जून-जुलाई 2020 (संयुक्तांक)
अंक - 61 | कुल अंक - 61
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कथा-कुसुम

कहानी- पंचराहे पर

‘‘आज तो जैसे सामान्य आदमी का पैदल राह चलना भी दूभर हो गया है?’’
‘‘सड़क पार करना तो और भी मुश्किल है, फिर यहाँ से तो कत्तई सम्भव नहीं।’’
‘‘हाँ, ये चौराहा तो शहर का सबसे व्यस्ततम चौराहा है। यहाँ का ट्रेफ़िक देखकर ऐसा लगता है मानो सभी एक-दूसरे से आगे निकलने की होड़ में बेतहाशा भागे जा रहे हों। कोई भी एक पल रुककर इन्तजार करना नहीं चाहता। किसी को ट्रेन पकड़नी है, तो कोई बस-स्टेशन की ओर भागा जा रहा है।’’
‘‘अरे! जनाब, चौराहा नहीं, इसे तो पंचराहा कहिए। कभी-कभी तो यहाँ ट्रैफिक इतना हो जाता है कि यही तय कर पाना मुश्किल हो जाता है कि कौन किधर से आ रहा है, और उसे जाना किधर है? सभी इस पंचराहे रूपी भंवरजाल को पार करने की जी-तोड़ कोशिश में अपने-अपने तरीके, अंदाजन आड़े-तिरछे तो गोल-गोल घूमते, इसे पार करने की कवायद में मशगूल से दिखते हैं।’’


‘‘अब इस टैक्सी वाले को ही देखिए? यहाँ सामने ही रोक दिया है।’’
‘‘वो भी बीच राह में ही सवारियाँ उतारने, चढ़ाने लगा है। भई हद्द है! इन लोगों के लिए तो जैसे कोई क़ायदा-क़ानून है ही नहीं?’’
‘‘अब आप ये सोचेंगे कि ये इतनी सवारियों को कैसे बिठाएगा? इन्हें लेकर किधर जायेगा? तो आप खुद ही चकरा जायेंगे।’’
‘‘सही कह रहे हैं। वो देखिये, अब उसने अपनी टैक्सी उस सिटी-बस के आगे ले जाकर खड़ी कर दी है, ताकि जो सवारियाँ बस में भीड़ की वजह से नहीं चढ़ पायी हों, वो उसकी टैक्सी में बैठ जायें।’’
‘‘हालांकि उसकी टैक्सी सवारियों से भरी है। लेकिन उसके नज़रिये से अभी भी उसकी टैक्सी में चार-पाँच सवारियाँ और भी बैठ सकती हैं।’’
‘‘आप देखते रहिए। जब-तक उसकी टैक्सी उसके अपने मानक के हिसाब से सवारियों से भर नहीं जातीं, वो अपनी जगह से टस्स से मस्स भी नहीं होगा। चाहे उसके पीछे कितने ही वाहनों का जाम क्यों न लग जाये?’’
‘‘सही कह रहे हैं। उस टैक्सी वाले को अपने पीछे लगे वाहनों की लम्बी कतार अगर दिख रही होगी, तो भी वो उन्हें देखना नहीं चाहेगा।’’
‘‘पर, ये सिटी-बस तो चौक की तरफ जा रही है और वो टैक्सी वाला रेलवे-स्टेशन की तरफ जाने के लिए यात्रियों को बुला रहा है। ऐसे में बस की सवारियाँ उसकी टैक्सी में क्यों आयेंगी? सिटी-बस के आगे अपनी टैक्सी लगाकर तो उसने खामखाह ही जाम की स्थिति पैदा कर दी है।’’


‘‘वो देखिये! कुछ यात्री सिटी-बस से उतर कर उसकी टैक्सी में आ रहे हैं। टैक्सी वाला पुराना अनुभवी लग रहा है। उसे पता होगा, तभी तो वो वहाँ खड़ा होकर इन सवारियों के आने का इन्तजार कर रहा था।’’
‘‘जाहिर है ज्ञानियों, अनुभवियों की कमी तो वैसे भी इस धरा-धाम पर नहीं है...हें-हें-हें।’’
‘‘सही कह रहे हैं पार्टनर। अब ये देखिये, इन मूँगफली बेचने वाले जनाब को? इन्होंने ज़ेब्रा-क्रॉसिंग पर ही अपने मूँगफली वाली परात, तिगोड़िया लगा कर सजा रखी है। अब पैदल सड़क पार करने वाले किधर से जायेंगे?’’
‘‘जाहिर है ये इनका टेंशन नहीं है। ऐसे में इन्हें पैदल यात्रियों की फिकर क्यों होगी?’’


लंच का समय है। आसपास के दफ्तरों से निकलकर कुछ ऑफिसकर्मी अपने-अपने सहकर्मियों संग शहर के इस व्यस्ततम पंचराहे पर कॉफी-हॉउस के सामने वाले बरामदे में खड़े हो, मूँगफलियाँ तोड़ते-बतियाते, आती-जाती सवारियों का नजारा ले रहे हैं। काफी-हॉउस की लोना लगी दीवारें और जगह-जगह से दरकती, खदराई ईंटे बयान कर रही हैं कि इसकी बिल्डिंग वर्षों पुरानी है। तेज धूप में भी इसके सामने बरामदे में खडे़ होने पर ठण्डी हवा की छुवन, साफ-साफ महसूस की जा सकती है।
लंच अवधि के दौरान आसपास के दफ्तरों से निकलकर आये ये लोग अक्सर कॉफी-हॉउस में बैठते या कभी उसके सामने के बरामदे स्थित टी-स्टॉल के सामने खड़े होकर चाय पीते देश-दुनिया की खबरों की पड़ताल के साथ-साथ अपने घर, परिवार, ऑफिस के रोजमर्रा के मसलों पर भी बतियाते-गपियाते मिल जाते हैं। आज फिलहाल ये सभी बरामदे में खड़े मूँगफलियाँ खाते-बतियाते इस पंचराहे की गतिविधियों पर ही चर्चारत हैं।


‘‘भई! खुराना जी, आपको क्या लगता है? यहाँ से दिन-भर में कितनी गाड़ियाँ निकलती होंगी?’’ उन ऑफिसकर्मियों में से किसी ने कॉफी-हॉउस के सामने ही बरामदे में एक तरफ न्यूजपेपर और पत्र-पत्रिकानाएँ आदि रखकर बेचने वाले खुराना जी से पूछा।
‘‘अरे जनाब! दिन-भर का मत पूछिये। ये पूछिये कि एक मिनट में कितनी गाड़ियाँ यहाँ से निकलती हैं? आप लोग यहाँ कितनी देर से खड़े हैं?’’ खुराना जी ने भी उनकी बातचीत में दिलचस्पी दिखानी चाही।
‘‘यही कोई...दस-पद्रह मिनट से?’’
‘‘इस बीच आपको कितनी गाड़ियाँ यहाँ से निकलती दिखीं होंगी?’’
‘‘अब ठीक-ठीक तो गिनी नहीं हम लोगों ने?’’
‘‘फिर भी...?’’
‘‘ध्यान नहीं दिया हमने।’’


‘‘अच्छा ये बताइये? यहाँ खड़े-खड़े किसी भी पल आपको ये लगा कि इस पंचराहे की सड़कों पर कोई गाड़ी सड़क इस पार से उस पार न गयी हो या उस पार से इस पार न आयी हो?’’
‘‘नहीं, ऐसा तो एक पल के लिए भी नहीं लगा। हमें तो ऐसा लग रहा है कि इस पंचराहे से छोटी-बड़ी दुपहिया, चौपहिया वाहनों या साइकिल वालों का आना-जाना लगातार जारी है।’’
‘‘और पैदल चलने वाले?’’
‘‘वो भी लगातार निकल रहे हैं, कभी इधर से धक्का खाते तो कभी उधर से धक्का-मुक्की करते।’’
‘‘यानी आवाजाही एक सेकेण्ड के लिए भी बन्द नहीं है। लोगों, सवारियों का तांता, उनकी आवाजाही, भागम-भाग, दौड़-भाग बदस्तूर जारी है। फिर आप खुद ही अंदाजा लगा लीजिए कि कितनी गाड़ियाँ, कितने लोग इस पंचराहे से एक मिनट में गुजर रहे होंगे? मैं तो लगभग पच्चीस साल से यहाँ दुकान लगा रहा हूँ। यही सब देखते-सुनते बड़ा हुआ हूँ। सोचिए इस पंचराहे पर ट्रैफिक संभालना कितना मुश्किल काम होगा? फिर इधर खड़ा ट्रेफिक वाला भला अकेले क्या कर सकता है? ऐसे में लाजिमी हो जाता है कि लोगों को खुद भी ट्रैफिक-नियमों का पालन करना चाहिए।’’
‘‘हाँ, पर ऐसा हो कहाँ पाता है?’’


‘‘बहुत-सी जगहों पर इससे ज्यादा ट्रेफिक होता है और बेहतर तरीके से मैनेज भी हो जाता है। बस्स जरूरत है सिविक-सेंस की।’’ खुराना जी ने भी समझाने वाला रूख अख्तियार कर लिया था।
‘‘आप ठीक कह रहे हैं।’’
‘‘अब सामने से आ रहे इन रोमियो-जूलियट जैसों को ही देखिये। पीछे से मोटर-साइकिल वाला लगातार हॉर्न पर हॉर्न बजाये जा रहा है पर अपनी ही दुनिया में मगन इन्हें कहाँ ख़बर? कानों में आला (यहाँ आशय ईयर-फोन से है) लगाए, सुध-बुध खोए अपने मोबॉइल पर गाना सुनते, बतियाते ये लोग ऐसे चले आ रहे हैं, जैसे अपने घर के आगे बने ‘लॉन’ की हरी-भरी घास पर टहल रहे हों। अभी अगर वो मोटरसाइकिल वाला पीछे से ठोंक दे तो यही कहेंगे न लोग कि अगले को मोटरसाइकिल चलाना नहीं आता और उल्टी-पुल्टी कहानी अलग से गढ़ेंगे।’’


‘‘एकदम सही कह रहे हैं आप। ये देखिये! इन्हें तो सड़क पर लगा ये ‘वन-वे’ का साइन-बोर्ड भी नहीं दिख रहा?’’
‘‘वैसे इसमें इनकी भी ग़लती नहीं। जो पुराने शहरी हैं, वो तो जानते ही हैं कि ये ‘वन-वे’ है लेकिन इधर से गुजरते नए लोगों को ये सब कैसे पता लगेगा? ज़रा साइन-बोर्ड की ओर भी तो देखिये? इसके एक तरफ किसी दवा कम्पनी वाले ने 'नौजवानों की निराशा दूर करने के लिए ख़ुशख़बरी' देने वाला विज्ञापन तो दूसरी तरफ बरामदे स्थित ‘मॉडल शॉप’ की दुकान वाले ने 'कल दुकान बन्द रहेगी' का नोटिस भी चिपका रखा है?’’
‘‘हें-हें-हें...ये भी ख़ूब कही आपने। अनुभवी आदमी लग रहे हैं आप भी। अब इन जनाब को क्या कहेंगे? बिना हेलमेट लगाए, अपनी मैडम को फटफटिया पर बिठाए, मुँह में पान दबाए, बीच-बीच में पीछे मुँह घुमाते, बतियाते, सामने कम, आसमान की तरफ ज्यादा देख रहे हैं?’’
‘‘हाँ, और पीछे बैठी उनके मैडम की साड़ी उड़ रही है, इस बात की ख़बर मैडम को भी नहीं है। ऐसे में अगर उनका पल्लू कहीं फटफटिया के पिछले पहिये में फँस-फँसा गया तो लेने के देने भी पड़ सकते हैं।’’


‘‘अरे! भाई, आप जरा किनारे होकर खड़े हो जाइये। उन जनाब की भाव-भंगिमा भी तो देखिये। लगता है कि ये फटफटिया वाले सज्जन, सुरक्षित कोना ढूँढते, पान थूकने का मूड बना रहे हैं...हें-हें-हें।’’
‘‘हें-हें-हें...।’’
‘‘बाउ जी! बड़े जोरों की भूख लगी है, एक रूपया मिल जाता तो...?’’ खुराना जी से उन ऑफिसकर्मियों की आपसी बातचीत अभी चल ही रही थी कि उनके समीप से गुजरते एक भिखारी ने गुहार लगायी।
‘‘यार! ये लोग भी अजीब आदमी हैं? अच्छे-खासे हट्टे-कट्टे दिखते हैं, पर इन लोगों को तो जैसे माँग-माँग कर खाने की आदत पड़ गयी है।’’
‘‘सही कह रहे हो पार्टनर। वैसे भी अगर बिना काम किये यूँ ही माँग-मूँग कर काम चल जाता है तो काम-काज की जरूरत ही क्या है इन्हें?’’


‘‘बाउ जी! एक रूपया मिल जाता तो, बहुत जोर की भूख लगी है।’’ उन कर्मियों की आपसी बातचीत चल ही रही थी कि उन्हें अनसुनी करते, उस भिखारी ने पुनः हस्तक्षेप किया।
‘‘अच्छा ये लो। मूँगफली खाओ और दफ़ा हो जाओ यहाँ से। अब तंग मत करो।’’
‘‘यार, सुकून से दो घड़ी कहीं खड़े होकर ये लोग मूँगफली भी नहीं तोड़ने देते।’’
‘‘हें-हें-हें...जबकि हम लोग यहाँ सुकून की तलाश में ही आते हैं।’’
‘‘हें-हें-हें...।’’ मुट्ठी-भर मूँगफली लेकर उन लोगों की बातें सुनते या शायद ऐसी बातें सुनने के लिए अभ्यस्त रहने के तईं, उन्हें अनसुनी करते वो भिखारी बरामदे में आगे बढ़ गया।


‘‘यार उधर बरामदे में उन रंगीन छतरियों के मोल-भाव करती लड़कियों को देखो!’’ कुछ लड़कियाँ बरामदे में फर्श पर ही चादर बिछाए रंगीन छतरियाँ, टोपियाँ, रूमाल, पर्स आदि बेचते दुकानदार से मोल-भाव करती दिखीं।
‘‘भइया! ये पोल्का प्रिण्ट वाली छतरियाँ कितने-कितने के दिये?’’
‘‘बहन जी, कोई सा भी लीजिए। मात्र चालीस-चालीस रूपये की हैं, ये सभी छतरियाँ। पूरे शहर में कहीं नहीं मिलेंगी इस रेट में।’’
‘‘अरे! इतने महँगे? क्या है इनमें? एक मीटर कपड़ा और स्टील की एक रॉड ही तो लगी होती है?’’
‘‘एक-दो स्प्रिंग्स और कुछ तीलियाँ भी तो होती हैं मैडम। लेना हो तो लीजिए, नहीं तो यहाँ से रास्ता नापिए आप लोग।’’
‘‘अरे! बड़े बदतमीज हो? जाओ, नहीं लेना हमें तुम्हारे ये छाते।’’ एक लड़की ने लगभग तल्ख स्वर में उस दुकानदार को डांटते हुए कहा।



‘‘बहन जी, नाराज मत होइये। यहाँ ख़रीदने वाले कम, दिन-भर मोल-भाव करने वाले ज्यादा आते हैं। वैसे आपकी मर्जी।’’ उस दुकानदार के व्यवहार से व्यथित वो लड़कियाँ वहाँ एक पल भी रुके बिना, बिना छाता ख़रीदे ही वहाँ से चली गयीं।
‘‘यार, ये दुकान वाला भी न...कितना कठकरेजी है? पाँच-दस रूपये कम करके मोल-भाव करते, ये छतरियाँ अगर उन लड़कियों को बेच ही देता तो क्या फरक पड़ जाता? अब तक तो ये यहाँ बैठा मक्खी ही मार रहा था। जबसे हम लोग यहाँ खड़े हैं, तबसे तो एक भी ग्राहक नहीं दिखा था यहाँ? वैसे वो लड़कियाँ स्वाभिमानी थीं। भले ही ऐसी तेज धूप में झुलस क्यों न जायें?’’
‘‘वाह गुरू! आपने तो पूरे परिदृश्य पर गहन नजर रखते हुए, घटनाक्रम की गम्भीरता से पड़ताल कर ली और रंगीन छतरियों से आँखें भी सेंक ली। फिर तो ड्यू हो गयी, चाय के साथ वाय भी...हें-हें-हें।’’
‘‘हें-हें-हें...। यार, दोस्त हो तो ऐसा। एक तुम ही तो हो, जो मुझे अच्छी तरह समझते हो। वो कहा गया है न 'लाइफ इज पॉर्टली व्हॉट वी मेक इट एण्ड पॉर्टली व्हॉट इट इज मेड बाइ द फ्रेण्ड्स वी चूज'...हें-हें-हें।"
‘‘यार, लंच-टाइम खत्म होने को है। अब चलें यहाँ से?’’
‘‘हाँ, पार्टनर चलते हैं।’’


‘‘यार! वो छड़ी लिए अंकल जी को देखिए? इधर ही आ रहे हैं। लगता है इन्हें सड़क उस पार जाना है?’’
‘‘हाँ, पर वो सड़क पार कर लेंगे। उनकी चाल देखो। वो छड़ी लेकर चलने के अभ्यस्त लग रहे हैं।’’
‘‘फिर भी रुको! देखते हैं। कैसे पार करते हैं?’’
‘‘अरे! ये तो सड़क किनारे आकर खड़े हो गये? हाव-भाव से थोड़ी मुश्किल में भी दिख रहे हैं? क्या पता इन्हें मदद की जरूरत हो?’’
‘‘हाँ, पर घबराइये नहीं। ये अपने आप ही सड़क पार कर लेंगे।’’
‘‘यार देखो! वो ट्रैफिककर्मी तो इधर ही आ रहा है? अरे! ये क्या? वो तो उन छड़ी वाले अंकल जी को सड़क भी पार करा रहा है?’’
‘‘हाँ, भई! मैं भी वही देख रहा हूँ, जो आप देख रहे हैं। अच्छा अब चलें? देर हो रही है।’’
‘‘हाँ-हाँ चलिए...।’’
‘‘पार्टनर! तुम इतने ग़मगीन से क्यों दिख रहे हो? तुम्हारा चेहरा भी उतरा हुआ है? काम-काज की आपाधापी के बाद यहाँ घूमने-फिरने से तो मूड फ्रेश हो जाना चाहिए?’’
‘‘नहीं नहीं, ऐसा कुछ नहीं...।’’
‘‘कुछ नहीं क्यों? दोस्त हूँ तुम्हारा। क्या सोच रहे हो? बताओ?’’
‘‘यार मैं सोच रहा था कि वो छड़ी लिए अंकल जी, जो सड़क पार करने की कोशिश कर रहे थे, उन्हें सड़क पार करने में हम भी तो मदद कर सकते थे?’’
‘‘हाँ हाँ, क्यों नहीं? पर अब तो वो पंचराहा पीछे छूट गया...?’’
‘‘शायद तुम ठीक कह रहे हो...।’’
पर क्या सचमुच ऐसा ही है? उनके बीच पसरी खिलखिलाहट, हँसी-मज़ाक, जो अब गहरे मौन रूपी सन्नाहट में तब्दील हो चुकी थी, को साफ-साफ महसूस किया जा सकता था।


- राम नगीना मौर्य

रचनाकार परिचय
राम नगीना मौर्य

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