जून-जुलाई 2020 (संयुक्तांक)
अंक - 61 | कुल अंक - 61
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

आधी आबादी: पूरा इतिहास

इस अंक से यह स्थाई स्तंभ प्रारंभ किया जा रहा है, जिसमें साहित्य में सृजनरत स्त्रियों का योगदान चित्रित किया जाएगा। अगर आप भी कुछ कहना चाहते है तो स्तम्भ लेखक से संपर्क करें।



अपने साहित्यिक योगदान के लिए शांति अग्रवाल सदैव स्मरणीय रहेंगी
- डॉ. शुभा श्रीवास्तव

(जन्म शताब्दी वर्ष पर विशेष)




23 जुलाई, 1920 को जन्मी शांति अग्रवाल का हिंदी साहित्य में विशिष्ट स्थान है। मात्र 11 वर्ष से शांति जी ने अपना लेखन कार्य प्रारंभ किया था। इनकी महत्वपूर्ण रचनाएँ निम्नलिखित हैं- बाल वीणा, मेरा देश महान, अगड़म-बगड़म, दुल्हन आई गोल-मटोल, जान आफत में, अधूरी छतरी, राष्ट्र के गीत और नाद, राधा माधव, स्नेहिल बंधन, भीगी पलकें, जय घोष, अनुगुंजन आदि।
शांति जी के उत्कृष्ट योगदान के लिए उन्हें भारतीय साहित्य सम्मेलन प्रयाग से विशिष्ट सम्मान, उत्तर प्रदेश के प्रतिनिधि कवयित्री सम्मान, श्रीमती शकुंतला सिरोठिया बाल साहित्य पुरस्कार, साहित्य महारथी, काव्यश्री, सारस्वत सम्मान आदि पुरस्कारों से नवाजा गया है।


शांति जी का सृजन काल बहुत लम्बा रहा, जो छायावाद से होते हुए नई कविता तक आता है। परंतु इस बीच जितने भी वाद चले, चाहे वह प्रगतिवाद रहा हो, प्रयोगवाद रहा हो या कोई अन्य वाद, इन सबसे शांति जी ने अपने को अलग रखा था। शांति जी की रचनाओं के केंद्र में मूल रूप से तीन बिंदु दिखाई देते हैं। पहला है- देश प्रेम, दूसरा है- प्रेम एवं प्रकृति तथा तीसरा है- बाल साहित्य।
उस समय देश की जनता आजादी के लिए व्याकुल थी। ऐसे समय में शांति जी वीरता और ओजपूर्ण गान करती दिखाई देती हैं। इनके गीत तत्कालीन समय में काफी प्रसिद्ध रहे हैं। इसीलिए वे मंच पर भी दिखाई देती थीं। आकाशवाणी और दूरदर्शन से इनकी रचनाएँ समय-समय पर प्रकाशित होती रही हैं और यह तब था, जब स्त्री शिक्षा और स्वतंत्रता की कल्पना भी संभव नहीं की जा सकती थी। उस समय देश गुलामी के बोझ तले दबा था, तब शांति जी ने अपनी कविता के माध्यम से सिंहनाद किया। वे कहती हैं-

सिंहनाद सुन हुई प्रक्रंपित चोटी-चोटी गिरी की
फड़की निज जन शौर्य देखकर बोटी-बोटी गिरी की


शांति जी द्वारा लिखा गया यह गीत गाते हुए कितने वीर शहीद हो गये। वे कहती हैं-

निज-निज अगणित आयुध लेकर गरज उठे मस्ताने
चले निराशा में आशा के मानो दीप जलाने


शांति जी के इन गीतों में देशभक्ति की भावना कूट-कूट कर भरी दिखाई देती है। उनकी वीर रस की कविताएँ सुभद्रा कुमारी चौहान का स्मरण कराती हैं।
यहाँ यह भी कहना आवश्यक है कि राष्ट्र प्रेम को व्यक्ति सिर्फ कविताओं के माध्यम से ही नहीं व्यक्त कर सकता है बल्कि इसके अन्य तरीके भी हो सकते हैं। शांति जी ने अपनी देशभक्ति को कई अर्थों में प्रामाणित किया है। अपनी प्राथमिक रचनाओं के साथ ही इन्होंने गद्य में भी अनेक देश भक्तिपरक रचनाएँ की हैं।


सन् 1975 ई. में इन्होंने फाँसी के फंदे नामक गद्य की रचना की, जिसमें भारत की स्वतंत्रता के लिए बलिदान हुए क्रांतिकारियों की संपूर्ण जीवन गाथा उपलब्ध है। यह पुस्तक मात्र सूचनात्मक नहीं है बल्कि भावनात्मक स्तर पर उन क्रांतिकारियों के संघर्षपूर्ण जीवन को रेखांकित करती है, जिनकी बदौलत आज हम आजादी से साँस लेने को स्वतंत्र हैं।
इसी तरह से आज़ादी की कहानी नामक गद्यात्मक पुस्तक में शांति जी ने भारत की स्वाधीनता का पूरा इतिहास वर्णित किया है। यह इतिहास अपने आप में इसलिए भी अनूठा है क्योंकि शांति जी ने स्वयं परतंत्रता से लेकर के स्वतंत्रता तक के भारत को अपनी आँखों से देखा है। इसलिए भारत की स्वाधीनता का जो इतिहास वर्णित है, वह विश्वसनीय तथ्यपरक और उत्कृष्ट कहा जा सकता है।


स्त्री की महत्ता को रेखांकित करते हुए इनकी मुख्य कृति पाँच नारी रत्न बाल जीवनी की श्रेष्ठ पुस्तक कही जा सकती है। इसमें इन्होंने कन्नगी, माता जीजाबाई, अहिल्याबाई होलकर, रानी लक्ष्मीबाई तथा रानी गिडिंलू जिलियांग का वर्णन किया है। इस पुस्तक परिचय में उन्होंने बड़े सरल शब्दों में बताया है कि इन पाँच नारी रत्नों की जीवन गाथा साहित्य की अमूल्य निधि के रूप में पाठकों के बीच सदैव विद्यमान रहेगी। शांति जी की भाषा और भाव का गद्यात्मक उदाहरण हमें इस पुस्तक में देखने को मिलता है। वे कहती हैं कि-
"स्वतंत्रता के इस महायज्ञ में भारत की नारियों ने सक्रिय सहयोग किया। उन्होंने ब्रिटिश शासन की लाठियाँ खायीं, गोलियाँ झेली और जेल गयीं। अपना जीवन ही स्वतंत्रता संग्राम को भेंट चढ़ा दिया। आज भी वे नारियाँ मील के पत्थर के रूप में इतिहास में प्रतिष्ठित हैं। पूर्वोत्तर भारत में स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेने वाली प्रभावशाली नारी स्वतंत्रता सेनानी थीं- रानी गिडिंलू जिलियांग। उनका नाम आज भी बड़े गर्व से लिया जाता है।"


भारत के राष्ट्रपति: राजेंद्र बाबू से कलाम तक पुस्तक में शांति जी ने आत्मीय शैली में जीवनी लिखी है, जिसमें संस्मरण का अंश भी शामिल है। जीवनी और संस्मरण विधा की मिश्रित युगलबंदी पुस्तक का वैशिष्ट्य है। इसमें तथ्यात्मक विवरण ही नहीं है बल्कि व्यक्तित्व की खूबियों और संघर्ष की उपलब्धियों का भी समावेश है।
इसके अतिरिक्त स्वतंत्रता संग्राम, गौरव गाथा जैसी रचनाओं से शांति जी ने स्वतंत्रता संग्राम में अपना योगदान दिया है।

हिंदी के बाल साहित्य के लिए शांति जी का नाम स्वर्ण अक्षरों में लिखा जाने योग्य है। इनकी बाल साहित्य की रचनाएँ ऐसी हैं, जो विभिन्न विद्यालयों के पाठ्यक्रमों में शामिल हैं। आई एक खबर चित्रात्मक काव्य में कहानी का सुंदर उदाहरण है। यह कहानी अपने आप में काव्य कहानी और चित्र का गुण एक साथ समाहित किए हुए है।


इनकी बाल रचनाओं में यह प्रयास देखने को मिलता है कि बच्चे इस प्रकार की जीवन दृष्टि पाएँ कि वे कुंठित न हों। इनकी रचनाओं में एक सीख रहती है। ये रचनाएँ ऐसी हैं कि बच्चा स्वयं सृजनशील बने और नकारात्मकता को अपने से दूर रखे। बाल मनोविज्ञान की सूक्ष्म पकड़ हम शांति जी की रचनाओं में देखते हैं। मनोरंजन के साथ ही कथा में अंतर्निहित सद्विचार बड़ी आसानी से शांति जी पाठक के मन में उत्पन्न कर देती हैं। भाषा की स्पष्टता इसका सर्व प्रधान गुण है। इन्होंने नए प्रतीकों और बिंबों का भी प्रयोग किया है। परंतु जो भी प्रतीक या बिंब है, वह सरल व सहज है। कहीं से भी वह क्लिष्ट नहीं है। इनकी बाल रचना का एक उदाहरण इस गीत में देखा जा सकता है-

कद्दू जी की चली बारात
हुई बताशों की बरसात
बैंगन की गाड़ी के ऊपर
बैठे कद्दू राजा
शलजम और प्याज ने मिलकर
खूब बजाया बाजा
बने बराती नाच रहे थे
आलू मटर टमाटर
कद्दू जी हँसते-मुस्कुराते
लौकी दुल्हन लाए
कटहल और करेले जी ने
चाट पकोड़े खाए
प्रातः चली यह बात
सपना देखा था यह रात


उपर्युक्त उदाहरण शांति जी की परिपक्व भाषा एवं भाव का प्रमाण है। इसीलिए बाल साहित्य में यह श्रेष्ठ रचनाकार के रूप में उभरती हैं। इसका प्रमुख कारण इनकी सहज सरल भाषा और भावाभिव्यक्ति है। पर इसका यह अर्थ बिल्कुल नहीं है कि शांति जी ने सिर्फ बाल साहित्य और देश भक्ति परक रचनाएँ की हैं। एक कुशल रचनाकार की तरह इन्होंने अन्य भाव बोध का भी सृजन किया है। हृदय की प्रेम अवस्था और उसकी सुकुमारता शांति जी की शब्दों में देखी जा सकती है-

मधुर मिलन यह विधु रजनी का देख चकोरी है जल जाती
सब कहते नभ नव दंपति पर मुक्ता कोष लुटा देता है
मैं कहती यह क्षुब्ध चकोरी के दृग में धारा ढलती है
जग कहता दीपक जलता पर मैं कहती बाती जलती है


शांति जी की प्रेम परक रचनाएँ इसी प्रकार की कोमलता से भरी पड़ी हैं। प्रेम चित्रण में इनकी भाषा और मधुर हो जाती है। इस मधुर भाषा में उपमा जैसे अलंकारों को हम देख सकते हैं। शांति जी की भाषा संस्कृत निष्ठ हिंदी रही है।
शांति जी की भाषा में बिम्ब, अलंकार आदि अनायास ही प्रयुक्त हुए हैं, जो बड़े सहज लगते हैं। इनकी प्रेमपरक और प्रकृति चित्रण की रचनाओं में हमें छायावाद की सुकुमारता का स्पष्ट प्रभाव दिखता है। परंतु किसी वाद से इन्होंने अपने को नहीं बांधा है।


अपने उत्कृष्ट योगदान के बावजूद शांति जी को हिंदी साहित्य के इतिहास में कोई स्थान प्राप्त नहीं हुआ है। जबकि हम देखते हैं कि इनका सृजन काल बहुत लंबे समय तक चला है और श्रेष्ठ रहा है। इनके उत्कृष्ट योगदान को किसी भी हिंदी साहित्य के इतिहासकार ने रेखांकित करना तो दूर इनका नाम उल्लेख तक करना ज़रूरी नहीं समझा। जबकि हम देखते हैं कि इनकी रचनाएँ कई अर्थों में महत्वपूर्ण है। अपने साहित्यिक योगदान के लिए शांति अग्रवाल सदैव स्मरणीय रहेंगी। इस जन्म शताब्दि वर्ष में उन्हें याद करके ही हम श्रद्धा सुमन अर्पित कर सकते हैं।


 


- डॉ. शुभा श्रीवास्तव

रचनाकार परिचय
डॉ. शुभा श्रीवास्तव

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