जून-जुलाई 2020 (संयुक्तांक)
अंक - 61 | कुल अंक - 61
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कथा-कुसुम

कहानी- लिव इन रिलेशनशिप

आहना के कार्यालय का समय नौ बजे का है। इस समय आठ बज रहे हैं, वह अभी तक कार्यालय के लिए निकल नही पायी है। कार्यालय पहुँचने में लगभग पैंतालीस मिनट लगते हैं। वो भी तब, जब ट्रैफिक सामान्य रहे। यदि कहीं जाम की समस्या हुई तो कुछ और समय लग सकता है। वह कार्यालय के लिए कुछ और पहले निकलना चाहती है। किन्तु घर के काम निपटाने में समय का अनुमान नहीं रहता और बहुधा इतना समय हो जाता है। इस समय घर के सभी काम प्राय: समाप्त हो चुके हैं। अब उसे शीघ्र निकलना चाहिए।
"जा रही हूँ ध्रुव! समय हो रहा है। ऑफिस पहुँचकर फोन करती हूँ।" उसने ध्रुव से कहा, जो इस समय बाथरूम में था। बाथरूम से पानी चलने की आवाज़ें आ रही थीं। उसने सोचा कि पानी के शोर में ध्रुव ने कदाचित् ठीक से सुना न हो अत: उसने बाथरूम का दरवाज़ा उँगलियों  से खटखटाते हुए अपनी बात पुन: कही तथा तीव्र गति से लिफ्ट की ओर बढ़ गयी।


"थैक्स गॉड! आज सड़कों पर जाम नहीं था। मैं ठीक समय पर ऑफिस पहुँच गयी। अटेंडेन्स रजिस्टर में आज उसकी लेट नहीं लगेगी।" कार्यालय के कॉरीडोर में पैर रखते ही आहना मन ही मन कह उठी।
अपने केबिन में पहुँचकर आहना काम में लग गयी। न चाहते हुए भी कभी-कभी बायोमैट्रिक अटेन्डेन्स सिस्टम में उसकी लेट लग ही जाती है, जो कि वह कभी नहीं चाहती। आहना करे भी तो क्या करे...? घर के रोज़मर्रा के काम करते-करते इतना समय हो ही जाता है। जबकि आज भी वह प्रतिदिन की भाँति सुबह शीघ्र उठी थी। प्रतिदिन वह सुबह शीघ्र उठने का प्रयत्न करती है, अक्सर तो उठ भी जाती है किन्तु कभी-कभी उठने में कुछ देर हो जाती है। देर से उठने का कारण भी तो है। एक तो ध्रुव देर से आता है। उसके आने के बाद कुछ देर दोनों बातें करते हैं। तत्पश्चात् शाम का भोजन बनाने के लिए दोनों रसोई में चले जाते हैं। रसोई के सारे काम यूँ तो आहना ही करती है किन्तु अकेलेपन से ऊबकर ध्रुव को रसोई में बुला लेती है। ध्रुव का उसके ईर्द-गिर्द रहना उसे अच्छा लगता है। वह ध्रुव से बातें करती रहती है। ध्रुव उसकी बातों में हाँ...हूँ करता रहता है। कभी-कभी प्लेटें-चम्मच उठाने, रखने जैसे हल्के-फुल्के काम भी कर देता है। शाम से लेकर रात तक ये सब करने में काफी समय व्यतीत हो जाता है। सोने में देर होती है तो प्रात: उठने में भी विलम्ब हो जाती है और कार्यालय पहुँचने की ऐसे ही आपाधापी हो जाती है।


आहना को इस शहर में रहते हुए कई बरस हो गये। प्राय: दस-बारह वर्ष। दस या बारह....आहना को ठीक से स्मरण नहीं। स्मरण हो भी कैसे....? इस शहर में शिक्षा पूरी की और शेष समय ध्रुव के साथ ऐसे व्यतीत हुआ कि समय को गिनने का समय ही न मिला। कभी-कभी आहना सोचती है कि यदि ध्रुव साथ न होता तो इतने बड़े शहर में आहना के लिए अकेले रहना और नौकरी करना इतना आसान न होता। आहना कभी-कभी यह भी सोचती है कि कदाचित् ध्रुव के बिना भी अकेली रह लेती। आखिर इस शहर में अनेक लड़कियाँ हैं, जो किसी सहारे के बिना अकेली रह रही हैं और नौकरी कर रही हैं। उसे याद आने लगे वो दिन जब ध्रुव उसके जीवन में आया था। उसने सोचा नहीं था कोई इस प्रकार भी उसे मिल जायेगा!

उसे भली प्रकार स्मरण है...आज से लगभग चार वर्ष पूर्व जब उसने अपना बी. टेक. पूरा किया था और कैम्पस सलेक्शन के माध्यम से उसकी नियुक्ति इसी शहर की एक मोबाईल कम्पनी में हो गयी थी। वह कितनी प्रसन्न थी। मम्मी-पापा से पूछकर वह नौकरी जॉइन करने इस कम्पनी में आ गयी। यद्यपि यह शहर उसके लिए अनजाना नहीं था किन्तु यहाँ के लोग अपरिचित थे। अपने साहस और कुछ कर गुज़रने की दृढ़ इच्छा लिए वो अपने मार्ग पर चल पड़ी। एक वर्किग वुमेन हॉस्टल में उसने अपने लिए कमरा ले लिया था। वो हॉस्टल कार्यालय से दूर था। कार्यालय आने-जाने के लिए उसे सिटी बस का सहारा लेना पड़ता था।

"हेल्लो...मैं धुव हूँ।" एक दिन कार्यालय छूटने के पश्चात् शाम को बस के लिए वो बस स्टैण्ड खड़ी थी कि उसके सामने एक युवक खड़ा होकर अपना परिचय दे रहा था।
"जी...।" किसी अपरिचित को सामने देखकर वह अचकचा गयी और बस इतना ही बोल पायी।
"मैं उस बिल्डिंग के कार्यालय में काम करता हूँ।" उसने आहना के कार्यालय के समीप की एक बिल्डिंग की ओर अपनी उंगली से संकेत करते हुए कहा।
"जी, मैं भी स्काई टॉवर में काम करती हूँ।" आहना ने कहा।
 "जानता हूँ। प्रतिदिन आपको आते-जाते देखता हूँ।" ध्रुव ने कहा।
उसकी बातें सुनकर आहना झेंप-सी गयी। बातें हो ही रही थीं कि बस आ गयी। आहना और धुव दोनों बस में चढ़ गये। धुव आहना से दो स्टॉपेज पहले बस से उतर गया। कदाचित् उसका घर पहले पड़ता हो।


अब वे दोनों प्रतिदिन ऑफिस छूटने के उपरान्त बस स्टॉप पर मिलने लगे। एक साथ एक ही बस में आने लगे। औपचारिक बातें धीरे-धीरे अनौपचारिकता की ओर बढ़ने लगीं। इस प्रकार आहना और धुव की मित्रता को चार माह हो गये। वे दोनों बस स्टॉप पर मिलते, बातें करते तथा एक साथ घर को जाते।.....और एक दिन ध्रुव नयी बाईक के साथ बस स्टैण्ड पर आहना को खड़ा मिला।
"आओ बैठो। अब बस से घर जाने की आवश्यकता नहीं है। मैं तुम्हें घर छोड़ दिया करूँगा।" ध्रुव ने बाईक के पीछे आहना को बैठने का संकेत करते हुए कहा।
आहना शाम को धुव के साथ घर जाने लगी थी किन्तु कार्यालय आती वो बस से ही थी। इसका कारण यह था कि दोनों अलग-अलग रहते थे तथा सुबह दोनों के कार्यालय के खुलने के समय में भी एक घंटे का फर्क था।


"आहना, तुम सुबह भीड़ भरी बस में कार्यालय जाती हो तो मुझे तुम्हारी फ़िक्र होती है। मैं चाहता हूँ कि तुम स्कूटी ले लो।" एक दिन बातों-बातों में ध्रुव ने कहा।
"किन्तु मैंने स्कूटी कभी चलाई नहीं है।" आहना ने कहा था।
"उसमें कुछ नहीं है। मैं सिखा दूँगा।" धुव ने कहा।
आहना ने स्कूटी ले ली। कुछ दिनों तक ध्रुव के साथ, बाद में अकेली पूरे आत्मविश्वास के साथ आहना स्कूटी चलाने लगी थी। अपनी इस नयी योग्यता का श्रेय वह ध्रुव को देना न भूलती। आहना स्कूटी से ऑफिस आती तो स्कूटी से ही घर भी जाना होता। शाम को बस स्टैण्ड पर दोनों का मिलना ख़त्म हो गया। लगभग दो सप्ताह इसी प्रकार व्यतीत हो गये। एक दिन ध्रुव ने आहना के साथ एक फ्लैट में रहने की इच्छा जताई। धुव के इस निर्णय में सहमति आहना की भी हो गयी थी। कार्यालय के पास ही किराए का यह फ्लैट लेकर वे दोनों साथ रहने लगे। चार वर्ष हो गये उन्हें इस तरह एक साथ रहते हुए। कदाचित् इसी रिश्ते को लोग 'लिव इन रिलेशनशिप' कहते हैं। इसका अर्थ कदचित् यही है कि बिना विवाह के किसी युवक व युवती का मित्र की भाँति एक साथ रहना। आहना इसी रिश्ते में ध्रुव के साथ चार वर्षों से रह रही है।


कार्यालय पहुँच कर आहना कुछ देर तक काम करती रही। तत्पश्चात् ध्रुव को फोन मिलाया। ऐसा वह प्रतिदिन करती है।
"ऑफिस पहुँच गयी...?" ध्रुव ने पूछा।
"हाँ...और सुनो, शाम को लौटते समय दूध का पैकेट, कुछ नूडल्स और ब्रेड ले लेना।" आहना से ध्रुव से कहा।
"ठीक है। फिर मिलते हैं।" कह कर ध्रुव ने फोन रख दिया। आहना भी कार्यालय के कार्यों में लग गयी।
काम करते-करते आहना सोचने लगी, कितना अच्छा है कि ध्रुव के साथ जीवन में चीज़ें आसान हो गयी हैं। सपोर्ट मिलता है उसका। सोचकर आहना के मन को अच्छा लगा। अब कार्यालय से दोनों अपने-अपने वाहन से, अलग-अलग समय पर घर अवश्य पहुँचते हैं किन्तु एक-दूसरे के साथ होने का अहसास बना रहता है। कभी-कभी आहना सोचती कि यदि ध्रुव साथ न होता तो क्या जीवन इतना सुगम व अच्छा होता...? तत्काल यह ख़याल भी आता कि जब न होता तो देखा जाता, अभी तो ध्रुव के साथ सब अच्छा है। इसी प्रकार दिन व्यतीत होते जा रहे हैं।


आहना एक छोटे से शहर के मध्यमवर्गीय परिवार की लड़की है। विद्यार्थी जीवन में पढ़ने का खूब मन लगता था। इण्टरमीडिएट तक की शिक्षा माता-पिता के घर में रहकर पूरी की। उच्च शिक्षा के लिए वह किसी बड़े शहर में जाना चाहती थी। जबकि उसके माता-पिता उच्च शिक्षा भी अपने शहर से ही पूरी करवाना चाहते थे। ऐसा भी नही था कि उच्च शिक्षा के लिए उसके अपने शहर में स्कूल-कॉलेज नही थे। किन्तु आहना कुछ अच्छा व सबसे अलग करना चाहती थी। अत: माता-पिता से हठ कर उसने इस शहर में एडमिशन ले लिया था। शिक्षा पूरी करते ही उसे कैम्पस सलेक्शन के माध्यम से तुरन्त नौकरी भी मिल गयी। सब कुछ आहना की इच्छानुसार होता चला जा रहा था और अब ध्रुव का साथ....ओह सबकुछ कितना अच्छा है। आहना ने कभी नहीं सोचा था कि उसे इस प्रकार ध्रुव का साथ मिलेगा। यद्यपि लिव इन रिलेशनशिप उसके शहर, उसके परिवार की संस्कृति न थी। किन्तु इस बड़े शहर की संस्कृति तो है। उसे इस शहर में रहते-रहते कई वर्ष हो गये। इस शहर की संस्कृति उसमें रच-बस गयी है। इस शहर की बड़ी-बड़ी कम्पनियों में काम करने वाले, बड़े-बड़े कॉलेजेज में पढ़ने वाले लड़के-लड़कियों के लिए इस प्रकार के रिश्तों बँधकर रहना आम है।

आहना को स्मरण है वो दिन जब उसने ध्रुव के साथ रहने का निर्णय लिया था। जब आहना के घर वालों को उसके इस निर्णय की जानकारी हुई, तब उसका कितना विरोध हुआ था। पापा-मम्मी ने उसे महीनों फोन नहीं किया। उन्हें समझाने के लिए आहना फोन मिलाती किन्तु वो फोन नहीं उठाते। कई महीने व्यतीत हो गये। आहना लगभग प्रतिदिन फोन करती। एक दिन आहना ने फोन किया और न जाने कैसे पापा ने फोन उठा लिया। बेटी के प्रति एक पिता का स्नेह तो था ही, समय ने भी कदाचित् दूरियाँ कम कर दी थीं। वह पापा को यह समझाने में सफल रही कि आजकल के युवक युवतियों में यह रिश्ते आम हैं। पापा विवश थे, उन्होंने यह मान लिया। अब मम्मी-पापा फोन पर उससे बातें करते हैं, उसका हाल पूछते हैं किन्तु ध्रुव के बारे में कभी कुछ नहीं पूछते।

समय व्यतीत होता जा रहा है। चार वर्ष हो गये ध्रुव के साथ रहते हुए। प्रतिवर्ष की भाँति इस वर्ष भी ऋतुएँ परिवर्तित हो रही हैं। तपती गर्मियों की ऋतु समाप्त हो रही है। बारिश की ऋतु का आगमन होने वाला है। बारिश की ऋतु आहना को बहुत पसन्द है। नीले असमान की सतह पर नन्हें नटखट खरगोशों की भाँति कुलाचें भरते बादलों के टुकड़े उसके मन को मोह ले रहे हैं। गर्मी की तपिश कुछ कम हो गयी है। प्रतिदिन की भाँति आज भी आहना कार्यालय से छूटकर अपना स्कूटर निकालने पार्किंग की ओर बढ़ गयी। उसने आसमान की ओर देखा, बादलों के श्वेत-श्याम टुकड़े आसमान में तैर रहे थे। शीतल हवाओं के साथ वृक्षों के पत्ते शनै:-शनै: झूम रहे थे। पत्तों की सरसराहट की ध्वनि किसी मधुर संगीत की भाँति प्रतीत हो रही थी। आहना ने स्कूटी निकाली और घर की ओर बढ़ चली। स्कूटी चलाते-चलाते उसे ध्रुव की याद आ गयी। काश! ऐसे मनभावन मौसम में ध्रुव उसके साथ होता किन्तु ऐसा सम्भव न था। धुव का ऑफिस कुछ देर से छूटता है। सामने आइसक्रीम पार्लर देख आहना ने स्कूटी रोकी और पार्लर में जाकर आइसक्रीम का ऑर्डर देकर वहीं कोने की मेज पर अकेली बैठ गयी। यद्यपि उसे अकेले बैठना अच्छा नहीं लग रहा था। उसने अपने चारों ओर दृष्टि डाली। पार्लर में अधिकांश युवक-युवतियाँ साथ में थे तो कहीं कपल भी बैठे थे। प्रतिदिन की अपेक्षा आज यहाँ भीड़ अधिक थी। हॉल लगभग भरा हुआ था। आज के मनमोहक मौसम का आनन्द लेने के लिए लोग घरों से बाहर निकल पड़े थे। आहना ने ध्रुव को फोन मिलाया।

"एक घंटे बाद आऊँगा। अभी ऑफिस में काम है।" ध्रुव ने कहा। निराश होकर आहना ने फोन रख दिया। इस समय आहना को धुव की कमी महसूस हो रही थी किन्तु.....। इसी समय ही क्यों अनेक ऐसे अवसर इससे पूर्व भी आते रहे हैं, जब आहना चाहती थी कि ध्रुव उसके साथ रहे किन्तु ऐसा हो नहीं पाया। वह सोचने लगी कि पहले भी ध्रुव का ऑफिस वही था और मेरा समय यही। किन्तु तब मुझसे मिलने वह प्रतिदिन बस स्टैण्ड पर आ जाता था। न जाने कैसे समय मैनेज कर लेता था? अब कई चीज़ें बदल-सी गयी प्रतीत होती हैं। कभी-कभी उसे महसूस होता है कि ध्रुव में और उसमें भी एक-दूसरे से मिलने की जो उत्सुकता और तड़प पहले रहती थी, वो अपेक्षाकृत कम हुई है। इसका कारण सम्भवत: यही हो सकता है कि शाम के बाद से सुबह कार्यालय जाने तक वो एक साथ रहते हैं। फिर भी आहना ध्रुव के बिना किसी सुबह, किसी शाम की कल्पना नहीं कर सकती। 'तो क्या उसे ध्रुव से अब विवाह कर लेना चाहिए...?' सहसा आहना के मन में ये विचार आया। आखिर चार वर्ष हो गये उन्हें साथ रहते हुए। इतना समय पर्याप्त है एक-दूसरे को समझने के लिए।

"मैडम, आइसक्रीम।" बेयरे ने मेज़ के पास आकर आवाज़ लगायी। आहना की तन्द्रा भंग हो गयी। उसने आइसक्रीम का प्याला अपनी ओर सरकाया और धीरे-धीरे खाने लगी। आइसक्रीम ख़त्म कर वह बाहर निकली तथा स्कूटी की ओर बढ़ गयी।
घर जाकर वह रसोई में शाम का भोजन बनाने की तैयारी करने लगी थी कि ध्रुव आ गया। आते ही ध्रुव फ्रैश होने बाथरूम में चला गया। आहना ने ध्रुव के लिए चाय के साथ पोहा बनाया, जो थोड़ा शीघ्र बन जाता है और ध्रुव को पसन्द भी है। आहना की इच्छा इस समय कुछ भी खाने की नहीं थी। क्योंकि वह आइसक्रीम खाकर आयी भी किन्तु ध्रुव के लिए उसने ये सबकुछ किया। आज ही नहीं, बल्कि आहना प्रतिदिन शाम की चाय के साथ ध्रुव के लिए कुछ न कुछ नाश्ता बना देती है, क्योंकि वह ध्रुव से पूर्व ऑफिस से घर आ जाती है। फ्रैश होकर ध्रुव अपनी आराम कुर्सी पर बैठ गया था तथा चाय के साथ पोहा खा रहा था। आहना भी आकर ध्रुव के पास वाली कुर्सी पर बैठ गयी। दोनों में इधर-उधर की बातें होने लगीं। बातें आहना ने ही प्रारम्भ की थीं। धुव बस हाँ....हूँ..कर रहा था। कदाचित् ऑफिस में काम अधिक होने के कारण थक गया होगा।


"सुनो! माँ का फोन आता है तो वो बार-बार मुझसे विवाह के लिए पूछती हैं।" आहना ने ध्रुव से कहा।
"हाँ, तुमने पहले भी बतायी है यह बात मुझसे।" ध्रुव ने आहना की ओर देखे बिना ही कहा।
"तो क्या कह दूँ?" आहना ने पूछा। वह चाहती थी कि ध्रुव उसकी ओर देखकर बातें करे।
"तुम जो चाहो।" इस बार भी ध्रुव ने चाय पीते हुए आहना की ओर देखे बिना ही कहा।
"तुमसे पूछे बिना, तुम्हारी इच्छा जाने बिना मैं कैसे कुछ कह दूँ?" आहना के स्वर में कुछ तल्खी आ गयी थी।
"मुझसे क्या पूछना? विवाह तुम्हारा है।" इस बार ध्रुव ने आहना की ओर देखते हुए कहा।
"मेरा है? मात्र मेरा, तुम्हारा नहीं?" आहना कुछ-कुछ ध्रुव के कहने का अर्थ समझ गयी थी किन्तु पूरी तरह समझना अभी शेष था। उसके दिल की धड़कनें तीव्र होने लगी थीं।
"मेरा और तुम्हारा विवाह क्या अलग-अलग होगा?" आहना ने रूआंसी होते हुए बात पूरी की।
"हाँ, मैं अभी विवाह करने के मूड में नही हूँ।" ध्रुव ने कहा।
"तो क्या तुम मुझसे विवाह करने वाले नहीं हो?" आहना अब स्थिति को स्पष्ट कर लेना चाहती थी।
"मैंने तुमसे कब कहा कि मैं तुमसे विवाह करूँगा?" ध्रुव ने दृष्टि नीची करते हुए कहा।
"तो इतने दिनों से एक साथ रहना! एक-दूसरे की परवाह करना और वो सबकुछ क्या था?" आहना के समक्ष सबकुछ स्पष्ट हो गया था फिर भी वो ध्रुव से पूछ पड़ी...बस यूँ ही। ध्रुव ख़ामोश था। उसकी ख़ामोशी में ही उसका उत्तर था। अत्यन्त पीड़ा भरे स्वर में चित्कार कर आहना रो पड़ी, जैसे किसी सगे-सम्बन्धी की मृत्यु का रुदन हो।


"तो क्या मेरी भावनाओं से, मेरे शरीर से खेलना....सबकुछ यूँ ही था, टाईम पास!" कुछ देर में स्वंय को सम्हालते हुए आहना ने तीव्र स्वर में ध्रुव से पूछा।
"इन सब में विवाह की बात कहाँ थी?" ध्रुव इन प्रश्नों का सामना करने के लिए जैसे पहले से ही तैयार था।
"कोई लड़की अपनी भावनाएँ, अपना शरीर किसी को समर्पित करती है तो वो मात्र समय व्यतीत नहीं करती है। उस रिश्ते की परिणति वह विवाह के रूप में चाहती है।" आहना ने लगभग बिफरते हुए कहा। वो जानती थी कि उसकी ये बातें ध्रुव के लिए अर्थहीन और मूर्खतापूर्ण हैं।

आहना को ऐसा प्रतीत हो रहा था, जैसे उसके जीवन में सबकुछ भरभरा कर टूट गया हो। कुछ भी शेष न बचा हो। उसकी प्रतिभा, उसका आत्मसम्मान, आत्मविश्वास, उसके सपने सबकुछ खण्डहर होकर मानो सामने पड़े थे। आहना के रुदन के स्वर कमरे में गूँज रहे थे। उसे समझाने वाला, उसे सान्त्वना देने वाला कोई न था। उसे चुप कराने वाला कोई न था। चाय पीकर ध्रुव दूसरे कमरे में जा चुका था। आहना निढाल होकर कुर्सी पर वहीं बैठी थी। उसे समझ में नहीं आ रहा था कि वो इस समय क्या करे? वह ध्रुव से अलग कहीं दूर चली जाना चाहती थी, किन्तु कहाँ? इन चार वर्षों में उसने स्वंय को ध्रुव पर इतना आश्रित कर लिया था कि अब उसे स्वयं में आत्मविश्वास से भरी आहना नहीं  मिल रही थी। दूसरे कमरे में जाकर ध्रुव सो चुका था। उसके खर्राटे के स्वर आहना तक आ रहे थे। वह देर तक यूँ ही कुर्सी पर बैठी रही, ठगी-सी। अब ध्रुव के साथ रहने का कोई अर्थ नहीं था, कोई औचित्य नहीं था। रात गहराती जा रही थी। इस समय वह कहाँ जायेगी? कहीं भी तो उसका ठिकाना नहीं था? हो भी कैसे सकता है?


इन चार वर्षों में उसने स्वयं को ध्रुव में समाहित जो कर लिया था। अपना अस्तित्व उसने बचाकर रखा ही कहाँ था? यद्यपि आहना टूट चुकी थी किन्तु टूटी हुई आहना ने अपने आप को स्वयं ही सम्हाला। भावनाओं को नियंत्रित किया और विचार करने लगी कि अब आगे क्या करना है? सहसा उसे ध्यान आया कि उसके कार्यालय में साथ काम करने वाली तनिशा यहीं कहीं वोर्किंग वुमेन के लिए बने हॉस्टल में रहती है। वह मोबाइल में तनिशा का नम्बर ढूँढ़ने लगी। तनिशा का नम्बर मिल गया। आहना ने उससे बात कर ली। आहना उठी और धीरे-धीरे अपना सामान समेटने लगी। बाहर से बारिश की बूँदों के स्वर आने लगे थे। शाम से छाये बादल इस समय बरस ही गये। आहना सामान अवश्य धीरे-धीरे समेट रही थी किन्तु उसके मन-मस्तिष्क में विचारों का प्रवाह बारिश की बूँदों की भाँति तीव्र होता जा रहा था....क्यों लड़कियों के साथ बहुधा ऐसा होता है? क्यों वे अपना स्वतंत्र अस्तित्व विकसित नहीं कर पातीं? क्यों वे माता-पिता के सपनों को तो तोड़ती ही हैं, अपने सपनों की भी तिलांजलि दे डालती हैं? चाहे विवाह से पूर्व ऐसी परिस्थितियों में हो या विवाह के पश्चात् पति के अधीन रहकर हिंसा और शोषण का शिकार होते हुए। तो क्या उसके जीवन में कुछ भी शेष नही है? सहसा आहना मन ही मन बोल पड़ी कि नहीं....उसके जीवन में सबकुछ शेष है। वह ध्रुव के साथ व्यतीत किये गये पलों को जीवन में घटी किसी अवांछित घटना की भाँति विस्मृत कर देगी। कल तक तनीशा उसके लिए कमरे का प्रबन्ध कर देगी। थोड़ी देर में आहना ने अपना काफी सामान पैक कर लिया था। उसने गूगल पर सर्च कर एक ट्रान्सर्पोट कम्पनी से सामान ले जाने के लिए वाहन बुक कर लिया, जो सुबह आ जायेगा। रात भर आहना सो न सकी। वह बैठी रही। अगले दिन तनिशा ने आहना को फोन कर बताया कि उसके लिए हॉस्टल में कमरे का प्रबन्ध हो गया है।

अगले दिन......। तैयार होकर ध्रुव कार्यालय जा चुका था। सुबह से उसने आहना से कोई बात नहीं की थी। लगभग दस बजे तक ट्रान्सपोर्ट की गाड़ी आ गयी। आहना ने अपने कुछ आवश्यक सामानों को गाड़ी में रखवाया। बहुत सारी चीज़ें जैसे- बेड, चादरें, फर्नीचर व रसोई की कुछ चीज़ें, जो आहना ने अपने पैसों से ख़रीदी थीं, छोड़कर जा रही थी। वह इन चीजों को पुनः खरीद लेगी। आखिर ध्रुव से कहीं अधिक सैलरी है आहना की। सामान की गाड़ी को अपने नये गन्तव्य की ओर रवाना कर आहना स्कूटी से नये हॉस्टल की ओर चल दी। उसने पलट कर एक बार भी पुराने फ्लैट की ओर नहीं देखा। बाहर आकर उसने भरपूर दृष्टि से आसमान की ओर देखा। बाहर का वातावरण खिला हुआ उन्मुक्त हो रहा था। बारिश से पेड़-पौधे ही नहीं बल्कि पूरी सृष्टि धुलकर स्वच्छ हो गयी थी। आहना जिस धुँधले रिश्ते 'लीव इन रिलेशनशिप' को छोड़कर जा रही थी, वो भी धुल गया था। अब पथ पर सबकुछ साफ व स्पष्ट था, जिस पर आहना को आगे बढ़ते जाना है।


- नीरजा हेमेन्द्र

रचनाकार परिचय
नीरजा हेमेन्द्र

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कथा-कुसुम (1)