नवम्बर-दिसम्बर 2015 (संयुक्तांक)
अंक - 9 | कुल अंक - 60
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

ग़ज़ल
ग़ज़ल
 
बदन ख़ुशबू में लिपटा है मगर आँखों में पानी है
ये किसकी याद में खोयी हुई सी रात रानी है
 
हया से पत्तियां भीगी हुई शाख़ों से हैं लिपटी
सुबह की ताज़गी ने रात की लिक्खी कहानी है
 
हमें चुभ जाने वाले ख़ार कलियों को नहीं छूते
सजे संवरे हुए गुलशन पे किसकी हुक्मरानी है
 
तेरी सोहबत में दिन मेरा खिला है गुलमुहर जैसा
तेरी यादों में डूबी रात मेरी ज़ाफ़रानी है
 
दिया होकर भी अब मैं आँधियों से जीत जाता हूँ
दुआ माँ की है या फिर कोई ताकत आसमानी है
 
फ़कीरों को नहीं होता है ग़म कुछ खोने-पाने का
वो रहते एक सा उनकी अमीरी ख़ानदानी है
 
किनारा तोड़कर नदियाँ उफनती हैं जवानी में
मगर सागर बताता है कि उनमें कितना पानी है
 
धनक कहते हो तुम जिसको, वो कुदरत का है एक तोहफा
धरा को आसमां ने प्रेम की भेजी निशानी है
 
मुहब्बत एक ख़ुशबू है रहेगी रहती दुनिया तक
यही कान्हा है राधा है यही मीरा दीवानी है
 
मैं ख़ुद को आज़माने के लिए ही घर से निकला हूँ
मुझे मालूम है बाहर हवा बेहद तूफ़ानी है
 
तेरे हाथों के जैसा स्वाद सालन में नहीं रहता
वही है आग, पानी माँ वही चौका चुहानी है
 
मुहब्बत पाटती है दो जहां की दूरियाँ 'अभिनव'
करम इस पर ख़ुदा का है ये एक जज़्बा रूहानी है
 
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ग़ज़ल
 
साज़िशें नश्वर हुआ करतीं बताता आ गया
चीरकर कुहरे को सूरज मुस्कराता आ गया
 
द्वार पर मंदिर के एक काली सफ़ारी क्या रुकी
सारे भिक्षुक ख़ुश हुए जैसे विधाता आ गया
 
आपके भाषण की सारी पोल पट्टी खुल गयी
एक बच्चा बीच में जो खिलखिलाता आ गया
 
घर में कानो-कान फैली बेटी होने की खबर
और एक सैलाब जैसे दनदनाता आ गया
 
आपका घर चीन की झालर से रोशन ख़ूब है
हम कुम्हारों के घरों में दुःख से नाता आ गया
 
इन समातों में अचानक आ गया भूचाल क्यों
क्या कोई दुष्यंत की ग़ज़लें सुनाता आ गया
 
मोह की लंका तुम्हारी लाह सी जलने लगी
सत्य का हनुमान फिर सबकुछ जलाता आ गया
 
मेरी एक आवाज़ पर सच झूठ कुछ पूछे बग़ैर
कर्ण कोई आज फिर रिश्ता निभाता आ गया
 
बंद पलकों से निकल सपने थिरकने से लगे
कौन रातों को यमन कल्याण गाता आ गया
 
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ग़ज़ल
 
सच को अपनाने का जब ऐलान किया
सबने मुझ पर बाणों का संधान किया
 
जागो रण में नींदें भारी पड़ती हैं
अभिमन्यू ने प्राणों का बलिदान किया
 
आंसू की दो बूँदें टपकी पन्नों पर
मैंने अपने किस्से का उन्वान किया
 
सोने की अपनी अपनी लंकाएं गढ़
हमने ख़ुद में रावण को मेहमान किया
 
देश निकाला देकर सारे पेड़ों को
हमने अपने शहरों को वीरान किया
 
भूख, ग़रीबी, महंगाई दो दिन के हैं
कुबड़े काने राजा ने फरमान किया
 
दूषित होकर भी गंगा गंगा ही है
बेशक हमने अपना ही नुक्सान किया
 
वृद्धाश्रम में नाम लिखाकर भूल गए
हमने अपनों का ऐसा सम्मान किया
 
बाहर बाहर उन्नतशील लबादे हैं
भीतर भीतर मूल्यों को शमशान किया

- अभिनव अरुण

रचनाकार परिचय
अभिनव अरुण

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ग़ज़ल-गाँव (1)