मई 2020
अंक - 60 | कुल अंक - 61
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

विमर्श

मात्रा पतन की स्वीकार्यता: कुछ सवाल
- डॉ. राम ग़रीब पाण्डेय 'विकल'


दुनिया की जितनी भी भाषाएँ हैं, उनका मानक स्वरूप निर्धारित होने के पूर्व उनका स्वरूप बोलियों का होता है। उन्हीं बोलियों के बहुतायत में प्रचलित और बहुलता में मान्य शब्दों को सहेजकर किसी भाषा का एक मानक स्वरूप तैयार होता है। इसके पश्चात जब वह भाषा साहित्य सृजन का साधन बनती है, तब उसके व्याकरणिक स्वरूप का निर्धारण होता है। साहित्य सृजन की बात की जाय, तो प्रायः हर बोली या भाषा में साहित्य सृजन की शुरूआत काव्य से ही होती है। भाषा के मानक स्वरूप का निर्धारण करने से लेकर, काव्य भाषा तक में लोक-व्यवहृत पद्धति का अपना प्रभाव सर्वत्र दिखाई देता है। यही कारण कहा जा सकता है, कि अनेक बार व्याकरण द्वारा निर्धारित मानदण्डों से बाहर रहकर भी शब्दों का उच्चारण व्यवहार में देखने को मिलता है। इन बातों को भाषाविज्ञान के ध्वनि प्रकरण में विस्तार से विश्लेषित किया गया है।
लोक-व्यवहार में अनेक शब्द कई बार मुख-सुख के कारण, तो कई बार प्रयत्न-लाघव के कारण अपना रूप बदलते हैं और भाषा के विकास की अवधारणा को पुष्ट करते हैं। यही कारण है कि अनेक शब्दों का स्वरूप, उच्चारण बलाघात के कारण परिवर्तित हो जाता है। इन परिवर्तित शब्दों में देशज-मानक शब्दों के साथ ही अन्य भाषा से आये हुए शब्द भी समाहित होते हैं। उदाहरण के रूप में मालूम और दूकान शब्दों को लें। लोक-व्यवहार में इनका उच्चारण क्रमश: मालुम और दुकान के रूप में होता है। यद्यपि हमें पता होता है कि मालुम और दुकान उच्चारण या प्रयोग सही नहीं हैं फिर भी हम इसे स्वीकार करते हैं। इतना अवश्य है कि लिखित रूप में यह मालूम और दूकान ही रहते हैं। इस प्रकार ‘लू’ और ‘दू’ की दीर्घ मात्राओं का उच्चारण जब लघु रूप में होता है तब यह मात्रा-पतन का उदाहरण प्रस्तुत करता है।


भारत देश में अनेक क्षेत्रीय भाषाओं-बोलियों में काव्य रचना हो रही है, किन्तु व्यापक स्तर पर काव्य-रचना में हिन्दी भाषा ही प्रमुख माध्यम है। हिन्दी भाषा की यह उल्लेखनीय सामर्थ्य है कि अन्य भाषायी शब्दों को भी इसने सहजता से आत्मसात कर लिया है। यही वज़ह है कि आज हिन्दी में काव्य की अनेकानेक विधाओं के साथ ही, ग़ज़लों का सृजन भी उतनी ही उदारता के साथ हो रहा है। ग़ज़ल विधा के व्याकरण (अरूज़) में मात्रा-पतन की सुविधा स्वीकार्य होती है। ग़ज़ल चूँकि हिन्दी में भी कही या लिखी जा रही है, तो बहुत स्वभाविक है कि हिन्दी ग़ज़ल में भी मात्रा-पतन की इस सुविधा का प्रयोग किया जाएगा। किन्तु जब मात्रा-पतन की यही सुविधा हिन्दी गीतों या अन्य विधाओं में लेने की बात आती है, तब अनेक विद्वान इसे सिरे से नकार देते हैं। इसके लिए भाषा के गद्य एवं पद्य दोनों ही प्रकार के साहित्य की पड़ताल करने की आवश्यकता समझ में आती है।


हिन्दी साहित्य के गद्य का विकास उसके आधुनिक काल में हुआ, किन्तु उसके पूर्व ही पूर्व मध्यकाल (भक्तिकाल) जिसे हिन्दी साहित्य का स्वर्णयुग भी कहा जाता है, में हिन्दी काव्य ने एक ऐसी आधारशिला रखी जिस पर हमें आज भी गर्व होता है। इसी काल में मीराबाई, कबीर, सूरदास, तुलसीदास जैसे अनेक ऐसे रचनाकार हुए, जिनका काव्य आज भी हमारा ध्यानाकर्षण कराने में सक्षम है। इसलिए संक्षेप में ही सही, इनके काव्य पर दृष्टिपात कर लेना उचित प्रतीत होता है। क्रम से एक-एक को देखना समीचीन होगा -
मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई (मीराबाई)। मात्र इसी पंक्ति को देखें तो मेरे के ‘रे’, ‘तो’ और गोपाल के ‘गो’ का मात्रा पतन स्पष्ट दिख रहा है।
कुछ उदाहरण तुलसीदास के विश्वप्रसिद्ध महाकाव्य ‘रामचरित मानस’ से दृष्टव्य हैं-
“एहिं बिधि रहा जाहि जस भाऊ”            या
“एहिं बिधि सो दच्छिन दिसि जाई”            या
“राम को रूप निहारति जानकी ....... “             (कवितावली)
यहाँ पहली दोनों ही चैपाइयों में प्रयुक्त ‘एहिं’ में ‘ए’ का मात्रा-पतन हुआ है, तो तीसरे उदाहरण में ‘को’ और जानकी के ‘की’ का मात्रा-पतन हुआ दिखता है। यहाँ यह बात ध्यान रखने योग्य है, कि तुलसी के समूचे काव्य में मात्रा-पतन के अनगिनत उदाहरण विद्यमान हैं।


उत्तर मध्यकाल (रीतिकाल) से भी एक उदाहरण देख लिया जाय -
“अति सूधो सनेह को मारग है, जहाँ नेकु सयानप बाँक नहीं”।  घनानन्द की इस एक ही पंक्ति में सूधो के ‘धो’, ‘को’, जहाँ के ‘हाँ’ का मात्रा-पतन साफ़-साफ़ दिख रहा है।
कतिपय विद्वानों का यह तर्क है, कि आधुनिक काल के पूर्व का काव्य बोलियों का काव्य है, अतः इसे हिन्दी के सन्दर्भ में मात्रा-पतन के लिए उदाहरण नहीं माना जा सकता। यहाँ दो बातें विचारणीय हो जाती हैं। पहली यह, कि क्या बोलियों को अलग करने के बाद किसी भी भाषा को पूर्ण कहा जा सकेगा? दूसरी यह कि ‘रामचरित मानस’ हिन्दी काव्य परम्परा की रीढ़ है, उसे हिन्दी काव्य की गणना से बाहर रखकर क्या हम हिन्दी की काव्य परम्परा को समझ सकेंगे? इसके बावजूद उनके तर्कों को ध्यान में रखते हुए आधुनिक काल के प्रतिष्ठित काव्यों पर भी दृष्टिपात करने में कोई 
बुराई नज़र नहीं आती। इसलिए राष्ट्रकवि मैथिली शरण गुप्त के बहुचर्चित एवं प्रतिष्ठित काव्य ‘यशोधरा’ की कतिपय पंक्तियाँ अवलोकनीय हैं-

“ढलक न जाय अर्घ्य आँखों का, गिर न जाय यह थाली”   या
“भाग्य आयँगे फिर भी भागे, चुप रह, चुप रह, हाय अभागे!”  


इसी प्रकार पायँगे, लायँगे, जायँगे, दिखलायँगे जैसे शब्द जो क्रमशः पायेंगे, लायेंगे, जायेंगे, दिखलायेंगे की जगह प्रयोग किये गये हैं, भी मात्रा पतन के उदाहरण के रूप में देखे जा सकते हैं। भाषा की प्रांजलता के लिए विख्यात छायावादी कवि जयशंकर प्रसाद का ‘कामायनी’ हिन्दी काव्य-जगत का उत्कृष्ट कोटि का महाकाव्य माना जाता है। एकाध उदाहरण वहाँ से भी देखना उचित होगा-
“आँसू औ’ तम घोल लिख रही तू सहसा करती मृदुहास”  (आशा सर्ग)
“जलधि के फूटें कितने उत्स-द्वीप कच्छप डूबें उतरायँ”  (श्रद्धा सर्ग)    
उपर्युक्त दोनों उदाहरण में क्रमशः और के लिए ‘औ’ का प्रयोग तथा उतरायें के लिए ‘उतरायँ’ का प्रयोग मात्रा-पतन की ओर स्पष्ट संकेत करते दिखते हैं।
यहाँ जितने भी उदाहरण दिये गये हैं और स्थानाभाव के कारण जो नहीं दिये जा सके, सब में एक बात की ओर ध्यान दिया जाना आवश्यक प्रतीत होता है और वह है - कतिपय अपवादों को छोड़कर मात्रा-पतन ‘ए’ और ‘ओ’ का ही हो रहा है। इसके कारण पर विचार करने पर हम पाते हैं, कि लोक व्यवहार में ‘ए’ और ‘ओ’ ध्वनियों के लघुरूप को उच्चारण में स्वीकार किया जा चुका है, किन्तु देवनागरी लिपि में इनके लघुरूपों को लिखने की कोई व्यवस्था नहीं है। ऐसी दशा में जब इनके लघुरूपों का प्रयोग होता है, तब वह मात्रा-पतन की श्रेणी में स्वयमेव चला आता है। इसके लिए काव्यभाषा से बाहर आकर सामान्य बोलचाल की भाषा का भी अवलोकन करना उचित होगा।


हमारे हिन्दी शब्द भण्डार में अनेकानेक तत्सम, तद्भव एवं अन्य भाषायी शब्द विपुल परिमाण में पाये जाते हैं, जो लिखित रूप में तो व्याकरण की दृष्टि से गुरु हैं, किन्तु उच्चारण बलाघात के कारण वह लघु हो जाते हैं। कतिपय शब्द मात्र दृष्टान्त के रूप में नीचे दिये जा रहे हैं।
केदार, कोटवार, कोतवाल, कोयला, खेतिहर, चोरकट, गोलाई, गेहुँआ, जोड़ाई, जेठानी, देवरानी, डोलची, घोटाला, ढोलकिया, लोहिया, लोहानी, सोनार, लोहार, चेहरा, मेहनत, मेहमान, मोहल्ला आदि। इसी तरह के शताधिक शब्द सूचीबद्ध किये जा सकते हैं। यहाँ सूचीबद्ध शब्दों में पहला ही शब्द ‘केदार’ संस्कृत भाषा का है। मात्रा गणना के नियमानुसार इसका मात्राभार ऽ ऽ । (गुरु गुरु लघु या 2 2 1) होगा, किन्तु उच्चारण विधि के अनुसार इसका मात्राभार सदैव । ऽ । (लघु गुरु लघु या 1 2 1) लिया जाता है। इसी प्रकार सूचीबद्ध एवं सूची में न लिये गये अनेकानेक शब्दों का भी मात्राभार लिखित में गुरु होने के बाद भी उच्चारण बलाघात के कारण लघु लिया जाता है।
कतिपय विद्वान मात्रा-पतन का सम्बन्ध सीधे ग़ज़ल और उर्दू से जोड़ने के पक्षधर मिलते हैं। यहाँ मेरा ऐसा विचार है कि मात्रा-पतन किसी भाषा का नहीं अपितु भाषाविज्ञान का मामला मानना अधिक प्रासंगिक लगता है। मात्रा-पतन को ग़ज़ल के विधान में भी बहुत अच्छा नहीं माना जाता है, तो हिन्दी में भी उसके प्रयोग से बचना ही उचित है। इसी बात को इस तरह भी कहा जा सकता है, कि मात्रा-पतन को अधिकार के रूप में नहीं सुविधा के रूप में देखा जाना चाहिए। इस सबके बावजूद जैसे ग़ज़ल विधा में कहीं-कहीं मात्रा-पतन की अनिवार्यता (जैसे क़ामिल बह्र में) हो जाती है, उसी प्रकार हिन्दी काव्य में भी, कई बार यह अपरिहार्य हो जाता है। इसके पीछे एक तो लोक प्रचलित शब्दों का परिवर्तित रूप होता है, तो भाव के अनुरूप आ रहे शब्द का विस्थापन भी कई बार काव्य-सौन्दर्य में बाधक बनता है। एक बात और भी उल्लेखनीय है। मुक्तछन्द कविता के अतिरिक्त काव्य की प्रायः हर विधा किसी न किसी छन्द में आबद्ध होती है, इसीलिए गेय भी होती है। गेयता का सीधा सम्बन्ध लयात्मकता से है। इसी बात को ध्यान में रखते हुए कतिपय विद्वानों ने छन्द के वार्णिक व मात्रिक के अतिरिक्त लयात्मक छन्द भेद का भी उल्लेख किया है। अंगेजी साहित्य में इसी को “लिरिकल पोएट्री” कहा गया है। गेयता के पैमाने पर जब काव्य को रखा जाता है, तब वहाँ स्वर के अतिरिक्त ताल का भी ध्यान रखना पड़ता है। ताल जो मात्राओं पर ही निबद्ध होते हैं, उनके अनुरूप काव्य की मात्राओं में पतन की आवश्यकता भी होती है।


इस बात को विराम लगाने के पूर्व एक और बात की चर्चा करना आवश्यक लग रहा है। ग़ज़ल हो या गीत या काव्य की अन्य कोई विधा, मात्रापतन की बात पर यदाकदा चर्चा हो ही जाती है, किन्तु मात्रा-विस्तार की बात कोई नहीं करता। बहुत सीमित ही सही किन्तु काव्य में मात्रा विस्तार होते भी देखा जाता है। लोकभाषाओं के काव्य में तो इसे बहुतायत में देखा जा सकता है। जैसे - ‘कइसन के जिउ बाँची आसौं के ठार म’ में ‘म’ का उच्चारण दीर्घ होता है, किन्तु इस प्रकार के कथनों में इसका लिखित रूप सदैव लघु ही होता है। इसी प्रकार के अनेकानेक उदाहरण भरे पड़े हैं। जब बात हिन्दी की आती है, तब वहाँ ‘न’ एक ऐसा अक्षर या शब्द है जिसका प्रयोग उच्चारण में लघु एवं गुरु दोनों ही रूपों में होता है जबकि यह लिखा लघु ही जाता है। एक फिल्मी गीत का स्मरण उदाहरणार्थ किया जा सकता है- ‘न बोले न बोले न बोले रे। घूँघट के पट न खोले रे।’ इस गीत को ‘ना बोले ना बोले ना बोले रे’ के रूप में हम सुनते हैं। कई बार कुछ जगह जब इसका गुरु रूप ‘ना’ लिखित में मिलता है तब यह खटकता भी है।
समग्रता में देखा जाय, तो किसी भी छन्द के लिए निर्धारित मानदण्डों से इतर एवं व्याकरण से असम्मत प्रयोग, काव्य में दोष की श्रेणी में परिगणित किये जाते हैं, किन्तु कहीं-कहीं यही दोष काव्य की लयात्मकता, गेयता और काव्य के सौन्दर्य के लिए जब उपयोगी या सहायक होते हैं, तो यही गुण भी बन जाते हैं। इस तरह के प्रयोग, हिन्दी काव्य के साथ ही ग़ज़लों में भी बहुप्रचलित हैं। एक उदाहरण से इसे समझा जा सकता है -
भूलकर सीमा बहें नदियाँ तमाम, देखते बेबस मुहाने हो गये।
इस शेर के अरकान हैं- ‘फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलुन’। पहली पंक्ति (मिसरे) में प्रयुक्त ‘तमाम’ का अन्तिम अक्षर ‘म’ अन्तिम रुक्न ‘फ़ाइलुन’ के अतिरिक्त है, किन्तु इसे दोष नहीं माना जाता। इस तरह के प्रयोगों पर हमारे पौर्वात्य आचार्यों ने वक्रोक्ति सिद्धान्त के अन्तर्गत विचार करते हुए, इसे ‘विपथन’ नाम दिया है, किन्तु साथ ही यह भी निर्देश दिया गया है, कि यह विपथन काव्य-सौन्दर्य या बाँकपन का हेतु बने तभी अनुमत्य है।


 


- डॉ. राम ग़रीब विकल

रचनाकार परिचय
डॉ. राम ग़रीब विकल

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