मई 2020
अंक - 60 | कुल अंक - 61
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

मूल्याँकन

कई रंगों का शाहकार है 'कुछ निशान काग़ज़ पर'
- फ़ानी जोधपुरी




कुछ महीनो क़ब्ल (पूर्व) फ़स्ले-गुल नाम के एक  मज्मुआ-ए-ग़ज़ल की इदारत (सम्पादन) करते हुए मैंने लिखा था- 'ग़ज़ल एक ऐसी देवी है जिसके कई हाथ हैं। किसी हाथ में इश्क़ है तो किसी में हुस्नो-जमाल, किसी में दर्दो-कर्ब, तो किसी में फ़लसफ़ा' और के.पी अनमोल का मज्मुआ-ए-ग़ज़ल 'कुछ निशान काग़ज़ पर' पढ़ने के बाद मेरी ये बात और पुख़्ता हो जाती है।

मेरा ज़ाती ख़याल है कि सोशल नेटवर्किंग ने और कुछ किया हो या न किया हो मगर शाइर/कवि थोक भाव से पैदा किए हैं। लोग कविता कर रहे हैं, शाइरी कर रहे हैं और दर्जनों तो ऐसे हैं, जो तक़रीबन हर रोज़ नई तख़्लीक (रचना) डालते हैं। वो कैसी होती हैं; इस बारे में अगर चुप ही रहा जाए तो बेहतर है मगर इस दौर में भी कुछ लोग रवायती दायरे में रहकर अपने क़लम की धार पैनी कर रहे हैं। के. पी. अनमोल उनमें से एक हैं और मुझे ये कहने में कोई गुरेज़ नहीं है कि वो अपनी तरह के इकलौते शाइर हैं। उनको पढ़ते हुए ये लगता है कि वो क़ारी (पाठक) से मुख़ातिब हो रहे हैं, दीगर शोअरा को पढ़ते हुए लगता है कि हम एक सफ़र कर रहे हैं (A Journey from Seen to Unseen) देखे से अनदेखे या ज्ञात से अज्ञात की तरफ़। ऐसे शोअरा क़ारी (पाठक) को सफ़र पे ले जाते हैं मगर अनमोल अपने क़ारी को कहीं नहीं ले जाते। वो अपने क़ारी को उसकी जगह पे ही मुंजमिद करके तमाम मनाज़िर (दृध्य) उसके सामने रख देते हैं ताकि जब क़ारी मत्न (अक्षर) और काग़ज़ के सहर (जादू) से आज़ाद हो तो उसे एहसास हो कि वो किसी सफ़र पर नहीं था बल्कि सारे मनाज़िर यहीं आए थे।
अपने क़ौल की तस्दीक़ (समर्थन) के लिए मैं उनका ये मक़्ता पेशे नज़र करूँगा-


तस्वीर कैमरे ने मेरी खींच के 'अनमोल'
मुझको ही रख दिया है समूचा मेरे आगे


इसके अलावा अनमोल की एक बात मुझे और मुत'आस्सिर (प्रभावित) करती है और वो है उनकी कई ग़ज़लों का हम्दनुमा होना। ये उनका हुनर है कि बात वो ग़ज़ल के ख़ाने में ही खड़े हो कर करते हैं मगर उसमें ख़ुश्बू हम्दो-मनक़बत की आती है। उनका ये मत्ला देखें-

महकी हुई फ़िज़ाएँ दे कुछ आसमान दे
गर हो सके तो हमको नया इक मकान दे


या ये मत्ला-
अजब ये इश्क़ में इक तज़रिबा कमाया है
तेरी तलाश में निकला तो ख़ुद को पाया है


या फिर ये शेर-
अगरचे छाँव है तो धूप भी है
कई रंगों में क़ुदरत बोलती है


दर्जबाला (उपर्युक्त) मत्ले और शेर को पढ़ने से क़ारी ये बख़ूबी जान लेता है कि बात क़ातिबे-तक़दीर के मुतआल्लिक़ (सम्बन्ध) में की जा रही है। इसके अलावा भी अनमोल की शाइरी की एक ख़ासियत ये भी है कि वो पुरानी चीज़ों को भी नए और अलग तरह से सोचते हैं। उनका नज़रिया सिर्फ़ सोच को कहीं ले जाकर छोड़ देना नहीं है बल्कि दस्तयाब (प्राप्य) चीज़ों से जोड़ देना भी होता है और इसमें उन्हें महारथ भी हासिल है। वो कहते हैं-

खड़े ऊँचाइयों पर पेड़ अक्सर सोचते होंगे
ये पौधे किस तरह गमलों में रहकर जी रहे होंगे


अनमोल की शाइरी को सरसरी तौर पर पढ़ते हुए हो सकता है क़ारी चौंक पड़े कि ये तो दुष्यन्त की महक है मगर उन्हें ध्यान से पढ़ा जाएगा तो पता चलेगा कि वो दुष्यन्त से कुछ आगे की बात कर रहें हैं। उनकी शाइरी को दुष्यन्त जैसी कह देना; उनके क़लम और कलाम के साथ नाइन्साफ़ी होगी क्योंकि दुष्यन्त ने अपने अहद की बात की थी और अनमोल उनसे कई साल आगे अपने दौर की बात करते हैं। उस दौर में दुष्यन्त ने कहा था-

हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी है


इस दौर में अनमोल कहते हैं-

इक नदी पर्वत की जानिब चल पड़ी है
सागरों में इक अजब-सी खलबली है


दुष्यन्त ने हिमालय से गंगा निकलने की बात कही तो उनकी वफ़ात (मृत्यु) के चालीस बरसों से ज़ियादह अरसे के बाद अनमोल नदी को पर्वतों की जानिब जाने देने की बात करते हैं। यानी गुज़िश्ता चालीस बरसों में जितने बदलाव आये, अनमोल की उन सब पर नज़र है। उन्होंने दौरे-हाज़िर के हालात को भी नहीं बख़्शा और उनको भी अपने क़लम के हल्क़े (दायरे/घेरे) में ले लिया, जिनको इन अशआर के ज़ैल में बख़ूबी देखा जा सकता है-

चावल, चीनी और आटे पर रोना था
यानी मन भर सन्नाटे पर रोना था


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सौ बहलावों पर भारी है बेचैनी
किसने मुझ पर दे मारी है बेचैनी


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लोग जब ज़हर उगलने लगते हैं
शहर के शहर जलने लगते हैं


'कुछ निशान काग़ज़ पर' पढ़ते हुए मुझ पर एक राज़ और फ़ाश हुआ कि अनमोल अछूती और मुनफ़रिद रदीफ़ पर काम करना भी पसन्द करते हैं। इस मज्मुए में उनकी इस्तेमाल की हुई रदीफ़ैन (रदीफों) में 'भरम रक्खा है', 'टाँका गया है', 'यही बेहतर है', 'पहने हुए', 'रोना था', 'यक़ीं रखता है', 'तो मानूँ', 'तक तवज्जोह' ने मुझे काफ़ी मुत'आस्सिर (प्रभावित) किया।

अनमोल का मज्मुआ (संग्रह) 'कुछ निशान काग़ज़ पर' अपनी एक और बात से मुत'आस्सिर करता है वो है इलाक़ाई या टकसाली ज़बान और मुहावरों का इस्तेमाल। आमतौर पर देखा जाता है कि तख़्लीककार (रचनाकार) अपनी बात को करने के लिए ऐसे अल्फ़ाज़ (शब्दों) का इंतेख़ाब (चयन) करता है, जो क़ारी के लिए नाआश्ना (अनजान) होते हैं मगर अनमोल ने परींडे, पन्ना (पृष्ठ), कैमरा, काला जादू, क्लिक, सैल्फ़ी, रजिस्टर, मैसेज, नेकी का दरिया में डालना, यॉर्कर, आख़िरी गेंद में छक्का उड़ाना, रास्ता काटना जैसे अल्फ़ाज़ का इस्तेमाल किया, जो कि क़ारी को एहसास दिलाता है कि बात उसके अतराफ़ (आस-पास) की ही हो रही है न कि किसी दूसरी दुनिया की, अगर मैं ये कहूँ कि अनमोल की शाइरी आम बोलचाल की ज़बान की शाइरी है तो कोई ग़लत नहीं है वो अपनी बात कहते हुए ज़रा-से हिन्दी दां और ज़रा-से उर्दू दां हो जाते हैं मगर पूरी तरह न उर्दू दां होते हैं और न ही हिन्दी भाषी। वो रहते हैं तो सिर्फ़ और सिर्फ़ हिन्दुस्तानी ग़ज़लगो।

उनकी शाइरी इन तमाम मंज़िलों से होती हुई क़ारी को जिद्दत (आधुनिकता) की जानिब भी गामज़न करती है, जहाँ नए-नए ज़ाविए भी खुलते हैं तो रवायती बातों को नए तरीक़ों से रखा भी जाता है। इसके लिए इन अशआर को बतौर नज़ीर रखा जा सकता है-


पेशियाँ घर को निगलने को चली आई हैं
फ़ैसला आज तो मी-लॉर्ड सुनाया जाए


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ज़रा ये ऐश ट्रे आगे करो भाई
गला सिगरेट का इसमें दबा दूँ मैं


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इक तरफ़ मोनालिसा तस्वीर में
इक तरफ़ चेहरा तेरा खिलता हुआ


इसका ये मतलब हर्ग़िज़ नहीं है कि रिवायती शाइरी को उन्होंने बिल्कुल नकार दिया है। इसी किताब के एक मत्ले में वो कहते हैं-

ओस से भीगी हवाएँ और जवानी की महक
रात भर आयी बदन से रात रानी की महक


इस किताब को पढ़कर ये तो कहा ही जा सकता है कि 'कुछ निशान काग़ज़ पर' के ख़ालिक के. पी. अनमोल कभी थोड़े-से रिवायती हो जाते हैं तो कभी थोड़े-से जदीद और कभी तरक़्क़ी पसन्द यानी हर मिज़ाज ने उनको थोड़ा-थोड़ा बनाया है और ये थोड़ा-थोड़ा उनके अपने दौर के तख़्लीककार से बहुत अलग बना देता है।

'कुछ निशान काग़ज़ पर' का कवर पेज और प्रिन्टिंग बहुत अच्छी है। किताबगंज प्रकाशन से शाय (प्रकाशित) हुए इस मज्मुए को देखा तो लगा कि इसमें काग़ज़ पर काफ़ी कुछ पढ़ने को मिलेगा मगर मैं ढूँढता रहा और मुझे काग़ज़ लफ़्ज़ का इस्तेमाल ग़ज़लों में सिर्फ़ सोलह बार मिला मगर लफ़्ज़ रात का इस्तेमाल कुल बाइस बार हुआ है। ज़ाहिर है काग़ज़ पर जो निशान हैं, वो रात के हैं या रात के नाख़ून ने जब काग़ज़ को खरोंचा तो कुछ निशान काग़ज़ पर छूट गये। काग़ज़ को अगर मैं दिल मानूँ तो रात को ज़िन्दगी के तल्ख़ और शीरीं (तज़रिबात) मानना पड़ेगा। ऐसे में मुझे मरहूम साहिर लुधियानवी का शेर याद आ रहा है-


दुनिया ने तज़रबातो-हवादिस की शक्ल में
जो कुछ मुझे दिया है वो लौटा रहा हूँ मैं


'कुछ निशान काग़ज़ पर' में के. पी. अनमोल ने भी शायद यही कहा है मगर तरीक़ा अलग है। और मेरा ख़याल है कि उनका ये शेर उनको ख़ुद को, उनके क़लम को डिफ़ाइन करने के लिए काफ़ी है-

मैं क्यों सोचूँ किसी ने क्या कहा है
मेरे जीने का अपना फ़लसफ़ा है






समीक्ष्य पुस्तक- कुछ निशान काग़ज़ पर
विधा- ग़ज़ल
रचनाकार- के. पी. अनमोल
प्रकाशन- किताबगंज प्रकाशन, गंगापुरसिटी (राजस्थान)
संस्करण- प्रथम (2019)
पृष्ठ- 128
मूल्य- 195/- (पेपरबैक) 395/- (हार्ड बाउंड)


- फ़ानी जोधपुरी

रचनाकार परिचय
फ़ानी जोधपुरी

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