मई 2020
अंक - 60 | कुल अंक - 61
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

विमर्श

डॉ. जयप्रकाश कर्दम की कविताओं में धार्मिक चेतना
- पी. रवींद्रनाथ


धर्म के बारे में डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन लिखते हैं कि "धर्म एक प्रकार का विश्वास या अंतर्दृष्टि है। हम इसलिए इसे विश्वास की संज्ञा देते हैं कि आध्यात्मिक उपलब्धि में अन्य तरह की उपलब्धियों की भांति गलतियाँ हो सकती हैं और उसकी जाँच के लिए तर्कसंगत अनुसंधान की आवश्यकता है।"1 इससे यह स्पषट होता है कि धार्मिक मान्यताएँ परिवर्तनशील हैं। शाश्वस्त सत्य नहीं हैं। ये मनुष्य की उपज हैं। धर्म तो मानव जीवन का अनिवार्य अंग है। भारतीय समाज की धार्मिक मान्यताएँ हजारों वर्ष पुरानी है। ये पोती, पुराण सामाजिक असमानता के पोषक हैं। यह वर्तमान की नहीं, भूतकाल की श्रेष्ठ चीज है। इसकी शुरूआत जब हुई तब मनुष्य प्रकृति के सामने असहाय खड़ा था- भूखा, कामातुर और बर्बर। लेकिन आज विज्ञान का युग है। नए-नए आयाम खोज लिए जा रहे हैं। धर्म की प्रासंगिकता भी आज चर्चा की प्रधान बिंदु इसलिए है कि इसकी उपलब्धि सब लोगों को नहीं मिल रही है, वरना धार्मिक मान्यताओं ने दलितों के जीवन को बरबाद किया है। धर्म की आवश्यकता पर डॉ. जयप्रकाश कर्दम जी लिखते हैं कि "धर्म एक सामाजिक व्यवस्था है। समाज की संरचना और नियंत्रण में धर्म की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। वस्तुत: धर्म का अभिप्राय एक जीवन पद्धति या आचरण की एक संहिता से है, जो व्यक्ति के रूप में और समाज के एक सदस्य के रूप में व्यक्ति की क्रियाओं को नियंत्रित करती है।"2 बाबा साहब डॉ. अंबेडकर की दृष्टि में मनुष्य के जीवन में धर्म एक अनिवार्य अंग है। मार्क्सवादी विचारधारा में 'धर्म लोगों की अफ़ीम है।' इस विचारधारा के उनुसार धर्म यथार्थ का विकृत, काल्पनिक चिंतन है।

भारतीय समाज में धर्म के आधार पर सभी लोगों का समान दर्जा नहीं है। श्रेष्ठ, कनिष्ठ, ऊँच, नीच के भेद से जातियों के दर्जे पैदा हुए हैं। वर्ण एवं जाति का प्रबल आधार धर्म ही है, मतलब धार्मिक ग्रंथ हैं। हजारों सालों से शूद्रों को शिक्षा से वंचित रखा गया। गुलामी की जंजीरों से बाँध दिया गया। आज बुद्ध-बाबा साहब डॉ. अंबेडकर की विचारधारा ने इन गुलामी जंजीरों को तोड़ने का प्रयास किया है । अतिशूद्र एवं अस्पृश्य की संज्ञा देकर जिन जातियों को अंधविश्वासों का जहर पिलाया था, आज वह तोड़ी गयी है। आज दलित अन्याय के विरूद्ध आवाज़ उठाये जा रहे हैं। बुद्ध-बाबा साहब की विचारधारा से प्रेरित दलितों ने अपना साहित्य स्वयं लिखने में सफलता प्राप्त की है । आज भारत के लगभग सभी भाषाओं में दलित साहित्य लिखा जा रहा है । समाज के हर पहलू पर तर्कसंगत विश्लेषण कर साहित्य का नया आयाम बन गया है । आरोपों एवं अवरोधों को पार कर दलित साहित्य दलितों की चेतना में सक्षम भूमिका निभा रहा है । दलित साहित्य हमेशा उस सच्चाई की तरफ़ समाज का ध्यान आकर्षित करना चाहता है । दलित साहित्य के वरिष्ठ लेखक ओम प्रकाश वाल्मीकि जी लिखते हैं कि " भारतीय समाज व्यवस्था ने दलितों के प्रति जो साजिशें रचीं, शोषण के जो हथकंडे इस्तेमाल किए, उसने हजारों सालों में दलितों को जर्जर कर दिया । उनकी दीन, हीन स्थितियों की निर्मिति इसी व्यवस्था की देन है । कोई भी धर्मशास्त्र उठाकर देख लीजिए, कोई भी स्मृति, संहिता, पुराण उठाकर देखिए, दलितों के प्रति दुर्भावनाओं, घृणा, प्रताड़न के तमाम तत्त्व वहाँ मौजूद मिलेंगे । "3 हिंदू धर्म के पाखंडी तत्त्वों से दलित अपने को बचाना चाहते हैं । हिंदू धर्म को धर्म नहीं मानते हैं । महारोग मानते हैं । बाबा साहब डॉ.अंबेडकर कहते हैं कि " यदि किसी मनुष्य को संसर्गजन्य रोग हो जाता है, तो उसे 'क्वारंटाइन' ( जलयान में किसी को संसर्गजन्य रोग हो जाए तो उसे उलग रखते हैं , वह समय ) में रखा जाता है, उसी तरह हमें हिंदुओं से अलिप्त ( अलग ) रहना चाहिए । अछूतों को हिंदू समाज से कभी भी न्याय नहीं मिलेगा, हिंदू धर्म महारोग है, उससे अछूत लोगों को अपना बचाव रखना होगा, धर्मांतरण ही उसका एकमात्र उपाय है । "4 हिंदू धर्म दलितों के लिए नरक माना गया है, इस धर्म से अलग होना ही बेहतर है । दलित साहित्य भी इसी बिंदु पर जोर दिया गया है । ईस्वर, पुनर्जन्म, कर्मफल, भाग्यवाद आदि पर प्रश्नों की वृष्टि करने लगी है । आज दलित साहित्य हिंदू धर्म से मुक्ति चाहता है । आस्तिकों का मानना है कि ईश्वर सर्व व्यापी है । ईश्वर की इच्छा से सब काम हो रहे हैं । उसकी इच्छा के बिना पत्ता तक नहीं हिलता है । इस दुनिया में जो कुछ हो रहा है उसके पीछे ईश्वर की सत्ता है । दलितों के दीन, हीन, दु:ख, पीड़ामय जिंदगी का कारण भी ईश्वर है । दलित चेतना के श्रेष्ठ कवि डॉ.जयप्रकाश कर्दम की कविताओं में धार्मिक चेतना का प्रबल स्वर देखा जाता है । कवि बुद्ध - बाबा साहब अंबेडकर की विचारधारा को आगे ले जाने में महती भूमिका निभा रहे हैं । आचरण पर बल देते हुए बौद्ध धर्म में दीक्षित हुए हैं । उसने अपने आचरण से कथनी और करनी में समान भूमि स्थापित की है । भाग्य, भगवान, पुनर्जन्म, परलोक आदि में विश्वास के बजाय वैज्ञानिक सोच पर बल दिया है । अंध विश्वासों पर, ईश्वर के अस्तित्त्व पर प्रहार करते हैं । आचरण, शील पर बल देते हैं , और स्वाभिमान की चेतना जगाते हैं । उसने भारतीय समाज व्यवस्था और धर्म के सारे दावे खोखला सिद्ध कर दी है । निषेध, नकार, आक्रोश तथा विद्रोह उनकी कविताओं में देखी जाती है । वर्ण - जाति की अमानवीय व्यवस्था के विरूद्ध समाज में एक माहौल बनाया है । ईश्वर के अस्तित्व का प्रश्न करते हुए  ' शुक्र है तू नहीं है ' कविता में कवि लिखते हैं -
      "   जो कुछ भी होता है  
      उस सबका कारण 'तू' है
      इसका मतलब, सदियों से
      मेरे शोषण और हत्याचार का कारण भी
      तू है
     तू ( बड़ा न्यारी और दयावान ) है
     सब कर्मों के अनुसार
     फल देनेवाला है  
     फिर बता
    तूने मेरे साथ अन्याय क्यों किया
    मुझे जिल्लत का ज़हर क्यों दिया ? "5


वर्ण - जाति व्यवस्था के हिंदू धर्म ने इस देश की 85 प्रतिशत आबादी को धर्म के नाम पर गुलाम बना दिया । धर्म के आधार पर शोषण किया । अमानवीय जीवन जीने पर मजबूर किया । सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, धार्मिक, शैक्षणिक आदि अधिकारों से वंचित रखा गया । आधुनिक भारत में महात्मा ज्योतिबा फुले, पेरियार रामस्वामी नायकर, नारायण गुरू, बाबा साहब अंबेडकर आदि ने पीड़ित समाज को उद्धार किया 

कवि डॉ. जयप्रकाश कर्दम जी की कविताओं में गुलामी का प्रश्न है । दलित के दीन, हीन, दरिद्र जीवन के जिम्मेदार पर आक्रोश है । धार्मिक संचेतना का स्वर है । अपने गौरवशाली इतिहास की खोज़ है । हिंदू धर्म के पाखंडी तत्त्वों पर आग है । ' धर्म ग्रंथों को आग जलानी होगी ' कविता में वह लिखते हैं  -

    " जब तक स्मृतियाँ रहेंगी
      रामायण, गीता और वेद रहेंगे
      तब तक वर्ण - शुचिता रहेगी
      अस्पृश्यता रहेगी, जातिवाद रहेगा
      समाज में विघटन
      और विद्वेष रहेगा
     समाज को प्रगतिशील बनाना है
     जाति के जहर को मिटाना है
     तो इन तथाकथित धर्म ग्रंथों को
     आग लगानी होगी । "6


कवि आगे कहते हैं कि धर्म ग्रंथों में जो बातें कही गयी हैं वे सब झूठी हैं । ये सब धोखेबाजों की रचना है । सामाजिक असमानता के पोषक हैं । वर्णों के अनुसार होनेवाले मोक्ष और ईश्वर के कर्मफल को न कारना है । विषमताओं के संरक्षण को ध्वस्त करना है ।
गाँधी जी ने दलितों को हरिजन का नाम दिया है । हरिजन का मतलब ईश्वर की संतान है । गाँधी जी ने हरिजन को उपेक्षा या अपमान का नहीं सेवा का पात्र माना है । यह शब्द दलितों को स्वीकार्य नहीं है कि परंपरावादी वर्ण - जाति व्यवस्था में हरिजन शब्द अवैध संतान का सूचक है । दूसरा गाँधी जी वर्ण व्यवस्था के प्रबल समर्थक थे । ' हरिजन ' कविता में कवि डॉ.जयप्रकाश कर्दम जी लिखते हैं -
" परम पिता है यदि हरि
यानी ईश्वर
और सब हैं उसकी संतान तो
क्यों नहीं सब हरिजन
क्यों कहा जाता है हरिजन मुझको ही । "7

 

कवि आगे कहते हैं कि वह अपने माँ - बॉप को ही जानते हैं । वह अपने माता - पिता के जने हैं । ईश्वर उसका पिता नहीं है । दलितों के लिए हरिजन शब्द ही नहीं ईश्वर भी त्याज्य है । आज दलित ईश्वर को नही मानते हैं । उसकी सत्ता को स्वीकार नहीं करते हैं । ईश्वर के नाम पर होनेवाले पाखंड, प्रवंचना, प्रपंच, विभेद, विखंडन, पीड़ा, प्रताड़न और उत्पीड़न का विरोध करते हैं । कवि दलितों में स्वाभिमान जगाना चाहते हैं । न्यूटन, अब्राहिम लिंकन को उदहरण लेने को कहते हैं कि हर समस्या का हल संभव है । कोई लक्ष्य अप्राप्य नहीं है । बाबा साहब डॉ.अंबेडकर से प्रेरणा लेने को कहते हैं । जिंदगी का हर युद्ध मैदान से पहले मस्तिष्क में खेला जाता है । जिंदगी हिम्मत के साथ आगे बढ़ने की बात करते हैं । ' अप्प दीपो भव ' कविता दलित के मन में एक हिम्मत पैदा करती है । जिंदगी अपना कुछ करने की और बनने की प्रेरणा देती है । धार्मिक अँध विश्वासों को तोड़कर अपने आप में एक लक्ष्य बनाने में अप्प दीपो भव बनने की हिम्मत देती है -
" आगे बढ़ना है यदि
 अपने लक्ष्य को बड़ा बनाओ
 तमसो मा  ज्योतिर्गमय की याचना छोड़
 अप्प दीपो भव को अपनाओ । "8

 

आज भी दलित अपनी अज्ञानता के कारण वही पुरानी हिंदू संप्रदाय में जकड़े हुए हैं । अपना दीप आप बनने में असमर्थ हैं । बाबा साहब डॉ.अंबेडकर दलितों का मसीहा है । दलितों के जीवन प्रदाता हैं । उसने दलितों को स्वतंत्रता के पंख दिया है । हर जगह भारत रत्न डॉ. अंबेडकर की जयंती पर लोग उनको याद करते हैं और प्रेरणा लेते हैं । कयी जगह वही पुरानी मान्यताओं व अंधश्रद्धा में डॉ.अंबेडकर की पूजा करते दिखाई दे रहे हैं । कवि इसके विरोध में लिखते हैं -
" देवता नहीं है अंबेड़कर
   पूजा घर में
   बंद कर दिए जाए,
   अंबेडकर एक जीवंत विचार है
   श्रद्धा के आवेग में
   जीवंत विचार को मत दबाओ
   अंबेडकर को भगवान मत बनाओ । "9

 

समाज में मनुष्य ही केंद्र बिंदु है । समता, ममता, बंधुता, भाईचारा, सामाजिक मूल्य हैं । सत्य, अहिंसा, नैतिकता, ईमानदारी और मनुष्यता ही सच्चा धर्म है । कवि विश्वास करते हैं कि दुनिया के जितने भी दर्शन हैं  उनमें बौद्ध दर्शन ही सर्वोपरि है । बौद्ध दर्शन की अवधारणा में समता और मनुष्य ही सबसे बड़ा मूल्य है ।
        हमारे समाज में देवभाषा संस्कृत में संबोधन करना एक परिपाटी रही है । कवि देव भाषा को धिक्कारता है । यह भाषा दलितों का नहीं है । जिसके लिए दलित अस्पृश्य रहा । जिस भाषा के उच्चारण मात्र से शूद्रों की जिह्वा काटी गयी । कानों में गरम शीश डाला गया था । आँखें फोड़ी गयी थीं । इसलिए कवि उस भाषा को न कारता है । उस भाषा में संबोधित करना अपमान मानते हैं । ' जन की भाषा में ' कविता में कवि कहते हैं -
" जिनके तीर जैसे नुकीले शब्द
  बींध जाते हैं मेरे कलेजे को
  कर देते हैं आहत
  मेरी चेतना को आज भी
  मैं अस्वीकारता हूँ
  धिक्कारता हूँ
  अपने विरोध में खड़ी
 उस देव भाषा को । "10

 

हजारों सालों की पीड़ा उस ईश्वर के कारण दलितों को भोगना पड़ा । आज के स्वतंत्रता के युग में ईश्वर, ईश्वर से संबंधित धार्मिक ग्रंथ, ईश्वर की भाषा को दलित तिरस्कार करते हैं । ईश्वर के रूपों, स्वरूपों में विश्वास नहीं करते हैं । आस्थिकता की धारणाओं को नफरत करते हैं  । सदियों से ईश्वर के साम्राज्य में दलित बहिष्कृत रह गये हैं । नास्तिक बनकर रह जाने को तैयार हैं । कवि ढंका बजाकर घोषणा करते हैं अपनी ' मनुष्यता के साम्राज्य का नागरिक ' कविता में  -  " यदि ईश्वर को मानना / उसके प्रति आस्थावान होना / परिभाषा है आस्तिकता की /  तो घोषणा करता हूँ मैं ढंके की चोट / कि आस्तिक नहीं हूँ मैं । "11
अनादि से ईश्वर के साम्राज्य में उपेक्षा, दमन और वर्जनाओं का दंश दलितों को सहना पड़ा है । दलित अपने समाज से ईश्वर उसकी दुनिया, उसके मूल्य और उसकी सत्ता को बहिष्कृत करते हैं । दलितों के आस्था का केंद्र मनुष्य और मनुष्यता ही सबसे बड़ा मूल्य है । मनुष्यता के साम्राज्य में नागरिक मानते हैं । ' मनुष्यता ' की कविता  में कवि लिखते हैं -
" जो मनुष्यता को
   सबसे बड़ा धर्म कहता है
   मनुष्यता यदि धर्म है तो
   इस धर्म को बचाओ
   मनुष्य के दुश्मनों को
   सबक सिखाओ । "12


कवि जयप्रकाश कर्दम जी अपनी कविताओं के माध्यम से दलितों में धार्मिक चेतना लाने का भरसक प्रयास किया है । वह यह संदेश देते हैं कि इंसान इंसान से प्रेम करें । स्वीय चेतना से आगे बढ़ें । अपने आप पर विश्वास करें । शांतिमय जीवन की ओर बुद्ध के चिंतन में आ जायें 'राहुल' खंडकाव्य में बौद्ध धर्म की ओर आने का संकेत करते हैं । सद्कर्म, नैतिकता और न्याय पर बल देनेवाला धर्म ही सर्वोच्च धर्म है । बौद्ध धर्म में सबको मान मिलता है और मानवता का सम्मान है । हारे, थके, निराश, दु:खी  सबका कल्याण मिलता है ।
" पूजा और प्रसाद कभी भी
   धर्म नहीं होता है
   कर्मकांड पाखंड कभी
   सत्कर्म नही होता है ।
   सद्कर्म वही होता है
   पर - हित निमित्त है होता
   नैतिकता और न्याय सदा
   सर्वोच्च धर्म है होता । "13
डॉ.जयप्रकाश कर्दम जी दलित साहित्य में जाने - माने, पहचाने लेखक हैं । अब तक उनके तीन कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं और दो कविता संग्रह प्रकाशित होनेवाले हैं । उनकी कविताओं में भोगा हुआ यथार्थ है । उनकी कविताओं में एक आग है वह सामाजिक परिवर्तनगामी हैं । दलितों को धार्मिक चेतना के बगैर सामाजिक चेतना संभव की बात नहीं है । इसलिए उनकी कविताओं में धार्मिक चेतना का स्वर फूट पड़ता है । उनकी रचनाओं पर लगभग 60 से अधिक शोध कार्य संपन्न हुए हैं । देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों में उनका साहित्य पढ़ाया जा रहा है । दलित चेतना के प्रखर कवि के रूप में जनमानस में अपना अलग स्थान बनाया है ।
   

संदर्भ :
1.    डॉ. सर्वेपल्ली राधाकृष्णन, हिंदी रूपांतरकार गोवर्धन भट्ट, चेतक पब्लिशिंग हाउस, 1/2 गली नं 5, पांडव रोड़, विश्वास नगर, शाहदरा, दिल्ली -110032, संस्करण 2014, पृष्ठ -12 &13.
2.    डॉ.जयप्रकाश कर्दम, धर्मांतरण और दलित, सम्यक प्रकाशन, 32/3 पश्चिमीपुरी,नई दिल्ली - 110063, प्रथम सम्यक संस्करण 2014, पृष्ठ -9.
3.    ओम प्रकाश वाल्मीकि, दलित साहित्य अनुभव संघर्ष एवं यथार्थ, राधाकृष्ण प्रकाशन प्राइवेट लिमिटेड, 7/31, अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली - 110002, पहला संस्करण 2013, पृष्ठ -111.
4.    डॉ.आंबेडकर के प्रेरक भाषण भाग -1, अनुवाद एवं संकलन विनयकुमार वासनिक, सम्यक प्रकाशन, 32/3 पश्चिमीपुरी,नई दिल्ली - 110063, प्रथम संस्करण 2014, पृष्ठ - 51.
5.    डॉ.जयप्रकाश कर्दम, गूँगा नहीं था मैं, सागर प्रकाशन, 77/सी/52/1, मुकेश नगर, दिल्ली - 110032, तृतीय संस्करण 2006, पृष्ठ - 35 & 36.
6.       वही      -     पृष्ठ - 74.
7.    डॉ. जयप्रकाश कर्दम, बस्तियों से बाहर, अमन प्रकाशन, 104A/80C, रामबाग,कानपुर 208012, पृष्ठ - 19.
8.    डॉ.जयप्रकाश कर्दम, तिनका तिनका आग, सम्यक प्रकाशन, 32/3, क्लब रोड, पश्चिमीपुरी चौक, नई दिल्ली - 63, पृष्ठ - 10.
9.     वही      -   पृष्ठ  -  22.
10.    डॉ.जयप्रकाश कर्दम, तिनका तिनका आग, सम्यक प्रकाशन, 32/3, क्लब रोड, पश्चिमीपुरी चौक, नई दिल्ली - 63, पृष्ठ -  57.
11.    फेसबुक पर लाइव कविता का पाठ 21/04/2020, 6.00 PM
12.    डॉ.जयप्रकाश कर्दम, तिनका तिनका आग, सम्यक प्रकाशन, 32/3, क्लब रोड, पश्चिमीपुरी चौक, नई दिल्ली - 63, पृष्ठ -  57.
13.     डॉ. जयप्रकाश कर्दम, राहुल खंडकाव्य, डॉ. जयप्रकाश कर्दम, बस्तियों से बाहर,      अमन प्रकाशन, 104A/80C, रामबाग,कानपुर 208012, पृष्ठ - 19.


 


- पी. रवींद्रनाथ

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