जून-जुलाई 2020 (संयुक्तांक)
अंक - 61 | कुल अंक - 61
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कथा-कुसुम
कहानी: बसेरे से बिछड़ कर
 
रात के सपने से डरी हुई शारदा आज सुबह से ही अपने मोबाइल पर ऋतुराज की बाट जोह रही थी। पर उसके पास अपनी माँ से बात करने की फुर्सत नहीं, क्योंकि नई-नई नौकरी होने के कारण उसने अपने माता-पिता को पहले ही बोल दिया है, ’’आप लोग मुझे बार-बार फोन मत किया करो, समय मिलने पर मैं खुद ही बात कर लिया करूँगा। परदेश में नौकरी करना इतना आसान नहीं! हर समय एक गिद्ध जैसी नज़र पीछे लगी रहती है। थोड़ी सी भी गलती हुई, बस, पूरे देश को बेपानी होना पड़ता है। इनकी नज़र में ’वसुधैवकुटुम्बकम्’ केवल बाहरी दिखावा है। अंदर से तो इन्हें सभी गैरमुल्कवासी अपने परोक्ष शत्रु या जासूस ही लगते हैं।
 
मेरी पिछली नौकरी भी इसी परोक्ष शत्रुता का शिकार हुई। यहाँ शायद ही कोई ऐसी कंपनी होगी जो दो वर्षों से ज्यादा किसी गैरमुल्कवासी वर्कर को काम पर रखती हो! इन लोगों को हमेशा ही यह डर सताता रहता है, कि कहीं कोई विदेशी वर्कर इनकी कंपनी पर एकाधिकार न जमा बैठे।’’
शारदा अपने बेटे की इन्हीं बातों में गोता खा रही थी कि बाहर दरवाजे से उनके पति मनोहर का आगमन हुआ, "तब से तुम यहीं बैठी हो?.......... मैं टहल कर भी आ गया।
आज घर का काम नहीं करना क्या?’’
शारदा के चेहरे पर उदासी छायी थी। उसका मन किसी उहापोह के कारण छटपटा रहा था। वह हताश भाव से बोली, "आज काम तुम निपटा लो मेरी तबियत ठीक नहीं है?’’
मनोहर मुस्कुराते हुए बोला, "अच्छा ठीक है। लेकिन ये अचानक तुम्हारी तबियत को क्या हो गया? सुबह तो तुम अच्छी भली जगी थीं? क्या ऋतुराज ने आज फिर अपनी माँ से बात नही की?’’
 
मनोहर ने मानो बुझी राख पर मुक्का मार दिया, शारदा तिलमिलाते हुई बोली, "क्या तुम्हें कोई फर्क नहीं पड़ता? आखिर वो तुम्हारा भी तो बेटा है?
ऐसी नौकरी किस मतलब की!
कि उसे अपने माता-पिता के जीने-मरने की भी सुधि नहीं?
या तो उसे इंडिया बुलालो या फिर उससे कह दो कि हमें भी ले जाए आपने साथ पिट्सबर्गं!
हमें नहीं रहना यहाँ अकेले?’’
मनोहर ने बात पलटते हुए कहा, "तुम ही तो उसे विदेश भेजने के लिए आमादा रहती थीं?
और अब खुद ही उसे इंडिया बुलाने की बात कर रही हो? देखती नहीं, लोगों में कितना रौब है हमारा! आखिर हमारे बेटा-बहू विदेश में नौकरी जो करते हैं!
पूरे आठ सौ डालर कमाता है एक सप्ताह में हमारा ऋतुराज !’’
शारदा को मनोहर की ये शीतल बातें किसी उल्कापिंड की भाँति दाहक लगीं।
वह विदग्ध होकर बोली, "कमाता होगा आठ सौ डालर!
पर अपने बाप के इलाज के लिए तो उस रईस पर एक फूटी कौड़ी भी नहीं!
कितने वर्षों से छाती का दर्द झेल रहे हो, क्या उसे यह पता नहीं?
पर तुम हो कि कान में पत्थर डाले बैठे हो!’’
 
मनोहर बगलें झाँकते हुए शारदा से बोला, "तुम तो बेकार में ही बिफरती हो।
अरे! वहाँ के खर्चे और यहाँ के खर्चे में मोहर-कौड़ी का अंतर है। और फिर मुझे पेंशन मिलती तो है, फिर भी तुम खामखा उस बेचारे को कोसती रहती हो?’’
शारदा एक कुटिलदृष्टि से मनोहर को घूरती हुई रसोईघर में चली गई। मनोहर भी किसी लुटे हुए व्यापारी की तरह करहाते हुए छाती को पकड़े सोफे पर बैठ गया। शायद आज फिर उसकी छाती में दर्द हो रहा था।
"चाय पीनी है क्या?" शारदा ने रसोईघर में चाय बनाते हुए उससे पूछा। लेकिन मनोहर ने कोई जवाब नहीं दिया। शारदा ने इस बार उखड़ते हुए पूछा, "अरे! चाय पीनी है क्या?’’
इस बार मनोहर का स्वर भी गंभीर था, वह करहाते हुए बोला, ’’नहीं..!!’’
तभी दरवाजे पर पड़ोस वाले शर्मा जी की दस्तक होती है। उनका लड़का गली के नुक्कड़ पर परचून की दुकान चलाता था। "अरे शर्मा जी! आइए-आइए। बैठिए....और बताइए कैसे हैं? घर पर सभी कुशल-मंगल तो हैं ?’’ मनोहर ने छाती को पकड़े बीमार स्वर में शर्मा जी से पूछा।
 
आज पौ फटते ही उसे  छाती में हल्का-हल्का दर्द हो रहा था। लेकिन इतने वर्षों में दर्द को दबाने और सहने की क्षमता भी उसने विकसित कर ली थी। वह शर्माजी की तरफ सोफे पर बैठने का इशारा करते हुए दबे स्वर में शारदा से बोला, "अरे, एक कप चाय और बढ़ा लेना, बगल वाले शर्मा जी आए हैं।’’
शर्मा जी खोजी स्वभाव के थे। वे जब भी मनोहर के घर आते थे, तो किसी खोजी कुत्ते की तरह उसके घर के हर सामान को सूँघते। आज फिर आते ही उन्होंने किसी सी.आई.डी. अफसर की भाँति अन्वेषण करते हुए, दीवार पर टँगी एक तस्वीर पर अपनी तिलिस्मी नज़रें टिकाकर एक बनावटी हँसी हँसते हुए मनोहर से पूछा, "मनोहर जी ये तस्वीर आपने पास वाले हाट बाज़ार से खरीदी थी क्या?
ही..ही..ही..बड़ी सुन्दर दिख रही है?"
 
शर्माजी को जानबूझकर मनोहर के घर की अधिकांश विदेशी चीजों को देशी और फूहड़ बताने में मजा आता था। वे मनोहर के स्वाभिमान को चोट पहुँचाते हुए पुनः बोले, "इस बार हमारे लिए भी खरिदवा दीजिएगा, ही..ही..ही..!"
मनोहर सम्मान को पोषित करते हुए तपाक से बोला, "नहीं!..नहीं..! शर्माजी,
यह किसी हाट बाजार से थोड़े ही खरीदी है! बल्कि इसे तो पिछले साल हमारा ऋतुराज पिट्सबर्ग से लाया था।"
शर्माजी मनोहर की बात का खंडन करते हुए बोले, "पता नहीं, मनोहर जी! पर गंगा कसम बिल्कुल ऐसी ही एक तस्वीर मैं हाट बाजार में पिछले दिनों छोड़ कर आया था। वो तो उस दिन मोटरसाइकिल पर पीछे कोई तस्वीर पकड़ने वाला नहीं था, नहीं तो लेकर ही दम लेता!"
मनोहर अपने सम्मान की डूबती नाव को बचाते हुए बोला, "क्यों गाल बजाते हैं शर्माजी?
यह कोई धूल-माटी से बनी तस्वीर तो है नहीं, जो इन फड़ों पर बिकती फिरे! इसे तो पूरे दो सौ डालर में खरीदा है हमारे ऋतुराज ने! कहाँ यहाँ के रद्दड़ हाट बाजार और कहाँ वहाँ के विशाल गगनचुम्बी माॅल! मुझे तो यहाँ की हर चीज में ही एक घूस और बेईमानी नजर आती है। यहाँ जिसे देखो वो अपनी सड़ी-से-सड़ी चीज का भी श्रेष्ठता से गुणगान करता-फिरता है!
 
आप क्या जानें, कितनी विलग है वहाँ की वस्तुएँ? महँगी जरूर हैं, पर टिकाऊँ और अनुपम हैं!
यहाँ की तरह गाजर घास थोड़े हैं! ये जो दीवारों पर आपको पेंट दिख रहा है न,
पिट्सवर्ग का ही है! अगर दस साल भी मकान को न पोतें तो भी क्या मजाल कि उसकी चमक फीकी पड़ जाए!'’ 
शारदा चाय की ट्रे टेबल पर रख कर शर्माजी का अभिवादन करती हुई मनोहर से बोलती है, "ऋतुराज का फोन आया था, पूछ रहा था कि पापा की तबियत कैसी है?’’
यह सुनकर मनोहर का मन शर्माजी के वाकयुद्ध से निकल स्वयं के अंतस युद्ध में घिर गया। अभी कुछ देर पहले जिस मनोहर का मन विदेशियत के गौरव गीत गाकर स्वयं को गौरवान्वित अनुभव कर रहा था, उसे मानो अचानक साँप सूँघ गया। इतने में शर्माजी चुटकी लेते हुए
बोले, "यह बात तो माननी पड़ेगी मनोहर जी, कि आपके विदेशी सामान के आगे हमारे रद्दड़  सामान की कोई औकात नहीं!
लेकिन फिर भी मैं यह बात जोर देकर कहना चाहता हूँ कि हमें अपने सामान की रद्दड़ता कभी अखरती नहीं है! हो सकता है गिलहरी के लिए गूलर ही मेवा हो..ही..ही..ही..!"
 
मनोहर को लगा कि शर्माजी ने उसका सारा वैभव खाक़ में मिला दिया। वह अपनी प्रतिष्ठा का अंतिम तंतु उधड़ने से बचाते हुए बोला, "हाँ आप सही कह रहे हैं शर्मा जी!
अब क्या है कि आपने तो कभी ब्रांडेड चीजें यूज की ही नहीं, जो आप उनका मर्म समझ सकें!
आपके लिए तो पीतल ही सोना है!  और फिर हम जिस अंदाज में जीने की आदत डाल लेते हैं, हमें वही अंदाज तो सर्वश्रेष्ठ लगने लगता है, है कि नहीं..! इसमें आपकी कोई गलती नहीं शर्माजी...!!"
शर्माजी ने इस बार मनोहर पर दोगुनी शक्ति से व्यंग्य-बाण चलाया, "पर सुख तो अपनों के पास रहने से ही मिलता है मनोहर जी! कम-से-कम मेरा बेटा रात को परिवार के साथ बैठकर खाना तो खा लेता है, आपको तो वो भी नसीब नहीं..!!’’
 
इस बार तीर ठीक निशाने पर लगा। मनोहर का पूरा शरीर विध गया। शर्माजी के व्यंग्य-बाण लौट-लौट कर उसके हृदय को भेदने लगे। शारदा से न रहा गया।
वह शर्माजी को आड़े हाथ लेते हुए बोली, "हमें पता है शर्माजी कि आप कितनी चुपड़ी खाते हो? अब मेरा ज्यादा मुँह मत खुलवाओ? बड़े आए परिवार वाले!
आप जब भी आते हो, ऐसी ही ऊल-झुलूल बातों से हमारा मूड़ खराब करके चले जाते हो!
आप तो आग लगाकर चले जाते हो,
पर हमें पूछो, यहाँ बुझाने में महीने भी कम पड़ जाते हैं!
विदेशों तक पहुँचना कोई बच्चों का खेल नहीं है! अनेक अग्नि-परीक्षाओं से गुजरना पड़ता हैं।
आपके बेटे जैसी परचून की दुकान नहीं है ऋतुराज की, जो पूरे दिन वहाँ बैठ कर मक्खियाँ मारे!
वहाँ काम में भी इज्जत है और दाम भी आपके बेटे से हज़ार गुना ज्यादा कमाता है हमारा ऋतुराज।’’
 
शर्मा जी का चेहरा पीला पड़ गया। वे थूक अंदर निगलकर किसी खजैले कुत्ते की तरह रिरियाते हुए बोले, "अरे भाभी जी, आप तो बुरा ही मान गईं!..ही..ही..ही..!
मेरा मतलब आप लोगों को दुःखी करना थोड़े ही था। मैं तो मज़ाक कर रहा था..ही..ही..ही..!
अच्छा ठीक है, तो फिर मैं चलता हूँ, फिर कभी आऊँगा!
नमस्ते..!! ही..ही..ही..!"
शर्माजी किसी निठल्ले की तरह हँसते हुए अपने घर की ओर चले गए। यद्यपि उनके जाने के बाद घर में नीरवता छा गई थी, लेकिन उनकी बातों का भूचाल मनोहर और शारदा के मन में अभी भी बवंडर बनकर घूम रहा था। कुछ देर तक वे दोनों एक-दूसरे की आँखों में लाचार दृष्टि से देखते रहे, फिर बरबस दोनों की आँखों में जल भर आया। अब कौन किसके आँसू पोंछता!
अंततः दोनों एक-दूसरे से नजरें बचाते हुए अलग-अलग कमरों में घुस गए। कमरे भी मन की तरह सूने और वीरान थे। उनकी दीवारों से टकराकर मनोहर और शारदा की लौटती हूक ने उनकी जड़ता को और अधिक निष्ठुर बना दिया था। कमरों के भीतर से उठता उन दोनों का अंतर्नाद किसी दारुण व्यथा की चीत्कार लग रहा था। दोनों अपनी-अपनी हथेलियों में मुँह दिए फफक कर रो रहे थे। अब मरहम कौन लगाता, जब दोनों ही घायल पड़े थे!
 
कुछ देर बाद शारदा को मनोहर के कमरे से कराहने की आवाज सुनाई दी। उसने देखा मनोहर छाती को पकड़े कमरे के एक कोने में ज़मीन पर पड़ा दर्द से कराह रहा है।
"क्या हुआ तुम्हें? छाती में फिर दर्द होने लगा क्या?’’ शारदा घबराते स्वर में मनोहर से बोली। 
मनोहर की आँखें बंद हो रही थीं। दर्द के मारे उसका चेहरा सूखता जा रहा था। वह बार-बार अपनी छाती को पकड़ता और छोड़ता।
फिर एक आर्तध्वनि में निःश्वास छोड़ते हुए शारदा से बोला, "नहीं!..नहीं! वैसे ही थोड़ी सी घबराहट हो रही है। जी मिचल रहा है, थोड़ा पानी ले आओ!'’
शारदा झट से पानी लेने चली गई। मनोहर खुद को सम्हालते हुए विस्तर पर लेट गया।
शारदा अविलंब पानी ले आई और मनोहर को सहारा देकर बिठाते हुए बोली, "लो पानी पी लो। तब तक मैं किसी रिक्शे वाले को बुलाती हूँ। चल कर डाॅक्टर को दिखा लेते हैं।’’
 
गला चटकने के कारण मनोहर बार-बार पानी पिए जा रहा था। फिर अचानक किसी उद्वेग में आकर एक लम्बी श्वाँस छोड़ते हुए वह बोला, "ऋतुराज आॅफिस से आ गया होगा क्या?’’
मनोहर के इस प्रश्न ने शारदा के जख़्म को हरा कर दिया।
वह विफरते हुए उससे बोली, "मुझे क्या पता वह कब आफिस से आता-जाता है?
मरे जा रहे हो!...फिर भी तुमसे उस निर्मोही का मोह नहीं छूटता! तुम्हें डाॅक्टर को दिखाने चलना है कि नही?’’  
मनोहर एक करुण निःश्वास छोड़ते हुए जवाब देता है, "नहीं!’’ 
शारदा मनोहर के इस उपेक्षित व्यवहार पर झल्लाती हुई बोली, "मेरा दिमाग ख़राब मत करो!
मैं अभी रिक्शे वाले को बुलाने जा रही हूँ। हॉस्पीटल जाना बहुत जरूरी है!’’
 
शारदा किसी रिक्शे वाले को बुलाने बाहर चली गई थी। इधर मनोहर अपनी दशा में बेसुध हो रहा था। दोनों के दर्द का पर्वत पिघलकर दरिया बन गया था, जिसमें एक ओर मनोहर की जिंदगी डूबती जा रही थी तो दूसरी ओर शारदा का जीवन किसी मझधार की नाव बन रहा था।
थोड़ी ही देर में शारदा बेहोश मनोहर को रिक्शे में बैठाकर हाॅस्पीटल ले आई।
डाॅक्टर ने इसे इमरजेंसी केस मानते हुए तुरंत एडमिट कर लिया और शारदा को बाहर बैठने का इशारा करते हुए कहा, "आप बाहर बैठ जाइए मैडम, जैसे ही इनकी रिपोर्ट आएगी आपको बुला लिया जाएगा।’’
 
शारदा ने अपने व्याकुल मन को सम्हाला और छाती पर पत्थर रखते हुए बैंच पर बैठ गई। उसका मस्तिष्क शून्य होता जा रहा था और उसकी आँखों के सामने बार-बार मनोहर और ऋतुराज का चेहरा घूमने लगा। उसने बिना कोई देर किए अपने पर्स से मोबाइल निकाल कर देखा, शायद ऋतुराज का कोई फोन या मैसेज आया हो, लेकिन मोबाइल की स्क्रीन बिल्कुल सूनी थी। उससे रहा न गया, उसने तुरंत अपनी ममता के टुकड़ों को समेटा और ऋतुराज को फोन लगा दिया, "हैलो..!! हाँ...ऋतु बेटे कैसे हो?’’
ऋतुराज ने हमेशा की तरह सहजतापूर्वक अपना जवाब दिया, "अच्छा हूँ मम्मी,
आप लोग कैसे हैं?...पापा की तबियत कैसी है?"
ऋतुराज की सहजता देखकर शारदा को लगा कि वह फोन पर ही जोर से रो दे।
पर वह कलेजे को कठोर करते हुए ऋतुराज से बोली, "ऋतु बेटे आखिर तुम लोग इंडिया कब आओगे?’’ ऋतुराज को अपनी माँ का यह सवाल अटपटा लगा। वह हँसते हुए उससे बोला, "माँ अब तो तुम्हारी बहू भी एक टॅाय-मेकिंग कंपनी में जॅाब करने लगी है!
अब ऐसे में हम लोगों का इण्डिया आना, हाल-फिलहाल तो मुश्किल लग रहा है।’’ 
 
शारदा का दिल भर आया, उसकी जुबान किसी बुझती हुई लौ की तरह लड़खड़ाने लगी। उसने अपने आँसुओं को पीते हुए ऋतुराज से कहा, "अच्छा ठीक है बेटा, फोन रखती हूँ। भगवान तुम्हें सुख-संपत्ति दे!’’
ऋतुराज को अपनी माँ का यह व्यवहार बाकी दिनों से अलग लगा। आॅफिस से घर पहुँचने तक उसके दिमाग में यही बात बार-बार घूम रही थी कि आखिर आज उसकी माँ ने उससे ज्यादा बातें क्यों नहीं कीं? और न ही दूसरे दिनों की तरह कोई शिकायत-शिकवा किया।
मालती भी थोड़ी देर पहले ही घर पर आती जा रही थी। बच्चे अपने-अपने टैबलेट पर होमवर्क कर रहे थे। ऋतुराज वाॅस-रूम से निकलते हुए दबे स्वर में मालती से बोला, "चलो क्यों न कुछ दिन इण्डिया घूम आएँ ? बहुत दिन हुए मम्मी-पापा को देखे?’’
 
मालती को इंडिया शब्द सुनते ही मानो साँप काट जाता था, उसने एक कुटिल दृष्टि अपने पति पर दौडा़ई और भिनभिनाते हुए कमरे में चली गई। ऋतुराज ने गुहार लगाते हुए मालती से फिर पूछा, "बोलो न डार्लिंग, चलें क्या इंडिया?’’
मालती स्वदेश के नाम पर चिढ़ती थी, उसकी नज़र में विदेश ही स्वर्ग था। वह मुँह की कड़वाहट उगलते हुए ऋतुराज से बोली, "अगर तुम्हे उस नरक में जाना ही है तो बेशक जाओं, पर मुझे जाहिलों से मिलने का कोई शौक नहीं!
भूल गए! पिछली बार गए थे इंडिया, क्या हुआ?
तुम्हारी नौकरी जाते-जाते बची थी!
और फिर वहाँ जाकर बच्चों का कितना कबाड़ा हो जाता है, ये तुम कभी भी महसूस नहीं कर सकते!"
 
ऋतुराज मालती के पास आकर पुनः द्रवित स्वर में हाथ बाँधे बोला, "पता है, आज मम्मी ने मुझसे ज्यादा बात नहीं की! मुझे लगता है कि घर में कोई परेशानी है, शायद पापा की तबियत ज्यादा ख़राब है?’’
यह सुनकर मालती का विष हलाहल बन गया। वह किसी भुजंग भामिनी की भाँति, फुस्कार मारते हुए बोली, "जब भी तुम्हारे माँ-बाप का फोन आता है, तुम इसी तरह किसी जानवर की तरह घर भागने के लिए बेकाबू होने लगते हो।
अगर तुम्हें घास खाने का इतना ही शौक था, तो फिर यहाँ इंसानों में आकर क्यों दुलत्ती मार रहे हो! वहीं ढोर-गँवारों में बने रहते...?
मैं फिर कहे देती हूँ, अगर तुम्हें अपने भविष्य की कोई चिंता नहीं है, तो बिल्कुल इण्डिया चले जाओ, पर मेरी नौकरी तो अभी नई-नई है, मुझसे साथ चलने की उम्मीद मत करना!’’
 
ऋतुराज का मन खिन्नता के शिखर पर था। रह-रह कर मालती की बातें उसे डश रही थीं। 
वह मुँह लटाकाए बच्चों के पास आकर बैठ गया।
"व्हाट हैपंड डैड्डी’’ संकेत अपने पिता का लटकता हुआ चेहरा देखकर बोला। ऋतुराज को अपने पुत्र के ये शब्द किसी मरहम की तरह लगे। उसने  तुरंत एक वात्सल्य भरी मुस्कान लिए संकेत से कहा, "विल यू गो टू योर ग्रांडपैरेंट्स?’’
संकेत अपनी माँ से प्रभावित था। स्वदेश के प्रति दुत्कार की भावना उसने मालती से ही सीखी थी। वह खीजकर तुरंत बोला, "नो..!नो..!नो..! आई डू नोट गो टू माई ग्रांडपैरेंट्स!"
पुत्र के इस जवाब से ऋतुराज का मन अपनों में ही बेगानों सा अनुभव करने लगा। वह चुपचाप उठ कर कमरे से बाहर निकलकर सड़क पर आ गया। चारों तरफ ऊँची-ऊँची इमारतें चैड़ी-चैड़ी सड़कें, जिन पर दौड़ते असंख्य वाहन हवा को माप रहे थे। हर तरफ एक निष्ठुर कोलाहल मचा हुआ था, मानो प्रकृति ने जड़ होकर पूरी मनुष्यता को मार दिया हो। 
 
ऋतुराज को लगा कि उसके चारो तरफ एक पतझड़ छा रहा है। प्रेम और करुणा का एक-एक पुष्प जमीन पर गिरकर गल रहा है। अचानक उसे खुदके गलने का भान हुआ और वह खुद को कोसते हुए बोला, "हाय! यह क्या कर दिया मैंने! आखिर मैं क्यों वहाँ अकेले मरने के लिए अपने माता-पिता को छोड़कर आ गया!
कितनी अच्छी जिंदगी गुजर रही थी इंडिया में मेरी! सुबह-शाम माता-पिता के आश्रय में पलता था! अपने देश की मिट्टी में खेलता था! लेकिन,
हाय! जब से इन बेगानों में आया हूँ, तिल-तिल कर मेरी जिंदगी की महक इस गुलशन से कब कूच कर गई, मुझे पता ही न चला?’’ 
यकायक ऋतुराज के मानसोद्यान में बचपन की स्मृतियों के गुल खिलने लगे। उसे याद आया
किस तरह उसके माँ-बाप ने अपने शिक्षित और आधुनिक होने का पूर्ण परिचय तब और महानता के साथ साबित किया, जब कुटुम्ब और समाज के अनेक लोगों के गला फाड़ने के बाद भी उन्होंने दूसरा बच्चा पैदा नहीं किया।
"एक ही सर्वस्व है और उसी में सम्पूर्णता देखो!’’के सिद्धांत को ध्यान में रखते हुए मेरे ही खान-पान और शिक्षा-दीक्षा को तरजी़ह दी। पड़ोस वाले शर्मा जी अक्सर पापा से कहते, "अरे! एक बच्चा भी कोई गिनती में होता है?
 
हम दो हैं तो कम-से-कम हमारे भी दो तो होने ही चाहिए! अगर एक गद्दार निकल जाए
तो बूढ़े माँ-बाप कम-से-कम दूसरे का पल्ला पकड़ कर किसी कोने में डले तो रहेंगे?’’ 
पर मम्मी-पापा ने कभी भी इस छुद्रता को गरिमा नहीं दी।
हाय! मेरे बचपन को उन्होंने कैसे सँवारा? खुद को बुझाकर मुझे जगमगाया!
धिक् ! इस तथा-कथित उन्नति पर, जो ऊपर से चमकदार और अंदर से इतनी घिनौनी है!
छिः!! क्या इसीलिए उन्होंने एक बच्चे को जन्म दिया था!
क्या उन्हें पता नहीं था? कि जिस बच्चे को वे इतने लाड़-प्यार से पाल रहे हैं,
जब वह विदेश चला जाएगा तो उसके बिना रहना उनके लिए दुःस्वार हो जाएगा?
क्यों पढ़ाया मुझे इतना कि विदेश में नौकरी करने की मेरी ललक ने एक ही झटके में
मेरे माता-पिता-परिवार और देश को  निगल लिया!
ओह! मम्मी-पापा मैं कैसे रहूँगा यहाँ? क्यों आने दिया तुम लोगो ने मुझे यहाँ काँटो के बीच!’’
 
ऋतुराज को स्वयं का अस्तित्व किसी वृक्ष से टूटे हुए पत्ते की भाँति लगने लगा, जो चाहकर अब कभी भी उससे नहीं जुड़ सकता। 
उसे स्वयं से घृणा होने लगी। जीवन की डोर अविशाप लगने लगी। अमर्ष और आत्मग्लानि में आकर वह खुद को चोटिल करना चाह रहा था कि
आवेग में आकर उसने अपना एक पैर मारे क्रोध के जोर से जमीन पर दे मारा, लेकिन उसे यह भी अपर्याप्त लगा।
अचानक उसका एक हाथ जेब में रखे मोबाइल से टकराता है, वह अविलंब उसे जेब से निकाल कर देखता है, कि शारदा का एक मैसेज आया था, "अब तुम्हें कभी भी इंडिया आने की जरूरत नहीं पड़ेगी, क्योंकि तुम्हारे पापा तुम लोगों का ज्यादा इंतजार न कर सके!’’
ऋतुराज के पैरों तले जमीन खिसक गई। उसका शरीर मानो निष्प्राण हो गया।
किसी तीखी चीत्कार को छोड़ते हुए उसने मोबाइल पूरी ताकत के साथ सड़क पर दे मारा
और खुद को गोली की तरह खुली सड़क पर छोड़ते हुए जोर से चिल्लाया, "पापाऽऽऽ...!!!!’’
और पछाड़ खाकर जमीन पर गिर पड़ा।

- डॉ. यदुनंदन प्रसाद उपाध्याय

रचनाकार परिचय
डॉ. यदुनंदन प्रसाद उपाध्याय

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कथा-कुसुम (1)