जून-जुलाई 2020 (संयुक्तांक)
अंक - 61 | कुल अंक - 61
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कथा-कुसुम

कहानी- विभीषिका

इस बात से बेख़बर कि उनका विडियो शूट किया जा चुका है, मंत्री जी अपने दल-बल के साथ मौर्या कॉम्प्लेक्स के भीतर दाखिल हुये। साथ में आये कुछ छुटभैयों ने मीडिया का समूह देखा तो बाहर ही रुक गये। उनके पास टी.वी. पर आने का मौक़ा था। बैरिकेड के इस पार खड़े होकर वे अपनी तस्वीरें खिंचवाने लगे। इनमें से एक से किसी पत्रकार ने बात करनी चाही तो उसने इस पूरे प्रकरण को राजनैतिक साजिश बताते हुये कहा कि इसमें विपक्षी दल की भूमिका है।

कॉम्प्लेक्स के अन्दर घुसते ही दाहिनी तरफ एक बड़ा सम्मेलन कक्ष था। मंत्री जी और उनके साथ आए लोगों के बैठने का यहीं इंतज़ाम किया गया था। सबके लिये कुर्सियाँ पर्याप्त संख्या में उपलब्ध थीं,जिन्हें सोशल डिस्टेंसिंग को ध्यान में रखते हुये दूर-दूर रखा गया था। मंत्री जी ने कक्ष में आकर मेज़ के अग्रिम छोर पर अपना स्थान ग्रहण किया। पर जैसा कि बैठकों में अक्सर देखा गया है,अन्य लोगों में उनके नज़दीक बैठने के लिये होड़ मच गयी। अधिकारीगण तो एक तरफ अपनी वरिष्ठता के क्रमानुसार बैठ गये,पर दूसरी तरफ सत्ताधारी दल के नेताओं में अभी भी जद्दोजहद छिड़ी हुयी थी। यहाँ मानक वरिष्ठता नहीं,अपितु यह था कि कौन मंत्री जी के कितने करीब है या उनका कितना खास है। लगभग पाँच मिनट की रस्साकशी के बाद जाकर सबको जैसे-तैसे अपनी प्रतिष्ठानुसार जगह मिली।

गृहमंत्री के एक तरफ पुलिस कमिश्नर उदयभान सिंह और दूसरी तरफ एक आदमी था,जो अपने हुलिये से किसी वार्ड का वार्ड काऊंसिलर मालूम पड़ता था। सफ़ेद शर्ट और सफ़ेद पैंट पहने, माथे पर लाल रंग का लम्बा टीका और गले में लटकती सोने की मोटी चेन,जो सौ ग्राम से कम की न होगी। पटना के लगभग सभी वार्ड  काऊंसिलर्स की यही वेषभूषा है।

“सर,फुलवाड़ीशरीफ में मास्क्स की होर्डिंग हो रही थी। वहाँ करीब बीस लाख मास्क पकड़े गये हैं। यहाँ से स्मगल करके विदेश में बेचने का भी प्लान था। कस्टम्स ने इनका सीज़र किया है। करीब पाँच लाख के आस-पास होंगे”। उदयभान सिंह ने मंत्री जी को पूरे मामले की जानकारी दी,जो पुलिस इंस्पेक्टर रवि से उन्हें प्राप्त हुयी थी।
“मास्क्स कहाँ रखे हैं”? मंत्री जी ने पूछा।
पुलिस सुपरिंटेंडेंट पी के लोढ़ा मेज़ के आखिर में बैठे थे।उन्होंने जवाब दिया, “सर शेड में”।
“तो फिर चलो, वहीं चलते हैं”। मंत्री जी कहते हुये उठ खड़े हुये,तो उनके साथ सबको खड़ा होना पड़ा। जिन कुर्सियों के लिये मारामारी की नौबत आ गयी थी, वह अचानक रिक्त हो गयीं।


“आइये सर, इस तरफ से”। पी के लोढ़ा अपनी जगह से उठकर मंत्री जी के पास आये और रास्ता दिखाने के लिये आगे हो लिये।
मंत्री जी के साथ पुलिस कमिश्नर, उनके अगल बगल सुरक्षा कर्मी और अन्य सभी उनके पीछे-पीछे चल दिये। पुलिस इंस्पेक्टर रवि को भी साथ जाना था कि तभी एक सिपाही दौड़कर उसके पास आया।
“सर, कुछ लोग बार-बार अन्दर आने की ज़िद कर रहे हैं। मना करो तो कहते हैं कि सस्पैंड करा देंगे। आप ही चलकर समझाइए”। सिपाही ने आकर अपनी परेशानी व्यक्त की।


रवि ने कॉम्प्लेक्स के अन्दर आते समय बंदोबस्त में खड़े पुलिस वालों को सख्त निर्देश दिया था कि अब किसी और को घुसने ना दिया जाये। पर तस्वीरें खिंचवाने का शौक पूरा करने के बाद जो छुटभैये बाहर रुक गये थे,उनके सिर पर अब भीतर जाकर मास्क्स देखने का भूत सवार था। इन सिरफिरों को समझाना,विशेष कारण था ही नहीं।
फिर उनमें से एक ने सामने आकर कहा। “हमें जाकर देखना है कि अन्दर क्या हो रहा है। पब्लिक तो हमसे पूछती है न, क्या जवाब देंगे उनको”।
रवि को इस व्यक्ति पर, जिसने स्वयं को इन छुटभैयों के समूह का अघोषित सरदार समझ लिया था, बहुत क्रोध आ रहा था। उसका बस चलता तो इस आदमी को अभी दो थप्पड़ रसीद कर देता। पर उसने संयम रखना उचित समझा।


“अन्दर पहले से ही बहुत भीड़ है। तुम सबको भी अन्दर जाने देना खतरे से खाली नहीं। मास्क है तुम्हारे पास। बिना मास्क के अन्दर नहीं जाने दिया जाएगा”। रवि ने पुनः मना करते हुये कहा।
“तुम्हारे पास भी तो नहीं है”। समूह में से एक बोला।
“हाँ नहीं है। ऐसे ही ड्यूटी कर रहे हैं। और सुनो, थोड़ा दूर रहो। हमको छूने से या हमारा डंडा खाने से तुमको कोरोना हो गया तो ना कहना कि पहले क्यों नहीं बताया”। रवि ने बगल में खड़े सिपाही से लाठी लेने के लिये हाथ बढ़ाया ही था कि भीड़ पीछे हटकर तितर-बितर हो गई।


इधर मीडिया भी बहुत देर से पुलिस वालों को परेशान कर रही थी। रवि को इस समस्या का समाधान भी मिल गया था। सोशल डिस्टेंसिंग। उसने सिपाही से फौरन लाउडस्पीकर और माइक मंगाया और घोषणा की।
“कृपया भीड़ न लगायें। एक-दूसरे से दूर-दूर खड़े हों। यदि आप में से कोई एक भी कोविड पॉज़िटिव हुआ,तो यहाँ जितने लोग हैं सबको होने का खतरा है। अपना-अपना नाम, पता और मोबाइल नम्बर एक कागज़ पर लिखकर जमा कर दें। ज़रूरत पड़ी तो आपको क्वारेंटाइन पर भेजा जाएगा”।


युक्ति काम कर गयी। मंत्री जी के आने पर पत्रकारों के मन में कोविड का भय जो कहीं गायब हो गया था, अब पुनः घर कर गया। सबने फौरन पहले की तरह औरों से उपयुक्त दूरी बना ली।
रवि ने सिपाही की तरफ देखा और फिर दोनों हँसने लगे।


- गोपाल मोहन मिश्र

रचनाकार परिचय
गोपाल मोहन मिश्र

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कथा-कुसुम (1)