
नवनीरदसंहतिभि: चलनम्। 
तृणपल्लवनिर्मितनीडगृहम्, 
विहगी रमणीयतरं सकलम्।।३ 
 
न च रक्षसि तान् जलपूर्णघटान्, 
सरिताजलमापिबसीह भृशम्। 
नियतं नहि भोजनसंग्रहणम्, 
तव जीवनमस्ति विचित्रतमम्।।४ 
 
उदरं भरितुं  यतनं कुरुसे, 
लतिकाकलिकानिचये भ्रमसि। 
तरुपत्रफलानि च भक्षयसे, 
रवितापकरान् सुतरां सहसे।।५
 
विहगी स्वशिशुध्वनिना हसति,
महता प्रणयेन प्रियं वदति। 
निजपक्षद्वयेन शिशून् ह्यवति, 
शिशुपोषणमत्र सुशिक्षयति।।६
 
तरुकुञ्जगता मृदु कूजति सा, 
सिकतोपरि क्रीडति कूर्दति सा। 
विहगी सलिलेSपि निमज्जति सा, 
विहगेन समं खलु खेलति सा।।७
 
शिशुमानसमोदकरी विहगी, 
निरता निजकर्मणि सा विहगी। 
अलसास्ति न सा निपुणा विहगी, 
विवशास्ति न सा स्ववशा विहगी।।८ 
 
दिवसे क्व नु यास्यसि हे विहगि! 
कथमत्र न नृत्यसि रे विहगि!? 
घनवृष्टिमये समये विहगी, 
वद हे परिरोदिसि किं विहगी?।।९
 
नहि याहि वनेषु सखी विहगी, 
इह तिष्ठ मया सह खेल खगी। 
चणकं प्रददामि च ते विहगी, 
अहमस्मि तवैव सखा विहगी।।१०

- युवराज भट्टराई