मई 2020
अंक - 60 | कुल अंक - 63
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

मूल्याँकन

वर्तमान के ताने-बाने में रिश्तों का प्रस्तुतीकरण
- प्रगति गुप्ता




युवा कहानीकार माधव राठौड़ का ‘मार्क्स में मनु ढूँढती’ प्रथम कहानी संग्रह है, जिसमें संग्रहीत कहानियाँ गाँव और शहर की विभिन्न स्थितियों और परिस्थितियों में रिश्तों के अंकगणित की बेबाक बयानी है। हर कहानी कुछ कही-अनकही समाज में फैली विसंगतियों और चिंताओं को पाठक के सामने लाकर खड़ा कर देती है। कहानियाँ पढ़ते-पढ़ते पाठक को महसूस होता है कि कुछ ऐसा ही शायद उसके आसपास घटित हो चुका है या हो रहा है। हम ऐसा भी बोल सकते है कि माधव राठौड़ की कहानियाँ वर्तमान के ताने-बाने में रिश्तों का प्रस्तुतीकरण है।

संग्रह की मेरी सबसे पसंदीदा कहानी, जिसका मैं उल्लेख करना चाहूंगी ‘उकताया हुआ दिन’ है। जो कि आज के युवा वर्ग का प्रतिनिधित्व करती नज़र आती है। जिसकी डिक्शनरी में ‘बोर’ शब्द बोल्ड लेटर्स में लिखा हुआ है। जिनका आकर्षण किसी भी बात को लेकर बहुत क्षणिक है। आधुनिक परिवेश में कैसे किसी को होशियारी से छला जाता है और कैसे सोशल साइट्स इसमें सहायक बनती हैं, इसका बहुत यथार्थ-सा चित्रण है। कोई भी अनजाना व्यक्ति जो जाना पहचाना-सा लगने लगता है और पास आते ही उतना ही अनजाना और छली महसूस होता है, आज की वास्तविकता से जुड़ा लगता है। किस तरह युवाओं की अधिक पाने ही हवस उन्हें गर्त में ले जा सकती है, अच्छा चित्रण किया है।

कहानी ‘रेड सर्किल’ एक हिंजड़े के इर्द-गिर्द घूमती कहानी है, जो कि गन्दी गलियों की अच्छी-बुरी मानसिकताओं का चित्रण करती है। जहाँ परिस्थितियाँ किसी भी व्यक्ति को मनोविज्ञान की पाठशाला में बैठाकर काफ़ी कुछ सीखा देती हैं।
‘बिकी हुई शामें’ कहानी मुझे बेहद पसंद आई है। इस कहानी में एक पंक्ति है, 'कई बार स्मृतियों से उभरे ज़ख्मों के जवाब में एक गैप होता है, जो शायद सुनने वाले को ख़ुद भरना होता है’ स्वयं में बहुत कुछ बोलती है यह पंक्ति। एक छोटे अनाथ बच्चे के संदर्भ में बोला गया यह वाक्य, न जाने कितनी संवेदनाओं की रिक्तता को भरता हुआ महसूस होता है।


संग्रह के शीर्षक से जुड़ी कहानी ‘मार्क्स में मनु ढूँढती’ दो ऐसे युवाओं की कहानी है, जो कि कुछ महान लोगों की विचारधाराओं में ख़ुद को खोज रहे है। परिणामस्वरुप खोज भटकन बनकर सामने आती है। जब इनका हक़ीक़तों से सामना होता है तब क़िरदार अपने द्वंदों और अन्तर्द्वंदो से निकल; स्वयं की खोज में निकलते हैं, तभी सुकून महसूस करते हैं।
आगे के क्रम में ‘मंगती’ एक शहरी युवा जोड़े और दूसरा मजदूर जोड़े की प्रेम कथा है। पहले जोड़े के प्रेम में मौज-मस्ती और जिम्मेवारी आने पर भगोड़ापन दिखता है। दूसरी ओर ग़लत काम हो जाने पर भी समर्पण का भाव जुड़ा है।


‘उदास यादें’ और ‘इमली फाटक के उस पार’ बेफिक्री का जामा पहनकर घूमने वाले युवाओं की कहानी है, जो भीतर ही भीतर बहुत अकेले हैं। जिनके अवसाद अन्त में किसी न किसी त्रासदी का परिणाम बनते हैं।
'अभिशप्त वरदान', 'उधडे ख्व़ाब' और 'शुक्रवार को शुरू किया काम ज़रूर पूरा होता है', तीनों कहानियाँ स्त्रियों की विभिन्न परिस्थितियों में कही-अनकही पीड़ाओं की अभिव्यक्ति है। इसके अलावा बेजुबां दर्द और अधूरा वजूद जैसी कहानियों में भी माधव ने पुरुष सत्तात्मक समाज में स्त्री-पक्ष के विभिन्न पहलुओं को अच्छे से उकेरने की कोशिश की है। 'नाच', 'सांझ की धूसरता', 'ढलती साँझ की धुंध', 'खालीपन' जैसी और भी कहानियों में विषयों की विविधता देखने को मिली।


बीस कहानियों के इस संग्रह में लेखक कभी गाँव की कच्ची सड़कों पर विचरण करते हुए कहानियाँ ढूँढते-लिखते नज़र आते हैं, तो कभी शहरी मानसिकताओं को, विभिन्न रिश्तों के ताने-बाने में पिरोते नज़र आते हैं।
अधिकतर कहानियों में राजस्थान के शहरों का ख़ूब विवरण है। अंग्रेजी, हिंदी के अलावा स्थानीय प्रचलित भाषा के शब्दों का भी भरपूर प्रयोग हुआ है। आज के परिपेक्ष्य में अच्छी कहानियाँ लिखी गयी हैं। एक दो कहानियों में थोड़ी अस्वाभाविकता दिखी। कुल मिलाकर अच्छी पठनीय कहानियों का संग्रह माधव राठौड़ लाये हैं। उनके भविष्य के लिए बहुत सारी बधाई व शुभकामनाएँ।




समीक्ष्य पुस्तक- मार्क्स में मनु ढूँढती
विधा- कहानी
रचनाकार- माधव राठौड़
प्रकाशन- बोधि प्रकाशन, जयपुर
मूल्य- 150/-
संस्करण- प्रथम


- प्रगति गुप्ता