जून-जुलाई 2020 (संयुक्तांक)
अंक - 61 | कुल अंक - 61
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

विमर्श

‘सरस्वती’ के समतुल्य थी ‘कल्पना’: एक अध्ययन
- डॉ. निकिता जैन


‘कल्पना’ का दृष्टिकोण हिंदी पत्रकारिता के इतिहास में ‘कल्पना’ का नाम अविस्मरणीय है। भारतेंदु युग के पश्चात हिंदी साहित्य के विकास में जिस भूमिका का निर्वाह ‘सरस्वती’ ने किया था, स्वतंत्रता के पश्चात वैसी ही भूमिका ‘कल्पना’ की रही। कल्पना ने केवल हिंदी विधाओं के विकास में ही नहीं बल्कि हिंदी भाषा को प्रतिष्ठित करने में भी महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। कल्पना पत्रिका का आरम्भ 15 अगस्त, 19491 से हुआ। लगभग तीस वर्षों तक यह पत्रिका अपनी सूझबूझ और स्पष्ट दृष्टिकोण के आधार पर हिंदी साहित्य को समृद्ध करती रही। संपादक ने प्रथम अंक में ही कल्पना के साहित्यिक उद्देश्य को स्पष्ट करते हुए कहा था कि- "कल्पना हिंदी पत्रिकाओं की संख्या में वृद्धि अथवा ग्राहकों का मनोरंजन करके धनोपार्जन करने के उद्देश्य से नहीं निकाली गयी है। इसके प्रकाशक तथा सभी संपादकों का ध्येय हिंदी के स्तर को ऊँचा करना है। हिंदी भाषियों की संख्या के आधार पर संसार की भाषाओं में हिंदी का स्थान दूसरा या तीसरा है, किन्तु साहित्यिक विकास की दृष्टि से हिंदी को संसार की प्रमुख भाषा में स्थान देना ही कठिन है, यहाँ तक कि एक-दो भारतीय भाषाएँ भी हिंदी से कुछ ऊपर ही हैं।......’कल्पना’ के संपादक इस लक्ष्य तक पहुँचने के लिए, हिंदी को उसके महत्त्व के अनुरूप विकसित तथा उन्नत बनाने के लिए भरसक प्रयत्न करेंगे, भले ही अन्य प्रकार की हानियाँ हों।”2

स्पष्ट है कि ‘कल्पना’ पत्रिका का उद्देश्य केवल हिंदी भाषा और साहित्य को प्रगति के पथ पर अग्रसर करना था। हिंदी साहित्य में उस समय जिन विधाओं की उपेक्षा हो रही थी, उन सभी विधाओं के विकास में इस पत्रिका का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। नाटक, एकांकी, व्यंग्य, निबंध इत्यादि विधाओं पर कल्पना में समय-समय पर वैचारिक लेख और रचनाएँ प्रकाशित होती रहती थीं। हालांकि कल्पना के संपादक मंडल के लिए यह कार्य आसान नहीं था, कल्पना के पहले अंक में सम्पादक इस समस्या की ओर संकेत करते हुए कहते हैं कि "लगभग पचास कवियों और विद्वानों से इस अंक में लेख भेजने की प्रार्थना की गयी थी, इनमें से केवल चार-पाँच ने लेख भेजने की कृपा की और दस-ग्यारह ने उत्तरमात्र देने की। शेष ने दोबारा प्रार्थना करने पर भी मौनोपेक्षा ही प्रकट की। इसीलिए जून में प्रकाशित किये जाने वाला यह अंक अगस्त में प्रकाशित हो सका।"3

इन सब कठिनाइयों के बावजूद ‘कल्पना’ ने अपने प्रथम अंक में ही कविता, कहानी, नाटक, निबन्ध, गीत, पुस्तक-परिचय एवं अनुदित कृतियों आदि को स्थान दिया और यह स्पष्ट कर दिया कि भले ही कितनी ही मुश्किलों का सामना करना पड़े लेकिन वे हिंदी साहित्य की उपेक्षित विधाओं को भी साहित्य की मुख्यधारा में वो ही स्थान दिलाएगी, जो उस समय कहानी और कविता को प्राप्त था। हिंदी निबंध, जो अन्य विधाओं के मुकाबले गौण है और जिस पर लिखते हुए साहित्यकार भी कतराते हैं, कल्पना ने इस विधा को विकसित करने के लिए भी कई प्रयास किये। कल्पना के लगभग सभी अंकों में अलग–अलग विषयों पर एक से अधिक निबंध मौजूद रहते थे। अपने प्रवेशांक में ही वासुदेवशरण अग्रवाल द्वारा ‘भारतीय ललित कला की परम्पराएँ’ एवं हजारी प्रसाद द्विवेदी द्वारा ‘आज भी काव्य की आवश्यकता है’4 आदि महत्त्वपूर्ण निबंधों को शामिल कर पत्रिका ने यह प्रामाणित कर दिया था कि वह अपने साहित्यिक उद्देश्य के प्रति पूरी तरह से सजग है।

कल्पना विशुद्ध रूप से साहित्यिक पत्रिका है, यह घोषणा पत्रिका ने अपने प्रथम सम्पादकीय में ही कर दी थी। संपादक मंडल ने प्रथम अंक में ही यह स्पष्ट कर दिया था कि किसी भी तरह की समसामयिक सामाजिक या राजनीतिक रचनाओं, लेखों, मुद्दों को कल्पना में प्रकाशित नहीं किया जाएगा। " सामयिक रचनाएँ एवं लेख कल्पना में नहीं छपेंगे और न ही वह देश या विदेश की राजनीति से किसी प्रकार का सम्बन्ध रखेगी।"5 यहाँ एक विचारणीय प्रश्न यह है कि कोई पत्रिका अपनी देश या समाज की स्थितियों से अनजान रहकर साहित्य को किस प्रकार समृद्ध कर सकती है! कहने का अभिप्राय यह है कि जिस साहित्य को हम समाज का दर्पण मानते हैं, उसी साहित्य का विकास बिना समाज के कैसे हो सकता है? सामयिक रचनाओं पर चर्चा न करके या उन्हें न छापकर कैसे वर्तमान साहित्य का मूल्यांकन किया जाएगा? और क्या कल्पना वाकई में इस नियम का पालन कर पायी? इसका जवाब है ‘नहीं’। सन् 1969 के पश्चात देश में होने वाली राजनीतिक उथल-पुथल की अनुगूँज कल्पना की कविताओं में साफ़ तौर पर परिलक्षित होती है। समय-समय पर साहित्य और समाज के अंतर्संबंध पर भी कल्पना में लेख और सम्पादकीय प्रकाशित होते रहे हैं। हाँ! यह अवश्य है कि ‘कल्पना’ ने आरम्भ के कुछ वर्षों तक अपने सम्पादकीयों में किसी राजनीतिक मुद्दे को नहीं उठाया और न ही उन पर चर्चा की क्योंकि कल्पना के सम्पादकीय मंडल का यह कहना था कि "हमारी नीति प्रारंभ से ही यही रही है कि केवल भाषा, साहित्य, संस्कृति और कला की समस्याओं पर प्रकाश डाला जाए। सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक प्रश्नों पर सम्पादकीय लिखना हमें अभीष्ट नहीं, न किसी नेता अथवा प्रतिष्ठित व्यक्ति के भाषण की प्रशंसात्मक या निन्दात्मक आलोचना करना।.....इस प्रकार के चटपटे सम्पादकीय अपेक्षाकृत सरलता से लिखे जा सकते हैं।”6

पत्रिका का यह रुख सन् 1956 तक निरंतर बना रहा लेकिन इसके पश्चात कल्पना में अप्रत्यक्ष रूप से सामाजिक मुद्दों को स्थान दिया जाने लगा। सन् 1956 के पश्चात कल्पना में प्रकाशित सम्पादकीय स्तम्भ का स्वरुप पूरी तरह से बदल दिया गया। 'सम्पादकीय' की जगह अब 'यह अंक' ने ले ली, जिसमें पत्रिका के वर्तमान या आगामी अंकों में छपने वाली सामग्री के बारे में सूचना होती थी। आगे चलकर 'यह अंक' को समाप्त करके 'सूचना और टिप्पणियाँ' नामक नया स्तम्भ शुरू किया गया। प्रस्तुत स्तम्भ में देश-विदेश में घटने वाली सामयिक घटनाओं की सूचना दी जाने लगी। इनमें साहित्यिक एवं सामाजिक सूचनाओं के अलावा राजनैतिक सूचनाओं को भी शामिल किया गया। उदाहरण के लिए– "1968 देश में सरकारों के बनने-बिगड़ने-टूटने का वर्ष था। बंगाल में पहली बार कांग्रेस पार्टी मिली-जुली सरकार में शरीक हुई मगर यह सरकार कांग्रेस की शिरकत के 36 दिन के अन्दर ही फ़रवरी 18 को टूट गयी और राष्ट्रपति शासन हो गया।"7 कल्पना के इस बदले हुए स्वरूप से स्पष्ट है कि अब संपादक मंडल को शायद यह समझ आ चुका था कि कोई भी पत्रिका अपने समाज से कटकर साहित्य का विकास नहीं कर सकती और राजनीति एवं समाज एक ही सिक्के के दो पहलू ही हैं, जिन्हें अलग करना नामुमकिन है।

कल्पना में सन् 1949 से लेकर 1955 तक जितने भी सम्पादकीय प्रकाशित हुए, वे सभी केवल साहित्यिक दृष्टि से ही नहीं बल्कि भाषिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं। स्वतंत्रता से पूर्व ‘सरस्वती’ ने जिस प्रकार खड़ी बोली को स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी थी वो ही कार्य आज़ादी के बाद ‘कल्पना’ पत्रिका ने अपने सम्पादकीय स्तम्भों द्वारा किया। ‘कल्पना’ के प्रधान सम्पादक आर्येन्द्र शर्मा मूलत: हिंदी भाषा के विद्वान् थे। उनकी पुस्तक ‘बेसिक ग्रामर ऑफ हिन्दी’ भारत सरकार ने प्रकाशित की जिसे आज भी हिन्दी का मानक व्याकरण माना जाता है।8 यही कारण था कि पत्रिका में समय-समय पर हिंदी व्याकरण सम्बन्धी कई सम्पादकीय लेखों को प्रकाशित कर हिंदी भाषा को एक नया आयाम देने की कोशिश की गयी। जनवरी 1953 के सम्पादकीय में सम्पादक ने हिंदी भाषा के प्रति अपनी और देश के प्रति हिंदी की जिम्मेदारियों का उल्लेख करते हुए कहा कि “हिंदी के राज्यभाषा स्वीकृत होने जाने के कारण हिंदी पत्रकारों पर एक विशेष दायित्व आ पड़ा है। राज्यभाषा प्राय: राष्ट्रभाषा होती है और हिंदी को तो राष्ट्रभाषा होने का पहले से ही गौरव प्राप्त है | इस कारण हिंदी को जहाँ देशव्यापी क्षेत्र मिला है, वहां देश की चिन्तन शैली और ज्ञानराशि को प्रकाश में लाने का दायित्वपूर्ण कार्य उसे करना है |”9. कल्पना के सम्पादक हिंदी भाषा के प्रति इतने संवेदनशील थे कि वह किसी भी तरह से हिंदी का मान कम नहीं होने देना चाहते थे | यही कारण था  कि आगे चलकर उन्होंने अपने सम्पादकीयों में राष्ट्रभाषा से जुड़ी हुई समस्याओं का भी ज़िक्र किया ताकि हिंदी भाषा की प्रगति में किसी प्रकार की व्यवधान न पड़े | भाषा सम्बन्धी सम्पादकीय लेखों के अलावा कल्पना ने ‘हिंदी पत्रकारिता10., साहित्य और प्रचार11. , समाज और साहित्य12. आदि विषयों पर भी बहुमूल्य विचार प्रस्तुत किये ताकि हिंदी को राष्ट्रीय स्तर पर नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त हो सके |

जनवरी 1953 के अंक में प्रकाशित सम्पादकीय “हिंदी पत्रकारिता” पर आधारित था | प्रस्तुत लेख में सम्पादक ने तत्कालीन हिंदी पत्रकारिता की व्यवसायगत समस्याओं को विवेचित करते हुए उसके समाधान हेतु कुछ सुझाव प्रस्तुत किये | तत्कालीन हिंदी पत्रकारिता का स्वरुप आज जैसा नहीं था | उस समय न तो पत्रकारिता के प्रशिक्षण हेतु शैक्षणिक संस्थान थे और न ही कोई पाठ्यक्रम जो पत्रकारों को उनके दायित्व और कर्त्तव्यों से परिचित करा सकें | उस समय अधिकतर पत्रकार बिना किसी प्रशिक्षण के ही पत्रकारिता जैसा जिम्मेदारी वाला कार्य कर रहे थे | ‘कल्पना’ के सम्पादकीय में इस बात पर चिंता ज़ाहिर की गयी है कि पत्रकारिता जैसे गौरवपूर्ण और जोखिम भरे कार्य का भार साधारण एवं अनुपयुक्त व्यक्तियों को सौंपना, पत्रकारिता के भविष्य को खतरे में डालना है | इसके अतिरिक्त हिंदी पत्रकारिता में लेखक और कवियों को पत्रिकाओं का सम्पादक बनाने वाली परम्परा पर भी कटाक्ष करते हुए सम्पादक लिखते हैं – “ पत्रकारिता से सम्बंधित विभिन्न कार्य करने वाले व्यक्तियों के लिए प्रशिक्षण का कोई प्रबंध भारत में नहीं है और न आज इसके लिए किसी प्रकार की विशेष योग्यता की आवश्यकता मानी जाती है | अंग्रेजी से हिंदी में संतोषजनक अनुवाद कर लेने वाला, ज्यों-ज्यों करके कुछ लिख लेने वाला और पत्र संचालक का कृपा-भाजन हो सकने वाला व्यक्ति दैनिक और साप्ताहिक पत्रों के संपादकत्व के लिए उपयुक्त माना जाता है ! मासिक पत्रिकाओं के सम्पादकीय पद के लिए किसी प्रसिद्ध कवि या लेखक का नाम पर्याप्त समझा जाता है | ......अगर संपादक पहले संपादक के लिए अपेक्षित योग्यता से विभूषित हो और यदि वह कवि अथवा लेखक भी है, तब सोने में सुगंध है | संपादक, लेखक, स्तम्भ तथा संवाददाता यदि अपने कार्य में दक्ष, अपने कार्य क्षेत्र से पूर्ण परिचित और एक-दूसरे की आवश्यकताओं से अवगत हों, तो सफल पत्रकारिता का एक बहुत बड़ा अभाव पूरा हो जाए |”13.  प्रस्तुत सम्पादकीय आज से लगभग 60 वर्ष पहले लिखा गया था तब हिंदी पत्रकारिता उतनी विकसित नहीं हुई थी जितनी कि आज | सम्पादकीय में दिए गए कुछ सुझाव सही हैं जैसे कि इस क्षेत्र में आने वाले व्यक्तियों को प्रशिक्षण की आवश्यकता है और प्रशिक्षण हेतु कुछ कार्यक्रम आरम्भ किये जाएँ लेकिन पत्र-पत्रिकाओं के संपादकों के लिए प्रशिक्षण से भी अधिक मायने रखता है उनका विवेक | विवेकहीन व्यक्ति प्रशिक्षण तो प्राप्त कर सकता है लेकिन उसका प्रशिक्षण तब तक किसी काम का नहीं जब तक वह उसका उपयोग सही जगह सही तरीके से न करे | यह बात पूर्णत: सत्य है कि हिंदी पत्र-पत्रिकाओं के सम्पादकीय पद के लिए किसी प्रसिद्ध कवि या लेखक का नाम उपयुक्त समझा जाता था लेकिन इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि तत्कालीन समय में कई लेखक, कवि एवं आलोचक ऐसे रहे हैं जिन्होंने किसी प्रशिक्षण को प्राप्त किये बिना  ‘हिंदी पत्रकारिता’ को नए आयाम प्रदान किये | आज़ादी से पहले ‘हिंदी पत्रकारिता’ की नींव रखने वाले जुगल किशोर, भारतेंदु हरिश्चंद्र, महावीर प्रसाद द्विवेदी, प्रेमचंद ने भी कोई प्रशिक्षण प्राप्त नहीं किया था लेकिन आज भी जब हिंदी पत्रकारिता की बात उठती है तो इन सब का नाम सबसे पहले जुबां पर आता है | और स्वंत्रता के बाद भी धर्मवीर भारती, गोपाल राय, नामवर सिंह, अज्ञेय के नामों को कौन भूल सकता है जिन्होंने हिंदी पत्रकारिता के प्रतिमान को नया स्वरुप प्रदान किया | यहाँ बात किसी व्यक्ति के लेखक, कवि, आलोचक या साधारण होने की नहीं बल्कि यह है कि व्यक्ति का पत्रकारिता के प्रति नजरिया क्या है? कोई प्रशिक्षण प्राप्त व्यक्ति अगर इस महत्त्वपूर्ण कार्य को केवल जीविकोपार्जन की दृष्टि से ही देखता है तो निश्चित रूप से वह कभी-भी पत्रकारिता जैसे क्षेत्र को समृद्ध नहीं कर पायेगा | जैसा कि वर्तमान में हो रहा है अधिकतर पत्रकार, संवाददाताओं, संपादकों को यह मालूम ही नहीं कि ‘पत्रकारिता’ का सही अर्थ क्या है? हिंदी पत्रकारिता ने उन्नति तो काफी की है लेकिन सफल वो आज भी नहीं है क्योंकि अधिकतर प्रशिक्षण प्राप्त व्यक्तियों ने इसे केवल व्यवसाय बना लिया है  और इस व्यवसाय की आड़ में वह ‘पत्रकार’ का मुखौटा पहनकर दोयम दर्जे की पत्रकारिता को बढ़ावा दे रहे हैं | ‘कल्पना’ के सम्पादकीय में ऐसे ही मुद्दों को बारी-बारी से उठाया गया है ताकि पत्रकारिता के भविष्य को और बेहतर बनाया जा सके |

सम्पादकीय लेखों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि कल्पना पत्रिका अपने आप में एक सम्पूर्णता लिए हुए है | साहित्यिक दृष्टि से देखा जाए तो बात चाहे भाषा की हो या व्याकरण की, समाज की हो या साहित्य की, कविता की हो या कहानी की - सभी विषयों को समेटकर उन पर सिलसिलेवार ढंग से बहस करना, एक नया दृष्टिकोण प्रस्तुत करना-कल्पना को अन्य पत्रिकाओं से अलग करके एक नया आयाम प्रदान करता है| सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों से दूर रहने वाली कल्पना ने आगे चलकर अपने सम्पादकीयों में अप्रत्यक्ष रूप से आपातकाल के बारे में भी लिखा, चुनावों की भी चर्चा की, अन्य सामाजिक मुद्दों को भी उठाया | ये बात और है कि 1970 से लेकर 1977 तक कल्पना में सम्पादकीय अनियमित रूप से प्रकाशित होने लगे थे और आधे से ज्यादा सम्पादकीयों में अगले अंक की सूचना भर होती थी | लेकिन इन सबके बावजूद ‘कल्पना’ ने अपने सम्पादकीय स्तम्भ से ‘हिंदी पत्रकारिता’ को नया मोड़ दिया और यह साबित कर दिया कि सम्पादकीय स्तम्भ केवल राजनीतिक मुद्दों पर बहस करने के लिए ही नहीं होते हैं उनका उपयोग सही दिशा में किया जाए तो पत्रिका और साहित्य दोनों को ही लाभ हो सकता है |

कल्पना में प्रकाशित स्तंभों का साहित्यिक महत्त्वइसमें कोई दो राय नहीं है कि कल्पना हर लिहाज़ से एक विशुद्ध साहित्यिक पत्रिका थी जिसने हिंदी साहित्य के प्रचार-प्रसार के साथ-साथ उसके परिष्कार पर भी ध्यान दिया ताकि हिंदी का आने वाला कल आज की तुलना में अधिक उज्ज्वल बन सके| वैसे तो कल्पना पत्रिका प्रत्येक दृष्टि से अपने आप में एक प्रकार की सम्पूर्णता लिए हुई थी लेकिन इसमें प्रकाशित कुछ स्तम्भ ऐसे थे जिन्होंने आगे चलकर न केवल हिंदी पाठकों की वाह-वाही बटोरी बल्कि हिंदी की साहित्यिक प्रवृत्तियों को मूल्यांकित एवं स्थापित करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया | ऐसे ही स्तंभों में से एक स्तम्भ था ‘साहित्य-धारा’| ‘साहित्य –धारा’ नामक स्तम्भ में कल्पना के साथ-साथ अन्य प्रकाशित पत्रिकाओं में छपी रचनाओं पर टिप्पणियाँ होती थीं | शुरूआती वर्षों के अंकों में यह स्तम्भ विभिन्न लेखकों द्वारा लिखा जाता था लेकिन सन् 1954 से यह स्तम्भ कथाकार मार्कंडेय ‘चक्रधर’ नाम से लिखने लगे | मार्कंडेय जी ने इस स्तम्भ के अंतर्गत जितनी भी टिप्पणियाँ की है उनमें तत्कालीन साहित्यिक इतिहास दृष्टिगोचर होता है | इस स्तम्भ की सबसे ख़ास बात यह है कि यह टिप्पणियां एक लेखक या एक साहित्यकार की कलम से नहीं बल्कि एक पाठक के नज़रिए से की गयी हैं| इसका सबसे बड़ा प्रमाण यही है कि मार्कंडेय जी ने अपनी पहचान छुपाकर एक छद्म नाम से इस स्तम्भ को लिखा ताकि एक निष्पक्ष मूल्यांकन साहित्य-प्रेमियों के समक्ष रखा जा सके | मार्कंडेय द्वारा विवेचित इन टिप्पणियों के केंद्र में मुख्य रूप से कहानी और कविता हैं | तत्कालीन नयी कहानी एवं नयी कविता की प्रवृतियों को मार्कंडेय की इन टिप्पणियों द्वारा अच्छी तरह समझा एवं मूल्यांकित किया जा सकता है | नयी कविता की तत्कालीन स्थिति को व्याख्यायित करते हुए वे लिखते हैं कि –“पिछले कई वर्षों से हिंदी की नयी कविता वाद-विवाद का विषय बनी हुई है | पूर्व नियोजित कसौटियां इस फुटकल, विविध काव्य-प्रयोगों को कसते-कसते घिस-घिसा कर, किनारे भी लग चुकी है | काव्य में केवल प्रयोग एवं शब्द श्रृंगार की उपयोगिता मानने वाले अथवा छिछले नारों के शब्द-समूह में अभिव्यक्ति-शून्य काव्य की रचना करने वाले, दोनों आज एक सामंजस्य की ओर संकेत करने लगे हैं|”14.  नयी कविता लिखने का दंभ भरने वाले कवियों के खोखले विचारों और शब्दों की जादूगरी से मार्कन्डेय खासे खफा थे | मार्कंडेय ने अपनी टिप्पणियों में सीधे तौर पर नए कवियों की चिंतन प्रक्रिया पर सवाल उठाये| उनके अनुसार नया कवि हमारे नए समाज की समस्याओं को छूने से डरता है, जैसे वह उसका दूधमुंहा बच्चा हो और बेकायदे चलने से उस पर डांट पड़ सकती हो | यह आधारभूत कमी है और शायद इसीलिए हमारे आगे इतना भटकाव है |15.  मार्कंडेय ने नए कवियों की रचनाओं में सामाजिक अन्तर्दृष्टि का अभाव देखा | उनका मानना था कि जब तक कवि समाज के प्रति अपने नज़रिए में नयापन नहीं लाएगा, उसका विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण विकसित नहीं होगा तब तक नयी कविता व्यक्तित्वहीन ही रहेगी |

मार्कंडेय अथवा चक्रधर की साहित्य धारा में केवल नए कवियों एवं कहानीकारों की ही नहीं बल्कि पत्र-पत्रिकाओं के सम्पादकीयों की आलोचना भी जमकर हुई है | वह समय-समय पर सम्पादकीयों के उद्देश्य, स्वरुप और प्रासंगिकता पर अपने विचार प्रस्तुत करते थे ताकि पत्रिकाओं के संपादक अपने दायित्व का निर्वाह सही ढंग से कर सकें | सम्पादकीय की विशेषता बताते हुए चक्रधर लिखते हैं कि –“सम्पादकीय का रूप व गुण, दोनों प्रकृति के अनुकूल होने चाहिए | जहाँ तक गंभीर  साहित्यिक पत्रों का प्रश्न है, उन्हें अपने सम्पादकीय स्तम्भों में साहित्य और संस्कृति से सम्बंधित समसामयिक समस्याओं को लेना चाहिए | इन समस्याओं पर उनके विचार चाहे जैसे भी हों इनसे हमें मतलब नहीं है | हमारा आग्रह इस बात का है कि पत्र की व्यक्तिगत रूचि और दृष्टिकोण का एक सधा हुआ माप वहां रहे | .....ताकि पाठक कह उठे कि ‘हाँ, इसी विषय पर तो मैं इस पत्र के विचार जानना चाहता था’ |”16.  मार्कंडेय ने केवल अन्य पत्रिकाओं के सम्पादकीयों पर ही नहीं बल्कि ‘कल्पना’ में प्रकाशित होने सम्पादकीय नीति को भी आड़े हाथों लिया | एक उदाहरण इस प्रकार है  – “सम्पादकीय कोई साहित्यिक लेख नहीं है ( जैसा आप कल्पना में पढ़ते हैं ) |  सम्पादकीय को किसी पत्र की ओर से एक विचारोत्तेजक निर्णीत मत होना चाहिए | मुख्य सम्पादकीय के साथ दो-एक आवश्यक टिप्पणियां भी होनी चाहिए, जो सामयिक छोटी समस्याओं की पूर्ति करती चले |”17. ज़ाहिर है कि चक्रधर की इसी स्पष्टवादिता ने ‘साहित्य-धारा’ के स्तम्भ को इतना चर्चित बना दिया था | सबसे अधिक आश्चर्य की बात तो यह थी कि चक्रधर एक निष्पक्ष पाठक की तरह केवल दूसरे लेखकों द्वारा रचित रचनाओं की ही आलोचना नहीं करते थे बल्कि स्वयं की रचनाओं को भी उसी पैनी नज़र से मूल्यांकित करते थे – “कल्पना में प्रकाशित मार्कंडेय की ‘अगली कहानी’ कहानी से ज्यादा निबंध के करीब पड़ती है | शुरू से लेकर अंत तक एक गहरी अनास्था और खीझ व्याप्त है | कहीं-कहीं तो लगता है, जैसे लेखक स्वयं पर विश्वास नहीं रखता |”18.  चक्रधर के इस निष्पक्ष रवैये ने न केवल ‘साहित्य-धारा’ स्तम्भ की ओर हिंदी प्रेमियों का ध्यान आकर्षित किया बल्कि हिंदी आलोचना के लिए भी नए मानदंडों को स्थापित किया | एक लेखक तब तक एक गंभीर आलोचक नहीं बन सकता जब तक कि उसके पास स्वयं के गुणों एवं अवगुणों को परखने की दृष्टि न हो |  मार्कंडेय के पास यह दृष्टि थी इसलिए वह एक कहानीकार के साथ-साथ एक अच्छे आलोचक भी सिद्ध हुए |      

कुल मिलाकर देखा जाए तो एक तरफ जहाँ चक्रधर की साहित्य-धारा ने साहित्यिक प्रवृत्तियों और उससे जुड़ी समस्याओं को निष्पक्षता के साथ व्याख्यायित करने की नयी दृष्टि प्रदान की वहीं दूसरी ओर कल्पना ने हिंदी पत्र-पत्रिकाओं को पत्रकारिता के सही दायित्व से रूबरू कराया कि कैसे एक साहित्यिक पत्रिका केवल रचनाओं को प्रकाशित करने तक सीमित नहीं होती बल्कि उस पर एक ऐसी दृष्टि निर्मित करने का भी भार होता है जो साहित्य और समाज के प्रति अपने नज़रिए को संतुलित रख सके |

चक्रधर की साहित्य-धारा की ही तर्ज पर कल्पना में सन् 1961 से ‘और अंत में’ नामक स्तम्भ प्रकाशित होना शुरू हुआ जिसके लेखक हरिशंकर परसाई थे | इस स्तम्भ में साहित्य-धारा की तरह अन्य पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित रचनाकारों और उनकी कृतियों की समीक्षा तो नहीं की जाती थी लेकिन साहित्य से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों पर परसाई जी अपनी ही शैली में विचार प्रस्तुत करते थे | इस स्तम्भ की सबसे बड़ी खासियत थी परसाई जी का अंदाज़-ए-बयाँ | परसाई जी अपनी व्यंग्य शैली द्वारा गंभीर साहित्यिक समस्याओं और गतिविधियों का चित्रण इस प्रकार करते थे कि वे पढ़ने में बोझिल भी नहीं लगते थे और पाठक बड़ी सरलता के साथ इन लेखों में चित्रित उनके मंतव्य के साथ तारतम्य स्थापित कर लेते थे | परसाई जी ने अपने इस स्तम्भ में हिंदी की तत्कालीन वास्तविक स्थिति को चित्रित करने की बार-बार कोशिश की है | वह कभी हिंदी कवियों की मरती हुई संवेदनाओं को कटघरे में खड़ा करते हैं तो कभी हिंदी के गिरते हुए स्तर के लिए हिंदी में होने वाले दोयम दर्जे के शोध पर निशाना साधते हैं | परसाई जी ने अपने स्तम्भ में न केवल हिंदी से जुड़ी समस्याओं को उद्घाटित करने की कोशिश की है बल्कि उन्होंने उन सभी साहित्यकारों और लेखकों पर भी निशाना साधा है जो हिंदी साहित्य को झूठी और खोखली आधुनिकता का जामा पहनाकर अपना लक्ष्य साधना चाहते हैं | दरअसल अब लेखक नयी साहित्यिक प्रवृत्तियों की आड़ में ऐसी परम्पराएं और आन्दोलन विकसित कर रहा था जो उसके अपने कम्फर्ट ज़ोन के दायरे में हैं अर्थात जिस तरह के लेखन में वो माहिर है वो ही लेखन साहित्य में नए आन्दोलन या नयी प्रवृत्ति के रूप में स्थापित हो गए  | परसाई जी ने जनवरी 1962 के अंक में अपने स्तम्भ में ऐसे रचनाकारों पर तीखा व्यंग्य किया है जिन्होंने पुरानी परम्पराओं की या तो तिलांजलि दे दी है या फिर अपनी सुविधानुसार उसका बंटवारा कर लिया है और अपने-अपने खेमे बनाकर बैठ गए हैं, अगर एक दूसरे के खेमे में घुसे तो क्या हाल होगा इसका उदाहरण देते हुए वह लिखते हैं – “एक दिन प्रेमचंद की परम्परा पर बहस करते-करते सो गया | सपने में गोबर आ पहुंचा, होरी का लड़का | अब तो बूढ़ा हो गया है | कहने लगा, ‘मेरी परम्परा कहाँ है ? मेरा लड़का कहाँ है ? मैंने कहा, ‘भई मैं नहीं जानता | ......मैं कुछ नहीं जानता | मैं गाँवों की तरफ नहीं जाता | शहर में रहता हूँ | प्रेमचंद की बात अलग थी | अब उनकी परम्परा का बंटवारा हो गया है | अगर गाँव की तरफ आऊंगा , तो मार्कन्डेय मुझे गिरफ्तार करवा देगा और इधर मोहन राकेश शहर बदल करवा देगा | कहीं का न रहूँगा | किसी कसबे में, शरण लेना चाहूँगा, तो कमलेश्वर मोटर स्टैंड के गुंडे पीछे लगा देगा और सड़क के भागे को सत्तावन में से किसी गली में शरण नहीं मिलेगी |”19.  इस एक उदाहरण में परसाई जी ने साहित्य की पूरी तस्वीर समेट कर रख दी | गाँव और शहर की तरह साहित्य के लेखक भी बंट गए हैं सब का अपना एक अलग खेमा है अगर कोई भी अपने खेमे से बाहर किसी दूसरे के खेमे में जाने की कोशिश करेगा तो उसका साहित्य से वनवास पक्का है | यह प्रेमचंद का ज़माना नहीं है जिसमें कभी-भी आप होरी की तरह शहर छोड़कर गाँव और गाँव छोड़कर शहर चले आओ | आपको अपना एक साहित्यिक खेमा ( जैसे कोई भी कहानी आन्दोलन या कविता आन्दोलन या कोई साहित्यिक वाद ) चुनना ही होगा और नहीं चुनते तो आपकी साहित्य में कोई जगह नहीं |

परसाई जी ने हिंदी लेखकों की बदलती हुई प्रवृत्ति के साथ-साथ उनकी बौद्धिकता पर भी प्रश्नचिह्न लगाए हैं | उनके अनुसार वर्तमान में हिंदी के बुद्धिजीवी लेखक जिस नयी बौद्धिकता को अपना रहे हैं वह दरअसल पश्चिम के बुद्धिजीवियों की केवल नक़ल मात्र है, इससे ज्यादा कुछ नहीं | आज का लेखक पश्चिम की साहित्यिक प्रवृत्तियों से प्रभावित होकर जिस आधुनिकता का अनुसरण कर रहा है असल में वो अभी तक आधुनिकता के अर्थ को ही ग्रहण नहीं कर पाया है | आधुनिकता की अंधी गली में आज का लेखक इस प्रकार फंस गया है कि वह अनुकरण और अंधे-अनुकरण के बीच के अंतर को ही भूला बैठा है | परसाई जी ऐसे बुद्धिजीवियों की आधुनिकता का उदाहरण प्रेमचंद के गोदान के पात्र डॉ. मेहता के द्वारा देते हैं जो होरी के बाद उनके सपने में आते हैं और उनसे अपने मानस-पुत्र के बारे में पूछते हैं, जिसका निर्माण डॉ. मेहता ने अपने अनुरूप किया था | परसाई जी डॉ. मेहता के प्रश्न का जवाब देते हुए कहते हैं – “ ‘हाँ, मेहता साहब, उसे मैं जानता हूँ | वह बड़ा उदास रहता है |....मैंने उससे एक दिन पूछा कि भाई, उदास क्यों रहते हो | उसने कहा कि मैं बुद्धिजीवी हूँ, इसलिए उदास हूँ | मेहता साहब, मैं उसकी  बात नहीं समझा | और प्रश्न किये तो ......कहने लगा कि प्रसन्न रहना गँवारी है ; उदास रहना बौद्धिकता का लक्षण है |’ ”20.  परसाई जी यहाँ उस उदासी की बात कर रहे हैं जो लेखकों की रचनाओं में कवियों की कविता में हर जगह व्याप्त है | लेकिन यह उदासी अनायास ही नहीं चली आई बल्कि आज का लेखक इस उदासी को अपनी कृतियों का हिस्सा बनाने के लिए मजबूर है क्योंकि उसे आधुनिक कहलाना है और आधुनिकता की सबसे बड़ी पहचान शायद सुख में भी दुःख की परछाईं को ढूँढना, या अच्छाई में बुराई को देखना है | परसाई जी डॉ. मेहता को आधुनिकता का पर्याय समझाते हुए आगे लिखते हैं – “ ‘मेहता साहब, वह कहता है कि काम करना और खुश रहना पुरानापन है | काम नहीं करना और उदास रहना आधुनिकता है | आपका मानस-पुत्र जब शहर में उदासी की सुविधा नहीं पाता, तब पहाड़ों पर उदास रहने के लिए चला जाता है | वह कहता था कि उसके पास पश्चिम से बुद्धिमानों की चिट्ठी आई है कि इधर हम सब उदास हो गए हैं ; तुम भी उदास हो जाना | बस, तभी से वह उदास रहने लगा है | उसे आधुनिकता ग्रहण करना है न !’ ”21.  यहाँ परसाई जी सीधे-सीधे उन लेखकों की विचारधारा पर सवाल उठा रहे हैं जो पश्चिम की आधुनिकता से प्रभावित होकर उसे हिंदी साहित्य पर ज़बरदस्ती लादने पर तुले हैं या लाद रहे हैं | ज़ाहिर है कि आधुनिकता का सम्बन्ध एक विचार से है जब तक साहित्य और समाज के परिप्रेक्ष्य में उस विचार को समझा जाएगा या ग्रहण नहीं किया जाएगा तब तक एक फैशन की तरह हम बस आधुनिक होने का ढोंग ही करते रहेंगे जैसे अधिकतर हिंदी के विद्वान् आज कर रहे हैं |  परसाई जी ने समय-समय पर हिंदी के लेखकों और कवियों के इस ढोंग को बेपरदा किया है | उनका मानना था कि अगर वास्तविकता में हिंदी का लेखक या कवि आधुनिक होने के मायनों को समझता है और पश्चिमी सभ्यता से प्रभावित है तो फिर वह क्यों पश्चिमी विद्वानों के जैसे व्यवस्था से सीधे-सीधे लड़ नहीं पाता ? क्यों एक साहित्यकार होने के नाते उसे आज भी अपना पद और गरिमा प्यारी है ? भारतीय बुद्धिजीवियों और हिंदी कवियों की मानिसकता पर निशाना साधते हुए परसाई जी मेक्सिको के तत्कालीन राजदूत ओक्टोवियो पाज़ का एक उदाहरण देते हुए लिखते हैं – “ओक्टोवियो पाज़ के इस्तीफे ने भारतीय बुद्धिजीवी को परेशान किया हुआ है | छात्रों का खून पुलिस ने बहाया तो उसने कविता लिखी और इस्तीफा दे दिया | उसकी सरकार उससे परेशान हो गयी थी | इसका मतलब है, सरकार कवि से डरती है |.... पता नहीं सरकार सिर्फ कवि से डरी या कवि - राजदूत से |”22.  परसाई जी न केवल पाज़ के ज़रिये हिंदी के सरकारी साहित्यकारों की स्वार्थी एवं एकांगी सोच पर चुटकी लेते हैं बल्कि वे हिंदी के उन साहित्यकारों की विचारधारा का भी मखौल उड़ाते नज़र आते हैं जिनको ‘विद्रोह’ का वास्तविक अर्थ नहीं पता लेकिन दंभ भरते हैं विद्रोही रचनाकार होने का –“ मैंने एक प्रमुख विद्रोही अकवि को पाज़ की कविता बतायी | उसने कहा, यह जमी नहीं | इसमें प्लाज़ा में खून बहने की बात ज़ोरदार ढंग से नहीं कही गयी | मैंने पूछा, इसे कैसे कहना था ? उसने कहा, कहना था प्लाज़ा में मेरे देश का मासिक धर्म बह रहा है | मैं सचमुच इस उक्ति से प्रभावित हुआ | पर मैंने कहा, यार देश तो पुल्लिंग होता है | उसने मुझे डांट दिया, तो विद्रोही काव्य के माने और क्या होते हैं ?”23.  विद्रोही काव्य के मायने कुछ भी हों लेकिन विद्रोही होने का वास्तविक अर्थ एक साहित्यकार के लिए यही है कि सही समय पर और सही तरीके से अपना विद्रोह शासन की अनियमितताओं के खिलाफ दर्ज करे न कि ‘विद्रोह’ शब्द के साथ खिलवाड़ करके उसके मायनों को ही बदल दे जैसे कि वर्तमान में कुछ साहित्यकार कर रहे हैं |

उपर्युक्त विवेचन के आधार पर यह कहा जा सकता है कि कल्पना में प्रकाशित साहित्यिक सामग्री  हर दृष्टि से हिंदी साहित्य के लिए उपयोगी है | पत्रिका के स्तंभों में तत्कालीन बदलते हिंदी साहित्य का वह इतिहास छिपा है जिस पर अलग से एक शोध किया जाए तो कई नई स्थापनाएं साहित्य को मिल सकती हैं | आज भी अगर गंभीरता के साथ इन स्तंभों का अध्ययन-विश्लेषण किया जाए तो हिंदी साहित्य की आधी समस्याओं का हल मिल सकता है लेकिन दुर्भाग्य की बात यह है कि ‘कल्पना’ के ये चर्चित साहित्यिक स्तम्भ स्वयं भी एक इतिहास बनकर रह गए हैं जिनपर नज़र केवल शोधार्थियों की जाती है अन्य किसी की नहीं |



 


- निकिता जैन

रचनाकार परिचय
निकिता जैन

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