मई 2020
अंक - 60 | कुल अंक - 61
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

ग़ज़ल-गाँव

ग़ज़ल-

ज़िल्लतों के अँधेरे मिटा दूँगी मैं
आसमां पर चमक कर दिखा दूँगी मैं

तू अगर प्यार देगा तो ऐ हमसफ़र!
ज़िन्दगानी को जन्नत बना दूँगी मैं

मैं बदल दूँगी सारी फ़िज़ा इश्क़ से
गीत गाकर ये महफ़िल सजा दूँगी मैं

जब भी देगा ज़माने में कोई फ़रेब
देख कर प्यार से मुस्कुरा दूँगी मैं

दोस्तों पर तो कुर्बान जां है मगर
दुश्मनों को भी अपने दुआ दूँगी मैं

अपना तन-मन समर्पण है उस पर 'निधि'
और क्या है मेरे पास क्या दूँगी मैं


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ग़ज़ल-

कुछ नहीं हूँ मैं, मेरे हो आप ही सबकुछ
जान भी, दिल भी, जिगर भी, ज़िन्दगी सब-कुछ

करते हैं मजबूर जीने के लिए मुझको
तुम ही मेरी साँस हो और जान भी, सबकुछ

आप ही मर्क़ज़ हो इनके, आप बिन क्या है
दिल्लगी, दिल की लगी और आशिक़ी सबकुछ

रात हो, दिन, दोपहर हो शाम हो मेरी
आप ही हो धूप तपती, चाँदनी सब-कुछ

हो रहे हैं आपके नज़दीक होने से
हड़बड़ी भी, गड़बड़ी भी, खलबली सब-कुछ


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ग़ज़ल-

हर फ़ैसले पे तेरे मैंने अमल किया है
तेरे ही इश्क़ ने तो मुझको ग़ज़ल किया है

जो मुझको जानते हैं वो सब ये पूछते हैं
ये किसकी सोहबतों ने तुझको सरल किया है

हर वक़्त मुस्कुराते रहते हैं होंठ लेकिन
आँखों को तेरे ग़म ने अक्सर सजल किया है

इस झोंपड़ी पे अब तो होता है नाज़ हमको
तेरे क़दम पड़े तो इसको महल किया है

मैं थम के रह गयी थी इक संग-ए-राह जैसी
तूने ही ज़िन्दगी में रद्द-ओ-बदल किया है

थी ये 'निधि' तो जैसे पत्थर की एक मूरत
तेरी छुअन ने मेरे दिल को कँवल किया है


- निधि भार्गव मानवी

रचनाकार परिचय
निधि भार्गव मानवी

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ग़ज़ल-गाँव (1)